-- आनंद तेलतुम्बडे
[ आदित्यनाथ के बारे में नेहा बोरा की आलोचना, भले ही तीखी हो, जायज राजनीतिक अभिव्यक्ति के दायरे में आती है, और राज्य की दंडात्मक प्रतिक्रिया उनकी भाषा से कहीं ज्यादा चिंताजनक है.]
14 सितंबर को गोरखपुर में ‘जेन जेड महाजुटान’ को संबोधित करते हुए, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की पीएचडी स्काॅलर और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को ‘गुंडा’ और ‘दंगाई’ कहा. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्होंने गोरखपुर – जो कभी बुद्ध और कबीर से जुड़ा था – को ‘दंगों की जमीन’ बना दिया है और पेपर लीक, बेरोजगारी और बुलडोजर से तोड़-फोड़ के जरिए अल्पसंख्यकों और दलितों के उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार हैं. उन्होंने चुनौती देते हुए कहा, ‘वह उत्तर प्रदेश को क्या शिक्षा दे सकते हैं?’
उम्मीद के मुताबिक, प्रतिक्रिया तुरंत आई और अगर इसे अपराध माना जाए तो यह अपराध के अनुपात में बहुत ज्यादा थी. उनके खिलाफ तीन पुलिस शिकायतें दर्ज की गईं; भाजपा नेताओं ने एफआइआर दर्ज करने की मांग की; और मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने सार्वजनिक रूप से उन्हें ‘सही इलाज’ की धमकी दी, जिसे उन्होंने नेहा की ‘नौटंकी’ कहा. यह नेहा की दूसरी जगहों पर सक्रियता के दौरान पहले से दिख रहे पैटर्न जैसा ही था – उन्हें ऑनलाइन नफरत भरे अभियानों का निशाना बनाया गया है. इससे पहले, झारखंड आंदोलन के दौरान, भाजपा समर्थित एक कार्यकर्ता ने उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहते हुए उन पर स्याही फेंकी थी. खबरों के मुताबिक, आइसा को नेहा को जान से मारने की धमकी देने वाले कई मैसेज और वाॅयस नोट मिले; उन्होंने 15 सितंबर, 2026 को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के पास सबूतों के साथ शिकायत दर्ज कराई.
निष्पक्ष रूप से कहें तो, नेहा अपने संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर एक सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में ऐसे तथ्य बता रही हैं जो सार्वजनिक रिकाॅर्ड में मौजूद हैं. असल में, आदित्यनाथ के मंत्रियों की धमकियां और डराने-धमकाने वाली प्रतिक्रियाएं लोकतांत्रिक मानदंडों का नेहा द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर उल्लंघन हैं. आदित्यनाथ पर उन्होंने जो आरोप लगाए, उनका उनके अपने राजनीतिक रिकाॅर्ड की घटनाओं से दस्तावेजी संबंध है.
मुख्यमंत्री बनने के बाद, आदित्यनाथ की सरकार ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने के लिए उनके और कई अन्य लोगों के खिलाफ 1995 में दर्ज आपराधिक मामले को वापस लेने का आदेश दिया. यह मामला एक कानूनी प्रक्रिया के तहत वापस लिया गया, जिसमें सरकारी वकील को अदालत में आवेदन करना होता है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था; इससे पहले, राज्य में समाजवादी पार्टी ने भी ऐसा ही किया था. लेकिन यह निश्चित रूप से अनैतिक था कि राज्य सरकार ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके उन मामलों को वापस ले लिया जिनमें मौजूदा मुख्यमंत्री खुद आरोपी थे. इसके बाद, सरकार ने ऐसे कानूनों को बढ़ावा दिया जिसका मकसद राजनीतिक नेताओं से जुड़े हजारों लंबित मामलों को वापस लेना या खत्म करना था.
संवैधानिक स्थिति
अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी देता है, और सुप्रीम कोर्ट ने लगातार सरकार और सार्वजनिक अधिकारियों की आलोचना को उस आजादी का अहम हिस्सा माना है. सार्वजनिक शक्ति का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ राजनीतिक भाषण अनुच्छेद 19(1)(a) के मूल में है. अनुच्छेद 19(2) के तहत अनुमत प्रतिबंध – जिनमें मानहानि, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता, और अपराध के लिए उकसाना शामिल हैं – कठोर या तीखी आलोचना को केवल इसलिए अपराध नहीं बनाते क्योंकि इससे सत्ता में बैठे लोग शर्मिंदा होते हैं.
भारतीय मानहानि कानून खुद सार्वजनिक आचरण की आलोचना और निजी अपमान के बीच अंतर करता है. भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 के अपवाद – जिन्हें अब भारतीय न्याय संहिता में शामिल किया गया है – जनहित में लगाए गए सच्चे आरोपों और लोक सेवकों के सार्वजनिक आचरण पर नेक नीयत से व्यक्त की गई राय की रक्षा करते हैं. एस. खुशबू बनाम कनियाम्मल (2010) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि एक स्वतंत्र समाज को अलोकप्रिय और असहमति वाले विचारों को भी सहन करना चाहिए, जबकि सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016) मामले में, आपराधिक मानहानि को बरकरार रखते हुए भी, सार्वजनिक अधिकारियों की उनकी सार्वजनिक भूमिका में निष्पक्ष आलोचना को मिलने वाली सुरक्षा को मान्यता दी गई. सार्वजनिक शक्ति के इस्तेमाल की आलोचना की तुलना निजी अपमान से नहीं की जा सकती.
इसका कारण स्पष्ट है. एक मुख्यमंत्री जो पुलिस, प्रशासन और अभियोजन को नियंत्रित करता है, वह एक आम नागरिक जैसी स्थिति में नहीं होता. सार्वजनिक शक्ति को सार्वजनिक जांच-पड़ताल के लिए खुला रहना चाहिए, जिसमें तीखी और असहज आलोचना भी शामिल है. अन्यथा, सत्ता को जवाबदेह ठहराने का नागरिक का अधिकार अर्थहीन हो जाता है. मौजूदा मामले में, एक युवा एक्टिविस्ट के खिलाफ पुलिस शिकायतें दर्ज करना और मंत्रियों द्वारा धमकी भरी प्रतिक्रियाएं देना इस अंतर को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाता है. सवाल यह नहीं है कि नेहा की भाषा संयमित थी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या सत्ता का इस्तेमाल करने वालों की आलोचना का जवाब राज्य की दमनकारी मशीनरी के जरिए दिया जा सकता है. इस मामले में भाषा का जो कथित असंयम है, वह असहमति जताने की भाषा से उपजा है. इसे ऐसे नहीं आंका जा सकता जैसे कि यह राजनीतिक रूप से बराबरी वालों के बीच हुई बातचीत हो. यह बात कि आलोचना लोगों के बीच और सत्ता के गलियारों में भी चर्चा का विषय बनी, इसकी उपयुक्तता को साबित करती है.
संवैधानिक नैतिकता का क्या?
इस विवाद को जो बात अनोखा बनाती है, वह यह है कि नेहा के आरोप आदित्यनाथ के अपने दर्ज आपराधिक रिकाॅर्ड से काफी हद तक मेल खाते हैं. उनके 2017 के चुनावी हलफनामे में दंगा करने (आइपीसी की धारा 147), पूजा स्थल को अपवित्र करने (धारा 295), कब्रिस्तान में घुसपैठ (धारा 297), आग या विस्फोटकों से नुकसान पहुंचाने (धारा 436), आपराधिक धमकी (धारा 506) और सार्वजनिक आदेश की अवहेलना (धारा 188) से जुड़े लंबित मामलों का खुलासा हुआ था. हलफनामे में किसी भी मामले में दोषी ठहराए जाने का जिक्र नहीं है.
एक अलग मामला 1995 में पिपीगंज में हुई एक बैठक से जुड़ा था, जब आदित्यनाथ और अन्य लोगों पर रोक के आदेशों के बावजूद बैठक करने के लिए धारा 188 के तहत मामला दर्ज किया गया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद, आदित्यनाथ की सरकार ने अभियोजन पक्ष को मामला वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया. गोरखपुर में सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े 2007 के एक मामले में भी उन्हें आरोपी बनाया गया था. जांच के दौरान शुरू में धारा 147, 295, 297, 436 और 506 के तहत आरोप लगाए गए, जबकि जरूरी मंजूरी मिलने के बाद बाद में समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित धारा 153 ए भी जोड़ी गई. उनके 2014 के चुनावी हलफनामे में धारा 307 (हत्या का प्रयास) के साथ-साथ धारा 147, 148, 149, 336, 504 और 427 से जुड़े एक अलग मामले का भी खुलासा हुआ था.
2017 में, आदित्यनाथ की सरकार ने हजारों मामलों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए उन्हें वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की. मामलों के पहले बैच में उनके अपने खिलाफ मामले के साथ-साथ केशव प्रसाद मौर्य और शिव प्रताप शुक्ला के खिलाफ मामले भी शामिल थे. और, अपने 2022 के चुनावी हलफनामे में, आदित्यनाथ ने बताया कि उनके खिलाफ कोई लंबित आपराधिक मामला नहीं है.
इसलिए, आदित्यनाथ के बारे में नेहा की बात को बेबुनियाद कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. इस घटना की खास बात यह है कि उनकी भाषा पर तो बहुत ज्यादा ध्यान दिया गया, जबकि कहीं ज्यादा अहम सवाल – यानी मुख्यमंत्री द्वारा अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को वापस लेने के लिए सत्ता का दुरुपयोग – पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया.
राजनीतिक माहौल और भाषा
नेहा की भाषा को मुख्यमंत्री के तौर पर आदित्यनाथ की अपनी राजनीतिक बयानबाजी के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए. उन्होंने अपनी सार्वजनिक बातचीत में बार-बार ताकत, सजा और बदले की भावना वाली भाषा का इस्तेमाल किया है. पद संभालने के तुरंत बाद, उन्होंने कहा कि अपराधियों को गोली मार दी जाएगी, यानी ‘ठोक दिया जाएगा’; 2022 के चुनाव प्रचार के दौरान, उन्होंने चेतावनी दी कि दंगों और अपराध से जुड़े लोगों की ‘गर्मी’ चुनाव के बाद ‘शांत’ कर दी जाएगी; 2023 में विधानसभा में, उमेश पाल की हत्या के बाद, उन्होंने घोषणा की कि ‘माफिया’ को धूल में मिला दिया जाएगा, यानी ‘मिट्टी में मिला देंगे’.
इसके बाद आदित्यनाथ सरकार की एनकाउंटर पाॅलिसी, सख्त शासन के उनके दावे की एक अहम पहचान बन गई. बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के तुरंत शारीरिक सजा देने की बात कहने के साथ-साथ, आदित्यनाथ ने बार-बार धार्मिक रूप से बांटने वाली भाषा का इस्तेमाल किया है. 2022 के चुनाव प्रचार के दौरान उनका ‘80:20’ वाला फाॅर्मूला, ‘अब्बा जान’ वाली टिप्पणी, और दंगों, पाकिस्तान व ‘घुसपैठियों’ का बार-बार जिक्र करने को स्वतंत्र निगरानी करने वालों ने मुसलमानों के खिलाफ या धार्मिक रूप से बांटने वाले राजनीतिक भाषणों के एक बड़े पैटर्न के हिस्से के तौर पर दर्ज किया है. निगरानी करने वाले संगठनों ने 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान आदित्यनाथ के दर्जनों भाषणों को ‘हेट स्पीच’ (नफरत फैलाने वाला भाषण) के तौर पर दर्ज किया है, हालांकि उनके तरीकों के हिसाब से इनकी संख्या अलग-अलग हो सकती है.
यह वही राजनीतिक माहौल है जिसमें नेहा ने अपना भाषण दिया. एक ऐसा माहौल जो ताकत, सजा, धार्मिक ध्रुवीकरण और राज्य की भारी-भरकम ताकत के प्रदर्शन वाली भाषा से बना है. नेहा का आदित्यनाथ को ‘गुंडा’ या ‘दंगाई’ कहना किसी राजनीतिक शून्य में नहीं हुआ. जब सत्ता में बैठे लोग ताकत और डराने-धमकाने वाली बुरी भाषा का इस्तेमाल खुद करते हैं, तो वे उन लोगों से विनम्र और सम्मानजनक भाषा की उम्मीद नहीं कर सकते जो उन्हें चुनौती देते हैं.
बीजेपी नेता और उनके समर्थक जवाब देंगे कि वापस लिए गए मामले अपराध का सबूत नहीं हैं, और उनमें से कई मामले या तो बहुत पुराने थे या पिछली सरकारों ने राजनीतिक मकसद से दर्ज किए थे. यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश की लगातार सरकारों ने, जिसमें समाजवादी पार्टी की सरकार भी शामिल है, अपने नेताओं के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिए हैं. बिना साबित हुए आरोपों को ‘कथित’ कहने के बजाय पक्की सच्चाई की तरह बताना, निष्पक्ष टिप्पणी से आगे बढ़कर मानहानि करने वाला बयान बन जाता है, और आम तौर पर यह बात सही भी है. लेकिन अफसोस, यह कोई आम मामला नहीं है. ये मामले कानूनी प्रक्रिया से खत्म नहीं किए गए थे. इन्हें उस सरकार ने वापस ले लिया था जिसके मुखिया अब वही आरोपी हैं. ऐसे में, लोग पब्लिक रिकाॅर्ड के आधार के अलावा और किस तरह आदित्यनाथ के प्रति अपनी असहमति जाहिर कर सकते हैं? अपने भाषण के दौरान नेहा बोरा ने लोगों का प्रतिनिधित्व किया और उस संवैधानिक वादे को निभाया जिसके तहत नागरिक बिना डरे सत्ता से जवाब-तलब कर सकते हैं.
जिस लोकतंत्र की संस्थाएं मजबूत हों, उसे किसी छात्र एक्टिविस्ट के खिलाफ पुलिस का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती, सिर्फ इसलिए कि उसने साफ शब्दों में वही बात कही जो सरकारी रिकाॅर्ड में पहले से दर्ज है. आदित्यनाथ के बारे में नेहा की राय उन आपराधिक आरोपों के दस्तावेजी इतिहास पर आधारित है जिन्हें उनकी सरकार ने अदालत में लड़ने के बजाय खत्म करना बेहतर समझा; यह बात नेहा के शब्दों के चुनाव से कहीं ज्यादा ध्यान देने लायक है. संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी ठीक ऐसे ही मौकों के लिए दी गई थी, और नेहा भारत के लोगों की तरफ से वह बात कहने के लिए तारीफ की हकदार हैं जिसे वे खुद डर की वजह से जोर से नहीं कह पाए.
[ आनंद तेलतुम्बडे एक नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और लेखक हैं. वे पेट्रोनेट इंडिया लिमिटेड के पूर्व सीईओ और आइआइटी, खड़गपुर तथा गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर हैं ]
(फ्रंटलाइन से साभार)