15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 103 मिनट लंबे स्वतंत्रता दिवस भाषण में जिस नए जीएसटी ढांचे का जिक्र किया था, उसे अब सरकार जीएसटी 2.0 या नेक्स्ट-जनरेशन जीएसटी सुधार बता रही है. सरकार के प्रवक्ता और समर्थक इसे ट्रंप के टैरिफ युद्ध से अलग बताते हैं और कहते हैं कि यह उनकी अपनी योजना है. लेकिन असलियत यह है कि ट्रंप के टैरिफ वार ने भारत के विदेशी व्यापार को गहरी चोट दी है और सरकार को मजबूरन घरेलू अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना पड़ रहा है. यही वजह है कि भाजपा और आरएसएस फिर से पुराने ‘स्वदेशी’ नारे को उछाल रहे हैं और इसे जीएसटी सुधारों के कथित बूस्टर डोज के साथ जोड़कर घरेलू बाजार की ताकत बताने में लगे हैं.
2017 में विनाशकारी नोटबंदी के तुरंत बाद बिना तैयारी के जीएसटी लागू करना भारत के छोटे कारोबारियों और मजदूर-गरीब जनता के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हुआ. इसने आम लोगों की रोजी-रोटी, घर-खर्च और बचत पर बोझ डाला और राज्यों के हिस्से को काटकर संघीय ढांचे को कमजोर कर दिया. वैसे भी अप्रत्यक्ष टैक्स हमेशा गरीब पर ज्यादा भारी पड़ता है. ऊपर से सरकार ने इसे कई स्लैब में और जरूरत की चीजों व सेवाओं पर भी ऊंचे टैक्स के साथ लागू कर दिया, जिससे आम जनता की कमर और टूट गई. यही वजह है कि शुरू से ही लोग मांग कर रहे हैं कि जरूरी सामान पर टैक्स कम हो, मल्टी-स्लैब सिस्टम खत्म हो, जटिल नियम आसान हों, और राज्यों को ज्यादा अधिकार व हिस्सा मिले ताकि वित्तीय संतुलन बहाल हो सके. लेकिन सरकार ने इन मांगों की कोई सुनवाई कभी नहीं की.
जीएसटी 2.0 के तहत सरकार ने आखिरकार 12% और 28% के स्लैब को खत्म कर दिया है, जिससे यह प्रणाली मुख्य रूप से दो स्तरों वाला हो गया है – 5% और 18% टैक्स. बेशक, कुछ लग्जरी सामानों और सिगरेट-तंबाकू जैसी सेहत के लिए हानिकारक चीजों पर 40% का भारी टैक्स रखा गया है. नए संस्करण से जीएसटी पहले की तुलना में कुछ आसान हुआ है और कई चीजों पर टैक्स दरें कम हुई हैं. यह आम जनता की एक पुरानी मांग थी. देर से ही सही, आंशिक रूप से इसे माना गया है, इसलिए इसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि टैक्स में कमी का असली लाभ आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा भी या नहीं. अगर जिन सामानों पर टैक्स घटा है, उनकी कीमतें साथ-साथ बढ़ा दी गईं, तो जनता को कोई फायदा नहीं मिलेगा.
सरकार का अनुमान है कि इन सुधारों से टैक्स राजस्व में करीब 48,000 करोड़ रुपये की कमी आएगी. मान लीजिए यह पूरा पैसा घरेलू खपत बढ़ाने में वापस आ भी जाए, तब भी यह ट्रंप के आक्रामक टैरिफ हमलों से भारत के निर्यात को हुए लगभग 4.4 लाख करोड़ रुपये के भारी नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा. सच तो यह है कि यह टैरिफ सिर्फ निर्यात पर ही नहीं, बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट देंगे. निर्यात से जुड़े श्रम-प्रधान सेक्टरों में बड़े पैमाने पर रोजगार खत्म होंगे, मजदूरों की आमदनी गिरेगी और उनकी खपत भी घटेगी. इससे भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था में मंदी और गिरावट का लंबा सिलसिला शुरू होगा. वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था को सहारा तभी मिलेगा जब रोजगार पैदा करने वाले निवेश बढ़ें, सामाजिक क्षेत्रों में सरकारी खर्च बढ़े और गरीबों व मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति मजबूत हो.
इस समय सबसे जरूरी है कि भारत की राजस्व वसूली की नीति की बुनियादी दिशा बदली जाए – यानी गरीब और मध्यम वर्ग पर बोझ डालने के बजाय अमीरों पर टैक्स लगाना. फिर क्यों सरकार आज तक किसी भी तरह का वेल्थ टैक्स लगाने से बचती रही है, जबकि देश की अर्थव्यवस्था में कुल संपत्ति का 40% सिर्फ 1% अमीरों के हाथ में है और आधी आबादी के पास सिर्फ 3% संपत्ति है. कॉरपोरेट सेक्टर को दी गई भारी कर छूट और कर्ज माफी के अलावा भी सरकार कॉरपोरेट टैक्स क्यों घटाती रहती है? 2014 में भारत के प्रत्यक्ष कर राजस्व में व्यक्तिगत आयकर का हिस्सा 38% था, जबकि कॉरपोरेट करों का 62% था. लेकिन मोदी राज के इन दस सालों में यह अनुपात पूरी तरह उलट गया है – व्यक्तिगत आयकर अब 53% है जिसका बोझ आम वेतनभोगी और मध्यवर्गीय करदाताओं पर है, जबकि कॉरपोरेट टैक्स घटकर 47% पर आ गया है.
ट्रंप के टैरिफ युद्ध ने मोदी सरकार को विदेश नीति में भी बड़े बदलाव करने पर मजबूर कर दिया. अमेरिकी दबाव में मोदी सरकार पहले भारत की भूमिका को ब्रिक्स (BRICS) और एससीओ (SCO) जैसे मंचों में कमजोर कर रही थी. लेकिन जब ट्रंप प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर अचानक 50% तक का टैरिफ थोप दिया, तो नरेंद्र मोदी को मजबूरन तियानजिन में हुई एससीओ बैठक में शामिल होना पड़ा. यह चीन की उनकी सात साल में पहली यात्रा थी. इसी मौके पर उन्होंने 2020 के चीन-भारत सैन्य तनाव के बाद पहली बार चीन के साथ नई द्विपक्षीय बातचीत शुरू करने की कोशिश भी की. लेकिन विडंबना देखिए – तियानजिन घोषणा-पत्र पर दस्तखत करके, जिसमें गाजा में फिलिस्तीनियों पर जारी जनसंहार और अमेरिका-इस्राइल की ईरान पर सैन्य कार्रवाई की निंदा की गई थी, लौटते ही मोदी सरकार ने भारत में इजरायल के धुर-दक्षिणपंथी वित्त मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच की मेजबानी की. स्मोट्रिच वही शख्स है जिसे ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और नॉर्वे जैसे देशों ने फिलिस्तीनियों के खुलेआम जातीय सफाए (एथनिक क्लीनजिंग) की वकालत करने के कारण बैन कर रखा है.
भारत की विदेश नीति यूं ढुलमुल और दोमुंही नहीं हो सकती जो मुख्य रूप से अमेरिका-इजरायल धुरी के आगे आत्मसमर्पण के इर्द-गिर्द घूमती हो, जबकि अमेरिकी दबाव को संतुलित करने का प्रयास करने के लिए रूस और चीन के साथ तात्कालिक सौदे कर ले. वास्तव में भारत को एक ऐसी स्वतंत्र विदेश नीति की जरूरत है जो साफ तौर पर साम्राज्यवाद-विरोधी हो और एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे दक्षिणी दुनिया के देशों के साथ बराबरी और भरोसे पर टिके मजबूत सहयोग पर आधारित हो. आज के बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात ने मोदी सरकार को मजबूरी में अपनी आर्थिक और विदेश नीतियों में कुछ आंशिक बदलाव करने पर मजबूर कर दिया है. लेकिन यही वक्त है जब भारत की प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताकतों को संघर्ष को और तेज करना होगा ताकि मौजूदा साम्राज्यवादी और कॉरपोरेटपरस्त नीतियों को पूरी तरह खारिज किया जा सके और भारत की नीतियों को जनता की जरूरतों और अधिकारों के लिए नई दिशा दी जा सके.