जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बिना मुकदमा चले पांच साल से ज्यादा समय से जेल में बंद उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद की जमानत याचिकाओं पर आखिरकार सुनवाई की, तो आम धारणा यही थी कि अब इन सभी को जमानत मिल जाएगी. आखिर सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह सिद्धांत दोहराता रहा है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद. यहां तक कि कठोर और दमनकारी यूएपीए के तहत भी, सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ; न्यायमूर्ति सूर्यकांत (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश), न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति एन. वी. रमन्ना ने 2021 में के. ए. नजीब को जमानत देते हुए अनुच्छेद 21 की सर्वोच्चता को रेखांकित किया था, जो नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है. नजीब 2016 से बिना मुकदमे के यूएपीए के तहत जेल में बंद थे. ऐसे में सभी याचिकाकर्ताओं को देर से ही सही, जमानत मिलना स्वाभाविक प्रतीत हो रहा था.
लेकिन दिल्ली दंगों के जमानत मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया द्वारा दिया गया फैसला, सुप्रीम कोर्ट की अपनी ही पूर्ववर्ती परंपरा के विपरीत सामने आया है. सात में से पांच याचिकाकर्ताओं को जमानत दी गई है, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम जिनमें से कोई भी दंगों के समय दिल्ली में मौजूद नहीं था और शरजील तो पहले से ही जेल में थे, को न केवल जमानत से वंचित किया गया, बल्कि एक साल तक नई जमानत याचिका दायर करने से भी रोक दिया गया. यह विभाजन इस आधार पर किया गया कि उमर और शरजील को ‘वैचारिक मास्टरमाइंड’ और बाकी को ‘स्थानीय स्तर के सहयोगी’ माना गया. याचिकाकर्ताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय, अदालत ने दिल्ली पुलिस द्वारा गढ़ी गई साजिश की कहानी को ही मान्यता दे दी. इस तरह जेल को अपवाद नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के लिए जीवन ही घोषित कर दिया गया. “यही अब जिंदगी है”, जमानत से इनकार के बाद उमर ने कहा और यह वाक्य जैसे पूरे दौर का नारा बन गया.
ठीक वैसे ही जैसे ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में आजादी के आंदोलनकारियों के खिलाफ साजिश के मुकदमे रचे जाते थे, दिल्ली दंगों का मामला और उससे पहले का बदनाम भीमा कोरेगांव मामला, मोदी-शाह-डोभाल सिद्धांत के तहत असहमति रखने वाले कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के खिलाफ रची गई साजिशी कार्रवाइयां हैं. वास्तविक घटनाओं और उनके सर्वविदित कारणों, जैसे शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ भाजपा नेताओं – अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और कपिल मिश्रा द्वारा खुलेआम हिंसा के लिए उकसाना – पर ध्यान देने के बजाय, इन मामलों को प्रधानमंत्री की जान को खतरा या देश की एकता और अखंडता पर हमले जैसे पूरी तरह मनगढ़ंत आरोपों पर खड़ा किया गया है. नतीजतन, भीमा कोरेगांव और दिल्ली दंगों, दोनों में हिंसा के शिकार लोगों को कोई न्याय नहीं मिला, असली अपराधी और उकसाने वाले आजाद घूमते रहे, और साजिशी मामलों में फंसाए गए कार्यकर्ता वर्षों तक बिना मुकदमे के जेल में सड़ते रहे.
यदि दिल्ली दंगों का उद्देश्य विभाजनकारी और भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए शांतिपूर्ण, संवैधानिक आंदोलनों को कुचलना और बदनाम करना था, तो दिल्ली दंगों का मुकदमा अब साफ तौर पर नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी अभियानकारियों के खिलाफ संदिगध ब्यक्तियों की खोज (witch-hunt) के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. और जैसा कि अभिनेत्री स्वरा भास्कर जो कि खुद समान नागरिकता की मुखर समर्थक हैं, ने भी कहा है, यह ‘विच हंट’ विशेष रूप से उमर और शरजील जैसे मुस्लिम विद्वानों और कार्यकर्ताओं को निशाना बना रहा है. जिन पांच अभियुक्तों को जमानत मिली है, उनके लिए भी शर्तें इतनी कठोर हैं कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा जैसे कई बुनियादी संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकते. उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए तो भविष्य और भी धुंधला है, एक और साल तक जमानत की गुहार लगाने का अधिकार भी स्थगित कर दिया गया है.
इस फैसले का सबसे भयावह निहितार्थ यह है कि सरकार की यह उस फासीवादी परियोजना को वैधता देता है, जिसमें शांतिपूर्ण संवैधानिक विरोध और लोकतांत्रिक आंदोलनों को आतंकवाद और देशद्रोह के बराबर खड़ा किया जा रहा है. विडंबना देखिए कि उमर और शरजील को जमानत से इनकार किए जाने से ठीक पहले, बलात्कार और हत्या का दोषी राम रहीम एक बार फिर 40 दिनों की पैरोल पर रिहा कर दिया गया. 2017 में सजा के बाद यह उसकी 15वीं पैरोल थी. और ठीक अगले दिन, सुप्रीम कोर्ट ने 27,000 करोड़ रुपये के बैंक घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कारोबारी अरविंद धाम को जमानत दे दी. देश की सर्वोच्च अदालत मानो एक ऐसे सिद्धांत को बढ़ावा दे रही है, जिसमें कार्यकर्ताओं और असहमति रखने वालों को जेल में सड़ने के लिए चुन लिया जाता है, जबकि बलात्कारी, हत्यारे और आर्थिक अपराधी खुलेआम घूमते हैं और अपनी आजादियों का आनंद लेते हैं. जिस संविधान ने “न्याय – सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक” और “विचार – अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता” का वादा किया था, वही संविधान आज अपने सबसे बड़े संरक्षक – देश की सर्वोच्च अदालत – के हाथों एक कड़ी और निर्णायक परीक्षा से गुजर रहा है.