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भारत-इस्राइल निवेश समझौता : जनसंहार के दौर में शर्मनाक साझेदारी

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-- मनमोहन 

8 सितम्बर 2025 को नई दिल्ली में मोदी सरकार ने इजरायल के फाइनेंस मिनिस्टर बेजलेल स्मोटरिच को बुलाकर भारत-इजरायल द्विपक्षीय निवेश समझौते पर दस्तखत करवाए. यह फैसला भारतीय विदेश नीति के इतिहास का सबसे अंधेरा और शर्मनाक मोड़ है. यह न सिर्फ फिलीस्तीनी जनता की आजादी की लड़ाई के साथ गद्दारी है बल्कि भारत की आजादी के उपनिवेश-विरोधी गौरवशाली विरासत के भी खिलाफ है.

भारत की आजादी की लड़ाई दुनिया भर के पीड़ित और गुलाम मजलूम कौमों के लिए उम्मीद का चिराग रही. यही वजह थी कि गांधी, नेहरू से लेकर इंदिरा और यहां तक कि  वाजपेयी तक की सरकारों ने फिलीस्तीनी आजादी के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा इजरायल का विरोध किया और फिलीस्तीनी जनता के साथ खड़े होने की परंपरा निभाई. लेकिन आज वही भारत, जो गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता माना जाता था, दुनिया के सबसे बड़े रंगभेदी और जनसंहारी राज्य इस्राइल से दोस्ती की नयी मिसाल पेश कर रहा है.

युद्ध अपराधी का स्वागतः नैतिक पतन की पराकाष्ठा

युद्ध अपराधी स्मोटरिच एक कट्टर दक्षिणपंथी चेहरा है, जिस पर जनसंहार भड़काने और बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप हैं. इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, नॉर्वे और ब्रिटेन जैसे कई देशों ने उस पर पाबंदी लगा रखी है. अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (आईसीसी) में उसके खिलाफ और इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार बैन-गवीर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट की अर्जियां दी गई हैं. इससे पहले भी आईसीसी  युद्ध अपराधी इजरायली नेताओं बेंजामिन नेतन्याहू और योआव गैलांट पर कार्रवाई शुरू की है. स्मोटरिच खुलेआम गाजा पर दोबारा कब्जा करने, जनसंहार, फिलीस्तीनी आबादी को घटाने और ‘कब्जे’ जैसे शब्द को सामान्य बनाने की बातें करता है. दरअसल, वह युद्ध अपराधों और गैरकानूनी बस्तियों को जायज ठहराने की कोशिश कर रहा है. उसकी पूरी सोच नस्ली वर्चस्व पर टिकी है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून की खुली धज्जियां उड़ाती है.

इस समझौते की घोषणा ऐसे वक्त हुई है जब गाजा को कंसन्ट्रेशन कैंप जैसा बना दिया गया है और पिछले दो साल से ज्यादा समय से इजरायल वहां पर पूरी ताकत से जनसंहार चला रहा है. ट्रम्प के कथित गाजा पीस प्लान की छाया में फिलीस्तीनी जनता को सरेंडर करवाने और गाजा पर नया उपनिवेशी शासन थोपने की कोशिशें तेज हो रही हैं. अक्टूबर 2023 से अब तक इजरायल ने 64 हजार से ज्यादा फिलीस्तीनियों को मार डाला और डेढ़ लाख से ज्यादा को घायल किया है, जिनमें औरतें, बच्चे, पत्रकार, डॉक्टर और शिक्षक भी शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र की इंडिपेंडेंट इंटरनेशनल कमीशन ऑफ इन्क्वायरी ने 16 सितंबर 2025 की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि इजरायल ने जनसंहार किया है और 1948 के जनसंहार कन्वेंशन की पांच में से चार शर्तें पूरी की हैं – सामूहिक हत्याएं, गंभीर शारीरिक व मानसिक नुकसान, ऐसी जिंदगी हालात थोपना जो समुदाय के विनाश की ओर ले जाएं, और जन्म रोकने के उपाय जैसे गाजा के सबसे बड़े रिप्रोडक्टिव क्लिनिक का नाश. बात सिर्फ बमबारी तक सीमित नहीं है; इस्राइल ने भूख को भी हथियार बना लिया है – खाना, दवा, ईंधन और पानी रोके गए हैं, लाखों लोग बेघर हैं और सैकड़ों बस्तियां तबाह हो चुकी हैं. अब तो इजरायली कैबिनेट ने नई यहूदी बस्तियां बनाने की मंजूरी भी दे दी है, यानी फिलीस्तीनियों की जमीन पर कब्जा और तेज किया जा रहा है. इजरायल का  मकसद फलस्तीन की आबादी को मिटाना, उनकी जमीन छीनना और उनकी पहचान मिटाना है. फिर भी, मोदी सरकार इस जनसंहार पर चुप रही और संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के युद्ध अपराधों की निंदा करने वाले हर प्रस्ताव पर अनुपस्थित रही. यह भारत के फिलीस्तीनी आत्मनिर्णय के ऐतिहासिक समर्थन से साफ भटकाव है.

स्मोटरिच का स्वागत करके और तेल अवीव के साथ रिश्ते गहरा करके मोदी ने दरअसल एक युद्ध अपराधी को गले लगाया है और एक रंगभेदी हुकूमत को मंजूरी दी है. एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल की रंगभेदी व्यवस्था का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया है, जिसमें अलग-अलग बुनियादी ढांचे, संसाधनों से वंचित करना और कानूनी असमानताएं शामिल हैं. एमनेस्टी की 2022 की रिपोर्ट ने इसे “हुकूमत की एक क्रूर प्रणाली” कहा था, जबकि ह्यूमन राइट्स वॉच की 2021 की रिपोर्ट ने साफ कहा कि इजरायल रंगभेद और उत्पीड़न के अपराधों का दोषी है. इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) भी इन उल्लंघनों के लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहरा चुका है. मोदी सरकार का यह कदम सिर्फ शर्मनाक ही नहीं, बल्कि बेहद खतरनाक भी है, क्योंकि दुनिया भर में इजरायल पर पाबंदी और जवाबदेही की मांग तेज हो रही है. भारत की यह चुप्पी और मिलीभगत उसकी उस छवि को चोट पहुंचा रही है जो उसे ग्लोबल साउथ की अगुवाई और अरब दुनिया से दोस्ती की वजह से मिली थी.

कॉरपोरेट मुनाफे के लिए मानवता की बलि

यह निवेश समझौता भारत और इजरायल के बीच लंबे समय के आर्थिक रिश्तों की नींव रखता है, जिससे भारत इजरायल के अपराधों का और गहरा हिस्सेदार बन रहा है. पहले ही भारत हथियार बनाने और राजनीतिक समर्थन देने में उसका साझीदार रहा है, अब इस साझेदारी को व्यापारिक समझौतों के जरिए और पक्का किया जा रहा है. स्मोटरिच ने इस समझौते को “निवेशकों के लिए नए मौके, इस्राइली निर्यात मजबूत करने और कारोबारी वर्ग को भरोसा व संसाधन देने वाला कदम” बताया. भारतीय सरकार ने भी इसे “आर्थिक साझेदारी मजबूत करने और निवेश के लिए एक भरोसेमंद और मजबूत माहौल बनाने की साझा प्रतिबद्धता” कहा.

यह भारत का पहला ऐसा समझौता है जो किसी गैर-पश्चिमी या ओइसीडी सदस्य देश के साथ हुआ है, और इसे आगे चलकर मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का रास्ता खोलने वाला कदम बताया जा रहा है. मगर सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी  की 2025 की रिपोर्ट “प्रॉफिट - जेनोसाइड : इंडियन इनवेस्टमेंट इन इजरायल” साफ करती है कि भारतीय पूंजी – चाहे सरकारी हो या निजी – गैरकानूनी कब्जे और युद्ध अपराधों को फंडिंग में लगी हुई है. भारत के रक्षा, टेक्नोलॉजी और बुनियादी ढांचे में इजरायल के साथ निवेश 5.2 अरब डॉलर से ज्यादा पहुंच चुका है. उदाहरण के तौर पर अदानी ग्रुप ने इजरायली कंपनी एल्बिट सिस्टम्स के साथ मिलकर ड्रोन्स बनाने की फैक्ट्री लगाई है, जिन्हें गाजा में इस्तेमाल किया जा रहा है – यानी भारतीय मुनाफा सीधे-सीधे फिलीस्तीनी जनसंहार, दर्द और तबाही से जुड़ा हुआ है.

इस समझौते का असली मकसद कॉरपोरेट घरानों के हितों को बचाना है – खासकर अदानी का 2023 में हाइफा पोर्ट की 1.2 अरब डॉलर की खरीद – और साथ ही इंडिया-मिडिल ईस्ट कॉरिडोर को जिंदा करना, जो अमेरिका समर्थित आर्थिक योजना है और चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के मुकाबले के लिए बनाई गई थी. गाजा जनसंहार की वजह से यह प्रोजेक्ट रुका हुआ है. अब इस समझौते के बाद इसे फिर से शुरू करने की कोशिश हो रही है, जिसमें इंसानी हकूक की जगह सीधे-सीधे मुनाफे को तवज्जो दी गई है. रिलायंस इंडस्ट्रीज और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसी बड़ी कंपनियां भी इस साझेदारी को और गहरा कर रही हैं, टेक्नोलॉजी और हथियारों के सौदों के जरिए. CenFA ने इन सौदों की आलोचना करते हुए कहा कि यह सब “लोगों के ऊपर मुनाफे” की सोच पर टिका है, बिल्कुल उसी तरह जैसे उपनिवेशी दौर में संसाधनों की लूट होती थी.

ऐसे रिश्ते उस हथियारों की मंडी को जायज ठहराते हैं जिसे ‘युद्ध  में आजमाया’ कहकर बेचा जाता है – यानी जो हथियार फिलीस्तीनियों पर आजमाए गए हैं, वही भारत में भी पहुंच रहे हैं. यह सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि निगरानी और दमन की तकनीक भी है, जिसका इस्तेमाल भारत में जनता को काबू करने के लिए किया जा रहा है.

भारत की कंपनियां पानी और खेती तक में इजरायल  के रंगभेदी ढांचे का हिस्सा बन चुकी हैं. जैन इरिगेशन और अदानी वेंचर्स जैसी कंपनियां इजरायल की राष्ट्रीय जल कंपनी मेकोरॉट के साथ जुड़ी हैं. यह वही कंपनी है जो वेस्ट बैंक के पानी पर कब्जा किए हुए है और उसका 80% हिस्सा यहूदी सेटलर्स (बसनेवालों) को देती है, जबकि फिलीस्तीनियों को पीने तक का साफ पानी नहीं मिलता. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे रंगभेद का हिस्सा बताया है, जिसमें पानी को हथियार बनाकर मानवीय संकट और गहरा किया जा रहा है. भारतीय कंपनियां बस्तियों के लिए सड़कें और पाइपलाइन जैसी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं में भी लगी हैं, जिनमें जमीन की जबरन जब्ती शामिल है. ह्यूमन राइट्स वॉच कहता है कि इस तरह की परियोजनाएं फिलीस्तीनियों के जबरन विस्थापन को बढ़ाती हैं और बसनेवालों को टिकाने के लिए जमीन पर कब्जे को मजबूत करती हैं. यह सब जेनेवा कन्वेंशन्स की खुली उल्लंघन है और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के हिसाब से भारत को भी कानूनी दायरे में ला सकता है.

वैचारिक गठजोड : हिंदुत्व-जायोनिज्म की साझेदारी

सियासी तौर पर देखें तो फिलीस्तीनी आजादी के समर्थन से इजरायल के साथ गहरे रिश्तों तक भारत का यह भटकाव, हिंदुत्व की सियासत के साथ वैचारिक मेल दिखाता है. आज दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार अरबों डॉलर तक पहुंच चुका है, जो भारत के पाखंड को उजागर करता है. हिंदुत्व और जायोनिज्म दोनों ही जातीय राष्ट्रवाद (ethno&nationalism) और नस्लीय श्रेष्ठता पर आधारित विचारधाराएं हैं, जो इतिहास का गलत इस्तेमाल करके अपना दबदबा जायज ठहराती हैं – जायोनिज्म यहूदी जनता की होलोकास्ट की पीड़ा का हवाला देता है, और हिंदुत्व पुरानी आक्रमणों की कहानी सुनाकर मुस्लिम विरोध को हवा देता है. जायोनिज्म के ग्रेटर इजरायल की तरह आरएसएस/भाजपा अखंड भारत की साम्राज्यवादी बात करती है. यही मेल भारत को इजरायल का सबसे बड़ा हथियार खरीदार और नस्ली राष्ट्रवाद के प्रोजेक्ट्स का साझीदार बनाता है. भाजपा के दौर में भारत ने कानून और नीतियां अपनाई हैं जो इजरायल से मेल खाती हैं – भारत के भीतर भी रंगभेदी ढांचे जैसे हालात बनाए जा रहे हैं, जिसकी मिसाल राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) है.

यह गठजोड़ सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि मजदूरों के शोषण और प्रोपेगेंडा तक फैला हुआ है. गाजा युद्ध के बाद इजरायल ने हजारों फिलीस्तीनी मजदूरों को निकाल दिया, और उस कमी को भारत ने पूरा किया – 2025 तक तकरीबन 20,000 भारतीय मजदूर इजरायल के निर्माण और देखभाल क्षेत्र में भेजे गए. मजदूर यूनियनों ने इसका विरोध किया, मगर मोदी सरकार ने इसे विदेश नीति की कामयाबी की तरह पेश किया.

कॉरपोरेट ताकतें भी इस रिश्ते को बढ़ावा दे रही हैं. मुकेश अंबानी का ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन रायसीना डायलॉग जैसे मंचों पर भारत-इजरायल रिश्तों का प्रोपेगेंडा करता है. 2018 में इसी मंच से नेतन्याहू ने भारत-इजरायल रिश्तों की तारीफ की थी, जब भारत में एनसीआर और इजरायल में भेदभाव वाले कानून लागू किए जा रहे थे. भारतीय मीडिया भी इसमें हिस्सेदार है – एंकर कश्मीर को हमास से जोड़कर दिखाते हैं और कहते हैं कि भारत-इजरायल की लड़ाई “इस्लामी आतंकवाद” के खिलाफ साझा जंग है. वहीं भाजपा की आईटी सेल फिलीस्तीनियों के खिलाफ वही झूठ और नफरत फैलाती है, जैसी वह भारत में मुसलमानों के खिलाफ फैलाती है. यह पूरा प्रोपेगेंडा तंत्र इस गठजोड़ को बेचता है, युद्ध अपराधों पर पर्दा डालता है और युद्ध अपराधियों को “हीरो” बनाकर पेश करता है.

अंतरराष्ट्रीय कानून बिल्कुल साफ है : बस्तियों या कब्जे पर आधारित किसी भी प्रोजेक्ट को समर्थन देना पूरी तरह गैरकानूनी है. 1973 का संयुक्त राष्ट्र रंगभेद कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय का रोम चार्टर रंगभेद को संगठित दमन और वर्चस्व की राजनीति के रूप में परिभाषित करते हैं.

संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी और ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि इजरायल की नीतियां इसी ढांचे में आती हैं. भारत की पूंजी अब सीधे उन ढांचों में लग  रही है जो कब्जे और युद्ध अपराधों को बनाए रखते हैं. CenFA की 2025 रिपोर्ट साफ कहती है कि भारतीय पूंजी “पूरी तरह उस वित्तीय ढांचे में लगी है जो कब्जे और युद्ध अपराधों को मजबूती देता है.” यह सिर्फ कानून का सवाल नहीं है, बल्कि इंसानियत और नैतिक जिम्मेदारी का है – हर निवेश में नैतिक विकल्प चुनने का अवसर है, और गाजा के मामले में सही रास्ता बिल्कुल साफ है.

भारत को तुरंत दिशा बदलनी होगी ताकि अपनी नैतिक नेतृत्व की विरासत को बचा सके. इनमें फौरी कदमों में सैन्य और तकनीकी सहयोग खत्म करना, ऑक्यूपेशन और रंगभेद से जुड़ी वस्तुओं पर आर्थिक पाबंदी लगाना, संयुक्त राष्ट्र में वैश्विक पाबंदियों की वकालत करना और फिलीस्तीन की आजादी का समर्थन देना शामिल है. लंबे समय के लिए भारत को गजा और वेस्ट बैंक में मानवीय मदद पहुंचानी होगी; बहिष्कार, निवेश पर रोक और बीडीएस आंदोलन का समर्थन करना होगा और इजरायली सांस्कृतिक व शैक्षणिक संस्थानों का बहिष्कार करना होगा.

दरअसल यह केवल गाजा के लिए नहीं बल्कि पूरी इंसानियत की रूह के लिए है. आजाद भारत की नैतिक दिशा आजादी आंदोलन की विरासत से तय होती रही, और ऐसे गठजोड़ों को ठुकराया गया. गांधी ने फिलीस्तीन के बंटवारे का विरोध करते हुए कहा था कि यूरोप के अपराधों का बोझ फिलीस्तीनियों पर क्यों डाला जाए? 1947 में नेहरू ने अल्बर्ट आइंस्टीन की अपील के बावजूद यहूदी राज्य के विचार को अस्वीकार कर अरब जनता के हक को हिंसा-आधारित दावों पर तरजीह दी.

मगर आज का भारत, मोदी के दौर में, इस विरासत से गद्दारी करते हुए उन फासीवादी हुकूमतों से हाथ मिला रहा है जो एक-दूसरे की सत्ता को मजबूत करते हैं. मोदी-नेतन्याहू की साझेदारी दरअसल हिंदुत्व और जायोनिज्म का गठजोड़ है, जो भारतीय मजदूरों और डिजिटल ट्रोलों तक को इजरायल की सेवा में झोंककर वैश्विक दक्षिणपंथ को मजबूत कर रहा है. लेकिन जनसंहार और रंगभेदी कब्जे के खिलाफ दुनिया भर में जो आंदोलन खड़े हो रहे हैं, उनमें भारत की जनता भी शामिल है. यही आवाजें तय करेंगी कि इतिहास का पहिया किस दिशा में घूमेगा. जनसंहार के अंधेरे के पार इंसानियत और आजादी की रोशनी जरूर चमकेगी.

11 October, 2025