2 फरवरी की रात हुआ ‘भारत-अमरीका व्यापार समझौता’ भारत की खेती-किसानी के लिए तबाही का दस्तावेज बन गया है. यह समझौता देश के किसानों और लघु-मध्यम उद्योगों के हितों पर बड़ा कुठाराघात है तथा अमेरिकी साम्राज्यवाद के आगे मोदी सरकार का पूर्ण समर्पण है. ऑपरेशन सिंदूर की तरह इस समझौते पर हस्ताक्षर हो जाने की घोषणा प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी या इस समझौते के लिए अमेरिका में मौजूद भारत के विदेश मंत्री एस. जय शंकर ने नहीं की. बल्कि एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ही यह घोषणा की और उनकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस ने इस समझौते पर कुछ रोशनी डाली. ट्रम्प ने कहा कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदने पर भी सहमत हो गया है. लगता है मोदी सरकार ने भारत जैसे महान देश को अमेरिकी साम्राज्यवाद के एक ऐसे राज्य की स्थिति में पहुंचा दिया है, जिसके सभी महत्वपूर्ण फैसले अब एक राजा की तरह ट्रम्प ले रहे हैं, तथा मोदी उनकी अधीनस्थता स्वीकार किए सामंत की तरह उनके आगे मौन और नतमस्तक हैं. आजादी के बाद दुनिया में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता की भूमिका में रहा भारत इस शर्मनाक स्थिति में पहुंचा दिया गया है. भारत के लोगों के साथ इससे ज्यादा मजाक और क्या हो सकता है कि इसे ही ‘अमृतकाल’ का नाम दिया जा रहा है.
मोदी सरकार ने अमेरिका और उसके बेलगाम राष्ट्रपति के आगे यह समर्पण ऐसे समय पर किया है, जब दुनिया की सबसे बदनाम एप्सटीन फाइल में प्रधान मंत्री मोदी सहित उनके एक मंत्री और उद्योगपति मित्र का नाम आने की चर्चा चारों ओर है. वहीं अमरीकी अदालत द्वारा आपराधिक मामले में प्रधानमंत्री मोदी के चहेते उद्योगपति अडानी पर कार्यवाही आगे बढ़ा दी गई है. अगर अमेरिकी कोर्ट अडानी को कोई सजा सुनाता है तो प्रधान मंत्री मोदी और भाजपा के आर्थिक स्रोत पर यह एक बड़ा हमला होगा. इसलिए अडानी को मिलने वाली संभावित कानूनी सजा भी असल में प्रधानमंत्री मोदी को मिली सजा के रूप में ही देखी और समझी जाएगी. इन्हीं दो मुद्दों ने प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जीवन की सांसें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के पंजों में अटका दी थी. अंत में खुद की छवि तथा राजनितिक सत्ता बचाने के लिए मोदी ने अमेरिका के आगे भारत के हितों को कुर्बान कर दिया. तीन फरवरी को संसद में भाजपा और एनडीए से जुड़े सांसदों ने इस समझौते के लिए प्रधानमंत्री का जिस उत्साह से अभिनन्दन किया, उससे लग रहा था कि प्रधानमंत्री की छवि और भाजपा के प्रमुख आर्थिक स्रोत अडानी को बचाने के लिए ही इस समझौते को अंजाम दिया गया है.
मोदी सरकार ने इस समझौते के घातक प्रावधानों पर देश और देश के किसानों को अंधेरे में रखा है. खासकर तब जब संसद चल रही हो और देश भर में ऐसे किसी समझौते के खिलाफ आवाजें उठ रही हों. मोदी सरकार समझौते के प्रावधानों को अमेरिका द्वारा भारत के मालों पर टैरिफ रेट 18 प्रतिशत कर देने के पीछे छुपा रही है, पर यह नहीं बता रही है कि अमेरिका से होने वाले आयात पर टैरिफ शून्य कर दिया गया है. इसके बावजूद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का यह कहना कि समझौते में भारत के हितों की रक्षा की गई है, देश के आंखों में धूल झोंकना है. अमेरिकी में कृषि मामलों को देखने वाली राष्ट्रपति की सचिव ब्रुक रोलिंस ने इस समझौते पर बयान जारी कर कहा है – ‘हमारे अमेरिकी किसानों के लिए एक बार फिर से अपना वादा पूरा करने के लिए @POTUS को धन्यवाद! नए अमेरिका-भारत समझौते से भारत के विशाल बाजार में अमेरिकी कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ेगा, जिससे कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीण अमेरिका में नकदी का प्रवाह होगा. 2024 में, भारत के साथ अमेरिका का कृषि व्यापार घाटा 1.3 अरब डॉलर था. भारत की बढ़ती आबादी अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है और आज का समझौता इस घाटे को कम करने में काफी मददगार साबित होगा. कृषि क्षेत्रा के दर्जनों समझौतों के अलावा ‘अमेरिका फर्स्ट’ की जीत भी एक बड़ी उपलब्धि है.’
मोदी सरकार ने इस समझौते के माध्यम से भारतीय किसानों की कीमत पर अमेरिका से भारी सब्सिडी वाली सस्ती कृषि उपज के आयात के दरवाजे खोल दिए हैं. भारतीय किसानों की बहुसंख्या जो घाटे की खेती और कर्ज के बोझ के कारण पहले ही जर्जर आर्थिक स्थिति में हैं, को बर्बादी की तरफ धकेल दी है. जिन फसलों पर इस समझौते का तुरंत असर पड़ेगा वे हैं सोयाबीन, मक्का, कपास, डेयरी, पोल्ट्री उत्पाद. इससे देश के किसानों की बहुसंख्या की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी और बहुत ही सस्ती अमरीकी जीएम फसलों तथा कृतिम रूप से मांसाहारी बनाई गई गायों के दुग्ध उत्पादों से भारतीय बाजार पट जाएगा. भारत में कृषि की उत्पादन लागत अमेरिका के मुकाबले काफी ज्यादा है. क्योंकि अमेरिकी सरकार अपने प्रति किसान को लगभग 22 लाख रुपए वार्षिक सब्सिडी देती है. यह भारत के किसानों को मिलने वाली कुल सब्सिडी से 20 गुना से भी ज्यादा है.
अमेरिका में अब कुल 40 लाख के करीब कृषि जोतें बची हैं. जबकि भारत में इनकी संख्या लगभग 14 करोड़ है. इसी तरह अमेरिका में एक कृषि जोत का आकार कम से कम 200 एकड़ है. जबकि भारत की 85 प्रतिशत कृषि जोतें 5 एकड़ से कम हैं. दूसरी तरफ अमेरिका में जहां भारी सब्सिडी पर आधारित कारपोरेट डेयरी फार्मिंग होती है, वहीं भारत के कुल दुग्ध उत्पादन का 70 प्रतिशत उत्पादन देश के मध्यम, गरीब और भूमिहीन किसान तथा खेत मजदूर 1 से 10 तक की संख्या में पाले गए पशुओं से करते हैं. ऐसी स्थिति में भी इस समझौते में अमेरिकी कारपोरेट फार्म उत्पादों को भारत के बाजार में शून्य प्रतिशत टैरिफ पर आने की छूट दे दी गई. यह भारत के किसानों और लघु मध्यम उद्योगों को बड़ी तबाही के रास्ते पर धकेल देगी और गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन को बढ़ावा देगी.
मोदी सरकार द्वारा एक फरवरी को सांसद में पेश बजट में कृषि क्षेत्र की पूर्ण उपेक्षा ने जता दिया था कि मोदी सरकार अमेरिका के कितने दबाव में है. मोदी सरकार का यह कदम देश और भारतीय किसानों के हितों पर एक बड़ा कुठाराघात है. अखिल भारतीय किसान महासभा सहित सभी किसान संगठनों ने इस समझौते को तत्काल रद्द करने की मांग की है. साथ ही संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने इस समझौते के खिलाफ गांव-गांव में मोदी-ट्रम्प के पुतले जलाते हुए 12 फरवरी की आम हड़ताल के दिन तहसीलों और जिला मुख्यालयों में बड़ी गोलबन्दी के साथ प्रदर्शनों का आ“वान किया है.
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मोदी सरकार ने ट्रंप के ‘मेक अमेरिका अगेन’ के मंसूबों के सामने देश के हित गिरवी रख दिए
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच जिस ‘ट्रेड डील’ का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उसकी पहली जानकारी खुद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दी. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ‘X’ पर चुनिंदा और अधूरी बातें रखीं. इतने अहम राष्ट्रीय मसले पर, जिसके दूरगामी और खतरनाक नतीजे हो सकते हैं, यह देश की जनता के साथ कपट भरी धोखाधड़ी है.
ट्रंप-मोदी समझौते की असली शर्तें क्या हैं? प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ 18% टैरिफ की गोल-मोल बात कर रहे हैं, जबकि ट्रंप ने इस सौदे की असली और कड़वी कीमत साफ कर दी है. ट्रंप के मुताबिक, भारत रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद करेगा और उसकी जगह अमेरिका व वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाएगा – ऐसा वेनेजुएला, जिसके तेल संसाधनों पर अमेरिका साम्राज्यवादी दखल के जरिये कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा है.
ट्रंप का यह भी कहना है कि भारत ने अमेरिकी सामानों, जिनमें कृषि उत्पाद शामिल हैं, के लिए अपने बाजार ‘जीरो टैरिफ’ पर खोलने पर सहमति दे दी है. अमेरिका की कृषि सचिव ब्रुक रोलिन्स ने सार्वजनिक तौर पर ट्रंप को अमेरिकी किसानों के लिए बड़ी जीत दिलाने के लिए धन्यवाद दिया है. इससे साफ है कि इस समझौते से फायदा किसे होने वाला है.
अब बुनियादी सवाल यह है कि मोदी सरकार ने भारत के राष्ट्रीय हितों, खासकर किसानों के हितों को दांव पर लगाकर ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ मंसूबों के सामने गिरवी क्यों रखा?
अगर अमेरिका की भारी सब्सिडी से लैस मक्का, इथेनॉल, सोयाबीन, डेयरी, मीट और प्रोसेस्ड फूड (डिब्बाबंद खाना) को बिना किसी रोक-टोक भारत में आने दिया गया, तो यह भारतीय खेती को तबाह कर देगा. हमारे करोड़ों छोटे और सीमांत किसान, जो पहले से ही खेती की बढ़ती लागत और सरकार की बेरुखी की दोहरी मार झेल रहे हैं, और गहरे संकट में धकेल दिए जाएंगे.
खास बात यह है कि स्टील और एल्युमिनियम जैसे उत्पाद तथाकथित पारस्परिक टैरिफ के दायरे से बाहर रखे गए हैं. यानी इन अहम क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों को पहले की तरह भारी टैरिफ का सामना करना पड़ेगा. ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति से पहले अमेरिका में औसत टैरिफ करीब 2.5% था, जो बाद में बढ़कर 50% तक पहुंच गया. इस लिहाज से 18% टैरिफ वाला यह “डील” भारत के लिए बुरा और घाटे का सौदा है, जिसमें उसे मिला कम और गंवाया कहीं ज्यादा है.
गैर-टैरिफ बाधाओं को शून्य करने की जो खबरें आ रही हैं, उसके नतीजे और भी गंभीर होंगे. अगर यह लागू हुआ, तो इसका मतलब भारत के छोटे उत्पादकों, एमएसएमई और लाखों नौकरियों के हितों को दांव पर लगाना होगा. इससे भारतीय बाजार में अमेरिकी कृषि व छोटे उद्योग के उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी. हमारे घरेलू उत्पादकों को अमेरिका के भारी सब्सिडी वाले डेयरी, अनाज, मांस और प्रोसेस्ड फूड सेक्टर से ऐसी असमान और बर्बर प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा, जिसमें उनका टिक पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा.
मोदी सरकार इस समझौते को बड़ी उपलब्धि बताकर पेश कर रही है, जबकि यह ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देगा, जिससे देश की आधी से ज्यादा आबादी की आजीविका चलती है. हमारे छोटे और मध्यम उद्योगों को बड़ी अमेरिकी कॉर्पारेट कंपनियों से मुकाबला करने के लिए मजबूर किया जाएगा, जिससे “मेक इन इंडिया” और “मेड इन इंडिया” को गहरा ढांचागत झटका लगेगा.
यह समझौता अमेरिका के भू-राजनीतिक हितों के सामने भारत के घुटने टेकने और बढ़ती अधीनता को उजागर करता है. पिछले एक साल में भारत के तेल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग दोगुनी हो चुकी है. ऐसे में यह बेहद चिंताजनक है कि भारत सरकार अमेरिका के इशारे पर वेनेजुएला से तेल खरीदने या रूस और ईरान से तेल न खरीदने का फैसला ले रही है. वेनेजुएला से तेल खरीदना – या किसी अन्य देश से न खरीदना – दो संप्रभु देशों के बीच का द्विपक्षीय मामला है. ऐसा फैसला लेने का हक डोनाल्ड ट्रंप या अमेरिकी सरकार को कतई नहीं है.
सरकार को तुरंत इस समझौते और प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते का पूरा विवरण जनता के सामने रखना चाहिए, ताकि उस पर लोकतांत्रिक चर्चा और जांच हो सके. भारतीय किसानों, मेहनतकश जनता और देश की संप्रभुता से किसी भी तरह का समझौता करने की कोशिश का डटकर मुकाबला किया जाएगा.
– केंद्रीय कमेटी, भाकपा(माले)-लिबरेशन