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महाराष्ट्र का धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून: मुसलमानों और ईसाइयों को दबाने का एक हथियार

महाराष्ट्र का धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून: मुसलमानों और ईसाइयों को दबाने का एक हथियार

-- इरफान इंजीनियर

महाराष्ट्र अब उन 13 राज्यों में शामिल हो गया है जिन्होंने धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून बनाए हैं और उन्हें विडंबनापूर्ण ढंग से ‘धार्मिक स्वतंत्रता कानून’ (Freedom of Religion Acts) का नाम दिया है. तमिलनाडु ने जून 2004 में राज्य में बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन की हार के बाद अपना धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून रद्द कर दिया था. बीजेपी के नेतृत्व वाली राज्य सरकारें एक-दूसरे से ज्यादा सख्त धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून पास करने की होड़ में हैं, ताकि उनका इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर ईसाइयों और मुसलमानों को दबाने के लिए किया जा सके.

बीजेपी सरकार और उसके समर्थकों द्वारा धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों के बारे में बनाई गई धारणा से ऐसा लगता है कि इनका मकसद सिर्फ ईसाइयों और मुसलमानों को दूसरे धर्मों के लोगों का धर्म-परिवर्तन करने से रोकना है. साथ ही, यह भी दिखाया जाता है कि हिंदुओं को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि वे आजादी से अपने धर्म का पालन कर सकते हैं, और यहां तक कि मुसलमानों और ईसाइयों का हिंदू धर्म में परिवर्तन भी कर सकते हैं और इसे ‘घर वापसी’ कह सकते हैं. असल में, ये कानून दलितों, आदिवासियों और समाज के अन्य हाशिए पर रहने वाले वर्गों के अपनी मर्जी से धर्म चुनने के अधिकारों को बुरी तरह प्रभावित करते हैं. उन्हें हिंदू धर्म के दायरे में रहने और जाति-आधारित उत्पीड़न सहने के लिए मजबूर किया जाता है. जब लोग प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर हिंदू धर्म छोड़ने का सोच-समझकर फैसला करते हैं, तो उन्हें बिना किसी विरोध के अपमानजनक हालात स्वीकार करने के लिए मजबूर करना नैतिक और कानूनी रूप से गलत है.

दलितों ने अक्सर छुआछूत और जाति-आधारित उत्पीड़न जैसे बेहद अमानवीय हालात से बचने और सम्मानजनक जीवन जीने की उम्मीद में हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाया है. डाॅ. बाबासाहेब अंबेडकर ने 1936 में अपने निबंध ‘जाति का विनाश’ में कहा था कि ऊंच-नीच वाली जाति व्यवस्था और ‘छुआछूत’ की प्रथा हिंदू धर्म में ही रची-बसी है. इसलिए, जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए अलग-अलग जातियों के बीच साथ बैठकर खाना-पीना जरूरी तो था, लेकिन काफी नहीं था. डाॅ. बाबासाहेब का मानना था कि छुआछूत को खत्म करने के लिए हिंदू धर्म छोड़कर किसी ऐसे धर्म को अपनाना जरूरी है जिसमें बराबरी का भाव हो. उन्होंने अपने उसी निबंध में कहा था कि हिंदू के तौर पर उनका जन्म उनके हाथ में नहीं था. लेकिन, वे हिंदू के तौर पर मरेंगे नहीं. 14 अक्टूबर 1956 को डाॅ. बाबासाहेब ने लगभग 6,00,000 दलितों को हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म में दीक्षित किया और उन्हें 21 प्रतिज्ञाएं दिलाईं. 19 फरवरी 1981 को, तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम में पल्लर समुदाय के 300 परिवारों के 1,100 से ज्यादा दलितों ने इस्लाम अपना लिया. वे सम्मानजनक जीवन और बराबरी का दर्जा चाहते थे. पल्लर समुदाय जमीन के मालिक ऊंची जाति के थेवर समुदाय के उत्पीड़न का विरोध कर रहा था. धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों के पीछे मुख्य तर्क यह रहा है कि निचली जातियों और गरीब लोगों का धर्म-परिवर्तन जबरदस्ती या किसी ‘विदेशी ताकत’ के इशारे पर किया जाता है. मीनाक्षीपुरम धर्म-परिवर्तन मामले पर मचे हंगामे के दौरान, गृह मंत्रालय ने इन धर्म-परिवर्तनों को विदेशी समर्थन मिलने के सबूत पेश किए थे. हालांकि, एससी-एसटी फेडरेशन के क्षेत्रीय निदेशक की रिपोर्ट समेत कई रिपोर्टों में कहा गया था कि यह धर्म-परिवर्तन समुदाय द्वारा झेले गए छुआछूत के अपमान के खिलाफ एक विरोध था. महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा पारित कानून समेत धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों में दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के धर्म-परिवर्तन को ज्यादा गंभीर अपराध माना गया है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है.

आइए, महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 (जिसे आगे ‘महाराष्ट्र कानून’ कहा जाएगा) के प्रावधानों को देखें. ये प्रावधान एक तरफ मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हथियार का काम करते हैं, और दूसरी तरफ दबी-कुचली जातियों को अपनी पसंद का धर्म चुनने से रोकते हैं. महाराष्ट्र कानून काफी हद तक 2014 के बाद अन्य राज्यों में बने ऐसे ही धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों के प्रावधानों की नकल करता है. इस कानून की कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैंः

1. इस कानून की परिभाषाएं इतनी व्यापक, समावेशी और अस्पष्ट हैं कि व्यावहारिक रूप से कोई भी धर्म-परिवर्तन अपराध की श्रेणी में आने से नहीं बच सकता. किसी धार्मिक संस्था द्वारा चलाए जा रहे संस्थान में मुफ्त शिक्षा देना, बेहतर जीवनशैली का प्रस्ताव देना, या दैवीय उपचार के लिए प्रार्थना करना भी ‘प्रलोभन’ माना जा सकता है; वहीं, एक धर्म की प्रशंसा करना या दूसरे धर्म की रीतियों की आलोचना करना कानून के कड़े दंडात्मक प्रावधानों को आकर्षित कर सकता है. 

2. तय की गई सजा बहुत ज्यादा कड़ी है, यानी 7 साल की अनिवार्य जेल और एक लाख रुपये का जुर्माना; इसमें जज के पास कम सजा देने का कोई अधिकार नहीं है. अगर धर्म बदलने वाला व्यक्ति नाबालिग है, मानसिक रूप से अस्वस्थ है, महिला है, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय से है, या एक साथ दो से ज्यादा लोगों का धर्म बदला जाता है, तो अनिवार्य जुर्माना बढ़कर पांच लाख रुपये हो जाता है. बार-बार ऐसा करने पर दस साल की जेल और सात लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है. सजा सिर्फ धर्म बदलने वाले व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मदद करने वाले, उकसाने वाले या इस काम से दूर का भी संबंध रखने वाले लोग और संस्थाएं भी शामिल हैं; संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन और सरकारी मदद रद्द हो सकती है, और यहां तक कि इससे जुड़े दस्तावेज तैयार करने वालों को भी सजा हो सकती है. यह सजा कई गंभीर अपराधों, जैसे कि गैर-इरादतन हत्या (5 से 10 साल) या दंगा करने (5 साल) की सजा से भी ज्यादा है. इससे पता चलता है कि कानून धर्म परिवर्तन को धार्मिक पसंद के तौर पर नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध के तौर पर देखता है – जिसे हिंदू राष्ट्रवादी ‘राष्ट्रान्तर’ कहते हैं, यानी हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ विद्रोह.

3. यह कानून स्थापित आपराधिक न्याय प्रणाली को उलट देता है; इसमें सबूत पेश करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष के बजाय आरोपी पर डाली जाती है, जबकि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में आरोपी को तब तक निर्दाेष माना जाता है जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए. शिकायत बहुत मामूली शक या बिना किसी आधार के भी दर्ज की जा सकती है. अगर शिकायत किसी सगे रिश्तेदार (जिसकी परिभाषा साफ नहीं है), शादी या गोद लेने से बने रिश्तेदार ने की है, तो पुलिस के लिए इसे दर्ज करना अनिवार्य है; उनके पास कोई विकल्प या शुरुआती जांच का प्रावधान नहीं होता. अधिकारी खुद भी इसका संज्ञान ले सकते हैं. चूंकि ये अपराध गैर-जमानती हैं और सबूत पेश करने की जिम्मेदारी आरोपी पर है, इसलिए इन प्रावधानों के तहत बेगुनाह लोगों को बेबुनियाद आरोपों से परेशान करना और उन्हें बरी होने या जमानत मिलने से पहले लंबे समय तक जेल में रखना आसान हो जाता है. यह तरीका पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों जैसा है, जिनका इस्तेमाल अक्सर ईसाइयों और हिंदुओं जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों से बदला लेने के लिए किया जाता है.

जनगणना के आंकड़े साबित करते हैं कि आजादी के बाद पिछले 78 सालों में देश की आबादी के ढांचे (डेमोग्राफी) के लिए धर्म परिवर्तन कोई खतरा नहीं रहा है. फिर भी, महाराष्ट्र के मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने बिना किसी डेटा के बेबुनियाद आरोप लगाए कि महाराष्ट्र में तथाकथित ‘लव जिहाद’ के 1,00,000 से ज्यादा मामले हैं. जब अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादियों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई, तो ऐसी शादियों के सिर्फ 152 मामले ही सामने आए, और उनमें से किसी में भी कोई शिकायत नहीं थी. महाराष्ट्र के ज्यादातर जिलों में ‘सकल हिंदू समाज’ की 100 से ज्यादा रैलियां आयोजित की गईं, जिनमें ‘लव जिहाद’ और जबरदस्ती, धोखे या लालच से धर्म परिवर्तन के बेबुनियाद आरोप लगाए गए. ऐसे बेतुके और बेबुनियाद आरोपों का इस्तेमाल लोगों को एकजुट करने और राजनीतिक फायदे के लिए राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए किया गया. इन रैलियों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बेहद अपमानजनक और नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल किया गया. बाॅम्बे हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई. जथ विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी विधायक गोपीचंद पडलकर ने तो उन लोगों के लिए नकद इनाम की घोषणा भी कर दी जो ईसाई प्रार्थनाओं में शामिल होने के लिए अपने गांवों में आने वाले ईसाइयों पर हमला करेंगे. महाराष्ट्र का यह कानून ऐसे तत्वों को खुश करने और मुसलमानों और ईसाइयों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने के लिए बनाया गया था. महाराष्ट्र का यह कानून, और असल में धर्म परिवर्तन विरोधी सभी कानून, असंवैधानिक हैं; फिर भी, सुप्रीम कोर्ट के पास उन्हें चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने का समय नहीं है.

10 October, 2026