– सौविक घोषाल
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उन्नीसवीं सदी के हिंदुस्तानी साहित्य में शायद ही किसी किताब का राजनीतिक जीवन बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ जितना पेचीदा रहा हो. और उससे भी कम किताबें ऐसी हैं, जिन्होंने ‘वंदे मातरम्’ जैसा ताकतवर और विवादों से घिरा प्रतीक पैदा किया हो. ‘आनंदमठ’ और ‘वंदे मातरम्’ के इतिहास को दो प्रचलित नजरियों में से किसी एक के सहारे ठीक से नहीं समझा जा सकता. पहला नजरिया बंकिम को बिना किसी सवाल-जवाब के भारतीय राष्ट्रवाद का पैगंबर मानकर उनकी जय-जयकार करता है और ‘वंदे मातरम्’ को सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ लड़ी गई आजादी की जंग का एक पाक तराना मानकर पढ़ता है. दूसरा नजरिया बंकिम को सीधे-सीधे आज की हिंदू सांप्रदायिकता का पुरखा मान लेता है और ‘आनंदमठ’ को हिंदू राष्ट्रवाद के एक शुरुआती घोषणापत्र से ज्यादा कुछ नहीं समझता.
सच पूछिए तो ये दोनों ही नजरिये अधूरे हैं.
बंकिम अपने समय की कहीं अधिक जटिल बौद्धिक शख्सियत थे. उनके शुरुआती लेखन पर औपनिवेशिक आधुनिकता, पश्चिमी शिक्षा, तर्कवाद और सामाजिक आलोचना की गहरी छाप थी. ये सब उस बदलते बंगाल की पृष्ठभूमि में विकसित हुए, जहां एक नया मध्यवर्ग-भद्रलोक या ‘बाबू तबका’ उभर रहा था. लेकिन आगे चलकर अपनी बाद की रचनाओं में वे हिंदुस्तानी समाज में नई जान फूंकने का रास्ता हिंदू नैतिक और धार्मिक विचारों को नए सिरे से गढ़ने में तलाशने लगे. इस बदलाव के दौर में, ‘राष्ट्र’ सिर्फ एक राजनीतिक जमात नहीं रह गया, बल्कि एक ‘पवित्र सांस्कृतिक सत्ता’ के रूप में दिखने लगा.
‘आनंदमठ’ के राजनीतिक सफर को समझने के लिए बंकिम के भीतर आए इस बदलाव को पकड़ना बेहद जरूरी है. लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि हम बंकिम को उनके बाद आने वाले लोगों से अलग करके देखें. बंकिम ने सावरकर के ‘हिंदुत्व’ का सिद्धांत नहीं गढ़ा था. उन्होंने न तो हिंदू महासभा बनाई और न ही आरएसएस की नींव रखी. सावरकर, हेडगेवार या गोलवलकर के सियासी प्रोग्राम क्या होंगे, इसका अंदाजा बंकिम को हो भी नहीं सकता था.
फिर भी, उन्होंने जिन विचारों और प्रतीकों की जुबान विकसित की, उसने बाद के हिंदू राष्ट्रवादी राजनीतिक आंदोलन को बहुत उपजाऊ जमीन मुहैया कराई. इस भाषा में भारत माता को पवित्र मां के रूप में देखना, हिंदू सभ्यता की ताकत को फिर से हासिल करने की चाह, समाज का नैतिक पुनर्निर्माण, अनुशासित आत्मबलिदान, धार्मिक प्रतीकों को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ना और हिंदू इतिहास को राजनीतिक पुनर्जागरण के स्रोत के रूप में पेश करना शामिल था.
इसलिए यह कहानी किसी सीधी-सादी वैचारिक वसीयत या विरासत की नहीं है. यह कहानी है किसी विचार और प्रतीक को अपने मकसद के लिए ‘हथियाने’, उसे नए रूप में ढालने और राजनीतिक जरूरतों के मुताबिक उसकी नए सिरे से व्याख्या करने की.
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बंकिम के बाद के दौर के राष्ट्रवाद को समझने के लिए हमें सबसे पहले इस प्रलोभन से बचना होगा कि हम उनके पूरे साहित्यिक सफर को ‘आनंदमठ’ के चश्मे से उल्टा करके पढ़ें. बंकिम के शुरुआती उपन्यास एक बिल्कुल अलग वैचारिक दुनिया की पैदाइश हैं. ‘दुर्गेशनंदिनी’ (1865) से शुरुआत करके ‘कपालकुंडला’, ‘मृणालिनी’, ‘विषवृक्ष’, ‘इंदिरा’, ‘चंद्रशेखर’, ‘रजनी’ और आखिरकार ‘कृष्णकांतेर विल’ (कृष्णकांत की वसीयत, 1878) तक, बंकिम ने आधुनिक बांग्ला उपन्यास की बुनियाद रखी. इन रचनाओं का मुख्य सरोकार अभी हिंदू राष्ट्र का निर्माण नहीं था. इनमें प्रेम, विवाह, यौन संबंध, परिवार, संपत्ति, सामाजिक रीति-रिवाज, महिलाओं की अपनी जिंदगी के फैसले लेने की क्षमता, नैतिकता और व्यक्ति की इच्छाओं तथा सामाजिक नियमों के बीच टकराव जैसे सवाल प्रमुख थे. यह उस औपनिवेशिक पढ़े-लिखे तबके की दुनिया थी, जो आधुनिकता के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा था.
बंकिम पर यूरोप के साहित्य और वहां के वैचारिक चिंतन का गहरा असर था. वे न तो सीधे-सीधे परंपरावादी थे और न ही हिंदू समाज-व्यवस्था को हमेशा एक जैसा बनाए रखने के पक्षधर. उन्हें विज्ञान, तर्क और पश्चिमी बौद्धिक परंपरा से मिलने वाले विचारों में गहरी दिलचस्पी थी, भले ही दूसरी तरफ अंग्रेजी गुलामी के सांस्कृतिक और नैतिक परिणामों से उनकी बेचैनी और नाखुशी लगातार बढ़ती जा रही थी.
उनके इस शुरुआती दौर की अहमियत तब और साफ होकर सामने आती है जब हम उनकी किताब ‘साम्य’ को देखते हैं. 1879 में छपी ‘साम्य’ में सामाजिक गैर-बराबरी और शोषण के सवाल से एक जबरदस्त और सीधी मुठभेड़ मिलती है. बाद में बंकिम ने इस किताब को बाजार से वापस ले लिया और अपनी अधिकृत रचनाओं से बाहर कर दिया. उनका यह फैसला काफी मायने रखता है, हालांकि इसे इस सस्ते और सतही दावे में नहीं बदल देना चाहिए कि बंकिम पहले ‘समाजवादी’ थे और बाद में ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ बन गए.
उनके विचारों में आया बदलाव इससे कहीं ज्यादा पेचीदा था. उनके बौद्धिक जीवन का केंद्रीय सवाल ही बदल रहा था. शुरुआती दौर के बंकिम का मुख्य सरोकार व्यक्ति और समाज में सुधार की समस्याओं से था. बाद के बंकिम की चिंता धीरे-धीरे एक पूरी सभ्यता के नैतिक पुनर्जागरण पर केंद्रित होती गई. इस पुनर्जागरण की बुनियाद तलाशते हुए वे लगातार हिंदू धार्मिक विचारों की ओर मुड़ने लगे.
1870 के दशक के आखिर तक आते-आते बंकिम इस सवाल से जूझ रहे थे कि अंग्रेजी राज के नीचे हिंदुस्तानी समाज राजनीतिक तौर पर इतना कमजोर और नैतिक तौर पर इतना बिखरा हुआ क्यों दिखता है? उन्होंने इसका जो जवाब ढूंढा, वह सिर्फ राजनीतिक नहीं था. उनका मानना था कि ‘भारत को एक नैतिक नवनिर्माण की जरूरत है’. इस नए सांचे में धर्म सिर्फ पूजा-पाठ या इंसान की निजी आस्था का मामला नहीं रह गया था. वह नैतिक अनुशासन, सामाजिक फर्ज और सामूहिक ताकत का जरिया बन गया था. यही वह वैचारिक जमीन थी जहां से ‘आनंदमठ’ का जन्म हुआ. यह बदलाव इसलिए भी खास है क्योंकि बंकिम सिर्फ पुराने पारंपरिक हिंदू धर्म की तरफ वापस नहीं लौटे थे; उन्होंने ‘आधुनिकता के औजारों और पैमानों के जरिए हिंदू धर्म को नए सिरे से गढ़ने’ की कोशिश की थी.
उन्होंने धार्मिक परंपराओं को तर्क की कसौटी पर कसा. उन्होंने कृष्ण की नई व्याख्या की. उन्होंने भगवद्गीता के विचारों से संवाद किया. उन्होंने हिंदू धर्म के भीतर ऐसी नैतिक बुनियाद खोजने की कोशिश की, जो अनुशासित, सक्रिय और नैतिक रूप से नए सिरे से गढ़े गए इंसान तैयार कर सके. इसलिए बाद के दौर के बंकिम न तो पूरी तरह रूढ़िवादी थे, और न ही कोरे आधुनिकतावादी. वे एक आधुनिक हिंदू नैतिक दर्शन गढ़ने की कोशिश कर रहे थे. यही उनके बाद के राष्ट्रवाद की असली बुनियाद थी.
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बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘आनंदमठ’ बांग्ला साहित्य की उन रचनाओं में है, जिनका असर साहित्य की दुनिया से बहुत आगे तक पहुंचा है. इसने समाज, राजनीति और इतिहास को देखने की सामूहिक चेतना पर गहरी छाप छोड़ी है. बंकिम ने इस उपन्यास की कुछ सामग्री इतिहास के एक खास दौर, यानी संन्यासी विद्रोह से ली थी. लेकिन उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं को इस कदर बदल दिया कि ‘आनंदमठ’ को महज एक ऐतिहासिक उपन्यास नहीं माना जा सकता.
बंकिम इतिहास और कल्पना को आपस में मिलाने का अपना गजब का हुनर इससे पहले ‘राजसिंह’ में दिखा चुके थे. ‘दुर्गेशनंदिनी’ और ‘कपालकुंडला’ में वे यह साबित कर चुके थे कि इश्क और रोमांच की कहानियों के पर्दे के तौर पर गुजरे हुए इतिहास का कितना असरदार इस्तेमाल किया जा सकता है. ‘चंद्रशेखर’ में उन्होंने इतिहास की पृष्ठभूमि पर समाज और परिवार के नैतिक संकटों को पेश करने की अपनी खास काबिलियत दिखाई थी. बार-बार बंकिम ने यह दिखाया कि अलग-अलग साहित्यिक मकसदों के लिए इतिहास को कैसे अपने हिसाब से ढाला और बदला जा सकता है.
मगर ‘आनंदमठ’ में उन्होंने इतिहास का इस्तेमाल एक बिल्कुल अलग और कहीं ज्यादा स्पष्ट राजनीतिक मकसद के लिए किया. यहां इतिहास की पृष्ठभूमि एक राजनीतिक नजरिये को सामने रखने का जरिया बन जाती है.
‘आनंदमठ’ के केंद्र में एक संगठन है, जिसे ‘संतान’ समुदाय कहा गया है यानी ‘मां की संतानें’. इस संगठन का असली निर्माता और वैचारिक मार्गदर्शक काफी हद तक पर्दे के पीछे रहता है. उपन्यास के बिल्कुल आखिर में जाकर ही हमें एक रहस्यमयी वैद्य के मुंह से वे दार्शनिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक विचार सुनने को मिलते हैं जो इस पूरे आंदोलन के पीछे काम कर रहे थे.
लगभग पूरे उपन्यास में ‘संतान’ दल का प्रत्यक्ष दिखने वाला नेता सत्यानंद है. उसके मुख्य साथी भवानंद, जीवानंद, धीरानंद और दूसरे संन्यासी हैं जिन्होंने घर-गृहस्थी त्याग दी है और खुद को ‘मां’ की पूजा और सेवा में झोंक दिया है. सत्यानंद, भवानंद और जीवानंद की अगुवाई में संतान संगठन लगातार फैलता जाता है.
उनकी लड़ाई उस वक्त के हुक्मरानों के खिलाफ है.
इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पलासी की लड़ाई (1757) और बक्सर की लड़ाई (1764) के बाद का वह दौर है, जब ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल की दीवानी, यानी राजस्व वसूलने और अर्थव्यवस्था पर वास्तविक नियंत्रण का अधिकार हथिया चुकी थी, जबकि औपचारिक राजनीतिक सत्ता नाम के लिए अब भी नवाब के पास थी. पलासी में सिराजुद्दौला और बक्सर में मीर कासिम की हार के बाद बंगाल के नवाब असल में ईस्ट इंडिया कंपनी की कठपुतली बन चुके थे. मीर जाफर और उसके वारिस सिर्फ नाम के लिए गद्दी पर बैठे थे.
‘दोहरे शासन’ के इसी अराजक और लूट-खसोट वाले दौर में संन्यासियों ने अपने हमले शुरू किए. संतान दल के नेता बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि जो राजा अपनी प्रजा की हिफाजत करने में नाकाम हो, उसे प्रजा की वफादारी मांगने का कोई हक नहीं है.
लेकिन आगे यह बात भी उतनी ही साफ हो जाती है कि उनका मकसद सिर्फ एक निकम्मी या जालिम सरकार को उखाड़ फेंकना नहीं है. वे मुस्लिम शासन को मिटाकर उसकी जगह हिंदू राज कायम करना चाहते हैं. संतान नेताओं के मुताबिक, मुसलमान हिंदुओं को अपना धर्म निभाने से रोकते हैं, और इसलिए उन्हें हर मुमकिन तरीके से कमजोर किया जाना चाहिए और आखिरकार खदेड़ दिया जाना चाहिए.
इस सोच को सबसे साफ तौर पर उजागर करने वाला एक बयान तब आता है जब संतान नेता देश की हालत का बखान करते हैं:
“मगध, मिथिला, काशी, कांची, दिल्ली, कश्मीर – इन तमाम देशों में ऐसी बदहाली और कहां है? किस देश में लोग अन्न न मिलने पर घास खाते हैं? कंँटे खाते हैं? दीमक खाते हैं? जंगल की बेलें खाते हैं? किस देश में लोग सियार और कुत्ते खाते हैं, मुर्दों का मांस खाते हैं? किस देश में लोग संदूक में रुपया रखकर चैन नहीं पा सकते, सिंहासन पर शालग्राम रखकर चैन की नींद नहीं सो सकते, घर में बहू-बेटियों को महफूज नहीं रख सकते? पेट फाड़कर औरत के गर्भ से बच्चा निकाल लेते हैं! हर दूसरे देश में राजा का अपनी प्रजा की रक्षा और पालन-पोषण का रिश्ता होता है; हमारे मुसलमान राजा हमारी रक्षा कहां करते हैं? धर्म चला गया, जाति चली गई, इज्जत चली गई, वंश चला गया और अब तो जान भी जा रही है. अगर इन शराबी, मुंडे सिर वालों को बाहर नहीं निकाला गया, तो फिर हिंदुओं का हिंदूपन बचेगा ही कहां?”
इसके पीछे की राजनीतिक सोच बिल्कुल साफ है. संतान दल के लोग सिर्फ कुशासन के खिलाफ विद्रोह करने वाले बागी नहीं हैं. उनकी बगावत को कदम-ब-कदम ‘हिंदू राजनीतिक ताकत की बहाली’ के प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया जाता है.
संतान संगठन में एक तरफ तो कई हजार लोगों की एक काफी हद तक संगठित लड़ाकू फौज है, और दूसरी तरफ एक छोटा लेकिन वैचारिक रूप से कट्टर नेतृत्व है. फौज का हर सिपाही धर्म की दीक्षा लिया हुआ संन्यासी नहीं है. कुछ लोग लूट के माल या इनाम के लालच में भी शामिल होते हैं. लेकिन संगठन की कमान सिर्फ उन्हीं के हाथ में है जिन्होंने इस संप्रदाय के वैचारिक अनुशासन को पूरी तरह कबूल कर लिया है.
सत्यानंद समझाता है: “संतान दो तरह के होते हैं – दीक्षा लेने वाले और बिना दीक्षा वाले. जिन लोगों ने दीक्षा नहीं ली है, वे गृहस्थ या भिखारी हैं. वे केवल लड़ाई के समय आते हैं और लूट में अपना हिस्सा या कोई दूसरा इनाम मिलने के बाद चले जाते हैं. जिन्होंने दीक्षा ली है, उन्होंने सब कुछ त्याग दिया है. वे समुदाय के नेता हैं. मैं तुमसे दीक्षित संतान बनने के लिए नहीं कहता. लड़ने के लिए लाठी और डंडे वाले बहुत से लोग हैं. लेकिन जब तक तुम दीक्षा नहीं लेते, समुदाय के किसी भी गंभीर काम में तुम्हें कोई अधिकार नहीं मिलेगा.”
इस तरह ‘आनंदमठ’ केवल दार्शनिक विचारों वाले विद्रोहियों का समूह पेश नहीं करता, बल्कि वह एक ऐसे आंदोलन की तस्वीर खींचता है जिसका बाकायदा एक सांगठनिक ढांचा है, वैचारिक दीक्षा है और फौजी अनुशासन है. संन्यासी हजारों स्वयंसेवकों की भर्ती करते हैं, उन्हें ‘मां’ के पंथ में दीक्षित करते हैं और अपनी जान कुर्बान करने का जज्बा भरते हैं. वे हथियार बनाने के कारखाने लगाते हैं, किलेबंदी करते हैं और उनके चारों तरफ हिफाजती खंदकें खोदते हैं. महेंद्र नाम का एक ताकतवर जमींदार इन कामों का बड़ा मददगार बन जाता है. इस तरह इस आंदोलन में एक संगठित क्रांतिकारी ताकत की सारी जरूरी खूबियां मौजूद हैं – भर्ती, वैचारिक ट्रेनिंग, फौजी तैयारी, आर्थिक संसाधन, हथियारों का उत्पादन और इलाके की हिफाजत.
‘आनंदमठ’ की राजनीतिक विचारधारा को उसके धर्म संबंधी नजरिये से अलग करके नहीं देखा जा सकता. सत्यानंद संतान समुदाय को वैष्णव बताता है, लेकिन तुरंत यह भी साफ कर देता है कि उनका वैष्णव धर्म चैतन्य से जुड़ी भक्ति परंपरा से बिल्कुल अलग है.
जब उससे पूछा जाता है कि अगर अहिंसा वैष्णव धर्म का सबसे बड़ा सिद्धांत है, तो संतान वैष्णव होकर भी हिंसा कैसे कर सकते हैं, तो सत्यानंद जवाब देता है:
“वह चैतन्य का वैष्णव धर्म है. यह तो नास्तिक बौद्ध धर्म की नकल से पैदा हुआ अधूरा धर्म है. वैष्णव धर्म की असली पहचान बुराई का दमन करना और धरती की रक्षा करना है. विष्णु इस ब्रह्मांड के पालनहार हैं. धरती को बचाने के लिए उन्होंने दस बार शरीर धारण किया है. उन्होंने खुुद केशी, हिरण्यकशिपु, मधु-कैटभ, मुर और नरक जैसे असुरों का संहार किया. रावण जैसे राक्षसों और कंस तथा शिशुपाल जैसे राजाओं को भी मारा. वे विजेता हैं, विजय दिलाने वाले हैं, धरती के रक्षक हैं और संतान समुदाय के आराध्य देव हैं.”
इसके बाद सत्यानंद चैतन्य के प्रेममय विष्णु और संतान समुदाय के शक्तिशाली विष्णु के बीच साफ फर्क खींचता है: “चैतन्य के विष्णु प्रेम से भरे हैं. लेकिन ईश्वर केवल प्रेम से भरे नहीं हैं, उनमें असीम शक्ति भी है. चैतन्य के विष्णु केवल प्रेममय हैं, जबकि संतान के विष्णु केवल शक्तिशाली हैं. हम दोनों वैष्णव हैं, लेकिन दोनों ही अधूरे वैष्णव हैं.”
राजनीतिक लिहाज से यह फर्क बेहद अहम है. बंकिम वैष्णव धर्म को ताकत, अनुशासन, संघर्ष और राजनीतिक कार्रवाई के सिद्धांत के रूप में नए सिरे से गढ़ रहे हैं. निष्क्रिय या केवल भक्ति में डूबे रहने वाले हिंदू को खारिज किया जाता है. उसकी जगह एक लड़ाकू धार्मिक इंसान को खड़ा किया जाता है, जो दुश्मन का दमन करना अपना धार्मिक कर्तव्य मानता है. धार्मिक विचारों में यह बदलाव ‘आनंदमठ’ की विचारधारा की बुनियाद में है.
लेकिन संतान आंदोलन की राजनीतिक दिशा में एक बड़ा विरोधाभास भी मौजूद है. सत्यानंद और दूसरे संतान शुरू में अंग्रेजों से भी टकराव की ओर बढ़ना चाहते हैं, क्योंकि अंग्रेज बंगाल के नए हुक्मरान बनकर उभर रहे हैं. लेकिन उनका छिपा हुआ नेता, रहस्यमय वैद्य, आखिरकार इस रास्ते को खारिज कर देता है.
दरअसल, उपन्यास का अंत एक बेहद हैरतअंगेज दलील पेश करता है: यह कि अंग्रेजी राज शांति, कानून-व्यवस्था और खुशहाली लाएगा; वह मुस्लिम शासन से जुड़ी बदइंतजामी को खत्म करेगा और, विडंबना देखिए कि वही आगे चलकर सनातन धर्म के पुनरुत्थान के लिए जरूरी हालात पैदा करेगा. आखिरी अध्याय से पहले भी उपन्यास बार-बार मुस्लिम शासन की अराजकता और अंग्रेजी राज के अनुशासन के बीच के इस फर्क की तरफ इशारा करता है.
मिसाल के तौर पर, बंकिम लिखते हैं:
“कोतवाल ने राजदरबार को खबर देकर ब्रह्मचारी और महेंद्र को कैदखाने में डलवा दिया. वह कैदखाना बड़ा भयानक था; जो एक बार उसके अंदर जाता, वह शायद ही कभी जिंदा बाहर निकल पाता, क्योंकि वहां इंसाफ करने वाला कोई नहीं था. वह अंग्रेजों की जेल नहीं थी, क्योंकि तब अंग्रेजों की न्याय-व्यवस्था नहीं आई थी. आज सुव्यवस्था का दौर है; तब अराजकता का दौर था. सुव्यवस्था के जमाने से उस अव्यवस्था के जमाने की तुलना कीजिए.” यह फर्क जान-बूझकर पेश किया गया है. मुस्लिम शासन को मनमानी सत्ता से जोड़ा गया है, जबकि अंग्रेजी शासन को कानून, व्यवस्था और संस्थागत शासन का प्रतीक बताया गया है. उपन्यास के आखिरी अध्याय में यह राजनीतिक नजरिया सबसे साफ रूप में सामने आता है.
चौथे भाग के आठवें अध्याय में, वह छुपा हुआ मुख्य किरदार (वैद्य) आखिरकार सामने आता है और पूरे आंदोलन के पीछे छिपी राजनीतिक सोच को उजागर करता है. सत्यानंद और दूसरे संतान अपनी लड़ाई सिर्फ पुरानी मुस्लिम हुकूमत के खिलाफ ही नहीं, बल्कि अंग्रेजों की उभरती ताकत के खिलाफ भी जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि उनका आखिरी मकसद तो हिंदू राज कायम करना है.
लेकिन वैद्य उन्हें कुछ और ही बताता है: “अंग्रेज दुश्मन नहीं हैं. वे हमारे सहयोगी हैं.”
उन दोनों के बीच की यह बातचीत गौर करने के काबिल है. सत्यानंद पूछता है कि ठीक उस घड़ी में जब उसने दुश्मन को हराकर सनातन धर्म का रास्ता साफ कर दिया है, उसे लड़ाई छोड़ने का हुक्म क्यों दिया जा रहा है? जवाब एकदम दो-टूक मिलता है: “तुम्हारा काम पूरा हो गया. मुस्लिम राज का नाश हो चुका है. अब तुम्हारा और कोई काम बाकी नहीं है. अब बेकार खून बहाने की कोई जरूरत नहीं.” सत्यानंद एतराज जताता है: “मुस्लिम राज तो मिट गया, पर हिंदू राज तो कायम नहीं हुआ. कलकत्ता में अब भी अंग्रेज ताकतवर हैं.” वैद्य जवाब देता है: “हिंदू राज अभी कायम नहीं होगा. अब तुम यहां रहोगे तो बेवजह कत्लेआम होगा. इसलिए, मेरे साथ चलो.” सत्यानंद टूट जाता है. वह पूछता है कि अगर हिंदू राज कायम नहीं होगा, तो फिर राज कौन करेगा? क्या फिर से मुसलमान लौट आएंगे? जवाब मिलता है: “नहीं. अब अंग्रेज राज करेंगे.” और फिर वह वैद्य इसके पीछे की वैचारिक दलील पेश करता है: “अंग्रेज बाहरी ज्ञान में बड़े आगे हैं और लोगों को तालीम देने में बड़े माहिर हैं. इसलिए हम अंग्रेजों को ही शासक बनाएंगे. अंग्रेजी शिक्षा से हमारे देश के लोग बाहरी ज्ञान में कुशल हो जाएंगे, और तब वे भीतर के सत्य को समझने के काबिल बन सकेंगे. तब सनातन धर्म के प्रचार में कोई रुकावट नहीं रहेगी.”
‘आनंदमठ’ का यह हिस्सा उसकी राजनीति को समझने के लिए बेहद अहम है. उपन्यास का अंत अंग्रेजी गुलामी से फौरन आजादी के किसी सीधे आह्वान के साथ नहीं होता. इसके बजाय, इसकी अंतर्निहित राजनीतिक सोच यह दलील देती है कि ब्रिटिश राज ऐतिहासिक रूप से फायदेमंद है, क्योंकि वह हिंदू सभ्यता के भावी पुनर्जागरण के लिए जरूरी ज्ञान, शिक्षा और सामाजिक अनुशासन मुहैया करा सकता है. इसलिए अंग्रेज महज दुश्मन नहीं हैं. वे इतिहास के ऐसे औजार हैं जो फिलहाल काम के हैं. वह वैद्य इससे भी आगे बढ़कर कहता है: “जब तक हिंदू फिर से ज्ञानवान, गुणवान और बलवान नहीं हो जाते, तब तक अंग्रेजी राज अटूट रहेगा. अंग्रेजी राज में प्रजा सुखी रहेगी और बेरोक-टोक अपने धर्म का पालन कर सकेगी.”
मगर सत्यानंद इस तर्क को मानने से इनकार कर देता है. उसका जज्बाती लगाव अब भी ‘मां’ के साथ जुड़ा है. वैद्य उससे कहता है: “तुम्हारा व्रत सफल हुआ. तुमने मां के कल्याण के लिए काम किया है – तुमने अंग्रेजी राज स्थापित कर दिया है.” ‘आनंदमठ’ की राजनीतिक बनावट की शायद यह सबसे बड़ी विडंबना है. संतान यह मानकर लड़ रहे होते हैं कि वे ‘मां’ की आजादी के लिए जान की बाजी लगा रहे हैं. लेकिन उपन्यास की छुपी हुई वैचारिक सत्ता के मुताबिक, उनकी बगावत ने असल में ब्रिटिश राज की बुनियाद मजबूत करने के राजनीतिक हालात तैयार किए हैं. संन्यासी योद्धा खुद को ‘मां’ का मुक्तिदाता समझता है, जबकि वैद्य उसे बताता है कि उसका ऐतिहासिक काम तो बस अंग्रेजों के राज के लिए जमीन तैयार करना था. इस तरह ‘आनंदमठ’ के भीतर एक गहरा राजनीतिक विरोधाभास मौजूद है: मुस्लिम राजनीतिक सत्ता का विनाश हिंदू पुनर्जागरण की जरूरी पहली शर्त के रूप में पेश किया जाता है, जबकि ब्रिटिश राज को एक ऐसे अस्थायी ऐतिहासिक माध्यम के तौर पर पेश किया जाता है जिसके जरिए वह पुनर्जागरण आखिरकार मुमकिन हो सकेगा.
यहीं आकर ‘आनंदमठ’ की ऐतिहासिक बुनियाद सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में आ जाती है. उपन्यास अपनी प्रेरणा संन्यासी विद्रोह से लेता है, जो तकरीबन 1763 से 1800 के बीच रुक-रुक कर चला था. लेकिन बंकिम को अपनी कहानी के सांचे में फिट करने के लिए ऐतिहासिक रिकाॅर्ड को बुरी तरह बदलना पड़ा. असल संन्यासी-फकीर विद्रोह को मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं की लड़ाई में समेटकर नहीं देखा जा सकता. वह काफी हद तक किसानों और उजड़े हुए ग्रामीणों की बगावत थी जिसमें हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर साथ लड़े थे. मजनू शाह इस आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे. नूरुल मुहम्मद एक दूसरे बड़े नेता थे. फिर भी बंकिम इस ऐतिहासिक बगावत को अपने वैचारिक चश्मे से दोबारा गढ़ते हैं और इसे मुख्य रूप से मुसलमानों के खिलाफ एक जंग के रूप में पेश करते हैं. इससे इतिहास और उपन्यास की कहानी के बीच एक बुनियादी तनाव पैदा हो जाता है. असल इतिहास का संन्यासी आंदोलन बंकिम द्वारा अतीत के हिंदू राष्ट्रवादी पुनर्निर्माण के सांचे में ठीक से फिट ही नहीं बैठता. इसलिए यह उपन्यास इतिहास को जस का तस रखने के बजाय उसका रूप ही बदल डालता है. यह विरोधाभास ‘आनंदमठ’ में दिखाई गई लड़ाइयों में और भी तीखे रूप में सामने आता है.
उपन्यास में जिन असली फौजी झड़पों का जिक्र है, उनमें थाॅमस और एडवर्ड जैसे अंग्रेज अफसरों के नाम तो आते हैं. मगर किसी भी मुस्लिम सेनापति को उस तरह का अलग व्यक्तिगत किरदार या चेहरा नहीं दिया गया है. और ठीक उसी वक्त, संतानों के मुंह से बार-बार जो युद्ध-घोष निकलता है, वह है – “मार नेड़े!” यानी “मुसलमानों को मारो!” (बंगाली में ‘नेड़ा/नेड़े’ मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक हिकारत-भरा शब्द था). इस तरह ऐतिहासिक दुश्मन को भी चुन-चुनकर अपने हिसाब से गढ़ा गया है.
बंकिम हिंदुओं और मुसलमानों की साझी भागीदारी वाले एक जटिल उपनिवेश-विरोधी और किसान विद्रोह को उठाते हैं, और उसे पूरी तरह एक ऐसे हिंदू राजनीतिक संघर्ष में बदल देते हैं, जहां मुस्लिम शासन ही इतिहास का मुख्य खलनायक बन जाता है. यह इतिहास नहीं है. यह इतिहास की सामग्री से गढ़ा गया एक राजनीतिक मिथक है.
बंकिम इतिहास को राजनीतिक मिथक में बदल देते हैं. ऐतिहासिक संन्यासी ऐसे अनुशासित योद्धा-संन्यासी बन जाते हैं, जो ‘मां’ के लिए अपनी निजी जिंदगी तक कुर्बान कर देते हैं. इसलिए ‘आनंदमठ’ का सबसे अहम वैचारिक योगदान उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि राष्ट्र को एक पवित्र सत्ता में बदल देना है. देश अब महज जमीन का एक टुकड़ा नहीं रह जाता. वह ‘मां’ बन जाता है – और इस मां की कल्पना धीरे-धीरे हिंदू धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के रूपों के जरिए गढ़ी जाने लगती है.
यह एक क्रांतिकारी राजनीतिक रूपक है.
आधुनिक राष्ट्रवाद के लिए आम तौर पर ऐसे सामूहिक समुदाय की कल्पना की जरूरत होती है, जो स्थानीय पहचानों और वफादारियों से ऊपर उठ सके. बंकिम ने इस काम के लिए एक बेहद ताकतवर भावनात्मक प्रतीक दिया: मातृभूमि यानी ‘मां’. लेकिन इस रूपक में एक ऐसा विरोधाभास था, जिसका हल नहीं निकाला गया.
अगर ‘मां’ का मतलब सिर्फ सभी भारतीयों की धरती है, तो इस प्रतीक में हर किसी को शामिल किया जा सकता है. लेकिन अगर ‘मां’ को खास तौर पर हिंदू देवी-देवताओं के रूप में दिखाया जाता है, तो सबको साथ लेने वाला राजनीतिक समुदाय धीरे-धीरे एक खास धार्मिक पहचान हासिल करने लगता है.
यही टकराव ‘वंदे मातरम्’ के भीतर भी बना रहा और बीसवीं सदी की भारतीय राजनीति में आखिरकार इससे बचना नामुमकिन हो गया.
(क्रमशः)
(लिबरेशन, नवंबर 2026 से साभार)