-- राजेश सहनी
25 जून को खेगामस द्वारा ब्लॉक मुख्यालयों पर धरना प्रदर्शन देने के आह्वान पर प्रदेश में 16 जिलों के 38 ब्लॉक मुख्यालयों पर प्रदर्शन हुए जिसमें मिर्जापुर जिले के भी छह ब्लॉक मुख्यालय शामिल थे. उस दिन हालिया ब्लॉक मुख्यालय पर भी प्रदर्शन किया गया और खंड विकास अधिकारी हालिया एवं तहसीलदार हालिया ने संयुक्त रूप से ज्ञापन प्राप्त किए.
ज्ञापन में ग्राम सभा मतवार में पीने के पानी की उपलब्धता, पेंशन, आवास एवं जमीन के समस्या को निस्तारित करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई थी. इस पर संज्ञान लेते हुए खंड विकास अधिकारी व तहसीलदार ने संयुक्त रूप से ग्राम सभा मतवार में चौपाल लगाने का आश्वासन दिया था. मुझे भी 2 जुलाई को लगने वाली इस चौपाल में भागीदारी करने के लिए कहा गया था.
मिर्जापुर से 80 किलोमीटर दूर मतवार पंचायत के इस चौपाल में जाने के लिए मैंने सुबह 6 बजे उठकर एक स्थानीय साथी को साथ लेकर बस पकड़ी. जंगल के रास्ते से 17 किलोमीटर गुजर कर दिन के 1:00 बजे हमलोग मतवार पंचायत में पहुंचे. चौपाल स्थल पर लगभग सौ-डेढ़ सौ महिला-पुरुष जुटे थे. इनमें से अधिकांश, करीब 90% कोल आदिवासी समुदाय के लोग थेे. खंड विकास अधिकारी तो आए नहीं, उन्होंने फोन करके बताया कि उनका तबादला रायबरेली जनपद में हो गया है. जहां तक तहसीलदार की बात है तो उनकी ओर से ना तो कोई संपर्क किया गया और ना ही किसी राजस्व कर्मी को चौपाल में भेजा गया. हां पुलिस चौकी का एक दरोगा चौपाल में जरूर पहुंचा और उसने आने के साथ ही अपनी डायरी में नेताओं का नाम व मोबाइल नंबर नोट करने लगा. उसने चौपाल लगाने का लिखित परमिशन दिखाने को कहा. नेताओं ने उसे बताया कि यह चौपाल तो प्रशासन ने आयोजित किया है. जब चौकी इंचार्ज से उसकी बात कराई गई और प्रशासनिक चौपाल आयोजित करने की बात बताई गई तब जाकर उसने चौपाल शुरू होने दी. चौपाल में मतवार के पंचायत सहायक एवं रोजगार मित्र अवश्य ही रजिस्टर लेकर उपस्थित रहे.
चौपाल में उपस्थित जन समुदाय ने मिर्जापुर की सबसे ज्वलंत समस्या – पीने के पानी का सवाल उठाया. बताया गया कि ग्राम पंचायत मतवार में नल-जल योजना के तहत करोड़ों रुपए की लागत से पानी की टंकी बन गई है, कुछ मोहल्ले में पाइपलाइन भी बिछा दी गई है तो कुछ मोहल्ले में अभी भी पाइपलाइन नहीं बिछाया गया है. जहां पाइपलाइन बिछाया भी गया है वहां चौथे-पांचवें दिन एक बार पानी की सप्लाई आती है. चौपाल में 17-18 पॉइंट चिन्हित किए गए जिसमें हैंडपंप तो लगे हैं लेकिन खराब पड़े हुए हैं और मरम्मती की बाट जोह रहे हैं. वहीं, 19-20 पॉइंट ऐसे हैं जहां सोलर पैनल व टंकी तो बनी हुई है लेकिन खराब स्थिति में है और मरम्मत करने के बाद ही पानी मिल सकता है जबकि 15-16 पॉइंट ऐसे हैं जहां नया सोलर पैनल व टंकी या हैंडपंप लगाने की आवश्यकता है. इस प्रकार रजिस्टर में कुल 52 पॉइंट रजिस्टर में पानी के लिए नल लगवाने, रिबोर करने की और टंकी बनवाने की आवश्यकता वाले दर्ज किए गए.
मतवार पंचायत का क्षेत्रफल 14-15 किलोमीटर का है जिसमें 3000 मतदाता हैं. आबादी का 90% आदिवासी कोल समुदाय के लोग हैं. दूर-दूर बसे और सात-आठ घरों से लेकर 20-25 घरों के छोटे-छोटे टोले हैं. पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पानी का तल काफी नीचे है जो गर्मियों में और भी नीचे चला जाता है. पहाड़ी क्षेत्र होने से पानी की किल्लत हमेशा बनी रहती है इसलिए महिलाओं को दूर-दूर से पानी ले आना पड़ता है.
पंचायत सहायक ने कुल 354 आवास की सूची ऑनलाइन होने की बात बताई. जिले के अधिकारियों से अप्रूवल के बाद यह सूची पंचायत भवन पर चस्पां कर दी जाएगी. चौपाल में मांग की गई कि सोमवार को प्रोविजनल आवास की सूची पढ़ कर सुनाई जाए और छुटे हुए सुपात्र लोगों का नाम शामिल किया जाए तो पंचायत सहायक ने 20 किलोमीटर दूर हालिया में बैठे हुए सेक्रेटरी से बातचीत करने के बाद निर्णय सुनाया कि सोमवार को पंचायत भवन पर सूची पढ़ कर सुनाई जाएगी और छूट गये पात्रों को आवास के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा. पेंशन के मसले पर पहले से रुके हुए पेंशन को चालू करवाने नया पेंशनरों का फार्म भरवाने का भी निर्णय लिया गया.
चौपाल में राजस्व विभाग का कोई कर्मचारी उपस्थित नहीं था इसलिए जमीन पर सिर्फ इतनी ही बात रखी गई कि मतवार पंचायत में लगभग 400 बीघा जमीन सरकारी है, जिस पर चंद बड़े लोग काबिज हैं. उनका प्रमाणित इंतखाब खतौनी जिले के रिकॉर्ड से निकाल लिया गया है और आगे जमूीन को गरीबों को जमीन बांटने का संघर्ष शुरू किया जाएगा. इधर वन विभाग में पीढ़ियों से आबाद आदिवासियों को बुलडोजर से उजाड़ फेंकने का अभियान तेज कर दिया है. जबकि वन विभाग की जमीन पर जो बड़े लोग काबिज हैं, उनसे वन विभाग कुछ नहीं बोलता है.
चौपाल में मौजूद लोगों ने बताया कि यहां निजी सूदखोर 10 से 20% महीने ब्याज पर आदिवासियों को कर्ज देते हैं. माइक्रो फाइनेंस कंपनियां भी अलग से कर्ज का जाल फैलाई हुई है. चौपाल में ही मालूम हुआ कि इतने बड़े पंचायत में लड़कों के लिए एक इंटर कॉलेज है जिसमें न तो कोई मास्टर आता है और न ही पढ़ाई होती है. कोल आदिवासियों में मात्र एक अध्यापक सरकारी कर्मचारियों के रूप में हैं. 8-10 लड़के हाई स्कूल व इंटर में पढ़ते हैं. बीए में एक भी छात्र नहीं है. इक्की-दुक्की लड़कियां ही कक्षा 5 तक पढ़ी हैं, 90% से अधिक लड़कियां निरक्षर ही हैं. पंचायत में एक अस्पताल भी मौजूद है. इसमें जो डॉक्टर नियुक्त हैं वे सप्ताह-पयावारे में एक बार आ जाते हैं और प्रायः जिला मुख्यालय में ही रहते हैं. मतवार पंचायत जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर और तहसील/ब्लाक सीएचसी से 20 किलोमीटर दूर है जिसमें 17 किमी जंगल से गुजर कर जाना पड़ता है. यह रास्ता भी कच्चा, अर्ध निर्मित व टूटी-फूटीे सड़क के रूप में है. रोडवेज बस तो आती नहीं है. 2 बजे के बाद निजी साधन और मोटरसाइकिलों के सिवाय तहसील या जिला मुख्यालय पर जाने के लिए कोई साधन नहीं है.
चौपाल में इसके अतिरिक्त गरीबों के दो लाख रुपए के तक के कर्ज माफ करने, 200 यूनिट बिजली फ्री करने एवं बीवी ग्राम जी के तहत गरीबों का जॉब कार्ड बनाने व काम देने की मांग को लेकर संघर्ष को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया. चौपाल में भाकपा(माले) की जिला सचिव जीरा भारती, एरिया सचिव भोला कोल और स्थानीय नेताओं चिंता कोल और बसंत कोल ने भी अपनी बात रखी.
(राजेश साहनी अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव हैं.)
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