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करम महोत्सव: पारंपरिक लोकगीतों व जनगीतों से गूंज उठा अखड़ा

करम महोत्सव: पारंपरिक लोकगीतों व जनगीतों से गूंज उठा अखड़ा

20 सितंबर 2026 को प्रकृति, पर्यावरण, श्रम और लोकजीवन के उत्सव तथा भाई-बहन के अटूट प्रेम के प्रतीक महान कृषि पर्व करमा के अवसर पर झारखंड जन संस्कृति मंच ने घुटूवा के कटहर टोला (बरकाकाना, रामगढ़) में ‘गहदम झूमइर’ का आयोजन किया गया. मंच द्वारा इस कार्यक्रम का आयोजन लगातार दूसरे वर्ष किया गया.

करमा पर्व के पारंपरिक लोकगीतों और जनगीतों की मनमोहक प्रस्तुतियों से पूरा अखड़ा देर रात तक गूंजता रहा. गीतों की लय और सामूहिक नृत्य ने उपस्थित लोगों को थिरकने पर मजबूर कर दिया. साथ ही, आयोजन ने लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, सामूहिकता, भाईचारे और प्रकृति के साथ अपने गहरे संबंध को समझने तथा वैचारिक चेतना से जुड़ने का संदेश दिया.

कार्यक्रम की अध्यक्षता झारखंड जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुरेन्द्र कुमार बेदिया व संचालन मंच के राज्य पार्षद सदस्य शिवनारायण बेदिया और युवा छात्रा कृष्णा बेदिया ने संयुक्त रूप से किया.

इसकी शुरुआत मुख्य अतिथि खोरठा भाषा-साहित्य के विद्वान डाॅ. बीएन ओहदार, विशिष्ट अतिथि आदिवासी संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय सह संयोजक एवं सामाजिक चिंतक देवकीनंदन बेदिया तथा पारंपरिक लोकगीतों के रइसका बोधन बेदिया ने अखड़ा में पारंपरिक रूप से गाड़े गए करम वृक्ष की प्रतीक डाली के समीप दीप प्रज्वलित कर की. इस अवसर पर सभी अतिथियों को आदिवासी गमछा देकर सम्मानित किया गया. सामूहिक नृत्य में शामिल महिलाओं को भी गमछा तथा खोंपा में धान का पत्ता खोंसकर सम्मानित किया गया.

‘जे नाची से बांची, जे गावी से जीवी’

उद्घाटन के अवसर पर डाॅ. बीएन ओहदार ने लोक संस्कृति पर विचार रखते हुए कहा, “जे नाची से बांची, जे गावी से जीवी”, अर्थात जो नाचेंगे, वही बचेंगे और जो गाएंगे, वही जीवित रहेंगे.

उन्होंने कहा कि झारखडी संस्कृति में सदियों से यहां रहने वाले विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग बिना भेदभाव के एक साथ जीवन-यापन करते रहे हैं. लेकिन जब से अपसंस्कृति हमारे बीच काबिज हुई है, तब से लोगों को बांटने का प्रयास जारी है. इससे हमें बचने की जरूरत है. आदिवासी संस्कृति सामूहिकता में विश्वास करती है.

उन्होंने कहा कि खोरठा लोकगीत हमारी संस्कृति और इतिहास के सच्चे दस्तावेज हैं. डिजिटल दौर में जब युवा अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में उन्हें लोकगीतों और लोकसंस्कृति से जोड़ना बेहद जरूरी है. करमा जैसे पर्वों पर सामूहिक झूमइर के माध्यम से खोरठा लोकगीतों की मिठास और परंपरा को बचाए रखना हमारी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक जिम्मेदारी है.

विशिष्ट अतिथि देवकीनंदन बेदिया ने कहा कि सामूहिक रूप से गाए जाने वाले लोकगीत लोगों के बीच आपसी भाईचारा और प्रकृति के प्रति प्रेम बढ़ाते हैं. त्योहारों में अपसंस्कृति फैलाने वाले गीतों की जगह पारंपरिक लोकगीतों और जनगीतों की परंपरा को वापस लाना हमारी साझी जिम्मेदारी है.

झारखंड जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुरेन्द्र कुमार बेदिया ने कहा कि “गहदम झूमइर जैसे पारंपरिक लोकगीत हमारी पहचान हैं. यह महोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और वैचारिक धरोहर को संजोकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी है.”

उन्होंने कहा कि करमा पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है. प्रकृति बिना किसी स्वार्थ के हमें जीवन देती है. इसलिए प्रकृति, जंगल, जल, जमीन और पर्यावरण की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है. लोक संस्कृति को बचाने का अर्थ केवल गीत और नृत्य को बचाना नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद सामूहिकता, श्रम, प्रकृति प्रेम और सामाजिक चेतना को बचाना भी है.


पारंपरिक वेशभूषा में महिलाओं का सामूहिक नृत्य

इसके बाद महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा लालपाड़ साड़ी और सफेद गजरा पहनकर लोका-लोकी गीतों के साथ सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया. पुरुषों द्वारा ढोल, मांदर और नगाड़ों की गूंज के साथ ‘गहदम झूमइर’ की तान छेड़ी गई. पारंपरिक लोकगीतों और धुनों से पूरा अखड़ा जीवंत हो उठा.

लोक गायक एवं रइसका बोधन बेदिया, भरत बेदिया, खोरठा की प्रोफेसर सुशीला कुमारी बेदिया, रूपन गोप, सुनीता देवी, धुरन बेदिया और शिवनारायण बेदिया ने विभिन्न पारंपरिक लोकगीतों और जनगीतों की जोरदार प्रस्तुति दी. इन लोकगीतों की लय, शब्द और ताल ने उपस्थित लोगों को भाव-विभोर कर दिया. सामूहिक गायन और नृत्य ने लोगों को मिल-जुलकर उत्सव मनाने तथा अपनी लोक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने की प्रेरणा दी.

लोकसंस्कृति के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश

‘गहदम झूमइर’ के माध्यम से प्रकृति, जंगल, नदियों और पर्यावरण संरक्षण तथा आदिवासी समाज के साथ प्रकृति के गहरे संबंध का संदेश दिया गया. यही करमा पर्व की मूल भावना भी है.

आयोजन में पारंपरिक कला और संस्कृति के प्रति युवाओं का विशेष जुड़ाव देखने को मिला. कार्यक्रम केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति, प्रकृति और अधिकारों के प्रति वैचारिक रूप से जागरूक करने का माध्यम भी बना. आयोजन स्थल पर उपस्थित लोगों के लिए खिचड़ी और चना की व्यवस्था की गई थी.

इस अवसर पर खोरठा की प्रोफेसर सुशीला कुमारी बेदिया, झारखंड जन संस्कृति मंच के राज्य पार्षद एवं संगीत शिक्षक नंदलाल दास, अफसर, मोतीलाल बेदिया, टुकुदास, पूर्व जिला परिषद सदस्य एवं ऐपवा नेत्री नीता बेदिया, भाकपा(माले) नेता अमोल घोषाल, नागेश्वर मुंडा, हीरालाल मुंडा, लालचंद बेदिया, रामवृक्ष बेदिया, मालती देवी, भुनेश्वर महतो, सुजाता देवी, हेमंती देवी, रीमा देवी, रंजना देवी, इलाचो देवी, मनवाइन देवी और धनमती देवी सहित अन्य लोगों को सम्मानित किया गया.

युवाओं की सहयोगी टीम का महत्वपूर्ण योगदान

महोत्सव को सफल बनाने में अक्षय, दयासागर, नीतेश, अमित, नीरज बेदिया, संजय, दुर्गा चरण, सोहित, नीरज, आनंद, अनिल, संतोष बेदिया, सिकंदर, कैलाश, योगेन्द्र, नन्हू, राजेश, सुनील, नरेश, राजू, कृष्णा, सुरेश, गौतम, अजित, रामदेव, करमा, मनोज, डीजन, सागर, अंशु, राकेश, प्रेम, विजेता, पंकज, अवधेश, उमेश, अंश, दिलीप, बैजनाथ और हरदेव की युवा सहयोगी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

अंत में उपस्थित लोगों ने समाज में सुख, शांति और समृद्धि तथा प्रकृति की रक्षा का संकल्प लिया. इस मौके पर बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, लोक कलाकार, बुद्धिजीवी, युवा और गणमान्य अतिथि मौजूद रहे.


26 September, 2026