वर्ष 35 / अंक - 15 / बरसों का कठोर जेल जीवन भी जिनके जज्बे को कमजोर न क...

बरसों का कठोर जेल जीवन भी जिनके जज्बे को कमजोर न कर सका

बरसों का कठोर जेल जीवन भी जिनके जज्बे को कमजोर न कर सका

(पिछले दिनों जेल से रिहा हुए टाडा बंदी का. चुरामन भगत से कुमार परवेज की एक बातचीत)

23 वर्षों की लंबी, कठोर और अन्यायपूर्ण जेल यात्रा के बाद जब का. चुरामन भगत अपने साथियों के साथ जेल से बाहर आए, तो यह सिर्फ रिहाई नहीं थी, बल्कि संघर्ष, अन्याय और जिजीविषा की एक पूरी कहानी का फिर से जीवित हो उठना था. समय ने उनके चेहरे पर उम्र की लकीरें जरूर खींच दी हैं, लेकिन उनकी आंखों में आज भी वही चमक और भीतर वही अडिग जज्बा मौजूद है, जो दो दशक पहले था. वे अपने व्यक्तिगत दुःख, जेल की यातनाओं या बीते वर्षों की तकलीफों को लेकर ज्यादा कुछ नहीं कहते, बल्कि उनकी चिंता आज भी वहीं केंद्रित है जहां से उनका संघर्ष शुरू हुआ था – गांव, गरीब और उनके अधिकार.

साल 1988 में अरवल जिले के भदासी गांव में हुए बहुचर्चित कांड ने कई जिंदगियों को गहरे अंधेरे में धकेल दिया. इस मामले में कॉ. चुरामन भगत समेत 19 लोगों को आरोपी बनाया गया. यह मुकदमा राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता को कुचलने के उद्देश्य से गढ़ा गया था. इन लोगों पर टाडा जैसा सख्त कानून लगाया गया, जो आमतौर पर आतंकवाद से जुड़े मामलों में इस्तेमाल होता था और उसे पूरे देश में समाप्त भी कर दिया गया था. वर्ष 2003 में अदालत ने 14 साथियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, लेकिन यह सजा भी उनके लिए अंत नहीं थी. जहां कानूनी रूप से 14 साल की सजा थी, वहीं वास्तविकता में उन्हें 23 साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा. यह सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया की देरी नहीं, बल्कि व्यवस्था की क्रूरता और लापरवाही का भी प्रतीक है.

इस लंबे कारावास के दौरान कई साथियों ने अपनी जान गंवाई. का. शाह चांद समेत अन्य साथी जेल के भीतर ही इस अन्याय को झेलते हुए दुनिया से चले गए. यह सामान्य मौतें नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम थीं, जिसने उन्हें धीरे-धीरे खत्म होने के लिए छोड़ दिया. इन मौतों ने इस पूरे संघर्ष को और भी गहरा और पीड़ादायक बना दिया.

जब का. चुरामन भगत से रिहाई के बाद बातचीत की गई, तो उन्होंने अपने जेल जीवन के बारे में विस्तार से बात करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई. वे बार-बार एक ही सवाल पर लौट आते हैं – ‘हमने लड़कर जो सैरात हासिल किया था, वह कहां चला गया?’ यह सवाल उनके भीतर की सबसे बड़ी पीड़ा को उजागर करता है. अरवल और आसपास के ग्रामीण इलाकों में आहर-पोखर, यानी जलस्रोतों पर सामूहिक कब्जा कर उसे ‘सैरात’ के रूप में विकसित करना गरीबों और दलितों के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इन जलस्रोतों से सिंघाड़े की खेती होती थी, जिससे कई परिवारों की आजीविका चलती थी और आत्मनिर्भरता का एक आधार तैयार हुआ था. लेकिन अबवह सैरात खत्म हो चुका है या उनसे छिन गया है. यही बात उन्हें सबसे अधिक बेचैन करती है.

4 अप्रैल को अरवल जिले में आयोजित पार्टी के सम्मेलन के अवसर पर का. चुरामन भगत ने पार्टी का झंडोत्तोलन किया. यह समय उनके सक्रिय जीवन में वापसी का संकेत भी था. इस मौके पर का. श्याम चौधरी, का. जगदीश यादव, का. त्रिभुवन शर्मा और अन्य साथी भी मौजूद थे, जो इस लंबे संघर्ष के साक्षी और हिस्सेदार रहे हैं. लोग उनसे मिलने आए – पुराने साथी, नए कार्यकर्ता, गांव के लोग. वे कई चेहरों को पहचान नहीं पा रहे थे, लेकिन जैसे ही कोई अपना नाम बताता, वे मुस्कुराकर कहते – ‘चेहरा बदल गया है, लेकिन आवाज से पहचान लिया.’ यह संवाद समय के बीत जाने और रिश्तों के बने रहने का एक भावुक संकेत था.

बातचीत के दौरान उन्होंने पार्टी और जनसंगठन की वर्तमान स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की. उनका मानना है कि संगठन कमजोर पड़ा है और जनता से उसका जुड़ाव पहले जैसा नहीं रहा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाना है, तो फिर से गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित करना होगा. आहर-पोखर और सैरात पर फिर से कब्जा करना होगा, क्योंकि यही गरीबों के जीवन और सम्मान का आधार है. उनके लिए यह सिर्फ जमीन या जलस्रोत का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अधिकार की लड़ाई है.

का. चुरामन भगत अपने अतीत को याद करते हुए बताते हैं कि वे इस आंदोलन से तब जुड़े जब उनके गांव भदासी में चोरी और लूटपाट की घटनाएं आम थीं. खेतों में लगी फसलें लूट ली जाती थीं, मवेशी चोरी हो जाते थे और गरीबों के पास कोई सहारा नहीं था. ऐसे माहौल में उन्होंने और उनके साथियों ने एकजुट होकर संघर्ष का रास्ता चुना. दलित टोले में बैठकें होने लगीं, लोगों को संगठित किया गया और धीरे-धीरे एक मजबूत जनाधार तैयार हुआ. लेकिन यही सक्रियता उनके खिलाफ साजिश का कारण बनी और उन्हें भदासी कांड में फंसा दिया गया.

आज, 23 साल बाद, जब वे फिर से अपने गांव और समाज के बीच खड़े हैं, तो यह साफ दिखता है कि उनकी लड़ाई खत्म नहीं हुई है. जेल की दीवारें उनके शरीर को कैद कर सकती थीं, लेकिन उनके विचार और जज्बे को नहीं. कॉ. अरविंद चौधरी की रिहाई की प्रतीक्षा हो या अपने पुराने साथियों की याद, हर बात उनके संघर्ष को और मजबूती देती है.

का. चुरामन भगत, कॉ. श्याम चौधरी, कॉ. जगदीश यादव और कॉ. त्रिभुवन शर्मा जैसे नाम अब सिर्फ व्यक्ति नहीं रह गए हैं, बल्कि वे उस जिंदा प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके हैं, जो अन्याय के खिलाफ लगातार खड़ा रहता है. उनकी कहानी यह बताती है कि लंबे से लंबा दमन भी उस इंसान को नहीं तोड़ सकता, जिसके भीतर अपने लोगों के लिए लड़ने का सच्चा जज्बा हो. उनके लिए आज भी सबसे बड़ा सवाल वही है – सैरात कहां गया? और शायद इसी सवाल के जवाब की तलाश ही उनके अगले संघर्ष की दिशा तय करेगी.


11 April, 2026