बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान राज्य के सबसे ज्वलंत सवालों – बुलडोजर कार्रवाई, भूमि-अधिकार, बिहार की बेटियों पर बढ़ती हिंसा, रोजगार और शिक्षण संस्थानों में भेदभाव – को लेकर गेट पब्लिक लाइब्रेरी में खेग्रामस के बैनर से एक सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों से बुलडोजर के सताए गरीबों और खेग्रामस कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया.
सम्मेलन के मुख्य वक्ता भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला और निर्णायक जनांदोलन छेड़ने का आह्वान किया. उन्होंनें कहा कि 20 वर्षों पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘भूमि सुधार’ के वायदे के साथ अपनी शुरूआत की थी और आज वे गरीबों-भूमिहीनों पर बुलडोजर चलवा रहे हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने “माफिया पर बुलडोजर” का नारा दिया लेकिन उसका इस्तेमाल गरीबों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ किया. पूरे देश में इसे एक खतरनाक मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है. लेकिन देश बुलडोजर से नहीं, संविधान और कानून से चलता है.
उन्होंने बताया कि जहां-जहां बुलडोजर का आतंक फैलाया जा रहा है, वहां-वहां लाल झंडा उसके खिलाफ संघर्ष की अगुआई कर रहा है. हमारे कई साथी जेल गए, जेल से बाहर आए. यह संघर्ष अब रुकने वाला नहीं है.
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से “घुसपैठिया” और भूमि से “अतिक्रमणकारी” हटाने के नाम पर गरीबों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि सारी जमीन और सारे संसाधन अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट घरानों के हवाले किए जा रहे हैं. जो गरीब पहले पलायन करने को मजबूर थे, आज उन्हीं को विकास और रोजगार के नाम पर उजाड़ा जा रहा और विकास का दुश्मन बताया जा रहा है.
उन्होंने आजादी के आंदोलन और जमींदारी उन्मूलन की परंपरा को याद करते हुए कहा गया कि गरीबों को जमीन वाम दलों के आंदोलन की लड़ाई से ही मिली है. आज की लड़ाई साफ तौर पर बुलडोजर बनाम भूमि-अधिकार की लड़ाई है. यह आर-पार की लड़ाई है. उन्होंने इस बुलडोजर राजनीति के खिलाफ जन-प्रतिरोध का संकल्प लेकर सम्मेलन से लौटने का आह्वान किया.
उन्होंने कहा कि मनरेगा योजना महात्मा गांधी के नाम पर बनी थी, जिनका कहना था कि किसी भी नीति की कसौटी हिंदुस्तान के सबसे गरीब की खुशहाली होनी चाहिए. 2013 में भूमि अधिग्रहण कानून बना, लेकिन भाजपा सरकार ने सत्ता में आते ही भूमि अधिग्रहण कानून और मनरेगा – दोनों पर हमला शुरू कर दिया. आज “विकसित भारत” के नाम पर मनरेगा को लगभग खत्म करने की साजिश हो रही है. रोजगार के बिना भारत विकसित कैसे होगा?
उन्होंने स्पष्ट किया कि जमीन और आवास का अधिकार, जबरिया भूमि अधिग्रहण पर रोक और रोजगार की कानूनी गारंटी – आज संघर्ष के केंद्रीय मुद्दे हैं. लेबर कोड के खिलाफ मजदूर संगठनों द्वारा आहूत हड़ताल को सम्मेलन ने पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की.
उन्होंने नीट छात्रा बलात्कार-हत्याकांड का उल्लेख करते हुए कहा कि एक तरफ बुलडोजर और दूसरी तरफ महिलाओं व बच्चियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा – यही भाजपा राज की पहचान बन चुकी है. इन दोनों के खिलाफ समान ताकत और एकजुटता के साथ लड़ाई लड़ने की जरूरत है.
का. दीपंकर ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव के खिलाफ बनाए गए नियम कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए थे. 2012 में कानून बना, 2016 में रोहित वेमुला और 2019 में पायल तड़वी की संस्थानिक हत्याएं हुईं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर यूजीसी ने नियम बनाए, लेकिन भाजपा-प्रायोजित आंदोलनों के दबाव में उन्हीं नियमों पर रोक लगा दी गई. अपने को अति-पिछड़ों का हितैषी कहने वाली मोदी सरकार और यूजीसी – दोनों की इस पर चुप्पी बेहद खतरनाक है.
कहा कि देश में जब-जब बराबरी के लिए कानून बने, कुछ लोगों ने उसका विरोध किया, लेकिन बराबरी की आवाज को कभी दबाया नहीं जा सका. इस बार भी यह लड़ाई रुकेगी नहीं और जीत जनता की होगी.
सम्मेलन को विधायक संदीप सौरभ, ऐपवा महासचिव मीना तिवारी, ऐक्टू नेता आरएन ठाकुर, किसान महासभा के नेता उमेश सिंह, अशरफी सदा, पूर्व विधायक मंजू प्रकाश, एमएलसी शशि यादव, मनोज मंजिल, बिरेंद्र गुप्ता, महबूब आलम, खेग्रामस महासचिव धीरेंद्र झा व राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्यदेव राम सहित कई नेताओं ने संबोधित किया. सम्मेलन की अध्यक्षता आशा देवी, सत्यनारायण प्रसाद और शनीचरी देवी और संचालन शत्रुघ्न सहनी ने किया. मौके पर स्वदेश भट्टाचार्य, अरूण सिंह, केडी यादव, अमरजीत कुशवाहा, शिवसागर शर्मा सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे.
सम्मेलन ने संकल्प लिया कि इन तमाम सवालों पर राज्यव्यापी जनआंदोलन को और तेज किया जाएगा और निर्णायक जीत हासिल की जाएगी.
सम्मेलन से दलित-गरीबों के जमीन और आवास अधिकार से संबंधित कई प्रस्ताव लिए गए जिनमें राज्य के सभी जिलों में उजाड़ी गई और उजाड़ने की नोटिस भेजी गयी हजारों बस्तियों को बचाने, आजादी के तुरंत बाद वास-आवास का अधिकार के लिए बनाए गए पीपीएच एक्ट-1948 पर अमल करने, भूमिहीनों को 5 डिसमिल आवासीय भूमि देने की घोषणा को लागू करने, मनरेगा को मजबूत करते हुए पुनर्बहाली करने, 4 लेबर कोड को वापस लेने तथा रैयती, मालिक गैर मजरुआ, गैर मजरुआ आदि सरकारी जमीन पर बसे परिवारों को बासगीत पर्चाध/पट्टा देने की आदि मुख्य हैं.