लगता है उत्तराखंड में भाजपा के पाप का घड़ा अब भर गया है. खुद को योगी आदित्यनाथ और हेमंता बिस्वा सरमा से बड़ा हिंदुत्ववादी घोषित करने की होड़ में लगे मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के कारनामे अब उन पर ही पलटवार करने लगे हैं. धामी सरकार ने 27 जनवरी 2025 को राज्य में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर अपने हिन्दुत्ववादी एजेंडे को परवान चढ़ाने का काम किया. यूसीसी लागू होने के बाद 26 मार्च 2010 से 27 मार्च 2025 के बीच हुए विवाह के जोड़ों को इस कानून के तहत पंजीकरण कराना आवश्यक था. इसी क्रम में भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर ने अपनी दूसरी पत्नी भाजपा नेत्री और अभिनेत्री उर्मिला राठौर को कानून अपनी पत्नी के रूप में पंजीकृत कराने से इनकार कर दिया. बस इस सवाल पर दोनों के बीच हुए विवाद ने अंकिता भंडारी हत्याकांड में शामिल वीआइपी के नाम का खुलासा करा दिया. इस खुलासे ने उत्तराखंड में ‘लव जेहाद’ का नारा लगाने वाले भगवाधारियों के बलात्कारी भेड़िया गिरोहों को बेनकाब कर दिया है, जो सत्ता की ठसक के बल पर राज्य की बहन-बेटियों की इज्जत से खेल रहे हैं और उत्तराखंड में पर्यटन का थाईलैंडी मॉडल तैयार कर रहे हैं.
अंकिता भंडारी हत्याकांड में संलिप्त वीआईपी नामों के खुलासे के बाद उत्तराखंड में एक बार फिर आंदोलन का उबाल आ गया है. इस प्रकरण में खास बात यह है कि नरेंद्र मोदी व पुष्कर धामी की डबल इंजन सरकार ने इस प्रकरण से अपने वीआईपी को बचाने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी. भय इतना था कि भाजपा के पिंजरे का तोता बनी और हर विपक्षी नेता के पीछे छोड़ी गयी सीबीआई की जांच पर भी मोदी-धामी सरकार भरोसा नहीं कर पा रही थी. 18 सितंबर 2022 को ऋृषिकेश के वनंतरा रिसोर्ट में अंकिता भंडारी की धामी सरकार के वीआईपी के सामने परोसने का विरोध करने पर हत्या कर दी गयी थी. मृतका के परिवार, न्याय के लिए आवाज उठा रहे तमाम संगठनों की मांग के बावजूद मोदी और धामी की सरकार ने इस कांड की जांच सीबीआइ को देने से इनकार कर दिया था. परन्तु तीन वर्ष बाद ही सही, खुद भाजपा के अन्दर से ही उन वीआईपी लोगों के नाम उजागर हो गए हैं, जिनके लिए अंकिता भंडारी को परोसने (अतिरिक्त सेवा देने) का दबाव बनाया जा रहा था.
निचली अदालत ने जन आंदोलनों के दबाव में पुलिस द्वारा आरोपी बनाए गए रिजॉर्ट मालिक भाजपा के दर्जा मंत्री विनोद आर्या के पुत्र पुलकित आर्य, मैनेजर सौरभ भास्कर और सहायक प्रवंधक अंकित गुप्ता को दोषी ठहराया है. परन्तु इस पूरे प्रकरण के लिए मुख्य रूप रूप से जिम्मेदार उन वीआईपी, रिजॉर्ट में अंकिता के कमरे को ध्वस्त कर उसका बिस्तर जला सारे सबूतों को मिटाने वाली भाजपा विधायक रेणु बिष्ट और ध्वस्तीकरण की घोषणा करने वाले मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के खिलाफ अदालत ने कोई आदेश नहीं दिया. आखिर वे कौन से सबूत अंकिता के कमरे में थे, जिन्हें मिटाने के लिए उसके कमरे को ध्वस्त कर बिस्तर को भी जला दिया गया? क्या अंकिता के इनकार के बावजूद उस रात उसके साथ इन वीआईपी ने जबरदस्ती की थी, जिसके सबूत मिटाने के लिए उसके बिस्तर को भी जला दिया गया था? क्योंकि खुलासा करने वाले भाजपा नेताओं के अनुसार भाजपा/धामी सरकार के वीआइपी लोगों ने अंकिता के साथ ग्रुप सेक्स (सामूहिक यौन संबंध) की योजना बनाई थी.
जैसी उम्मीद थी, भाजपा कि राज्य सरकार और उसकी पुलिस ने वीआईपी के नामों का खुलासा करने वाले भाजपा के पूर्व विधायक तथा दोनों वीआईपी भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व उत्तराखंड प्रभारी तथा उत्तराखंड के संगठन मंत्री के खिलाफ कोई जांच नहीं बिठाई. इसके बजाय अभिनेत्री उर्मिला सनावर के खिलाफ जांच बिठाई गयी है, जिसने इस कांड के वीआईपी नामों से सम्बंधित ऑडियो सबूत दुनिया के सामने लाकर कानून की मदद की है. उम्मीद के अनुसार उत्तराखंड की भाजपा और उसकी सरकार खुलकर अपने वीआईपी को बचाने के लिए सामने आ गए हैं. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट से लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर धामी तक अपने वीआईपी के बचाव में मैदान में उतर पड़े हैं. बलात्कार में सजायाफ्ता आशाराम और राम रहीम को लगातार पैरोल पर जेल से बाहर करा रहे प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने अंकिता प्रकरण पर चुप्पी साध ली है. पर इसी समय उन्नाव के बलात्कारी भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को जमानत और सजा के निलंबन का आदेश करा कर भाजपा की मोदी-योगी सरकार ने साफ संदेश दे दिया है कि बलात्कारियों के साथ उनके रिश्ते कैसे हैं?
इस कांड में उजागर वीआईपी की दलित पृष्ठभूमि के कारण भाजपा ने इसे दलितों के अपमान से जोड़ने की असफल कोशिश की है. जबकि सच्चाई यह है कि इस पूरे प्रकरण में वीआईपी नामों का खुलासा करने वाले भाजपा के पूर्व विधायक और उसकी आवाज का आडियो जारी करने वाली भाजपा नेत्री व अभिनेत्री उर्मिला सनावर खुद दलित पृष्ठभूमि से आते हैं. भाजपा का आरोप है कि उर्मिला सनावर कांग्रेस पार्टी के इशारे पर भाजपा नेताओं को बदनाम कर रही है. अगर भाजपा के नेता बेदाग हैं तो फिर भाजपा और उसकी राज्य सरकार सीबीआई जांच से क्यों इनकार कर रही है? मुख्य सवाल यह है कि पूर्व भाजपा विधायक द्वारा किये गए खुलासे के बाद इस बात की जांच की जानी चाहिए कि उजागर हुए दोनों वीआईपी के मोबाइल फोन की लोकेशन अंकिता भंडारी हत्याकांड की रात कहां थी? इन दोनों वीआईपी के कॉल रिकार्ड भी सामने आने चाहिए कि उस दिन इन्होंने किस-किस से बात की थी.
अंकिता को न्याय देने के सवाल पर आन्दोलन में उतरे तमाम समूह सिर्फ “वीआईपी को सजा दो” की मांग तक सीमित न रहें. अंकिता भंडारी की हत्या के लिए इन वीआईपी के साथ भाजपा की राज्य सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर धामी भी जिम्मेदार हैं, जो सत्ता का प्रसाद पाने के लिए अपने वीआईपी के सामने उत्तराखंड की बेटियों को परोस रहे हैं. अंकिता भंडारी हत्याकांड का सवाल अब एक बेटी के साथ हुए अन्याय और उसकी हत्या से कहीं आगे उत्तराखंड के विकास के मॉडल से जुड़ गया है. अब यह तय करने का समय आ गया है कि उत्तराखंड को थाईलैंड जैसे खुले यौन व्यापार की मंडी बनाने के भाजपा के एजेंडे के साथ आगे बढ़ना है या फिर अपने जल, जंगल, जमीन पर जनता के अधिकार के साथ एक खुशहाल उत्तराखंड की नीव रखनी है. अगर उत्तराखंड के इन बुनियादी मुद्दों से इतर सिर्फ वीआईपी को सजा देने पर आन्दोलन आगे बढ़ा तो भाजपा इसे पहाड़ी-बाहरी का रंग देकर अपने एजेंडे पर ही आगे बढ़ जाएगी.
उत्तराखंड में परिस्थितियां एक बार फिर 1994 जैसी बन रही हैं. मगर ध्यान रहे कि 1994 की गलतियों का दोहराव न हो! हम किसके लिए लड़ रहे हैं और किसके खिलाफ लड़ रहे हैं, यह समझ साफ रहे. इसलिए आंदोलनकारी ताकतों को सर्वदलीय मंचों के धोखे से बाहर आना होगा. कारपोरेट लूट तथा थाइलैंडी विकास मॉडल की नीतियों से पहाड़ की तबाही और मैदानी क्षेत्रों से अतिक्रमण के नाम पर गरीबों की बड़े पैमाने पर बेदखली आज राज्य में आन्दोलन के बड़े मुद्दे बने हैं. अंकिता भंडारी को न्याय देने का सवाल अब उत्तराखंड के साथ न्याय होने का सवाल बन गया है. अंकिता की हत्या के लिए जिम्मेदार हत्यारी राजनीतिक ताकत ही उत्तराखंड राज्य की अवधारणा की हत्या के लिए भी दोषी है. इन्हें उत्तराखंड से उखाड़े बिना न तो अंकिता को न्याय मिलेगा, न उत्तराखंड को.