बिहार चुनावों से पहले जून 2025 में भारत के चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई एसआइआर प्रक्रिया अब बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करने और कई स्तरों पर चुनावी धोखाधड़ी के एक हथियार के तौर पर पूरी तरह बेनकाब हो गई है. जिस तरह से आयोग ने भारत के चुनावी लोकतंत्र की नींव – सार्विक वयस्क मताधिकार और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक वादे – पर यह सर्जिकल स्ट्राइक की है, उससे आयोग की अपनी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में आयोग के संदिग्ध कामकाज के बारे में छपी सनसनीखेज जांच रिपोर्ट और आयोग की ओर से दी गई तथाकथित सफाई ने इस संवैधानिक संस्था में फैली गंभीर गड़बड़ियों की पुष्टि कर दी है. इस प्रक्रिया ने भारत के सुप्रीम कोर्ट पर भी सवालिया निशान लगा दिया है, जिसने अब तक इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है और आयोग को खुली छूट दी है. भारत अब 1975 में आपातकाल की घोषणा के बाद के सबसे गंभीर संवैधानिक संकट का सामना कर रहा है.
यह गड़बड़ी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून के साथ शुरू हुई, जिसने निष्पक्ष चुनाव आयोग के विचार की जड़ पर ही प्रहार किया. मौजूदा सरकार को अपने इशारों पर चलने वाला चुनाव आयोग चुनने की आजादी और चुनाव आयुक्तों को मिले आजीवन कानूनी अभयदान ने सरकार और चुनाव आयोग के बीच एक खतरनाक गठजोड़ बना दिया है. इसके तहत आयोग भाजपा के हक में फैसला लेने के लिए निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही की हर बात को ताक पर रख देता है; और बदले में भाजपा इस आयोग का पुरजोर बचाव करती है. अब जब आयोग के नोट से यह बात सामने आ गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) मनमाने ढंग से काम कर रहे थे और एजेंडा या बैठक के मिनट्स का कोई औपचारिक रिकार्ड रखे बिना ही आयोग की बैठकें हो रही थीं, तो एसआइआर के नाम पर लिए गए फैसलों का कोई कानूनी या नैतिक आधार नहीं रह जाता. जाहिर है, मनमाने और अपारदर्शी तरीके से काम करने वाले चुनाव आयोग द्वारा हेरफेर की गई वोटर लिस्ट के आधार पर कराए गए चुनावों की विश्वसनीयता और वैधता भी खत्म हो जाती है.
सुप्रीम कोर्ट का रवैया भी आश्चर्यजनक ढंग से गैर-जिम्मेदाराना रहा है; कोर्ट ने उन वोटरों के मताधिकार की कोई परवाह नहीं की जिन पर विपरीत असर पड़ा है. जब पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा योग्य माने गए लाखों वोटरों के मामलों को ट्रिब्यूनल में भेजा गया, और यह साफ हो गया कि ट्रिब्यूनल को अपीलों पर फैसला करने में सालों-साल लगेंगे, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों के लंबित रहने के दौरान वोटरों के मताधिकार को बनाए रखने के बजाय मताधिकार से वंचित किए जाने को सिर्फ अधिकार का अस्थायी नुकसान बताकर हल्के में चलता कर दिया. नंदीग्राम और रेजीनगर निर्वाचन क्षेत्रों में होने वाले उपचुनावों से पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर उन 18,000 से ज्यादा वोटरों के मताधिकार-हरण के मामले को मामूली चीज बता दिया है जिनकी अपीलें ट्रिब्यूनल में लंबित हैं, मानो उपचुनावों में वोट देने का अधिकार कोई जरूरी चीज न हो.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के खुलासों और 26 सितंबर के अपने प्रेस नोट के जरिए चुनाव आयोग द्वारा स्पष्ट रूप से अपनी गलती मान लेने के बाद ज्ञानेश कुमार ने सीईसी पद पर बने रहने का अपना हर अधिकार साफ तौर पर खो दिया है. उन्हें अपने पद से हटाने और भारत के संविधान तथा निर्वाचन प्रणाली को कमजोर करने के अपराध के लिए उन पर मुकदमा चलाने की मांग अब स्वाभाविक रूप से देश भर से उठ रही है. एसआइआर को खत्म करने और इसके चलते हुए नुकसान को ठीक करने की मांग भी उतनी ही जरूरी है. गलत तरीके से बाहर किए गए हर वोटर का मताधिकार बिना किसी शर्त और बिना किसी देरी के बहाल करना होगा. मतदाता पंजीकरण अधिकारियों के तमाम अधिकार भी बहाल किए जाने चाहिए और डिजिटल तरीके से मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में लाए गए केंद्रीकरण को खत्म किया जाना चाहिए.
लोकतंत्र की मांग है कि उन सभी राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों में फिर से चुनाव कराए जाएं जहां 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से एसआइआर और मतदाता सूची में संदिग्ध बदलावों के जरिए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया गया है. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून, जिसमें उन्हें कानूनी कवच प्रदान करने का प्रावधान भी शामिल है, को भी रद्द किया जाना चाहिए. चुनाव आयोग के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप भारत के चुनाव आयोग की स्वायत्तता, निष्पक्षता और जवाबदेही के लिए संवैधानिक गारंटी होनी चाहिए. चुनावी धोखाधड़ी से बड़ा कोई भ्रष्टाचार नहीं है. चुनाव हारने का डर न होने और लोगों की शिकायतों, गुस्से और विरोध से बेअसर रहने की वजह से भाजपा सरकारें और अधिक अहंकारी और तानाशाहीपूर्ण हो गई हैं. मोदी-शाह-ज्ञानेश कुमार की मिलीभगत से लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिशों को खत्म करने के लिए भारत को एकजुट होकर आगे आना होगा.