(क्यूबा से लैटिन अमेरिका के राजनीतिक और सामाजिक मामलों की विशेषज्ञ लिविया रोड्रीगेज)
आज क्यूबा में जो जन-प्रतिरोध उठ खड़ा हुआ है, वह अब आर्थिक सवालों से आगे निकल गया है. यह अमेरिकी साम्राज्यवादी वर्चस्व के खिलाफ अपनी संप्रभु गरिमा बचाने की लड़ाई बन चुका है. 65 साल से जारी अमेरिका की नाकेबंदी को अब और सख्त कर दिया गया है, जिसे व्हाइट हाउस “राष्ट्रीय आपातकाल” का नाम देता है. हकीकत में यह एक धीमी लेकिन लगातार चल रही जंग का नया चेहरा है.
जैसा कि क्यूबा के राष्ट्रपति मिगेल डियाज-कानेल ने अपने हालिया भाषण में इस जंग का मकसद ऊर्जा की घेराबंदी के जरिये क्यूबा पर “वर्चस्ववादी विचारधारा” थोपना कहा है.
इस मुश्किल हालात में क्यूबा सरकार ने सिर्फ जवाबी कदम नहीं उठाए हैं, बल्कि जनता के जीवन को बचाने की एक ठोस रणनीति अपनाई है. इस टापू देश ने एक बहु-क्षेत्रीय आपात योजना लागू की है, जिसमें स्वास्थ्य, पानी की आपूर्ति और जरूरी चीजों जैसी बुनियादी सेवाओं को प्राथमिकता दी गई है. यह सब उस अभूतपूर्व “नौसैनिक अभियान” के बीच किया जा रहा है, जिसके तहत वॉशिंगटन क्यूबा के तेल टैंकरों को निशाना बना रहा है, तब यह योजना इलाज, पानी और जरूरी सामान जैसी बुनियादी सेवाओं को सबसे ऊपर रखती है. इसके तहत कुछ अभूतपूर्व कदम उठाए गए हैं – गैर-जरूरी कामों को अस्थायी तौर पर बंद किया गया है, हफ्ते के कामकाजी दिन घटाए गए हैं और घर से काम को बढ़ावा दिया जा रहा है. ये सारे कदम उस बड़ी लड़ाई का हिस्सा हैं, जिसे क्यूबा “सम्पूर्ण जनता की जंग” कहता है. आज इस जंग का मतलब है – ऊर्जा के हर अंश की बचत और ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता.
राष्ट्रपति मिगेल दियाज-कानेल ने दो टूक कहा कि महज एक साल में अक्षय ऊर्जा – यानी सौर और पवन ऊर्जा – का उत्पादन 3 फीसदी से बढ़ाकर 10 फीसदी करना कोई मामूली बात नहीं है. यह ट्रंप की उस कोशिश का ठोस जवाब है, जिसके तहत वे वेनेजुएला और मेक्सिको से तेल की आपूर्ति काटना चाहते थे. क्यूबा के लिए यह सिर्फ अंधेरे में किसी तरह जिंदा रहने की जद्दोजहद नहीं है, बल्कि उस जंजीर को तोड़ने की कोशिश है, जिसे अमेरिकी साम्राज्यवाद गुलाम बनाने के औजार की तरह इस्तेमाल करता है.
कूटनीतिक मोर्चे पर उप विदेश मंत्री कार्लास फर्नांदेज दे कोस्सियो के बयानों ने व्हाइट हाउस के मीडिया प्रचार का पर्दाफाश कर दिया है. डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्का रुबियो अपने देश के भीतर “बातचीत” की तस्वीर पेश कर झांसा दे रहे हैं, लेकिन कोस्सियो ने साफ कहा है कि कोई औपचारिक वार्ता नहीं हो रही है. क्यूबा के विदेश मंत्रालय (मिनरेक्स) के मुताबिक, केवल सुरक्षा और प्रवासन जैसे मसलों पर कुछ तकनीकी संदेशों का आदान-प्रदान जरूर हुआ है. मगर एक साफ लाल लकीर है, जिसे पार नहीं किया जा सकता – क्यूबा का संवैधानिक ढांचा किसी भी बातचीत की मेज पर नहीं रखा जा सकता.
उप विदेश मंत्री कार्लास फर्नांदेज दे कोस्सियो ने साफ लफ्जों में कहा, “क्यूबा न तो अमेरिका की कोई कॉलोनी है, न ही उसकी जागीर.” उन्होंने जोर देकर यह भी कहा कि किसी भी भविष्य की बातचीत की गुंजाइश तभी बनेगी, जब अमेरिका क्यूबा को तथाकथित आतंकवाद समर्थक देशों की काली सूची से हटाएगा और तीसरे देशों के साथ व्यापार पर टैरिफ लगाने की धमकियां देना बंद करेगा.
हमारे नजरिये से देखें तो क्यूबा में जो कुछ हो रहा है, वह उभरती बहुध्रुवीय दुनिया की एक बड़ी परीक्षा है. मेक्सिको का मदद का हाथ बढ़ाना हो या ब्रिक्स देशों का साथ – ये महज मानवीय सहायता की पेशकश नहीं हैं. ये उस प्रतिबंध मॉडल के खिलाफ आत्मरक्षा के कदम हैं, जिसे अगर क्यूबा में कामयाब होने दिया गया, तो हर उस देश पर लागू किया जाएगा जो अपने संसाधनों पर अपना हक जताने की हिम्मत करेगा.
जैसा कि क्यूबा के राष्ट्रपति मिगेल दियाज-कानेल ने ठीक ही कहा है, आज क्यूबा की क्रांति की खूबसूरती इस बात में है कि वह चुनौती का सामना करने की ताकत रखती है – और मुश्किलों को जनता की समझदारी और एकता की सामूहिक ताकत में बदल देती है.