जल्द ही बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाला है इसलिए प्रधानमंत्री बिहार में लगातार दौरा कर रहे हैं और महिलाओं के लिए तरह-तरह की योजनाओं की घोषणा कर रहे हैं. लेकिन इस बार गरीबी, कर्ज, बेरोजगारी, बीमारी और घर की परेशानी झेलती औरतों पर मोदी जी की लुभावनी बातों का असर नहीं हो रहा है. उनकी सभाओं में अब महिलाएं नहीं पहुंच रही हैं. इंडिया गठबंधन के वोटर अधिकार यात्रा ने, जिसने पूरे बिहार में लोगों को अपने वोट के प्रति सजग कर दिया है, रही-सही कसर भी पूरी कर दी है, ऐसे समय में दरभंगा में एक व्यक्ति द्वारा प्रधानमंत्री की मां को दी गई गाली की एक अलग-थलग घटना को प्रधानमंत्री ने राजनीतिक संजीवनी की तरह देखा और इसे महिला सम्मान का भावनात्मक मुद्दा बनाने की कोशिश की. लेकिन, बिहार की महिलाओं ने यह भी देखा है कि प्रधानमंत्री सार्वजनिक मंचों पर विपक्षी दलों की महिला नेताओं की यौनिकता पर कितने अपमान जनक तरीके से फब्तियां कसते रहे हैं. इसलिए अपने रोजमर्रा की जिंदगी में अपमान, बलात्कार, यौन उत्पीड़न, हिंसा और ऐसी घटनाओं पर सरकार की उपेक्षा-अवहेलना झेलती बिहारी महिलाओं को प्रधानमंत्री की नारी सम्मान की बातें खोखली लगीं और वे प्रधानमंत्री की पीड़ा के प्रति, विपक्षी दलों से बदला लेने के उनके उकसावे के प्रति, उदासीन बनी रहीं.
प्रधानमंत्री मोदी ने महिला सहकारिता बैंक के उद्घाटन भाषण में अपनी मां को पड़ी गाली को भावनात्मक मुद्दा बनाया. उन्होंने बिहार के लोगों को रिझाने के लिए भोजपुरी बोली. वे भाषण के बीच कई बार भावुक हुए फिर भी यह सब बेअसर रहा. मोदी जी ने अपने भाषण को काफी चतुराई से विस्तृत फलक दिया और ‘कामदारों’, अति पिछड़ों व गरीबों के सम्मान के साथ इसे जोड़ने की कोशिश की. चूंकि उनका खास टारगेट महिलाएं थीं इसलिए मां की ममता, त्याग व बलिदान की बातें करते हुए उन्होंने इसे समस्त महिलाओं के सम्मान से जोड़ा और इसे धार्मिक प्रतीकों – सात बहिनी और छठी मैया के सम्मान – तक ले गए. उन्हें उम्मीद थी कि मां की गाली एक भावनात्मक मुद्दा बन जाएगा और महिलाएं सड़कों पर उतर आएंगी. लेकिन कल के बंद में ऐसा कुछ नहीं हुआ.
बहरहाल, अगर हम यौन संबंधी गालियों की बात करें तो बिहार में वे खूब दी जाती हैं. कई घरों में बाप अपने बेटे को मां की गाली देते हुए सुने जा सकते हैं. कुछ खास रिश्तों में, दोस्तों के बीच, होली के गीतों में और हिंदू शादियों में गालियों का खूब आदान-प्रदान होता है. लेकिन, यह एक अलग विषय है और यहां बात किसी व्यक्ति को अपमानित करने के लिए दी जाने वाली गालियों की हो रही है. जब क्रोध में या घृणा प्रकट करने के लिए अथवा किसी को नीचा दिखाने के लिए उसके अहं पर चोट करने के लिए गालियां दी जाती हैं तो उनका असर बिल्कुल अलग होता है.
गालियां अपमानित करने के लिए या अपमान का बदला लेने के लिए दी जाती हैं, लेकिन एक बात तय है कि ये गालियां औरतों को ही दी जाती हैं. दूसरी बात, औरतें सिर्फ बाहर ही नहीं, अपने घरों में भी गालियां सुनती हैं.
हमारी सामाजिक व्यवस्था सवर्ण पुरुषों को तिहरी सुविधा देती है, वह अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए दूसरे पुरुष की औरत को गाली दे सकता है, दलित जातियों को गाली दे सकता है और अपने घर की औरतों को भी गाली दे सकता है. चूंकि परिवार का मुखिया पुरुष होता है और वह स्त्रियों से श्रेष्ठ होता है, इसलिए अपने घर की औरतों को गाली देने का अधिकार हर जाति के पुरुष को होता है. कल के बंद में उतरे भाजपा कार्यकर्ताओं के वीडियो देख रही थी तो मन में एक विचार कौंध रहा था कि इसमें कितने ही पुरुष होंगे जो अपने घरों में, अपनी पत्नियों को गाली देकर मोदी जी की मां के सम्मान में सड़क पर निकले होंगे!
पुरुष अपने घर की स्त्री को जब गाली देता है, उसे अपमानित करता है तो इसे पारिवारिक मामला माना जाता है. महिलाओं को अपमान और हिंसा से बचाने के लिए बने तमाम कानूनों के बावजूद आज भी कोई उस स्त्री के पक्ष में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता क्योंकि पुरुष को घर का मालिक मानने का विचार मजबूती से विद्यमान है. पुरुष का काम है स्त्री को ‘अनुशासन’ में रखना और स्त्री का कर्तव्य है पुरुष के नियंत्रण को स्वीकारना. मनुस्मृति के अनुसार एक आदर्श स्त्री वही है जो बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्र की अधीनता को खुशी-खुशी स्वीकारे. ऐसा न करने पर उसके लिए तरह तरह के दंड की व्यवस्था दी गई है. सभी धार्मिक ग्रंथ यही उपदेश देते हैं. हमारे सांस्कृतिक क्रियाकलापों में और साहित्य में यही विचार थोड़े परिमार्जित रूप में रहते हैं. आजकल बाबाओं और प्रवचकों की जो नई मंडली पैदा हुई है, उनका भी ऐसा ही प्रवचन चलता रहता है. सभी उपदेशात्मक नियमावलियों के अनुसार स्त्री का काम है सेवा और समर्पण, जो उसे स्वेच्छा से करना चाहिए. जहां वह इसकी उपेक्षा करती है वहां उसे सही रास्ते पर लाने के लिए गालियां देना, पीटना, ऑनर किलिंग करना पुरुषों का अधिकार बन जाता है.
लेकिन जब दूसरा पुरुष उसके घर की औरतों को गाली देता है तब वह अपमानित महसूस करता है और उसकी प्रतिष्ठा पर चोट पड़ती है क्योंकि स्त्रियों की यौनिकता पर नियंत्रण उसका अधिकार क्षेत्र है. स्त्री अपने परिवार/पुरुष की संपत्ति है. इसलिए संपत्ति की रखवाली, अपने परिवार की स्त्रियों की यौनिकता की रखवाली या रिश्तों के हिसाब से उनकी यौनिकता को सुरक्षित और शुद्ध बनाए रखना उसकी जवाबदेही है. इस कर्तव्य से च्युत बताकर उसे नीचा दिखाया गया है. अपने संरक्षण में रहने वाली स्त्री – मां, बहन व बेटी की यौनिकता की रक्षा में विफल या उनकी शुद्धता को भंग करने वाला करार देकर किसी पुरुष को जब शर्मिंदा करने की कोशिश होती है, तब वह बदला लेने के लिए उतावला हो जाता है और बदला लेने की इस भावना का इस्तेमाल सत्ताधारी वर्ग बहुत चालाकी से अपने लिए करता है. लेकिन, किसी भी स्थिति में औरत ही प्रताड़ित होती है. औरत को गाली देना या उसकी पूजा करना एक ही विचारधारा के दो पहलू है.
इसलिए पुरुष को नियंत्रक और स्त्री को नियंत्रित की भूमिका से बाहर निकलना होगा. स्त्री को देवी का सम्मान नहीं, आजाद इंसान की गरिमा चाहिए. इसीलिए मां-बहन के रिश्ते का महिमा मंडन करने के बदले उन्हें एक इंसान के रूप में देखने और उनकी स्वायत्तता को महत्व देने की जरूरत है. यही उनका वास्तविक सम्मान होगा.