19 जनवरी 2026 को आदिवासी एकता परिषद, भूमि सेना, कष्टकरी संघटना, वाढवल बंदरगाह विरोधी समिति, सभी मछुआरा संगठन, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, महाराष्ट्र जन आंदोलन मंच, मुरबे बंदरगाह व टेक्सटाइल पार्क विरोधी संगठन, पर्यावरण दक्षता संघर्ष समिति, महाराष्ट्र व अखिल भारतीय मछुआरा समिति, नेशनल फिशवर्कर्स फोरम, सागर कन्या मंच, ठाणे जिला मछुआरा मध्यवर्ती सहकारी संघ आदि कई जन संगठनों ने मिलकर एक भव्य मार्च आयोजित किया.
इस मार्च में आदिवासी संघर्ष मोर्चा के सचिव का. अशोक तांडेल, कमलाकर बालशी, प्रकाश मोरे, प्रभाकर मोरे, दिलीप धोधड़े, रामू सातवी, अजय मोरे, अनुसूया चाकर, मंजू बाबर, निलेश धोधड़े, सुभाष अनंत सरप, राज्या गडग, जयवंत पाटील, कैलास दुमाडा, का. रामदास लिलके, का. रुपाली लिलके सहित कई आदिवासी नेताओं ने भाग लिया. मुंबई से भाकपा(माले) लिबरेशन के केंद्रीय कमिटी सदस्य का. विजय कुलकर्णी व का. श्याम गोहिल, भाकपा(माले) लाल निशान के मुंबई सचिव का. आदेश बनसोडे़, सुभांगिनी, महाराष्ट्र जन आंदोलन मंच के का. सरखेत सहित अन्य कार्यकर्ता उपस्थित थे.
‘एक ही जिद! वाढवल बंदर परियोजना रद्द करो! अरावली पर्वत बचाओ! अंडमान-निकोबार बचाओ! नाणार-बारसू बचाओ! केलवे-माहिम टेक्सटाइल परियोजना रद्द करो! समुद्री विमानतल रद्द करो! चौथी मुंबई रद्द करो!’ का नारा लगाते हुए लगभग 40 हजार से अधिक लोगों का यह भव्य एल्गार मार्च जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचा. इसमें महिलाओं की संख्या बहुत अधिक थी. लोगों के चेहरों पर मोदी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश दिखाई दे रहा था.
19 जून 2015 को राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी कर पालघर जिले के 107 गांवों के समूह को ‘चौथी मुंबई’ में शामिल किया. जबकि 18 नवंबर 2025 को राजस्व विभाग ने ग्राम पंचायत के ‘नो आब्जेक्शन प्रमाणपत्र (एनओसी)’ को बाध्यकारी न होने की अधिसूचना जारी कर ग्राम सभा व ग्राम पंचायतों को पेसा कानून के तहत मिले निर्णय लेने के अधिकार को असंवैधानिक रूप से छीन लिया. विकास के नाम पर पूंजीपतियों व कॉर्पारेट कंपनियों के लिए मुरबे व वाढवल बंदर परियोजना को आदिवासी, किसान व मछुआरों के सिर पर जबरदस्ती थोपने का प्रयास जारी है.
वाढवल बंदर के 10 किमी त्रिज्या क्षेत्र में वाढवण, आगर, नरपड़, डहाणू, धाकटी डहाणू, गुंगवाड़ा, तारापूर, वरोर, दांडेपाड़ा, चिंचणी, घिवली, कंबोडे, ताडियले, धुमकेत, अब्राम, आसनगाव व माटगाव आदि गांवों में लगभग 5333 घर विस्थापित होंगे. इसके अलावा कम से कम 21 हजार मछुआरे बेरोजगार हो जाएंगे. बंदरगाह से माल ढुलाई के लिए 12 किमी लंबी व 60 मीटर चौड़ी रेलवे लाइन होगी. परियोजना के लिए 12 किमी लंबी व 120 मीटर चौड़ी सड़क होने से 21 गांवों में 10641 घर व लगभग 50 हजार लोग विस्थापित होंगे.
विशेष बात यह है कि चिंचणी-तारापुर तटवर्ती गांवों में ‘डाई मेकिंग’ नामक स्वावलंबी घरेलू उद्योग है, जिसमें हजारों लोगों को रोजगार मिलता है. यह उद्योग बंद हो जाने से हजारों भूमिपुत्र बेरोजगार हो जाएंगे. इस परियोजना में लिक्विड टर्मिनल, रो-रो टर्मिनल, कोस्टगार्ड टर्मिनल, बहुद्देशीय टर्मिनल सहित कुल 19 टर्मिनल बनाए जाएंगे.
वाढवल बंदरगाह परियोजना का विस्तार यानी वॉटर फ्रंट के लिए 15363 हेक्टेयर, समुद्र में भराव डालकर बनाई जाने वाली जमीन 1484 हेक्टेयर, बर्थ क्षेत्र 63.5 हेक्टेयर. यानि कुल क्षेत्रफल 16906 हेक्टेयर है. इस भराव से मानसून का पानी जमा होगा जिससे बागायती खेती को नुकसान होगा, लहरों से खेत की जमीन धंस जाएगी, तटवर्ती व खाड़ी के किनारे के गांवों में पानी घुसने की संभावना बढ़ेगी.
बंदरगाह के भराव के लिए 7 करोड़ टन पत्थर व मिट्टी और 20 करोड़ घन मीटर रेत इस्तेमाल होगी. यह पत्थर व मिट्टी 20 किमी दूर स्थित नानिवली, महागांव, गारगाव, खानिवडे, बोरशेती, नागझरी, किरात व गीमोली आदि गांवों के पहाड़ों व आसपास से लाया जाएगा. इससे पहाड़, जल स्रोत, जैव विविधता व जंगल का बड़े पैमाने पर विनाश होगा. पूरे डहाणू तालुका पर पर्यावरण का विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा.
वाढवल से 22 किमी दूर स्थित सुर्या नदी से 2.1 करोड़ लीटर पानी इस्तेमाल होगा. इससे पालघर क्षेत्र में पानी की कमी पैदा होगी. सर्दियों में रबी फसलों के लिए नहरों से मिलने वाले पानी पर असर पड़ेगा. जिले की खेती वर्षा पर निर्भर रह जाएगी व किसानों को सूखे का सामना करना पड़ेगा.
इस परियोजना से पालघर का शहरीकरण होगा. शहर से निकलने वाला मल नदियों, कुओं व समुद्र के जल को प्रदूषित करेगा. पानी का अत्यधिक उपयोग होगा. प्रकृति के रक्षक स्थानीय भूमिपुत्र, किसान, मछुआरे व आदिवासियों को उनकी पीढ़ियों से चले आ रहे गांवों से उजाड़कर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कॉर्पारेट पूंजीपतियों को सौंपने की यह चाल है. दूसरी ओर, चार श्रम कानून स्थानीय भूमिपुत्रों को ठेका मजदूरों की फौज बनाकर मजदूरी के लिए लाचारी-गुलामी थोपेंगे.
वाढवल के लिए अतिरिक्त बिजली तारापूर विद्युत केंद्र से विशेष लाइन डालकर लाई जाएगी. इसके लिए अडानी को तारापूर में निजी बिजली परियोजना बनाने की मंजूरी मिलने की संभावना है. वाढवल परियोजना के लिए अडानी, रिलायंस, कैनकोर, बॉस्कॉलिस, लाई, वान हाई, हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन, एवरग्रीन, गल्फटेनोर आदि कंपनियों के साथ टेंडर प्रक्रिया के लिए समझौता हो चुका है.
यह परियोजना पिछले दो दशकों से विरोध का सामना कर रही है. स्थानीय लोग कहते हैं कि, ‘जमीन का मुआवजा, मछुआरों को प्रति नाव कितने पैसे, कितनी नौकरियां स्थायी या ठेके पर – ये हमारे मुद्दे नहीं हैं. हमारे सवाल हैं – हमारी भूमि, हमारा प्राकृतिक निवास, हमारी संस्कृति, भाषा, अबाधित स्वतंत्रता व आने वाली पीढ़ियों का सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार अबाधित रखना. समुद्र पर अधिकार व जमीन की मालिकी पीढ़ियों से हमारी है. एक बार गई तो कभी वापस नहीं मिलेगी. इसे बचाने के लिए यह संघर्ष है.’
पहले की सरकार ने नियुक्त की गई जनप्रतिनिधि समिति ने इन विनाशकारी परियोजनाओं के जनता के विरोध व पर्यावरण पर प्रभाव को सरकार के सामने रखा था. लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने उस समिति को भंग कर विकास के नाम पर अडानी सहित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कॉर्पारेट कंपनियों के सामने सिर झुका लिया. गुजरात व मुंबई क्षेत्र को ‘चौथी मुंबई’ के नाम से कॉर्पारेट पूंजी खेलने के लिए, जल-जंगल-जमीन की लूट कर कॉर्पारेट के हवाले करने की यह चाल है. पालघर की जनता के पास सड़क पर उतरकर लड़ना ही एकमात्र विकल्प है.
का. कुलकर्णी व का. श्याम गोहिल ने कासा-चारोटी, ऐना दाभोण से तारापूर क्षेत्र के कई गांवों में जाकर आदिवासियों से प्रत्यक्ष संवाद किया. स्पीड रेल, सुपरफास्ट हाईवे परियोजनाओं से उजाड़े गए गांव, जंगल व पानी आपूर्ति पर प्रभाव, पुनर्वास व घर-जमीन की तुच्छ भरपाई पर चर्चा की. बाद में चार श्रम कानूनों के बारे में जानकारी दी व 12 फरवरी 2026 के अखिल भारतीय मजदूर हड़ताल में भाग लेने का आह्वान किया.