वर्ष 35 / अंक - 28 / भारत में दहेज के लिए होने वाली हत्याओं पर अब पहले...

भारत में दहेज के लिए होने वाली हत्याओं पर अब पहले जैसा जनाक्रोश नहीं उमड़ता

भारत में दहेज के लिए होने वाली हत्याओं पर अब पहले जैसा जनाक्रोश नहीं उमड़ता

-- मैथ्यू पियर्स

एक नए अध्ययन के मुताबिक, भारत में दहेज के लिए होने वाली हत्याएं अब पहले की तरह लोगों के गुस्से और सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बनतीं, जबकि हर साल अब भी हजारों औरतों की जान दहेज की बलि चढ़ रही है. परिवारों के बीच दहेज को लेकर होने वाले झगड़ों में जिन औरतों की हत्या कर दी जाती है या जिन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया जाता है, ऐसी घटनाएं राजनीतिक बहस से भी लगभग गायब हो चुकी हैं. यह तब है जब ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है.

अध्ययन के मुताबिक, 1988 में भारत में दहेज के कारण 1,841 मौतें दर्ज हुई थीं, जबकि 2022 में यह संख्या बढ़कर 6,516 हो गई.

पिछले साल अगस्त में दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा की 28 वर्षीय निक्की भाटी को उसके पति ने दहेज विवाद के चलते उनके छह साल के बेटे के सामने ही आग लगाकर मार डाला. इस हत्या का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो कुछ समय के लिए लोगों में गुस्सा फूटा और दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन भी हुए. लेकिन कुछ ही दिनों में यह मामला भी लोगों की याद और राजनीतिक चर्चा से ओझल हो गया. इस अध्ययन की लेखिका डॉ. कृति कपिला कहती हैं, ‘आज पूरी दुनिया में राजनीतिक विरोध पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है. भारत समेत कई देशों में सत्ताएं बेहद दमनकारी हो गई हैं और विरोध-प्रदर्शनों पर कड़ा नियंत्रण रहता है.’

लंदन के किंग्स इंडिया इंस्टीट्यूट की सामाजिक मानवशास्त्री कपिला कहती हैं, ‘असहमति या नाराजगी जताने की आजादी या तो दबा दी जाती है या लोग खुद ही सेंसरशिप करने लगते हैं.’

भारत में 1961 से ही दहेज पर कानूनी रोक है. लेकिन अध्ययन बताता है कि दूल्हे के परिवार की दहेज मांगने की परंपरा आज भी बड़े पैमाने पर जारी है. जो औरतें इन मांगों को पूरा नहीं कर पातीं, उन्हें मारपीट, उत्पीड़न और कई बार हत्या तक का सामना करना पड़ता है.

अध्ययन के मुताबिक, जाति व्यवस्था को कमजोर करने के लिए किए गए कानूनी सुधारों ने दहेज की व्यवस्था का रूप तो बदल दिया, लेकिन उन सामाजिक ढांचों को खत्म नहीं कर सके जो दहेज को जिंदा रखते हैं.

कपिला कहती हैं कि पहले दहेज को एक रस्म के तौर पर देखा जाता था, जिसके जरिए बेटी की जिम्मेदारी उठाने के बदले दूल्हे के परिवार को कुछ दिया जाता था. लेकिन जब इस पर कानूनी रोक लगी, तो यह बदलकर एक ऐसी ‘उगाही की मांग’ बन गया जिसमें दूल्हे की जाति, वर्ग, पढ़ाई-लिखाई और नौकरी के हिसाब से उसकी ‘कीमत’ तय होने लगी.

उनके मुताबिक, दहेज बेटे के ‘बाजार भाव’ का दूसरा नाम बन गया. यानी उसकी कमाई और सामाजिक हैसियत जितनी ज्यादा, दहेज की मांग उतनी बड़ी. जब लड़की का परिवार लगातार बढ़ती मांगें पूरी नहीं कर पाता, तो उसका बदला दुल्हन को शारीरिक और मानसिक हिंसा झेलकर चुकाना पड़ता है.

कपिला कहती हैं, ‘असल सवाल यह नहीं है कि दहेज विरोधी कानून क्यों नाकाम रहा. ज्यादा अहम सवाल यह है कि दहेज के लिए होने वाली हत्याएं अब पहले की तरह हजारों औरतों को सड़कों पर उतरने के लिए क्यों नहीं झकझोरतीं. यह बदलाव यूं ही नहीं आया, इसके पीछे एक सामाजिक ढांचा काम कर रहा है.’

1970 और 1980 के दशक में दहेज से जुड़ी हिंसा ने पूरे देश में महिला आंदोलन की एक बड़ी लहर पैदा की थी. आजादी के बाद भारत में दहेज विरोधी आंदोलन औरतों के पहले बड़े जनआंदोलनों में से एक था.

लेकिन अध्ययन बताता है कि समय के साथ दहेज हत्याओं का तरीका बदल गया और उसी के साथ आंदोलन भी कमजोर पड़ गया. 1970 और 1980 के दशक में बड़ी संख्या में नई-नई ब्याही गई औरतों को मिट्टी के तेल से जलाकर मार दिया जाता था और इसे रसोई में हुए ‘दुर्घटनावश आग लगने’ का मामला बता दिया जाता था. 1990 के दशक में जब मिट्टी का तेल धीरे-धीरे घरों से गायब होने लगा, तो ‘रसोई दुर्घटना’ की यह कहानी लोगों को कम भरोसेमंद लगने लगी. इसके बाद ससुराल वाले कई मामलों में नई दुल्हनों को इस हद तक प्रताड़ित करने लगे कि वे खुद ही अपनी जान लेने पर मजबूर हो जाएं.

कपिला के मुताबिक, इस बदलाव ने पहले के सार्वजनिक गुस्से और सामूहिक शोक को बदलकर ‘घर की शर्म और निजी दुख’ में बदल दिया. अध्ययन का तर्क है कि जब किसी औरत की मौत आत्महत्या के रूप में सामने आती है, तो उसके खिलाफ व्यापक जनआंदोलन खड़ा करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि समाज इसे उस औरत का ‘खुद चुना हुआ अंत’ मानने लगता है.

अध्ययन इस ओर भी ध्यान दिलाता है कि भविष्य में दहेज के बोझ से बचने के लिए कन्या भ्रूण हत्या भी बढ़ी है. 2001 की जनगणना में भारत में बच्चों के लिंगानुपात में भारी असंतुलन सामने आया था. राष्ट्रीय स्तर पर हर 1,000 लड़कों पर सिर्फ 927 लड़कियां थीं, जबकि पंजाब के कुछ इलाकों में यह संख्या घटकर हर 1,000 लड़कों पर केवल 754 लड़कियां रह गई थी.

कपिला का मानना है कि परिवार के भीतर होने वाली यह हिंसा अपने आप में ऐसी होती है कि उसके खिलाफ बड़े पैमाने पर लोगों को संगठित करना बेहद मुश्किल हो जाता है. वह कहती हैं, ‘मेरे निजी अनुभव में अलग-अलग जातियों और वर्गों के बहुत से लोग बेटी होने पर गर्भपात कराने को लेकर कोई अपराधबोध महसूस नहीं करते. इसका असर सिर्फ आबादी के आंकड़ों पर नहीं पड़ता. इसका मतलब है कम औरतें और कम बहनें.’

इस अध्ययन की प्रेरणा एक ऐसी प्रदर्शनी से मिली, जिसमें फोटोग्राफर शेबा छाछी की तस्वीरें प्रदर्शित थीं. उन्होंने 1970 और 1980 के दशक के भारत के महिला आंदोलन का दस्तावेजीकरण किया था.

कपिला कहती हैं कि उन तस्वीरों को देखकर उन्हें एहसास हुआ कि आज वैसा जनआंदोलन कितनी दूर की बात लगने लगा है. वह कहती हैं, ‘दहेज आज भी लिया-दिया जाता है और आज भी इसकी वजह से बहुत-सी औरतें मारी जा रही हैं. फिर भी यह हैरानी की बात है कि दहेज हत्याएं अब किसी बड़ी राजनीतिक बहस या जनआंदोलन को जन्म नहीं देतीं.’

हालांकि वह उम्मीद जताती हैं कि भविष्य में औरतें दहेज के खिलाफ संघर्ष के नए रास्ते तलाशेंगी.

उनके शब्दों में, ‘जो सवाल समाज की जड़ जमाई हुई मान्यताओं को चुनौती देते हैं, उन पर एकजुटता कायम करना आसान नहीं होता. यह हमारे समय के व्यापक राजनीतिक माहौल को भी दिखाता है.’

 (स्रोत: द गार्डियन, 7 जुलाई 2026)

11 July, 2026