वर्ष 35 / अंक - 32 / बगावत की बद-जबानी के हक में

बगावत की बद-जबानी के हक में

बगावत की बद-जबानी के हक में

-- आनंद तेलतुंबडे


[ जंतर-मंतर के प्रदर्शनों पर आनंद तेलतुंबड़े की शुरुआती प्रतिक्रिया से मुझे कुछ निराशा हुई थी. जब भूख हड़ताल शुरू ही हुई थी, तभी आनंद ने इस आंदोलन के भविष्य को लेकर अपनी शंका जाहिर कर दी थी. उन्हें डर था कि यह विरोध-प्रदर्शन भी ‘काबू में रखे गए विरोध’ के पुराने ढर्रे में ही सिमट कर रह जाएगा. उन्हें आशंका थी कि यह विरोध कहीं उसी पुराने रास्ते पर न चला जाए, जहां असहमति को धीरे-धीरे काबू में करके बेअसर बना दिया जाता है. उन्हें यह चिंता भी थी कि आंदोलन की पहचान में अंबेडकर को केंद्र में रखने से कहीं उसकी पहुंच और व्यापक स्वीकार्यता सीमित न हो जाए.

अब जबकि आंदोलन का पहला दौर हुकूमत को अचंभे में डालने और उसे बैकफुट पर धकेलने में साफ तौर पर कामयाब रहा है, मुझे उम्मीद है कि तमाम शुभचिंतकों के शुरुआती शक अब काफी हद तक दूर हो चुके होंगे. जाहिर है कि अपनी सरेआम हुई फजीहत और दरकती पकड़ से तिलमिलाई सरकार अब हर मुमकिन हथकंडे से पलटवार करने की कोशिश कर रही है. खास तौर पर, आंदोलन की भाषा और अभिव्यक्ति को निशाना बनाकर उसे बदनाम करने और अपराधी ठहराने की साजिशें रची जा रही हैं.

ऐसे समय में यह देखकर खुशी हुई कि आनंद तेलतुंबड़े जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शनों की भाषा के पक्ष में इतिहास की ठोस समझ पर आधारित यह महत्वपूर्ण दलील लेकर सामने आए हैं. वे सत्ता की तयशुदा, अनुशासित भाषा और प्रतिरोध की उस विद्रोही, मर्यादा तोड़ने वाली और लीक से हटकर इस्तेमाल की जाने वाली जुबान के बीच एक बेहद अहम फर्क उजागर करते हैं,  पढ़ें 
– दीपंकर भट्टाचार्य ]


(जब हुक्मरान सामने हो, तो अक्लमंद किसान सिर नवाता है और चुपचाप पाद देता है.)

– इथियोपियाई कहावत

24 जुलाई का दिन. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपनी कुर्सी से हटना पड़ा. पिछले दस साल से ज्यादा समय से सत्तासीन नरेंद्र मोदी को किसी जन-आंदोलन से मिली पहली बड़ी हार है. सवाल यह है कि जितने आंदोलनों का इस सरकार ने सामना किया, उन्हें कुचल डाला, और समय के साथ खत्म कर दिया, उनमें से यही आंदोलन क्यों कामयाब हो गया. इसका एक जवाब वो है जिसे कहने से भारत का तथाकथित ‘बुद्धिजीवी तबका’ कतराता रहा है: ‘काॅकरोच’ इसलिए भी जीते क्योंकि वे बदतमीज थे.

हर पीढ़ी अपनी अलग जबान गढ़ती है, और आज की जेन-जी की बोली कुछ ऐसी है जो बद-जबान अल्फाजों से भरी, तानों से लदी, और बोलने से पहले किसी की इजाजत लेने में बिल्कुल दिलचस्पी न रखने वाली है. जंतर-मंतर पर लगे पोस्टर, इंस्टाग्राम रील्स और शिक्षा मंत्री के घर के बाहर लगे प्लेकार्ड पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलन में रहे हिन्दुस्तानी विरोध-प्रदर्शन की संजीदा और नैतिकता से लबरेज तर्ज पर बिल्कुल नहीं थे.

ये सब तो दोस्तों के किसी ग्रुप-चैट जैसे लग रहे थे, गालीदार, गंदा, बेतुका, बेधड़क और शरारत  से सराबोर. और इसी ने ठीक उन्हीं लोगों को चिढ़ाया जिन्हें चिढ़ाने के लिए यह सब बनाया गया था: आरएसएस के वो संस्कारी ढोंगी, और वो भक्त जिनके लिए नेता की पूजा एक तरह का धर्म बन चुका है. यह चिढ़ना कोई गलती नहीं थी. यही तो पूरा मकसद था. इसे आंदोलन की जीत की एक वजह मानना चाहिए.

क्योंकि जब बद-जबानऔर बेअदब अल्फाज को सोच-समझकर पाक मानी जाने वाली हुकूमत के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए, तो उसका राजनीति में एक बहुत पुराना और बहुत कामयाब इतिहास रहा है, भले ही ‘शालीन’ टिप्पणीकार इसे मानने को तैयार न हों.

ऐसी गाली जो गाली नहीं रही

आंदोलन के नाम में ही इसकी पूरी रणनीति छिपी है. 15 मई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, फर्जी कानूनी डिग्रियों से जुड़े एक केस की सुनवाई करते हुए, बेंच से बोल पड़े कि बेरोजगार नौजवान ‘काॅकरोच’ जैसे हैं, जिन्हें पेशे में कोई जगह न मिलने पर सोशल मीडिया और एक्टिविज्म की तरफ मुड़कर ‘सबको निशाना बनाने’ की आदत पड़ जाती है. इस तिरस्कार भरी झिड़की का मकसद युवाओं को नीचा दिखाना और खारिज करना था, वही आम तिरस्कार जो राज्य के संस्थानों से आती है और जिसे बर्दाश्त करने की आदत आम हिंदुस्तानियों को पड़ चुकी है.

एक दिन के अंदर ही बोस्टन में पढ़ने वाले एक छात्र अभिजीत दिपके ने ‘बाहर घूम रहे सारे काॅकरोचों’ के लिए एक प्लेटफाॅर्म खड़ा कर दिया, जिसमें आधे मजाक-आधे सच में शामिल होने की शर्तें, यह रखी गई: ‘बेरोजगार, आलसी, हर वक्त ऑनलाइन, और प्रोफेशनल लेवल पर बकबक करने की काबिलियत रखने वाला.’ 78 घंटे में इसके तीस लाख फाॅलोअर हो गए. पांच दिन में एक करोड़, यानी सत्ताधारी पार्टी के अपने ऑफिशियल अकाउंट्स से भी ज्यादा. एक पूरी पीढ़ी को चुप कराने के इरादे से कही गई गाली, एक हफ्ते से भी कम में, ऐसा तमगा बन गई जिसे कोई वापस नहीं छीन सकता था.

यह अपमान को अस्मिता में बदलने की एक जानी-पहचानी राजनीतिक रणनीति है. किसी गाली को, जो सत्ता में बैठे लोगों ने गढ़ी हो, आंदोलन उसे छीनकर अपनी सामूहिक पहचान का नाम बना देता है. यह हमने पहले भी देखा है. फ्रेंच क्रांति के दौरान ‘सां-कुलोत’ (घुटने की पैंट न पहनने वाले), ब्लैक पावर मूवमेंट में ‘ब्लैक’, एलजीबीटीक्यू राजनीति में ‘क्वीयर’, और थोड़े अलग संदर्भ में, दलित आंदोलन द्वारा ‘दलित’ शब्द को खुद अपनाना. ‘अगर सारे काॅकरोच एक हो जाएं तो?’ यह नारा इसलिए दमदार नहीं बना क्योंकि यह भद्दा था, बल्कि इसलिए क्योंकि इसने अपमान को सामूहिक ताकत में बदल दिया. इसके इर्द-गिर्द की बेअदब जबान उसी राजनीतिक उलटफेर का हिस्सा थी. दरअसल, यह सिर्फ बदजबानी का बचाव करने से कहीं बड़ा तर्क है. यह दिखाता है कि कैसे कड़वे अल्फाज और रणनीतिक सोच अक्सर एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं.

इसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह इसी सोच को आगे बढ़ाता गया. शिक्षा मंत्री के दफ्तर में ‘पेपर लीक रोकने’ के लिए डायपर भेजे गए. ऐसे प्लेकार्ड और पोस्टर लहराए गए, जिनका पूरा मजमून कोई अखबार छापने की हिम्मत नहीं कर सकता था. एक नारा जो बिना शर्म या झिझक के खुद को ‘आलसियों और बेरोजगारों की आवाज’ होने का ऐलान कर रहा था. पुराने दौर के टिप्पणीकार और बड़ी संख्या में नेक इरादे वाले उदारवादी यह सब देखकर बड़ी असहजता से मुंह बिचकाते रहे. उनकी यह बात गलत नहीं थी कि यह भद्दा था. गलती यहां थी कि उन्होंने मान लिया कि बद-जबानी और राजनीतिक संजीदगी साथ-साथ नहीं चल सकते.

दबी जुबान सरेआम चौराहे पर

हर बड़ी हुकूमत न सिर्फ मंजूर-शुदा राजनीतिक नजरिए तय करती है, बल्कि राजनीति की एक मंजूर-शुदा जबान भी मुकर्रर करती है. शालीनता, इज्जतदारी और तमीज उस अनुशासन का हिस्सा बन जाते हैं जिसके जरिए हुकूमत असहमति को काबू में रखती है. लोगों से उम्मीद की जाती है कि बेइंसाफी के खिलाफ बोलते हुए भी वे तमीज से बोलें. लेकिन इतिहास बताता है कि बड़े बदलाव अक्सर इसी भाषाई मर्यादा को तोड़ने से शुरू होते हैं. बगावत की भाषा शायद ही कभी संसदीय होती है. यह नपी-तुली नहीं, जज्बाती होती है. यह आदर देने वाली नहीं, ताना मारने वाली होती है. अक्सर जानबूझकर हद पार करने वाली होती है, और जिसे सत्ता “बद-जबानी” कहती है, वह अक्सर बरसों से जमा हो रहे अपमान और गुस्से का पहला सार्वजनिक इजहार होता है.

राजनीतिक विचारक जेम्स सी. स्काॅट ने अपनी किताब डाॅमिनेशन एंड द आट्र्स ऑफ रेजिस्टेंस: हिडन ट्रांसक्रिप्ट्स (येल यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यू हेवन एंड लंदन, 1990) में रोजमर्रा के दमन और प्रतिरोध पर अपने अध्ययन में एक अहम फर्क बताया है, जो इस गर्मी में हुई घटना पर बिल्कुल सटीक बैठता है. हुकूमत के सामने कमजोर तबके जो अदब वाला रवैया दिखाते हैं, वह है “पब्लिक ट्रांसक्रिप्ट”, यानी सार्वजनिक संवाद; और वो मजाक, वो ताना, वो नफरत, जिसे वे निजी तौर पर दबाए रखते हैं, वह है दबी हुई जुबान का “हिडन ट्रांसक्रिप्ट”. स्काॅट के मुताबिक, बगावत वही पल है जब यह दबी हुई जबान सरेआम चौक-चौराहे पर आ जाती है. “कॉकरोच” आंदोलन से भद्र समाज को जो झटका लगा, वह असल में उसकी बद-जबानी  की वजह से नहीं था, बल्कि उन जज्बात का अचानक और बिन-इजाजत सामने आ जाना था, जो मौजूद तो हमेशा से थे, बस सरकार और न्यूज एंकरों की पहुंच से दूर थे.

सांस्कृतिक विचारक मिखाइल बख्तिन (राबेलैस एंड हिज वर्ल्ड, इंडियाना यूनिवर्सिटी प्रेस, 1984)  ने इस बात की वजह समझने के लिए एक अहम नजरिया पेश किया कि ऐसे इजहार करने का सरेआम आना इतना खलबली क्यों मचाता है. यूरोप के शुरुआती दौर की कार्निवाल (मेले/उत्सव) परंपराओं पर लिखते हुए उन्होंने “कार्निवलेस्क” नाम की एक सोच दी: वे पल, जब बद-जबानी, शरीर और गंदगी से जुड़ी बातों को जानबूझकर इस्तेमाल किया जाता है ताकि सत्ता संस्थानों के ऊपर-नीचे के ढांचे को उलट दिया जाए – जब बादशाह को मजाक में ताज पहनाया जाता है और पाक चीजों को शरीर और उसकी गंदगी के स्तर तक घसीट लाया जाता है.

जब तक यह ठहाका गूंजता रहता है, तब तक असली हुक्मरान भी, कम-से-कम निशानी के तौर पर, बौने बना दिए जाते हैं. बख्तिन का जोर इस बात पर था कि यह हंसी सिर्फ मनोरंजन नहीं है. यह भले ही कुछ समय के लिए हो, उस मानसिक जकड़न और खौफ का सचमुच अंत कर देती है जो  ऊंच-नीच का तयशुदा ढांचा अपने नीचे रहने वालों पर थोपता है. जो हुकूमतें खुद को बहुत गंभीर और पाक मानती हैं, उनके पास ऐसी जबान में उड़ाए जाने वाले मजाक का इतिहास में कभी कोई टिकाऊ जवाब नहीं रहा है, क्योंकि वे उस जबान का जवाब उसी लहजे में देकर अपनी इज्जत नहीं बचा सकतीं.

जब बाजारू पैम्फ्लेट्स ने राजा की हैसियत उतार दी

1770 के दशक तक, बैस्टिल का एक भी पत्थर ढहने से एक दशक से भी पहले, फ्रांस की राजशाही पहले ही वह चीज खो रही थी जिसे वापस पाना आसान नहीं था: उसकी आभा. न उसकी फौज गई थी, न खजाना, न अभी तक तख्त, बल्कि वह लगभग पाक-सी छवि जिसकी बदौलत फ्रांसीसी राजा आम राजनीति से ऊपर की सत्ता का दावा कर पाते थे. इतिहासकारों का मानना है कि इस आभा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली चीज पढ़े-लिखे तबके के बीच फैले इंलाइटनमेंट (ज्ञानोदय) जमाने के दार्शनिकों की समझी-बूझी संवैधानिक दलीलें नहीं थीं. इसके पीछे कुछ और ही था, कहीं ज्यादा बद-जबान और कहीं ज्यादा पढ़ा जाने वाला: “लिबेल” – यानी गैरकानूनी, अश्लील और बदनाम करने वाले पेम्प्लेट्स, जो विदेश में छपते या चोरी-छिपे मंगवाए जाते और हाथों-हाथ बंटते थे, और जिनका पसंदीदा निशाना होती थी रानी.

इन पेम्प्लेट्स के जरिए लगातार रानी मारी आंत्वानेत पर हर मुमकिन बदचलनी का आरोप लगाया गया. खुद राजा का नामर्द और हास्यास्पद कहकर मजाक उड़ाया गया. एक ऐसा कमजोर इंसान जिसने अपनी हैसियत से भारी ताज पहन रखा था. इसमें से कुछ भी नपा-तुला तर्क नहीं था, और इसमें से ज्यादातर सच भी नहीं था. लेकिन जैसा कि इतिहासकार राॅबर्ट डार्टन (डार्नटन, राॅबर्ट. द लिटरेरी अंडरग्राउंड ऑफ द ओल्ड रिजीम. कैम्ब्रिज, MA: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1982.) ने अपने अध्ययन में दिखाया है, इन लिबेल ने वह काम कर दिखाया जो दार्शनिकों की भारी-भरकम किताबें अकेले कभी नहीं कर सकती थीं, उन्होंने राजशाही को गली-मोहल्ले और गटर की जबान में चर्चा का विषय बना दिया.

एक बार जब राजा-रानी पर आम पाठक अश्लील तरीके से सोचकर हंस सकते थे, तो हुकूमत वह इकलौती चीज खो चुकी थी जिस पर तानाशाही असल में टिकी होती है – यह मान्यता कि राजशाही ऐसी बातों से ऊपर है. डार्टन, और बाद में क्रांति के दौर के कामुक साहित्य पर काम करने वाली लिन हंट (हंट, लिन. पाॅलिटिक्स, कल्चर, एंड क्लास इन द फ्रेंच रेवोल्यूशन. बर्कले: यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस, 1984), दोनों इसे राजशाही का ऐसा अवमूल्यन मानते हैं जो 1789 से बहुत पहले ही पूरा हो चुका था. जब तक एस्टेट्स-जनरल की बैठक हुई, तब तक लुई सोलहवें के सिर का ताज उस आभा से पहले ही खाली हो चुका था जिसकी खातिर कभी लोग जान देने को तैयार रहते थे.

क्रांति ने यह हथियार शुरू होने के बाद छोड़ा नहीं, बल्कि इसे और धारदार बना दिया. जाक हेबेर का अखबार ‘ले पेर दुशेन’ क्रांति के सालों के सबसे असरदार अखबारों में से एक इसीलिए बना क्योंकि इसने इज्जतदार पर्चेबाजी के हर नियम को ठुकरा दिया. इसका किरदार, एक काल्पनिक भट्टी बनाने वाला, पेरिस की गलियों की जबान में लगातार गालियां बकता था और पाठकों को समझाने लायक “नागरिक” नहीं, बल्कि पहले से मजाक में शामिल “साथी” मानकर बात करता था.

यह जान-बूझकर बद-जबान था, क्योंकि इसका राजनीतिक काम ही यह था कि पुरानी हुकूमत के पास इज्जत बचाते हुए कोई जवाब ही न हो. और जिस पहचान ने क्रांति के आम जनाधार को परिभाषित किया – “साँ-कुलाॅत” (यानी घुटने तक वाले पायजामे न पहनने वाले लोग) – उसकी शुरुआत भी गरीब मजदूरों के ढीले पायजामों पर रईसों के कसे ताने से हुई थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे “कॉकरोच” शब्द की शुरुआत बेरोजगार युवाओं पर सूर्यकांत के कसे ताने से हुई थी. पेरिस की जनता ने वही किया जो ढाई सदी बाद काॅकरोचों ने किया: उन्होंने इस गाली को गले लगाया, इसे अपनी पहचान बनाया, और इस मजाक को उन्हीं पर पलट दिया जिन्होंने इसे गढ़ा था.

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि अश्लील पेम्प्लेट्स ने अकेले फ्रांसीसी क्रांति करा दी, जैसे अकेले डायपर भेजने से भारत के शिक्षा मंत्री की कुर्सी नहीं गई. दोनों ही मामलों में असली भारी काम रोटी की कीमतों, युद्ध के कर्ज और ठप पड़ी राजनीतिक व्यवस्था ने किया. लेकिन ये लिबेल पर्चे यह जरूर बताते हैं कि बदजुबानी और राजनीति अक्सर एक ही हथियार क्यों बन जाते हैं: ये दोनों उस श्रद्धा को छीन लेते हैं जिस पर जड़ जमाए बैठी सत्ता टिकी होती है.

अपनी सरजमीं की विरासत

भारत के पास भी इस इतिहास का अपना संस्करण है, और यह 1970 के दशक की शुरुआत तक जाता है. नामदेव ढसाल की कविताओं ने अपनी गंदी भाषा और खुरदुरेपन से साहित्यिक हलकों में तूफान मचा दिया था, लेकिन ‘गोलपीठा’ कभी मध्यवर्ग की साफ-सुथरी मराठी में लिखी ही नहीं जा सकती थी. उसकी जबान उस बेरहम सामाजिक हकीकत से अलग हो ही नहीं सकती थी जिसे वह बयां कर रही थी. यही बात अश्वेतों के प्रतिरोधी साहित्य, पंक म्यूजिक, रैप, नारीवादी नारों, और दुनिया भर के बेशुमार मजदूर वर्ग के आंदोलनों पर भी लागू होती है. दुनिया भर के दबे-कुचले लोगों की जबान शायद ही कभी उन लोगों के तय किए हुए नियमों पर चली हो, जो उन पर हुकूमत करते हैं.

यह बद-जबानी या गाली-गलौज को महिमामंडित करना नहीं है. एक बुनियादी फर्क समझना जरूरी है. वह गाली जो नीचे की तरफ दी जाती है, यानी औरतों, अल्पसंख्यकों या दूसरे कमजोर तबकों पर, दरअसल वर्चस्व के उसी ढांचे को दोबारा मजबूत करती है. लेकिन वह बद-जबानी या गाली जो ऊपर की तरफ दी जाती है और जमे-जमाए सत्ता संस्थानों पर चोट करती है, उसका राजनीतिक मतलब बिल्कुल अलग होता है.

‘काॅकरोच’ आंदोलन की जबान, चाहे उसके उदारवादी आलोचक इसके बारे में कुछ भी कहें, साफ तौर पर सत्ता के इसी दूसरे रूप पर निशाना साधे हुए थी: मुख्य न्यायाधीश की बेंच पर, मंत्री के दफ्तर पर, पार्टी की मशीनरी पर और उस पूरे निजाम की बेफिक्री पर.

जब ऐसी हद पार करने वाली बागियाना जबान ऊपर बैठे हुक्मरानों की तरफ तानी जाती है, तो यह प्रतीकात्मक बगावत बन जाती है. यह सत्ता से उस झूठी श्रद्धा को छीन लेती है जिस पर उसकी ताकत का बड़ा हिस्सा टिका होता है. इस नजरिए से देखें तो इस आंदोलन में जेन-जी की यह जबान महज जवानी की बेअदबी नहीं थी, बल्कि यह बेरोजगारी और परीक्षा घोटालों से बिलबिला रही एक पूरी पीढ़ी के बरसों से जमा गुस्से का इजहार थी. यह मांगों के साथ-साथ जज्बात को भी बयां कर रही थी और आंदोलन और उसके जनाधार के बीच की दूरी को उस तरह मिटा रही था जैसा कोई भी ‘सभ्य’ और संभ्रांत जबान शायद ही कभी कर पाती है.

मोदी की छवि पर असर, सिर्फ प्रधान की कुर्सी का मामला नहीं

कमजोर पक्ष के ताकतवर पक्ष को हराने का एक पुराना, लगभग फौजी जैसा तरीका होता है: आप जीतते हैं जब आप अपने दुश्मन की सोच से बाहर जाकर वार करते हैं, उस जबान और जंग के मैदान में लड़ते हैं जिसका जवाब देने की उन्हें कोई ट्रेनिंग नहीं मिली होती. इस सरकार ने अपना दबदबा नीतियों को जमीन पर उतारने से ज्यादा एक सोच-समझकर बनाई गई छवि पर खड़ा किया था – अनुशासित, गरिमामय,  लगभग संत जैसी, एक नेता जो हर आलोचना से ऊपर, और यकीनन मजाक से भी ऊपर रखा गया था, जिसे दस साल तक दोस्ताना टीवी एंकरों, सजे-सजाए रैलियों, और एक सोशल मीडिया मशीन ने संभाले रखा, जिसे इस साल तक अपने ही मैदान में कोई असली टक्कर नहीं मिली थी.

यह छवि 1770 के दशक में लुई सोलहवें के चारों ओर मौजूद उस पवित्र आभा का आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष रूप थी – भले ही वह आभा तब तक काफी कमजोर पड़ चुकी थी. यह कोई वास्तविक दैवीय आभा नहीं थी, बल्कि लंबे समय से गढ़ी गई एक धारणा थी.

राज्य के पास नारों, याचिकाओं, अखबारी लेखों का जवाब देने की एक स्क्रिप्ट थी – यानि हिंदुस्तान में विरोध-प्रदर्शन की पुरानी और पारंपरिक जबान, जिसे सत्ता में दस साल के दौरान वह ज्यादा शोर मचाकर, ज्यादा पैसा खर्च करके, या बस चुपचाप नजरअंदाज करके पछाड़ना सीख चुकी थी. लेकिन अपने ऊपर उड़ाए जाने वाले मजाक का उसके पास कोई तोड़ नहीं था. बदजबानी और तंज हुकूमत के आगे अदब से गुजारिश नहीं करते; वे सत्ता को वह इज्जत देने से ही साफ इनकार कर देते हैं. और जिस हुकूमत का वजूद सिर्फ इस बात पर टिका हो कि उसे पूरी संजीदगी से लिया जाए, उसके पास खुद का मजाक बनने से बचने की कोई ढाल नहीं होती.

एक महीने तक उस छवि के साथ बिल्कुल यही हुआ. उस छवि के साथ जो बड़ी कीमत चुकाकर बनाई गई थी – किसी विरोधी नेता के भाषण से नहीं, बल्कि एक मीम अकाउंट चलाने वाले नौजवानों के हाथों यह गुब्बारा फूट गया. यह बिल्कुल वैसा ही तरीका था जिसने ढाई सौ साल पहले फ्रांस के तख्त को उसकी आभा से खाली कर दिया था.

इसीलिए यह इस्तीफा उतना मायने नहीं रखता जितना यह मायने रखता है कि इसे मुमकिन किसने बनाया. दस साल से भी ज्यादा समय से आम हिंदुस्तानी इस खामोश सोच के साथ जी रहे थे कि इस हुकूमत को हिलाया नहीं जा सकता – कि संसद कड़े सवाल नहीं पूछेगी, कि अदालतें तेजी से काम नहीं करेंगी, कि विरोध-प्रदर्शनों से कुछ नहीं बदलता, और सत्ता के सामने सब्र के नाम पर सिर झुका लेना ही सबसे अक्लमंदी है.

‘काॅकरोचों’ ने ठीक उसी हथियार से इस तिलिस्म को तोड़ दिया जिसे हर किसी ने एक ‘संजीदा’ आंदोलन के लिए नाकाबिल-ए-बर्दाश्त बताया था. एक बार जब उम्मीद फिर से सार्वजनिक जिंदगी में लौट आती है, तो उसे वापस पाना कोई छोटी बात नहीं होती – यह हर आगे की चीज की बुनियाद बन जाती है, ठीक जैसे एक बिल्कुल अलग सदी में पेरिस की जनता ने यह समझ लिया था कि जिस बादशाह पर हंसा जा सकता है, उसका विरोध भी किया जा सकता है.

पुरानी फितरत फिर से हावी

और अब कुछ न कुछ आगे जरूर होगा, क्योंकि सरकार ने यह दिखाने में एक पल की भी देर नहीं लगाई कि वह असल में अपने किए हुए वादे के बारे में क्या सोचती है. ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) ने अपना विरोध-प्रदर्शन ‘अच्छी नीयत से’ इस भरोसे पर खत्म किया था, जिसकी पुष्टि बातचीत करने वाले मंत्रियों ने खुद सार्वजनिक रूप से की थी कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी. कुछ ही दिनों में, सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह को एक सार्वजनिक किए गए संदेश में चेतावनी दे रहे थे कि ‘बिहार और बंगाल में सैकड़ों छात्र गिरफ्तार किए जा चुके हैं,’ दिल्ली में सैकड़ों और लोगों की ‘निगरानी और परेशान’ किया जा रहा है, और सिर्फ रसद और लाॅजिस्टिक्स में मदद करने वाले वाॅलंटियर्स को भी चुपचाप उठाया जा रहा है.

आंदोलन के अपने ही आंकड़ों के मुताबिक, विरोध-प्रदर्शन रोके जाने के अड़तालीस घंटों के अंदर ही सौ से ज्यादा छात्रों को हिरासत में लिया जा चुका था. दिल्ली पुलिस ने अपनी तरफ से एक रिपोर्ट फैलानी शुरू कर दी है जिसमें दावा किया गया है कि करीब तीन हजार ‘आदतन अपराधी’ प्रदर्शनों में घुस आए थे. यह वही जानी-पहचानी पहली चाल है जो कोई सरकार तब चलती है, जब वह कैमरे हटते ही किसी जन-आंदोलन को कानून-व्यवस्था की समस्या बनाकर पेश करने की तैयारी में होती है. अठारहवीं सदी की निरंकुश सत्ता भी उस मजाक का जवाब, जिसे वह दलील से नहीं दे सकती थी, ठीक इसी अंदाज में देती थी: ‘लेत्र द काशे’ यानी बिना मुकदमे की गिरफ्तारी का शाही फरमान, चुपचाप की गई गिरफ्तारियां, पर्चे छापने वालों का बैस्टिल की कालकोठरी में गुम हो जाना – जब मजाक को हंसी में उड़ाना अब मुमकिन नहीं रह जाता था.

यह किसी को हैरान नहीं करना चाहिए, जिसने इस सरकार को पहले भी असहमति से निपटते देखा हो. कोई भी हुकूमत सिर्फ इसलिए अपनी सजा देने की आदत नहीं छोड़ देती कि उसे एक बार शर्मिंदा होकर झुकना पड़ा है. वह अक्सर तब और भी चुपचाप सजा देती है जब टीवी कैमरों की गाड़ियां लौट जाती हैं. ‘काॅकरोचों’ को शुरू से यह खतरा समझ में आया था या नहीं, अब इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता. असली सवाल यह है कि क्या वे इसका सामना उसी बेअदबी से करेंगे जिसने उनकी पहली लड़ाई जितवाई थी.

जो आंदोलन तंज और हंसी की ताकत खोजते हैं और फिर उसी से शर्मिंदा होने लगते हैं, जो अपनी  बद-जबानी को उस ‘इज्जतदार’ जबान से बदल देते हैं जिसकी मांग उनके आलोचक हमेशा से करते रहे थे, वे अक्सर ठीक वही बढ़त गंवा बैठते हैं जिसने उन्हें खतरनाक बनाया था. यह भी अठारहवीं सदी का ही एक सबक है: ठीक उसी वक्त, जब क्रांति की सबसे बद-जुबान और सबसे लोकप्रिय आवाजों को, जिनमें हेबर्ट भी शामिल थे, अंदर से ही चुप करा दिया गया, तभी आंदोलन का उन सड़कों से रिश्ता कमजोर पड़ने लगा जिन्होंने उसे जन्म दिया था.

सरकार यह मानकर चल रही है कि ऐसा आंदोलन, जिसका कोई तय ऊपर-नीचे का कोई तय ढांचा नहीं है, कोई मुख्यालय नहीं है और कोई एक ऐसा नेता नहीं है जिसे बुलाकर बातचीत की जा सके और फिर उसे किनारे किया जा सके, जीत की शुरुआती खुशी और जोश खत्म होने के बाद खुद ही थक जाएगा. लेकिन इस पीढ़ी को लेकर सरकार पहले ही एक बार गलत अनुमान लगा चुकी है. यह देश बिहार और बंगाल में गिरफ्तारियों का हिसाब रखने वाले हाकिमों का नहीं है. यह, कम-से-कम एक लंबे और अनोखे महीने के लिए, काॅकरोचों का था, और तब तक उन्हीं का बना रहेगा जब तक वे चुप, शरीफ और भुला दिए जाने लायक बनने से इनकार करते रहेंगे, भले ही अब कैमरों का ध्यान कहीं और जा रहा हो. इतिहास, चाहे वह 1770 के दशक के लिबेल पेम्प्लेट्स हों या जंतर-मंतर के प्लेकार्ड तक, एक बात लगभग हमेशा सिखाता है: जो हुकूमत खुद को हमेशा संजीदगी से लिए जाने पर अड़ी रहती है, वह ज्यादा देर तक तंज और हंसी का निशाना बनकर टिक नहीं पाती, लेकिन वह उस पल बहुत आसानी से बच निकलती है जब उसके विरोधी यह मान बैठते हैं कि हंसना और मजाक उड़ाना आखिरकार उनके स्तर से नीची बात थी.

उम्मीद है, ‘काॅकरोच’ यह सुन रहे हैं.

(इन डिफेंस ऑफ प्रोफेनिटी ऑफ प्रोटेस्टर्स, द वायर, 30 जुलाई 2026, अनुवाद: मनमोहन)

08 August, 2026