-- ऑड्री ट्रशके
[ ऑड्री ट्रशके अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित रटगर्स यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया इतिहास की जानी-मानी एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उनका शोध भारत के शुरुआती आधुनिक और आधुनिक दौर के समृद्ध और जटिल इतिहास पर गहराई से रोशनी डालता है, खासकर मुगल दौर और उसकी सांस्कृतिक विरासत पर. ट्रशके ने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनमें कल्चर ऑफ एनकाउंटर्सः संस्कृत एट द मुगल कोर्ट शामिल है, जो मुगल शासन के दौरान संस्कृत और फारसी साहित्यिक परंपराओं के जीवंत आदान-प्रदान को दिखाती है, और औरंगजेबः द मैन ऐंड द मिथ, जिसमें इस विवादास्पद बादशाह का संतुलित पुनर्मूल्यांकन करते हुए पुरानी धारणाओं को चुनौती दी गई है.
उनकी ताजा किताब इंडियाः 5,000 इयर्स ऑफ हिस्ट्री ऑन द सबकॉन्टिनेंट पूरे उपमहाद्वीप के इतिहास को पेश करती है – सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आजादी के बाद के उथल-पुथल भरे दौर तक. इसमें 1990 के दशक के जातीय संघर्ष और हिंदुत्ववादी राजनीति के उभार को भी शामिल किया गया है. यह बड़ा काम दिखाता है कि कैसे हजारों सालों के प्रवास, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से भारत ने दुनिया को लगातार प्रभावित किया. ट्रशके उपमहाद्वीप के शुरुआती निवासियों पर रोशनी डालती हैं, वे प्रवासी जिन्होंने शहरी सभ्यता की नींव रखी और वेदों की रचना की, जो दुनिया की सबसे पुरानी साहित्यिक परंपराओं में से एक है. उनके दृष्टिकोण का मुख्य आधार हाशिए पर पड़ी आवाजों – खासकर महिलाओं और दबे-कुचले तबकों – को मजबूती देना है, ताकि भारत के अतीत को ज्यादा समावेशी नजरिए से समझा जा सके.
हालांकि अकादमिक हलकों में ट्रशके के काम की काफी कद्र है, पर हिंदू दक्षिणपंथी ताकतों ने इसे लेकर कई बार विवाद खड़ा किया है. भारत के बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक अतीत पर उनकी बारीक पड़ताल, खासकर मुगल दौर पर, उनके सांप्रदायिक एजेंडे को चुनौती देती है. पहली किताब छपने के बाद से ही उन्हें लगातार ऑनलाइन हमलों, नफरती मेल, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और हिंदुत्ववादी संगठनों की ओर से सेंसर करने की मांग जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. इन सबके बावजूद वे इतिहास को गहराई और विविधता के साथ समझने-समझाने की अपनी कोशिश में डटी हुई हैं.
इस इंटरव्यू में ट्रशके बताती हैं कि वे इतिहास लिखने का नजरिया कैसे अपनाती हैं, पेचीदा अतीत पर लिखते समय किन चुनौतियों से गुजरती हैं, और आज के दौर की बहसों में इतिहास क्यों मायने रखता है, ताकि लोग उनके काम और उसके असर को समझ सकें.]
सवाल : आपने 5,000 साल के भारतीय इतिहास को एक ही किताब में समेटने की चुनौती को कैसे लिया, और किन मुद्दों को सबसे अहम माना?
जवाब : भारतीय इतिहास की कोई एक ही कहानी नहीं है. इसलिए मैंने अलग-अलग किस्सों को साथ लाने की कोशिश की, जिनमें बार-बार आने वाले कुछ अहम विषय शामिल हैं – जैसे विविधता, प्रवास (माइग्रेशन), सामाजिक असमानता और जलवायु परिवर्तन.
सवाल : किताब में आपने उपमहाद्वीप में इंसानी तजुर्बों की विविधता पर जोर दिया है. हाशिये पर पड़े लोगों की कहानियां शामिल करने के लिए आपने क्या किया?
जवाब : हमारे पास ज्यादातर पुराने लिखित ग्रंथ ऊंची जातियों के मर्दों ने लिखे हैं, किसी भी दूसरे पूर्व-आधुनिक भारतीय समुदाय की तुलना में कहीं ज्यादा. इसे संतुलित करने के लिए मैंने इन ग्रंथों को उल्टी नजर से पढ़ा, ताकि दबे-कुचले लोगों की दब गई आवाजें सामने आ सकें. इसके अलावा, मैंने औरतों और हाशिये के तबकों की कम मशहूर रचनाओं को ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ा और उन्हें किताब में जगह दी – कई बार तो ऊंची जाति या हावी तबकों के ग्रंथों की जगह उन्हीं को तरजीह दी.
सवाल : आपकी किताब हाल के समय में हिंदू राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) के उभार को भी शामिल करती है. आप इस घटना को उपमहाद्वीप के भविष्य को प्रभावित करते हुए कैसे देखती हैं?
जवाब : हिंदुत्व का इतिहास साफ है – इसकी जड़ें 1920 के दशक के फासीवादी आंदोलनों में हैं, और इसकी मौजूदा लोकप्रियता 1970 के दशक से बढ़ी. मुझे लगता है कि हिंदुत्व का आकर्षण भी उतना ही साफ है, चाहे कितना ही डरावना क्यों न हो – यह बहुसंख्यक को बाकियों से ज्यादा हक देने का वादा करता है. लेकिन हिंदुत्व का भविष्य तय नहीं है. एक बात पक्की है कि हिंदुत्व भी, बाकी सभी फासीवादी आंदोलनों की तरह, किसी न किसी वक्त बिखर जाएगा. असली सवाल यह है कि उसके बिखरने से पहले कितने भारतीयों को चोट पहुंचेगी.
सवाल : सिल्क रोड और अन्य व्यापारिक मार्गों ने उपमहाद्वीप के इतिहास को गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई. इन वैश्विक रिश्तों ने भारत के सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास को कैसे प्रभावित किया?
जवाब : आज का भारतीय उपमहाद्वीप हजारों सालों के व्यापक वैश्विक संबंधों और प्रवासों के बिना सोचा भी नहीं जा सकता. यहां उन चीजों की एक छोटी सूची है जो पुराने वैश्विक नेटवर्क से यहां पहुंचीं – मनुष्य, इंडो-यूरोपीय भाषाएं, ढेर सारा सोना, गेंदे के फूल, टमाटर, मिर्च, और कई धर्मों की खास परंपराएं (जिनमें हिंदू धर्म और इस्लाम शामिल हैं). भारतीय उपमहाद्वीप लंबे समय से सांस्कृतिक और भौतिक वस्तुओं का मजबूत निर्यातक भी रहा है.
सवाल : आप भारतीय इतिहास के बड़े ग्रंथों की अहमियत पर जोर देती हैं. आपको क्या लगता है कि ये आज के भारतीय समाज और संस्कृति को कैसे प्रभावित करते हैं?
जवाब : वेदों का आज के भारत पर, कुछ धार्मिक संदर्भों को छोड़कर, सीधा असर बहुत कम है. धुर-दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी वेदों का नाम तो लेते हैं, मगर ज्यादातर उनकी असल सामग्री से पूरी तरह अनजान रहते हैं. महाभारत अलग मामला है – यह राज्य द्वारा फैलाई जाने वाली हिंसा पर गहरी टिप्पणी करता है. मुझे लगता है यह आधुनिक टकरावों को समझने के लिए बिलकुल सटीक है, और यही वजह है कि लोग इस महाकाव्य को बार-बार अलग-अलग रूपों में सुनाते और पढ़ते हैं.
सवाल : आपको कैसे लगता है कि आपकी किताब भारतीय उपमहाद्वीप के जटिल इतिहास और दुनिया में उसकी जगह को गहराई से समझने में मदद कर सकती है?
जवाब : आजाद भारत में इतिहास पर खतरा मंडरा रहा है. भारतीय पाठकों के लिए मेरी उम्मीद है कि मेरी किताब भारत के विविध अतीत को ईमानदारी से सामने लाने वाली अकादमिक सच्चाई का सबूत बने. आजकल अतीत को लेकर कई राजनीतिक विवाद खड़े किए जा रहे हैं, मगर असल में वे आज के डर और बेचैनी के बारे में हैं. इसके उलट, मेरा मकसद है कि सचमुच जिज्ञासु लोग दक्षिण एशिया के समृद्ध अतीत को खुले मन से समझें.
सवाल : अकादमिक और लोकप्रिय इतिहासकारों के बीच अक्सर फासला देखा जाता है. क्या आपको लगता है कि यह जरूरी है?
जवाब : इतिहास बहुत बड़ा विषय है और इसमें हम सबके लिए जगह है. मुझे अच्छा लगता है कि लोकप्रिय इतिहासकारों ने लोगों में भारत के अतीत को लेकर दिलचस्पी जगाई है. लेकिन पेशेवर इतिहासकारों के पास वो हुनर और ट्रेनिंग होती है जो आम तौर पर लोकप्रिय इतिहासकारों के पास नहीं होती – जैसे इतिहास को समझने की विधियां, कारण-परिणाम की गहरी समझ, और मूल स्रोतों को उनकी असली भाषाओं में पढ़ने की क्षमता. ये बातें सिर्फ दिखावे की नहीं हैं, बल्कि इतिहास को पूरी तरह समझने की बुनियाद हैं.
(‘हिस्ट्री इज अंडर थ्रेट इन इंडिया’ : ऑड्रे ट्रशके, डेक्कन हेराल्ड, 28 सितंबर)
https://www.deccanherald.com/features/books/history-is-under-threat-in-india-author-audrey-truschke-374389