भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है. इसे लंबे समय तक देश की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा जा रहा कि भारत का युवा इक्कीसवीं सदी का नेतृत्व करेगा. प्रधानमंत्री मोदी अक्सर इस जुमले को दोहराते रहते हैं, और विकसित भारत के अपने जुमले में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित करते नहीं थकते हैं. कहते हैं कि वह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का निर्माता बनेगा और ‘नए भारत’ का स्वप्न साकार करेगा. लेकिन आज यही युवा हताश, असुरक्षित और आक्रोशित दिखाई देता है. जिस पीढ़ी को उम्मीद का प्रतीक होना चाहिए था, वह अपने भविष्य को लेकर गहरे संकट में है.
बीते वर्षों में शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर युवाओं का भरोसा लगातार कमजोर हुआ है. प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, वर्षों तक भर्ती प्रक्रियाओं का लंबित रहना, रिक्त पदों को न भरना, संविदा और अस्थायी रोजगार का विस्तार, शिक्षा का महंगा और निजीकरण की ओर बढ़ता स्वरूप – इन सबने युवाओं के सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि मेहनत और योग्यता का मूल्य आखिर कहां है? जब लाखों युवा वर्षों तक तैयारी करने के बाद भी अनिश्चितता के अंधेरे में छोड़ दिए जाते हैं, तब उनका गुस्सा केवल किसी एक परीक्षा या भर्ती के खिलाफ नहीं होता, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ होता है जो उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करती है.
व्यवस्था से हताशा और आक्रोश के रूप में ही भरत तिवारी जैसे नौजवान को देखना चाहिए, जो अपने क्षेत्र के समस्याओं से परेशान हो कर प्रशासन से टकराव मोल लेता है. इस देश में आज भी हजारों आदिवासी युवा व्यवस्था से उत्पीड़ित हो कर अपनी मांग और जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए हथियार उठाए हुए हैं.
वह देख रहा है कि एक ओर बेरोजगारी बढ़ रही है, दूसरी ओर सरकारी नौकरियों में लगातार कटौती हो रही है. लाखों स्वीकृत पद वर्षों तक खाली पड़े रहते हैं, लेकिन उन्हें भरने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती. रोजगार की जगह इवेंट, विज्ञापन और प्रचार अधिक दिखाई देता है. ऐसे में उसके भीतर यह भावना स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है कि व्यवस्था उसकी आकांक्षाओं को पूरा करने के बजाय उन्हें टाल रही है.
यह आक्रोश केवल आर्थिक नहीं है. यह लोकतांत्रिक भी है. जब युवा अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरता है, तो उसे कई बार पुलिसिया कार्रवाई, फर्जी मुकदमों, हिरासत या प्रशासनिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है. बिहार आज पुलिस स्टेट के बतौर खड़ा हो रहा है. महज एक डिग्री काॅलेज के लिए आंदोलन कर रहे छात्रों को बर्बर पुलिसिया दमन का शिकार होना पड़ा है. सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शन को भी कानून-व्यवस्था के संकट के रूप में पेश करती है. किसी की बात सुनने के बजाय दबाई जा रही है जबकि लोकतंत्र में असहमति और विरोध नागरिक अधिकार हैं.
उसका संघर्ष आज भले ही बिखरा हुआ दिखाई देता हो, लेकिन वह वह लगातार लड़ रहा है, रुक नहीं रहा. कहीं पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन है, कहीं भर्ती में धांधली के खिलाफ धरना है, कहीं विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि के खिलाफ आंदोलन है, तो कहीं संविदा रोजगार और श्रम अधिकारों को लेकर प्रदर्शन हैं. ये संघर्ष अलग-अलग हैं, लेकिन इन सबके भीतर एक साझा सवाल मौजूद है – क्या इस देश की व्यवस्था युवाओं के साथ न्याय करेगी?
ये सच है कि युवा आंदोलन टुकड़ों में हो रहे हैं. एक राज्य का संघर्ष दूसरे राज्य से नहीं जुड़ पाता. एक परीक्षा का आंदोलन दूसरी परीक्षा के आंदोलन से अलग रहता है. छात्र आंदोलन बेरोजगार युवाओं के आंदोलन से पूरी तरह नहीं जुड़ पाता. इस बिखराव का लाभ स्वाभाविक रूप से सत्ता को मिलता है. जब तक संघर्ष अलग-अलग रहेंगे, तब तक व्यवस्था पर व्यापक लोकतांत्रिक दबाव बनाना कठिन होगा. टुकड़ो में हो रहे आंदोलनों को एक व्यापक वैचारिक राजनीतिक दिशा और साझा मंच की जरूरत है.
किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन में युवाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई है. स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकतंत्र की रक्षा के संघर्षों तक, युवाओं ने हमेशा परिवर्तन की मशाल उठाई है. आज भी वही संभावना मौजूद है.
आज शासन की प्राथमिकताओं को बदलने की जरूरत है. शिक्षा को अधिकार की तरह देखना होगा, रोजगार सृजन को विकास का केंद्रीय लक्ष्य बनाना होगा, भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध और पारदर्शी बनाना होगा तथा लोकतांत्रिक असहमति को सम्मान देना होगा. यदि व्यवस्था युवाओं की आवाज को सुनने के बजाय उसे दबाने का रास्ता चुनेगी, तो असंतोष और गहरा होगा.
युवा किसी देश की समस्या नहीं, उसकी सबसे बड़ी शक्ति होते हैं. लेकिन, जब यही शक्ति निराशा, अपमान और असुरक्षा में जीने को विवश हो जाए, तो यह पूरे राष्ट्र के लिए चेतावनी है. आज भारत का युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा है; वह सम्मान, न्याय, पारदर्शिता और अपने भविष्य पर विश्वास की मांग कर रहा है. उसके आंदोलन भले आज टुकड़ों में दिखाई दें, लेकिन उन टुकड़ों के भीतर एक साझा बेचैनी है. यदि यह संगठित चेतना में बदलती है, तो केवल रोजगार की लड़ाई नहीं रहेगी, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जवाबदेह शासन की व्यापक लड़ाई बन जाएगी, आजादी की दूसरी लड़ाई होगी.
– कुमार दिव्यम