वर्ष 34 / अंक-33 / मैकाले पर मोदी : इतिहास की आड़ में एक और खेल

मैकाले पर मोदी : इतिहास की आड़ में एक और खेल

मैकाले पर मोदी : इतिहास की आड़ में एक और खेल

कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक बयान में मैकाले की शिक्षा नीति पर हमला बोलते हुए कहा कि ‘मैकाले की औलादों’ का युग खत्म होने वाला है और भारत ‘गुलामी की मानसिकता’ से मुक्त हो जाएगा. सुनने में यह वाक्य जितना क्रांतिकारी लगता है, सत्ता की राजनीति में अक्सर ऐसे ही सबसे जोरदार नारे सबसे खोखले इरादों को ढंकने का काम करते हैं. क्या सचमुच मोदी और संघ औपनिवेशिक विरासत से नाता तोड़ना चाहते हैं? या फिर यह नारा भी वही पुराना खेल है – इतिहास की आड़ में विरोधियों पर हमला करना, जनता को बांटना और असली मुद्दों से ध्यान हटाना?

युवा इतिहासकार रूचिका शर्मा ने बिल्कुल सही सवाल उठाया है कि जिस वक्त मोदी ‘मैकाले की औलादों’ का राग अलापते हैं, उसी वक्त वे ब्रिटेन के 11 विश्वविद्यालयों को भारत में अपना कैंपस खोलने की अनुमति देते हैं. इसके पहले, 2023 में यूजीसी ने ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति दी है. तो सवाल यह है कि अगर विदेशी मॉडल ‘गुलामी’ है, तो फिर इन संस्थानों को भारत में बुलाने की इतनी बेचैनी क्यों? यह कैसी मुक्ति है? यह दोमुंही राजनीति की जीती-जागती मिसाल नहीं तो और क्या है?

मोदी सरकार के किसी भी सुधार पर नजर डालिए, उसका अंतर्य साफ दिखता है. हाल ही में श्रम कानूनों को ‘औपनिवेशिक’ बताकर जो संशोधन किए गए, वे मजदूरों की रीढ़ तोड़ देने वाले हैं. यह संशोधन मजदूरों के अधिकार छीनने, उन्हें 19वीं सदी की दासता में धकेल देने और कॉरपोरेटों को सूबेदार बना देने की खुली साजिश है. भाजपा-आरएसएस का जो ‘स्वदेशी’ है, उसके केंद्र में न लोकतंत्र है, न बराबरी, न सामाजिक न्याय – उसके केंद्र में है आक्रामक छद्म राष्ट्रवाद और देश की संपत्तियों को अडानी-अंबानी के हवाले कर देने की बेचैनी; शिक्षा को भी देशी-विदेशी कॉरपोरेटों की चौखट पर रख आना.

और रही बात ‘गुलामी की मानसिकता’ से मुक्ति की – तो ट्रंप के सामने पूरी सरकार का स्वर ऐसा हो जाता है कि मानो वे किसी मालिक के सामने खड़े हों. दुनिया के सामने यह सरकार जिस तरह घुटनों पर बैठ जाती है, वह किसी भी तरह ‘मुक्ति’ का संकेत नहीं देता, बल्कि देश की संप्रभुता को गिरवी रख देने जैसा होता है. ‘गुलामी’ का विरोध करते हुए मनुस्मृति जैसी दस्तावेजी गुलामी को ही देश का संविधान बनाने की बात कही जाती है – वह मनुस्मृति जिसके मूल में भेदभाव, स्त्री-द्वेष, जातिगत दासता और शोषण की व्यवस्था है. अगर यही ‘स्वदेशी’ है तो यह औपनिवेशिकता की आड़ भर लेती है, काम कुछ और ही कर रही है.

बहरहाल, इस बहाने हमें कुछ ऐसे सवालों पर चर्चा करने का अवसर मिल गया है, जिन्हें आज बिल्कुल नए नजरिए से देखने की जरूरत है. मोदी या आरएसएस को खाद-पानी यूं नहीं मिलता – वे समाज की सड़ी-गली चीजों को ही एक नया स्वर देते हैं, जैसे मैकाले पर. हम सबने कभी न कभी इस मुहावरे का इस्तेमाल किया ही है. इतिहास की कक्षाओं में हमें बताया जाता था कि मैकाले ऐसी शिक्षा नीति चाहता था, जिसमें तन से भारतीय तो रहें, लेकिन मन पूरी तरह अंग्रेजों जैसा हो.

यह शत-प्रतिशत सच है कि अंग्रेजी राज के हर सुधार उसकी साम्राज्यवादी योजना के ही हिस्से थे, लेकिन इतिहास में अवचेतन शक्तियां भी काम करती हैं, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि इतिहास अतीत की नहीं, बल्कि वर्तमान की समस्याओं को समझने के लिए अतीत की नई समझदारी है. आरएसएस ब्रिगेड अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ऐसे ही आज की राजनीति खेलता है. जैसे, अभी हाल में उसने ‘वंदे मातरम’ पर एक बेकार की बहस खड़ा करने की कोशिश की, क्योंकि बंगाल में चुनाव सामने है. ऐसे में, परिवर्तन चाहने वाली ताकतों को भी अपने अतीत को नए सिरे से समझना होगा, उसकी नई व्याख्या करनी होगी ताकि हम आज की चुनौतियों का सामना कर सकें.

शुरुआती दौर के अंग्रेज अधिकारी भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक नीतियों में कोई बदलाव नहीं चाहते थे. हालांकि बाद में इन सवालों पर अंग्रेजी प्रशासकों के बीच मतभेद के तथ्य मिलते हैं और उसी के बाद कई शैक्षणिक योजनाएं बनीं. 1813 का चार्टर भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रस्थान बिंदु माना जाता है, जब पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी ने सार्वजनिक शिक्षा के लिए 1 लाख रु. खर्च करने का वादा किया. 1835 में मैकाले, 1854 के वुड डिस्पैच और 1882 में हंटर जैसे शिक्षा आयोग गठित हुए. बहरहाल, अंग्रेजों की मंशा चाहे जो रही हो, लेकिन अंग्रेजी राज के संपर्क में आने के बाद भारत में नवजागरण की आहट हुई. यह भी इतिहास का एक सच है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. यह समझ बनी कि भारत की सबसे बड़ी विडंबना आधुनिक शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान से कट जाना है. भारतीय नवजागरण के दूतों ने आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में इसकी भूमिका की तलाश करनी शुरू की. क्या इस सच्चाई से मोदी मुंह मोड़ लेना चाहते हैं?

अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीय युवाओं को विचारों की ऐसी समष्टि से परिचित कराया जिसने परंपरागत व्यवस्था की कई बुनियादी मान्यताओं को खुलकर चुनौती दी. क्या आरएसएस-भाजपा को इसी से डर है? क्या वे दासता पर आधारित समाज ही चाहते हैं? 1893 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारत में ऐसी जनता को जन्म लेते देखा जो विभिन्न मुद्दों पर सार्वजनिक बहस में रुचि लेने लगी थी. दूसरे शब्दों में, एक ऐसा नागरिक समाज जन्म ले रहा था जो अपने अधिकारों के प्रति मुखर हो रहा था. यह आकस्मिक नहीं था कि भारतीय नवजागरण के नेताओं – राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर तथा अन्य कई लोगों ने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन इसलिए किया क्योंकि वे समझ चुके थे कि पुरानी पद्धति से भारत आधुनिक विश्व से नहीं जुड़ सकता. उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा को नए विचार, विज्ञान और प्रगति का द्वार माना.

जनशिक्षा वर्नाकुलर में देने की आवाज उस समय भी जोर से उठ रही थी, और 1882 का हंटर आयोग इस दिशा में एक सकारात्मक कदम था. 1825 में राजा राममोहन राय ने ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों के अनुवाद के लिए एक सोसाइटी स्थापित की. 1838 में सामान्य ज्ञान की प्राप्ति हेतु एक सोसाइटी बनाई गई. महेंद्र लाल सरकार ने 1876 में इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस की स्थापना की. 1861 में बनारस डिबेटिंग क्लब, 1864 में सैयद अहमद खां द्वारा अलीगढ़ साइंटिफिक सोसाइटी और 1868 में बिहार साइंटिफिक सोसाइटी – ये सब इसी प्रक्रिया का हिस्सा थे.

यही वह दौर था जब पहली बार दलित, महिलाएं और वंचित समुदाय शिक्षा तक पहुंचने लगे. सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेखए ज्योतिबा फुले, पंडिता रमाबाई और रूकैया बेगम जैसे सुधारकों ने अंग्रेजी और आधुनिक शिक्षा को सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में इस्तेमाल किया. लड़कियों के लिए स्कूल खोले जाने लगे. डॉ. अंबेडकर का नाम लेना भी यहां उचित होगा, जिन्होंने इस दिशा में बड़े महान काम किए. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि यदि आधुनिक शिक्षा की शुरुआत न हुई होती तो वंचित समुदायों को शिक्षा का अधिकार मिल भी पाता?

भारतीय राष्ट्रवाद का आंदेलन जैसे-जैसे आगे बढ़ा, उसमें ‘देशी भाषा में शिक्षा’ का जोर भी बढ़ा. यह जरूरी भी था, क्योंकि अंग्रेजी में शिक्षा पाने वाला वर्ग बहुत छोटा था और उन्हें विशेषाधिकार भी हासिल था, लेकिन भारतीय राष्ट्रवाद अपने अंतर्य में बेहद जटिल और बहुविध था. इस देश में असंख्य बोलियां और भाषाएं हैं. ऐसे में किसी एक भाषा का वर्चस्व कैसे थोपा जा सकता था? इसीलिए आजादी के बाद तय हुआ कि देशी भाषाओं को बढ़ावा दिया जाए और अंग्रेजी को संपर्क भाषा के रूप में बनाए रखा जाए. आजादी के बाद भारत में शिक्षा के क्षेत्रा में राधाकृष्णन आयोग (1948), मुदालियार आयोग (1952) और कॉमन स्कूल सिस्टम (1966) जैसी कई नीतियां बनीं. इसलिए, आज के भारत की शिक्षा को पूरी तरह मैकाले की देन बताना इतिहास से खिलवाड़ है. लेकिन यह सवाल भी मौजूं है कि भारत की शिक्षा अपने मूल्यों से लगातार भटकती क्यों गई? क्या हम भूल सकते हैं कि संविधान प्रदत्त शिक्षा के अधिकारों से विश्वासघात करते हुए 1990 के बाद शिक्षा में निजीकरण की प्रक्रिया की शुरूआत कर दी गई. निजी विद्यालयों की बाढ़ आ गई, सरकारी स्कूलों को बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया गया. बिहार को ही देख लें – पचास साल पहले सरकारी विद्यालयों की क्या स्थिति थी और आज क्या है?

लेकिन, मोदी सरकार तो शिक्षा के निजीकरण की दिशा में अब तक की सभी सरकारों से गुणात्मक रूप से आगे बढ़कर काम कर रही है. नई शिक्षा नीति 2020 को मोदी सरकार व्यापक, आधुनिक और भविष्यमुखी बताती है, लेकिन इस नीति की काफी गंभीर आलोचनाएं सामने आई हैं. उन आलोचनाओं पर एक नजर डाल ली जाए.

पहली, इसका निर्माण व्यापक लोकतांत्रिक विमर्श के बिना हुआ; शिक्षकों, विश्वविद्यालयों, राज्यों और सामाजिक संगठनों से परामर्श सीमित रहा, जिससे यह नीति केंद्रीकृत दृष्टिकोण का उत्पाद लगती है. दूसरा, बढ़ता निजीकरण. पीपीपी मॉडल और स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका के पीछे शिक्षा के बाजारीकरण का मूल मकसद है. इससे सरकारी स्कूल और विश्वविद्यालय और कमजोर होंगे, और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एक बाजार-निर्भर वस्तु बन जाएगी. फीस नियंत्रण, नियमन और समान अवसर की बात स्पष्ट नहीं है. तीसरी आलोचना-भाषा नीति को लेकर है. ‘तीन-भाषा फॉर्मूले’ को लागू करना कई राज्यों में व्यावहारिक रूप से कठिन है. अंग्रेजी के वैश्विक महत्व और जरूरत के बीच संतुलन की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं दी गई है. नीति का एक और पहलू यह है कि इसमें शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य – समानता, सामाजिक न्याय, आलोचनात्मक सोच, लोकतांत्रिक मूल्य – पर वह स्पष्टता नहीं है जिसकी जरूरत है. शिक्षा का मानवीय और सामाजिक पक्ष काफी कमजोर कर दिया गया है. कुल मिलाकर नई शिक्षा नीति निजीकरण, केंद्रीकरण और बाजार-उन्मुखी सुधारों पर टिकी है. यह शिक्षा को अधिकार मानने की बजाए प्रतिस्पर्धी बाजार की वस्तु बना देता है.

इसलिए, समस्या औपनिवेशिक काल में नहीं, बल्कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली की असमानताओं में है. यदि प्रधानमंत्री सचमुच ‘गुलामी की मानसिकता’ तोड़ना चाहते, तो उन्हें सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत करना चाहिए था. हमें खुशी होती कि सरकार कॉमन स्कूल सिस्टम लागू करने की बात करती. कोठारी शिक्षा आयोग ने भारतीय शिक्षा के इतिहास में सबसे दूरदर्शी और लोकतांत्रिक प्रस्ताव दिया था. इसका मूल विचार था कि हर बच्चे – अमीरी-गरीबी, जाति, धर्म और वर्ग – की परवाह किए बिना, सबको समान गुणवत्ता की शिक्षा उपलब्ध हो, और सरकारी स्कूल ही शिक्षा का मजबूत आधार बनें. लेकिन यह प्रस्ताव आज तक लागू नहीं हो सका. क्या आरएसएस-भाजपा के किसी नेता के मुंह से इसे लागू करने की कभी भी बात सुनते हैं? नहीं. उनका एक और राग है – पूरे देश में हिंदी थोप दी जाए. क्या तमिलनाडु या केरल जैसे राज्य इसे स्वीकार करेंगे? ढहती सरकारी शिक्षा और तेजी से बढ़ती निजी फीस के बीच असल गुलामी किसकी है – मैकाले की या बाजार की?

प्रधानमंत्री इतिहास से खेलते हैं और इसकी आड़ में शिक्षा के दरवाजे अपने देशी-विदेशी कॉरपोरेटों के लिए खोल देना चाहते हैं. वि-औपनिवेशिकरण के नाम पर हर मिले अधिकारों को खत्म कर देना चाहते हैं. इस देश को असली जरूरत है – समावेशी, वैज्ञानिक, आधुनिक और बहुभाषी शिक्षा व्यवस्था की, जो हर बच्चे को अवसर दे सके. गुलामी की मानसिकता तोड़नी है तो शिक्षा को अधिकार बनाना होगा – न कि छद्म राष्ट्रवाद का हथियार.

13 December, 2025