पिछले चार दशकों से बिहार को करीब से देखते हुए मैंने पुलिस फायरिंग और सामंती-अपराधी हिंसा में हुए न जाने कितने जनसंहार और हत्याकांड देखे हैं. लेकिन, नीतीश के बाद के इस दौर में, जब पहली बार भाजपा का अपना मुख्यमंत्री बना है, बिहार एक पुलिस राज्य में बदलता दिख रहा है. बुलडोजर, तथाकथित एनकाउंटर हत्याएं, माॅब लिंचिंग – यह सब अब रोज की बात हो गई है. पुलिस और यहां तक कि पुजारी भी निहत्थे लोगों को, बूढ़ी औरतों तक को, पीटकर एक तरह का क्रूर आनंद ले रहे हैं.
1 जुलाई को मैं काॅमरेड कुणाल, संदीप सौरभ, अमर, अजीत सिंह, संतोष सहर और कुमार परवेज के साथ नालंदा, यानी पूर्व मुख्यमंत्री के गृह जिले, और भोजपुर में कुछ जगहों पर गया – वहां के पीड़ितों से बात करने के लिए. जो हिंसा हमें वहां सुनने को मिली वह बेवजह और क्रूर थी, मनुस्मृति की सोच से प्रेरित, और संविधान से इसका कोई लेना-देना नहीं.
हम बिहारशरीफ गए और श्रवण पासवान तथा पिंटू पासवान के परिवार और पड़ोसियों से मिले. ये दो नौजवान हाल ही में राजगीर में मंदिर के पुजारियों द्वारा पीट-पीटकर मार डाले गए, बताया जा रहा है कि उनकी मौजूदगी से मंदिर ‘अपवित्र’ हो गया – इसी की सजा के तौर पर. हमने बेरहमी से पिटाई के वीडियो देखे और पुलिस की एफआईआर पढ़ी, जिसमें इस भयानक जातिगत हिंसा को कुछ इस तरह पेश किया गया जैसे कोई अनजान लोग चोर पकड़ने की कोशिश कर रहे हों!
हम नगरनौसा गए, नालंदा का एक प्रखंड मुख्यालय, जहां हाल ही में एक डिग्री काॅलेज मंजूर हुआ है. कुछ स्थानीय नेताओं ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए काॅलेज को प्रखंड मुख्यालय से हटाकर एक दूर की पंचायत में स्थानांतरित करवाना चाहा, जिसके खिलाफ छात्रों और उनके परिवारों ने प्रदर्शन की बात कही. क्या आप सोच सकते हैं कि प्रशासन एक दर्जन थानों से फोर्स बुलाकर पहले से ही भारी हिंसा शुरू कर दे, घरों में तोड़फोड़ करे, बेरहमी से पिटाई करे, आंसू गैस के गोले छोड़े, और दर्जनों छात्रों और आम लोगों को तरह-तरह के झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर ले? यही हुआ था वहां, और लोग आज तक इस दहशत को भूल नहीं पाए हैं.
हम बेलौटी गांव भी गए, भरत भूषण तिवारी के दुखी परिवार से मिलने. भरत को एक फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया, जिसके बाद बड़े पैमाने पर विरोध हुआ और बिहार सरकार को न्यायिक जांच का एलान करना पड़ा. जिस मनहूस सुबह इस नौजवान को पुलिस ने गोली मारी, उसके पिता को सुबह से ही स्थानीय थाने में बिठाया गया था, और उसकी मां को भी पुलिस ने पीटा.
हम गांव के आखिरी छोर तक गए, जहां जवइनिया गांव में गंगा नदी के कटाव से बेघर हुए लोगों को निचली जमीन पर बसाया गया है, जो बारिश आते ही एक बड़े गड्ढे में बदलने वाली है. कहा जा रहा है कि भरत तिवारी इन लोगों के पुनर्वास के मुद्दे पर, खासकर इस इलाके को ऊंचा उठाने की मांग पर, गहराई से जुड़े हुए थे ताकि बरसात में उनके परिवार डूबने से बच सकें.
इन सारी यात्राओं के बाद हमें एक बहुत ही डरावना पैटर्न साफ नजर आया. नीतीश कुमार के दौर में जो अच्छे शासन का वादा था, उसकी जगह अब बुलडोजर से इंसाफ और एनकाउंटर हत्याओं का नया सिद्धांत ले चुका है, साथ ही भीड़ की हत्या की बढ़ती संस्कृति भी. लोकतंत्र और कानून का राज बचाने के लिए जरूरी है कि बिहार को इस पुलिस राज के साये से बचाया जाए.