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पांचवीं बरसी पर फादर स्टैन स्वामी: मानवाधिकार, आदिवासियत और प्रतिरोध की आवाज

पांचवीं बरसी पर फादर स्टैन स्वामी: मानवाधिकार, आदिवासियत और प्रतिरोध की आवाज

-- मनोज भक्त

5 जुलाई 2021 को फादर स्टैन स्वामी की न्यायिक हिरासत में मृत्यु हुई और देश ने मोदी सरकार तथा पूरी न्यायपालिका के क्रूर गठबंधन को बेनकाब होते देखा. 84 वर्ष के फादर स्टैनिस्लॉस लूर्दुस्वामी पार्किंसन्स रोग की विकसित अवस्था से जूझ रहे थे, लेकिन उन्हें पानी पीने के लिए स्ट्रॉ-सिपर तक नहीं दिया गया. यह क्रूरता तो है ही, पर इसके पीछे छिपा सच और भी भयावह है – और यह केवल स्टैन तक सीमित नहीं है. आज स्टैन की पांचवीं बरसी पर यह भयावह सच चारों ओर फैलता दिख रहा है.

स्टैन झारखंड के आदिवासी आंदोलनों के साथ दृढ़ता से खड़े रहे. उन्होंने आदिवासियों को झूठे मुकदमों में फंसाए जाने, बिना सुनवाई या न्यायिक प्रक्रिया के जेलों में बंद रखने, पांचवीं अनुसूची के इलाकों में लगातार संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठाई और आंदोलनकारियों तथा कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहे.

नामकुम (रांची) स्थित बागाइचा विभिन्न अधिकार आंदोलनों के मंच और आश्रय के रूप में स्थापित हुआ, और इसमें स्टैन के नेतृत्व का बड़ा योगदान है. उन्होंने तमाम आंदोलनों के साथ एकता स्थापित की और उस एकता के मजबूत हिमायती रहे. झारखंड जनाधिकार महासभा – जो संवैधानिक अधिकारों और मानवाधिकारों के संघर्ष का प्रमुख मंच है – की स्थापना में भी स्टैन की महत्वपूर्ण भूमिका थी. अधिकारों के दमन के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज को आदिवासियत की स्वाभाविक भाषा में ढालने में वे सफल रहे. बागाइचा आज भी इसका जीवंत गवाह है.

2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आते ही हिंदुस्तान करवट लेने लगा था. सांप्रदायिक मॉब लिंचिंग और त्योहारों के दौरान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण सरेआम शुरू हो गया था. सांप्रदायिक अपराधियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त था. झारखंड में एक ओर 2017 का ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट, सीएनटी-एसपीटी को कमजोर करने की कोशिश, पत्थरगड़ी आंदोलन का दमन, गो-रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों पर हमले, और धर्म-परिवर्तन संबंधी कानूनों के जरिए धार्मिक स्वतंत्रता पर अंकुश – इन सबने राज्य में फासीवादी आतंक कायम कर दिया था. दूसरी ओर केंद्र सरकार सीएए, तीन कृषि कानून, आधार एक्ट और जेएनयू में दमन के जरिये फासीवाद की ओर बड़े कदम उठा रही थी. असहमति और आंदोलनों को कुचलने के लिए पूरे तंत्र में बड़ा बदलाव आ चुका था. इसलिए स्टैन की गतिविधियां सत्ता की नजर में अब “अक्षम्य अपराध” बन चुकी थीं.

विश्रामबाग (पुणे) एफआईआर 4/2018 – भीमा कोरेगांव मुकदमे में 16 लोगों को अभियुक्त बनाया गया. यह दूसरी प्राथमिकी थी; पहली प्राथमिकी 2/18 पिंपरी थी, जिसमें शौर्य दिवस मनाने आए दलितों पर हमला करने वालों को अभियुक्त बनाया गया था. दूसरी प्राथमिकी संघी- कॉरपोरेट तंत्र का पहला प्रयोग थी. देश के गिने-चुने कार्यकर्ताओं, लेखकों और आंदोलनकारियों को इस मुकदमे में फंसाया गया और “अर्बन नक्सल” शब्द उछाला गया.

माओवादियों से संबंध के आरोप पर यूएपीए थोप दिया गया और सभी आरोपियों पर प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश रचने का आरोप मढ़ा गया. यह केस पूणे पुलिस से लेकर राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया. मुकदमे में मालवेयर का इस्तेमाल कर आरोपियों के लैपटॉप में फर्जी फाइलें इंस्टॉल की गईं और जाली सबूत गढ़े गए. यह सर्वविदित है कि खुफिया सॉफ्टवेयर की मदद से मोदी सरकार नौकरशाहों, जजों, पत्रकारों और सांसदों तक को निगरानी जाल में फंसा चुकी है. इस केस में एक अभियुक्त सुरेंद्र गडलिंग अभी भी जेल में हैं; कुछ गृहबंदी में हैं और शेष मुश्किल शर्तों पर जमानत पर हैं.

इस बीच सरकार द्वारा माओवादियों के “खात्मे” की घोषणाएं सुनाई दीं – खात्मे की आखिरी तारीखें तय की गईं और सजाए गए मुठभेड़ों के जरिए लगातार हत्याओं का सिलसिला चलता रहा. सत्ता-समर्थित हिंसा के पीछे-पीछे जंगलों का विनाश, आदिवासियों का दमन और कॉरपोरेट कब्जे का न रुकने वाला सिलसिला जारी है. उमर खालिद और शरजील – छात्रा-कार्यकर्ता, राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकार – अभी भी कैद में हैं. कानूनों में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं, संविधान पर हमला हो रहा है. बावजूद इसके संविधान का बुनियादी ढांचा अभी भी बरकरार है, लेकिन इससे बहुत फर्क नहीं पड़ रहा. चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अब सांसदों पर धावा बोला जा रहा है. मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण लोकतंत्र को हाशिये पर धकेल रहा है.

यह सच है कि जिस फासीवादी राज्य का सपना संघ ने सौ साल पहले देखा था, वह उसे हासिल करने के करीब दिख रहा है. वह संस्थाओं को कमजोर कर उन पर काबू कर रहा है, राजनीतिक विरोधियों को भय और लालच में तोड़ रहा है. मोदी सरकार ने भारत के गणतंत्र की सर्वाेच्च ताकत – नागरिकता – पर भी हमला बोला है. लेकिन मोदी सरकार अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ मुक्त भारत की जड़ों की गहराई समझने में नाकाम रही है. भारत के “हम लोग” की ताकत सड़कों के जनांदोलनों में है.

स्टैन को इस बात से संतोष होता कि इस देश में लोग मूक दर्शक नहीं हैं. लेबर कोड लागू होते ही मजदूरों की नई पीढ़ी ने नोएडा, मानेसर, गुरुग्राम, फरीदाबाद जैसे नए औद्योगिक केंद्रों में आंदोलन छेड़ दिया है. बड़कागांव में अडाणी के कब्जे के खिलाफ किसानों का संघर्ष जारी है. झारखंड और पूरे देश में आदिवासियों को सरना-ईसाई में बांटने की कोशिशों के खिलाफ आदिवासी एकजुट हो रहे हैं. और केंद्र सरकार के खिलाफ छात्र-नौजवानों ने नया मोर्चा खोल दिया है. फासीवादी तंत्र के खिलाफ इन फैलते-गहराते आंदोलनों के साथ दृढ़ता से जुड़ना और इन्हें आपस में जोड़ना शहीद फादरस्टैन स्वामी की स्मृतियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी!


11 July, 2026