झारखंड-छत्तीसगढ़ में हिंसक कार्रवाइयों का जन संगठनों ने मुखर विरोध किया
आदिवासी संघर्ष मोर्चा व झारखंड जनाधिकार महासभा के संयुक्त तत्वावधान में 9 दिसंबर 2025 को रांची में एक व्यापक विचार-विमर्श आयोजित किया गया. कार्यक्रम में झारखंड-छत्तीसगढ़ क्षेत्र में माओवादी उन्मूलन के नाम पर जारी हिंसा, राज्य दमन और कॉरपोरेट लूट की गहन समीक्षा की गई. इसमें झारखंड के विभिन्न जिलों – बोकारो, लातेहार, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम, रामगढ़, हजारीबाग, रांची आदि से आए सैकड़ों आदिवासी-मूलनिवासी लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिला कार्यकर्ताओं, युवाओं और जन संगठनों के प्रतिनिधियों ने श्रिकत की.
कार्यक्रम मे विषय प्रस्तुति करते हुए झारखंड जनाधिकार महासभा के मो. सिराज ने कहा कि माओवादी खात्मा अभियानों का मुख्य उद्देश्य है आदिवासियों के अस्तित्व को खतम करना और उनके जल, जंगल, जमीन और खनिज के कॉरपारेट लूट के सुरक्षित करना. भाकपा(माले) के राज्य सचिव मनोज भक्त ने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा मार्च 2026 तक “माओवाद के सफाये” की घोषणा के बाद आदिवासी क्षेत्रों में फर्जी मुठभेड़ों, गिरफ्तारियों और सैन्यीकरण में तेजी आई है और छत्तीसगढ़ व झारखंड में सैकड़ों आदिवासी, निहत्थे ग्रामीण और आम नागरिक सरकारी दमन व हिंसा के शिकार हुए हैं. माडवी हिडमा की हालिया हत्या ने इस अभियान का असली चेहरा उजागर कर दिया है, जहां एक ओर आत्मसमर्पण की अपील होती है और दूसरी ओर तथाकथित मुठभेड़ों में हत्याएं. आदिवासी संघर्ष मोर्चा के राज्य सचिव देवकीनंदन बेदिया ने सवाल उठाया कि जब माओवादी संगठनों ने युद्धविराम और शांतिवार्ता की इच्छा जताई थी, तब संवाद के बजाय हिंसा को क्यों चुना गया.
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह विमर्श माओवादी विचारधारा के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि माओवाद उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों के खिलाफ चल रहे दमन पर है. किसी भी प्रकार की हिंसा – चाहे राज्य की हो या किसी और की – जायज नहीं है, और ऑपरेशन ग्रीन हंट, सलवा जुड़ुम व ऑपरेशन कगार जैसे अभियानों ने यह साबित किया है कि उनका सबसे बड़ा शिकार आदिवासी समाज ही बनता है.
महासभा के दिनेश मुर्मू ने कहा कि यूएपीए और एसआइआर जैसे कानून आज दमन का हथियार बन चुके हैं. इन कानूनों के जरिए हजारों आदिवासियों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाला गया है. संदेश साफ है – “हमारे पुरखों की जमीन, जंगल और संघर्ष की विरासत को हमसे छीना जाएगा.”
वक्ताओं ने अदानी जैसे कॉरपोरेट समूहों का जिक्र करते हुए कहा कि खनन, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आदिवासी इलाकों को खाली कराया जा रहा है और जो विरोध करेगा, उसे देशद्रोही करार दिया जा रहा है. राज्य का दमन केवल सशस्त्र आंदोलनों तक सीमित नहीं है. विस्थापन, जबरन खनन, सुरक्षा कैंप निर्माण और सैन्यीकरण के खिलाफ चल रहे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों को भी कुचला जा रहा है. मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध और उनके नेताओं पर यूएपीए के मामले इसका उदाहरण हैं. 2019-23 के बीच देशभर में यूएपीए के तहत 10,400 से अधिक गिरफ्तारियां (झारखंड में 501) हुई हैं.
गोमिया के हीरालाल टुडू ने बताया कि हेमंत सोरेन सरकार आंख बंद करके केंद्र के माओवादी-खात्मा अभियान के नाम पर आदिवासी-खात्मा के रणनीति के नक्शे-कदम पर चल रही है. राज्य में 21 अप्रैल व 16 जुलाई को गोमिया में हुए मुठभेड़ों पर भी कई सवाल खड़े होते हैं.
संघर्ष मोर्चा की अल्मा खलखो ने कहा कि जमीन लूटने के लिए फर्जी ग्राम सभाओं के जरिए परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. उन्होंने कहा कि ग्राम सभा में 33% महिला भागीदारी जैसे संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन होता है. ग्राम सभा के नाम पर अकसर सिर्फ एक महिला – वह भी मुखिया के नाम पर – कागजों में मौजूद होती है. वक्ताओं ने स्व. रामदयाल मुंडा को याद करते हुए कहा कि सत्ता द्वारा आदिवासियों पर दमन इसलिए होता है क्योंकि उनकी जमीन के नीचे खनिज है.” पेसा, पांचवीं अनुसूची और संविधान ने जो अधिकार आदिवासियों को दिए हैं, उनके बारे में जन-जन तक जानकारी पहुंचाना जरूरी है, नहीं तो दिकू साहब जो कहते हैं, वही अंतिम सच बना दिया जाता है. संविधान के तहत प्रतिरोध करना देशद्रोह नहीं है.
महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर लीना पादम् ने अपने अनुभव साझा किए. उन्होंने सोनी सोरेन सहित अनेक महिलाओं के उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह आदिवासी इलाकों में महिलाओं और युवतियों को जबरन श्रम कार्य (खाना पकाने), यौन हिंसा और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. उन्होंने कहा कि इन महिलाओं के प्रतिरोध, साहस और संघर्ष की कहानियों को सामने लाना, उन्हें सम्मान और मंच देना और उनके अधिकारों व गरिमा के प्रति समाज को शिक्षित करना जरूरी है.
झारखंड जनाधिकार महासभा के टॉम कावला ने ‘अबुआ सरकार’ से भी गहरी निराशा व्यक्त की. उन्होंने कहा कि भूमि बैंक, विस्थापन और दमनकारी नीतियों पर उसकी चुप्पी सवालों के घेरे में है. सीपीएम के राज्य सचिव प्रकाश विप्लव द्वारा भारतमाला परियोजना को रांची और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर विस्थापन के ‘ब्लूप्रिंट’ के रूप में बताया गया. पश्चिमी सिंहभूम से अजीत कांडेयांग ने बताया कि बिना ग्राम सभा की सहमति के लगातार सुरक्षा बल कैम्प स्थापित किए जा रहे हैं.
गौतम मुंडा ने कहा कि आदिवासियों को उनके मूल मुद्दों से भटका कर इन समुदायों के भीतर जाति-धर्म के आधार पर विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा है; उनको सरना, ईसाई, हिंदू, मुसलमान जैसे खांचों में बांटकर उनकी एकता तोड़ी जा रही है.
चेरो समुदाय के प्रतिनिधियों ने सतबरवा में 130 एकड़ में फैले पहाड़ पर कब्जा करने के विरोध में हुए आंदोलन के दौरान सैकड़ों लोगों पर मुकदमा दर्ज करने और नीलांबर-पीतांबर की प्रतिमा तक पर नोटिस दिए जाने की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि पलामू टाइगर रिजर्व के नाम पर बड़े पैमाने पर विस्थापन जारी है. अशोक वर्मा ने कहा कि एक तरफ मोदी सरकार ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा के बहाने सांप्रदायिकता फैला रही है तो दूसरी तरफ ग्रामीण ‘वंदे मातरम्’ गाते हुए जन विरोधी गोंदुलपुर कोयला परियोजना के विरुद्ध लोकतान्त्रिक आंदोलन कर रहे हैं.
उक्त वक्ताओं के अलावा कार्यक्रम में मौजूद जन संस्कृति मंच के मोती बेदिया और सुरेंद्र बेदिया, आदिवासी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष आरडी मांझी व नन्दकिशोर गंझु, ऐपवा नेत्री नंदिता भट्टाचार्य तथा भाकपा(माले) लिबरेशन सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने एकजुट प्रतिरोध पर जोर दिया. अंत में 1-9 जनवरी 2026 को प्रतिरोध सप्ताह, विधानसभा घेराव जैसे कार्यक्रमों का प्रस्ताव लेते हुए कानूनी जागरूकता, जनशिक्षा, संगठित जनआंदोलन और व्यापक एकजुटता का आह्वान किया गया. यह चेतावनी दी गई कि यदि अब भी चुप रहे, तो हमारी संस्कृति, हमारे जंगल, जैव विविधता और कई आदिवासी समुदाय समाप्ति की कगार पर पहुंच जाएंगे.