वर्ष 35 / अंक - 41 / कोई भी प्रक्रिया जो नागरिकों को बिना वोट का नागरिक...

कोई भी प्रक्रिया जो नागरिकों को बिना वोट का नागरिक बना दे, संविधान के अनुच्छेद 326 और 14 का उल्लंघन है!

कोई भी प्रक्रिया जो नागरिकों को बिना वोट का नागरिक बना दे, संविधान के अनुच्छेद 326 और 14 का उल्लंघन है!

-- जस्टिस उज्ज्वल भुयान

[ वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर को लेकर चल रही बहस के बीच हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा कि वोट का अधिकार विशेषाधिकार नहीं, बल्कि भारतीय संविधान का एक मौलिक और संवैधानिक अधिकार है.]

“अगर कोई भी प्रक्रिया ऐसी है जिससे करोड़ों-करोड़ भारतीय नागरिकों से उनका वोट देने का अधिकार छिन जाए, और वे अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएं, यानी ऐसे नागरिक जिनके पास वोट का अधिकार ही न हो, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी है. कोई भी लीपापोती या कुतर्क इसे जायज नहीं ठहरा सकता.

वोट देने का अधिकार या वोटर होने का अधिकार सिर्फ एक आम कानूनी अधिकार नहीं है जो संसद के बनाए किसी कानून, जैसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 से मिला हो. यह एक ऐसा संवैधानिक अधिकार है, जो भारतीय लोकतंत्र का अविभाज्य हिस्सा है, और इस तरह यह भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे के दायरे में आता है. संविधान सभा की बहसों को देखेें तो साफ दिखता है कि हमारे संविधान निर्माताओं की मंशा यही थी कि देश के हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार मिले. पूरी चुनावी प्रक्रिया का बुनियादी आधार यही है, और यही लोकतंत्र की असली जान है.

भारतीय नागरिक की पहचान से वोट देने के अधिकार को, या वोटर लिस्ट में शामिल होने के अधिकार को, अलग नहीं किया जा सकता. यह वैसा ही होगा जैसे शरीर से आत्मा निकाल दी जाए. भारतीय संविधान दो तरह के नागरिक नहीं मानता: एक वे जिनके पास वोट का अधिकार है और दूसरे वे जिनके पास नहीं है. कोई भी प्रक्रिया जो थोक में भारतीय नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित कर दे और उन्हें बिना वोट के नागरिक बना दे, मेरी राय में सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 326 और 14 का उल्लंघन है.

जो प्रक्रिया करोड़ों-करोड़ भारतीय नागरिकों से उनका वोट देने का अधिकार छीन ले, और उन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना दे, वह संविधान की बुनियाद पर हमला है. मैं तो यहां तक कहूंगा कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को ही नकार देना है जिसे हमने भारत के संविधान के आधार पर अपनाया है.

भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार विदेशी हुकूमत के खिलाफ हमारे लंबे संघर्ष से जुड़ा हुआ है. यह हमारी आजादी की निशानी है, जो इतने संघर्ष और इतनी भारी कुर्बानियों के बाद हमें मिली. अनुच्छेद 326 से किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. कोई भी सत्ता या प्राधिकारी ऐसा नहीं कर सकता, और कोई भी अदालत न इसे मंजूरी दे सकती है, न माफ कर सकती है. संविधान से ऊपर कोई नहीं है.

अमेरिका के जस्टिस फ्रैंकफर्टर ने एक बड़ी बात कही थी कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि नागरिक होने का होता है. उनका एक कथन बहुत मशहूर है, जिसे मैं उद्धृत करना चाहता हूं:

‘लोकतंत्र हमेशा एक ऐसा पड़ाव है जो हमें आवाज देकर आगे बुलाता रहता है. यह कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है. क्योंकि आजादी के लिए जद्दोजहद लगातार चलती रहती है, यह कभी आखिरी मंजिल पर नहीं पहुंचती.’

लेकिन मैं खुद से सवाल करता हूं कि जिस नागरिक के पास वोट का अधिकार ही न हो, उसकी नागरिकता का क्या मोल रह जाता है? मुझे नानी पालकीवाला की वह बात याद आती है जो उन्होंने 28 सितंबर 1979 को, यानी लगभग पांच दशक पहले, मद्रास यूनिवर्सिटी के दीक्षांत भाषण में कही थी. उन्होंने कहा था कि आजादी खून में विरासत की तरह नहीं मिलती. हर पीढ़ी को इसकी हिफाजत करनी होगी, हर पीढ़ी को इसके लिए लड़ना होगा. तभी यह बचेगी, और तभी इसे अगली पीढ़ी को सौंपा जा सकता है.”

10 October, 2026