-- क्रिस गिलबर्ट, सिरा पास्कुअल मार्कीना
कोई भी आपदा ‘सिर्फ प्राकृतिक’ नहीं होती, खासकर उस देश में जो नाकेबंदी से घिरा हो और मुश्किल हालात का सामना कर रहा हो. उसी तरह, किसी भी आपदा से निपटने का तरीका हमेशा सामाजिक, राजनीतिक और यहां तक कि भू-राजनीतिक हालात से तय होता है. आजादी की लड़ाई के दौरान 1812 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद सिमोन बोलीवार ने कहा था, ‘अगर प्रकृति हमारा रास्ता रोकेगी, तो हम उससे लड़ेंगे और उसे अपनी इच्छा के मुताबिक झुकने पर मजबूर कर देंगे.’ आज यह बात कुछ लोगों को चौंकाने वाली, बल्कि पर्यावरण-विरोधी भी लग सकती है. लेकिन बोलीवार का मतलब यह था कि आजादी का रणनीतिक मकसद हमेशा सबसे आगे रहना चाहिए और वही हमारे कदमों का रास्ता तय करे, भले ही हमारे सामने कोई प्राकृतिक चुनौती क्यों न हो.
वेनेजुएला में हाल में आए भूकंपों को समझते समय इस बात को याद रखना जरूरी है. प्राकृतिक घटना साफ थी. धरती दो बार जोर से हिली. पहले 7.2 तीव्रता का झटका आया और कुछ ही सेकंड बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा. इसके बाद तबाही ने उन प्राकृतिक फाल्ट लाइन्स का रास्ता पकड़ा जिनमें ला गुआइरा तट के साथ गुजरने वाली सैन सेबास्तियान फाॅल्ट भी शामिल है. लेकिन यह विनाश सिर्फ प्राकृतिक फाल्ट लाइन्स तक सीमित नहीं रहा. वह उन दरारों में भी फैल गया जिन्हें साम्राज्यवाद ने पैदा किया था. इनमें सबसे गहरी दरार देश के बुनियादी ढांचे, आपदा राहत और बचाव की क्षमता तथा स्वास्थ्य व्यवस्था में थी, जिन्हें एक दशक से भी ज्यादा समय से जारी पंगु बना देने वाली कमरतोड़ पाबंदियों ने खोखला कर दिया था.
आज भी ऐसी पाबंदियों की संख्या एक हजार से ज्यादा है. ये महज धमकियां या दुश्मनी भरे बयान नहीं हैं. वाॅशिंगटन के सीईपीआर संस्थान में मार्क वाइसब्रोट की रिसर्च के मुताबिक इन पाबंदियों की वजह से सिर्फ एक साल में तकरीबन 40,000 अतिरिक्त मौतें हुईं. जो लोग अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था से परिचित नहीं हैं, उनके लिए इस तरह की पाबंदियों का असर समझना मुश्किल हो सकता है. लेकिन इसका सीधा नतीजा यह होता है कि हर अंतरराष्ट्रीय लेन-देन मुश्किल बन जाता है. सामान्य व्यापार और कर्ज की सहूलियतें ठप्प पड़ जाती हैं, जबकि कंपनियां, बैंक और सरकारें लेन-देन से कतराने लगती हैं, भले ही वह पाबंदियों के तहत कानूनी तौर पर जायज क्यों न हो, क्योंकि उन्हें कोई यकीन नहीं होता और आगे बदले की कार्रवाई का डर सताता रहता है.
इसका असर आपदा से निपटने की तैयारी और जवाबी कार्रवाई के हर पहलू पर पड़ता है. वेनेजुएला में 2015 में ओबामा के कार्यकारी आदेश के जारी होने के फौरन बाद लाखों लोग देश छोड़कर जाने लगे, जिनमें डाॅक्टर, मेडिकल स्टाफ, सिविल इंजीनियर और दूसरे प्रशिक्षित पेशेवर भी शामिल थे. भारी-भरकम बचाव उपकरणों की मरम्मत मुश्किल हो गई क्योंकि पुर्जे बाहर से मंगवाना नामुमकिन हो गया. अस्पतालों को खास मेडिकल उपकरण बदलने में दिक्कत आई. सार्वजनिक सेवाओं ने रख-रखाव का काम टाल दिया क्योंकि वित्तीय संसाधन की मदद खत्म हो गई और सप्लायर सेकेंडरी पाबंदियों से डरने लगे. यहां तक कि जब लेन-देन कानूनन जायज भी था, बैंक और निर्माता कंपनियां अक्सर जरूरत से ज्यादा एहतियात बरतते हुए काम करने से इनकार कर देते थे, जिससे संस्थाओं को हमेशा की किल्लत के हालात में जुगाड़ से काम चलाना पड़ा.
फाल्ट लाइन्स का दूसरा सिलसिला 3 जनवरी को वेनेजुएला पर हुए साम्राज्यवादी हमले से शुरू हुआ, जिसमें लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण कर लिया गया, सौ से ज्यादा लोग मारे गए और उससे कहीं अधिक लोग जख्मी तथा गहरे सदमे का शिकार हुए. बोलिवारियन क्रांति राजनीतिक सत्ता को बचाए रखने में तो कामयाब रही, जो किसी भी क्रांतिकारी प्रक्रिया के लिए बुनियादी शर्त होती है, लेकिन उसने वेनेजुएला के तेल निर्यात पर अपना नियंत्रण खो दिया. साथ ही उसे देश के प्राकृतिक संसाधनों, खासकर तेल, को नियंत्रित करने वाले अपने बेहद प्रगतिशील कानूनों में तथाकथित ‘सुधार’ करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
इन तमाम बातों का मतलब यह है कि वेनेजुएला में आया भूकंप, जो हर लिहाज से दिल दहला देने वाला है, उसे अमरीकी साम्राज्यवाद की देश और उसकी जनता पर लगातार जारी, बहुस्तरीय हमलों की वजह से कहीं ज्यादा घातक बना दिया है. इसका असर सिर्फ फौरी तबाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी नतीजे भी उतने ही विनाशकारी होंगे. अब तक सरकारी तौर पर तकरीबन 1500 मौतें दर्ज हो चुकी हैं, और यह दुखद आंकड़ा आने वाले दिनों में और बढ़ेगा. जान-माल के इस नुकसान का असर कई सतहों पर महसूस होगा, और इसे कम करने की जद्दोजहद, यानी एक असरदार, संप्रभु और समन्वित राहत अभियान, अब एक जंग का मैदान बन गई है, जिसके ठीक बीचोबीच अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ टकराव मौजूद है.
बिल्कुल अलग तरह के जवाब
जब यह दोहरा भूकंप आया तो लोगों ने उसे एक अजीब और डरावने तजुर्बे के रूप में महसूस किया. कान फाड़ देने वाली गड़गड़ाहट, देर तक और बेहद तेजी से हिलती धरती, और आसमान का अजीब-सा रंग – सब कुछ जैसे किसी भयावह मंजर का हिस्सा था. एक चश्मदीद ने इसे ‘बिना हवा के तूफान’ कहा. लोग चीख पड़े और कुत्ते खौफ से पागल हो उठे. पूरी-पूरी इमारतें मलबे में तब्दील हो गईं, जबकि उस समुंदरी किनारे पर भी दरारें पड़ गईं जहां बहुत से लोग राष्ट्रीय छुट्टी मनाने गए थे. कई दिन बीत जाने के बाद भी लोग मलबे के नीचे फंसे हुए हैं. ला गुआइरा तट के किनारे बसे शहरों और कस्बों में हालात सबसे ज्यादा गंभीर हैं. सोशल मीडिया पर सैकड़ों तस्वीरें और नाम लगातार साझा किए जा रहे हैं, क्योंकि परिवार अपने खोए हुए अजीजों को बेताबी से तलाश रहे हैं.
ऐसे हालात में अपने फायदे-नुकसान की परवाह किए बिना मदद के लिए आगे आना स्वाभाविक है. वेनेजुएला और उसके पड़ोसी देशों के लोगों ने ठीक यही किया. कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज की सरकार ने भी तेजी और मजबूती से कदम उठाए हैं. पिछले तीन दशकों से बोलिवारियन क्रांति की पहचान रही जन-केंद्रित सोच के मुताबिक उसने अपने पास मौजूद तमाम संसाधनों को राहत और बचाव के काम में झोंक दिया. सरकारी कोशिशों के साथ-साथ जनता की ओर से भी बड़े पैमाने पर स्वतःस्फूर्त मदद सामने आई. राहत सामग्री से लदी मोटरसाइकिलें प्रभावित इलाकों की ओर उमड़ पड़ीं, हजारों स्वयंसेवक सरकार के नेतृत्व में चल रहे विशाल राहत और बचाव अभियान में शामिल हो गए, जबकि मेक्सिको, क्यूबा और ब्राजील से राहत दल ठोस मदद लेकर बहुत जल्दी पहुंच गए.
अगर वेनेजुएला की सरकार और लातीनी अमरीका के लोगों का जवाब हमदर्दी से भरा है, तो यही बात अमरीकी साम्राज्यवाद के बारे में नहीं कही जा सकती, जिसके लिए इंसानियत की फिक्र मुनाफे, लूट और दबदबे की हवस में कहीं गुम हो चुकी है, और जो हमेशा दूसरों की मुसीबत को अपने फायदे में बदलने की ताक में रहता है. भूकंप के अगले ही दिन विदेश मंत्री मार्काे रुबियो ने बेहद ठंडे लहजे में ऐलान किया कि अमरीकी ‘राहत अभियान’ में युद्ध विभाग, साउथकाॅम (SOUTHCOM) और मरीन फोर्स की केंद्रीय भूमिका होगी.
यह खेल हम पहले भी देख चुके हैं. 2010 में हैती में आए विनाशकारी भूकंप के बाद अमरीका की तथाकथित ‘मानवीय सहायता’ एक ऐसे ‘ट्रोजन हाॅर्स’ (धोखे से घुसपैठ) के रूप में पहुंची जो मुश्किल से अपना असली चेहरा छिपा पा रही थी. इसके साथ एक विमानवाहक युद्धपोत और लगभग 20,000 सैनिक भी भेजे गए थे. हैती में उस वास्तविक सैन्य कब्जे का नतीजा यह हुआ कि देश की संप्रभुता को खुला धक्का पहुंचा, यौन हिंसा और शोषण के अनेक दर्ज मामले सामने आए, और हैजे की वह महामारी फैली जिसे खुद कब्जा करने वाली सेनाएं अपने साथ लाई थीं.
साम्राज्यवाद के इन मंसूबों के सामने वेनेजुएला की क्रांतिकारी जनता तीन मांगों पर एकजुट है. अमरीका सभी पाबंदियां पूरी तरह हटाए, वेनेजुएला की तमाम जब्त की गई संपत्तियां तुरंत वापस करे, और राष्ट्रपति मादुरो तथा सीलिया फ्लोरेस को सकुशल वेनेजुएला लौटाए. अगर ये कदम नहीं उठाए जाते, तो अमरीका की मौजूदगी सीधे-सीधे एक फौजी कब्जे से अलग नहीं लगती. यह डोनाल्ड ट्रंप के मागा (MAGA) साम्राज्यवाद की दोबारा उपनिवेश बनाने की हसरतों का ही एक अहम हिस्सा है, जिसमें मुनरो डाॅक्ट्रिन की बदशक्ल वापसी साफ दिखाई देती है.
नैरेटिव पर कब्जे की जंग
वेनेजुएला की जनता, उनके भविष्य और उनके बोलिवारियन क्रांति की मुकम्मल हिफाजत की जद्दोजहद मीडिया और सोशल नेटवर्क पर भी एक जंग की शक्ल में जारी है. झूठे और बदनीयत दावे फैलाए जा रहे हैं कि सरकार न तो राहत पहुंचा रही है और न ही बचाव का काम कर रही है, बल्कि वह मदद में रुकावट डाल रही है. साथ ही, तुर्की के भूकंप जैसी दूसरी आपदाओं के वीडियो को वेनेजुएला का बताकर पेश किया जा रहा है. इसके अलावा एआई से तैयार किया गया भ्रामक और घटिया कंटेंट भी सोशल मीडिया पर बाढ़ की तरह फैलाया जा रहा है. इस दुष्प्रचार का बड़ा हिस्सा मारिया कोरीना मचाडो के नाराज विपक्ष की ओर से आ रहा है, जो 3 जनवरी के बाद हुई सत्ता-सौदेबाजी में अपने को हाशिए पर पड़ा हुआ महसूस कर रहा है.
हकीकत यह है कि नेकनीयती से ला ग्वाइरा पहुंचने की कोशिश कर रहे लोगों की भारी तादाद की वजह से काराकास से ला ग्वाइरा जाने वाला मुख्य हाइवे जाम हो गया, जिससे कुछ समय के लिए भारी मशीनरी और एंबुलेंस के पहुंचने में रुकावट आई. इसी तरह बचाव स्थलों के आसपास इतने लोग, गाड़ियां और मोटरसाइकिलें जमा हो गईं कि मलबे के नीचे फंसे लोगों की आवाजें सुन पाना मुश्किल हो गया, जिससे बचाव कार्य में बाधा पड़ी. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राहत दलों ने लोगों से अपील की कि उन्हें काम करने के लिए जगह दी जाए. इसके जवाब में सरकार ने काराकास के ‘पोलिएद्रो’ खेल परिसर में एक समन्वय केंद्र बनाया, जहां नागरिकों की ओर से भेजी गई राहत सामग्री इकट्टा की जाती है और फिर ट्रकों के जरिए जरूरत वाली जगहों तक पहुंचाई जाती है. यहां स्वयंसेवकों का भी आकलन किया जाता है, ताकि उन्हें वहां लगाया जा सके जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत हो.
अगर कोविड महामारी ने हमें कुछ सिखाया है, तो वह यह कि सिर्फ राज्य की अगुवाई वाली जवाबी कार्रवाई ही असरदार हो सकती है. गैर-सरकारी संस्थाओं और मदद करने वाले आम लोगों का स्वागत है, लेकिन उन्हें भी एक ऐसी संगठित मुहिम का हिस्सा बनना होगा जिसकी अगुवाई सिर्फ एक संप्रभु राज्य ही कर सकता है. आज विदेशी मीडिया जिस सबसे बड़े झूठ को फैला रहा है, वह दरअसल वही पुराना झूठ है जो हमेशा बोलिवारियन क्रांति के खिलाफ इस्तेमाल होता रहा है. यानी जब भी ग्लोबल साउथ का कोई देश वही अधिकार इस्तेमाल करता है जो ग्लोबल नाॅर्थ की सरकारें करती हैं, या उनसे भी कम, तो उसे ‘तानाशाही’ कहकर बदनाम किया जाता है. दूसरी ओर, कुछ लोग यह भी प्रचार कर रहे हैं कि सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई ही नहीं हो रही है, ताकि बाहरी सैन्य दखलअंदाजी का रास्ता तैयार किया जा सके.
क्रांतिकारी तैयारी
इस दोहरे भूकंप की मार उस देश पर पड़ी जो पाबंदियों की वजह से कमजोर हो चुका था, लेकिन दूसरी ओर 27 साल पुरानी बोलिवारियन क्रांति ने उसे एक नई मजबूती भी दी है. इस क्रांति ने वेनेजुएला के समाज के लगभग हर पहलू को गहराई से बदल दिया है. अगर पाबंदियों ने लगातार देश के बुनियादी ढांचे को कमजोर किया, तो बोलिवारियन क्रांति ने दो दशकों से भी ज्यादा समय तक समाज की एक नई सामूहिक ताकत गढ़ने का काम किया. यह प्रक्रिया अभी पूरी तरह मुकम्मल नहीं हुई है, फिर भी आज वही देश की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है. कम्यूनल काउंसिल, कम्यून, जनता-फौज एकता और सार्वजनिक आवास योजनाएं – इन सबने मिलकर देश की उस सामूहिक ताकत को गढ़ा जिसने इस संकट का मुकाबला किया.
बोलिवारियन क्रांति ने लगातार देश के आवास ढांचे को मजबूत किया है. 2011 में ह्यूगो चावेज द्वारा शुरू की गई आवास योजना ग्रान मिसियोन विविएन्दा वेनेजुएला के तहत पूरे देश में लाखों ‘सम्मानजनक घर’ बनाए गए. इनमें से ज्यादातर इमारतें, जिन्हें चीनी, ब्राजीली, बेलारूसी और वेनेजुएला की अलग-अलग कंपनियों ने बनाया, भूकंप में अच्छी तरह टिकी रहीं. जिन जगहों पर कोई इमारत रहने लायक नहीं बची – जो ज्यादातर तटीय फाल्ट लाइन वाले इलाकों में हुआ – वहां भी वे गिरने की बजाय बस झुक गईं. लोगों को असुरक्षित पहाड़ी बस्तियों में बिखरा छोड़ने के बजाय मजबूत अपार्टमेंट इमारतों में बसाना हर लिहाज से ज्यादा सुरक्षित साबित हुआ. इसकी वजह सिर्फ बेहतर निर्माण मानक नहीं हैं, बल्कि यह भी है कि इससे सामूहिक कार्रवाई आसान होती है और सरकारी मदद जल्दी और बेहतर ढंग से पहुंचाई जा सकती है.
दूसरी अहम वजह वह जनता-फौज एकता है जिसे चावेज ने बढ़ावा दिया. यह माॅडल अब पूरी आबादी की सोच का हिस्सा बन चुका है. इसी ने सरकार की सरकारी मशीनरी और स्वयंसेवकों की साझा जवाबी कार्रवाई की बुनियाद तैयार की. यह जनता-फौज एकता, जिसे मादुरो ने समझदारी से पुलिस को भी शामिल करके और मजबूत किया, हमेशा दो रूपों में मौजूद रही है. एक तरफ यह एक संस्थागत व्यवस्था है, जो साठ लाख सदस्यों वाली मिलिशिया के रूप में दिखाई देती है, और दूसरी तरफ यह एक व्यापक राजनीतिक सोच है, जिसकी जड़ें आम नागरिकों और सैन्यकर्मियों – दोनों की वर्ग-चेतना में हैं. इसकी पहली परीक्षा 1999 की वार्गास त्रासदी के दौरान हुई थी, ठीक उसी इलाके में जहां इस बार भी सबसे ज्यादा तबाही हुई है. उस वक्त भी सिविल-फौजी एकता हालात से निपटने के लिए आगे आई थी, और आज भी वही भूमिका निभा रही है.
आखिर में, सबसे दूरअंदेशी जवाब देश के समाजवादी कम्यूनों से सामने आ रहा है. यूनियोन कम्यूनेरा नाम के नेटवर्क की टीमें ला ग्वाइरा पहुंचकर राहत और बचाव अभियान में जुट गईं. कराकास के एल पानाल कम्यून के साथियों ने बस्ती की इमारतों की हालत का जायजा लेने के साथ-साथ कई राहत संग्रह केंद्र भी बनाए हैं और उन लोगों के लिए अस्थायी ठिकाने तैयार कर रहे हैं जो भूकंप की वजह से बेघर हो गए हैं.
जैसे 2010 के दशक के बीच के सालों में खाद्य संकट का सामना करते समय हुआ था, वैसे ही आज भी पूरे देश में लोग अपनी सेहत और जिंदगी से जुड़े बुनियादी मसलों का सामूहिक हल निकालने और आगे का रास्ता खोजने के लिए कम्यूनों की ओर रुख कर रहे हैं. कम्यून आंदोलन की ताकत और उसकी मजबूत वैचारिक बुनियाद को देखते हुए यह मुमकिन है कि कम्यून एक बार फिर नई राजनीतिक चेतना के उभार का माध्यम बनें. इन मुश्किल दिनों में, जब 3 जनवरी के हमले का साया अब भी देश पर मंडरा रहा है, कम्यून समाजवादी परियोजना के पक्ष में वेनेजुएला की जनता को फिर से संगठित करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
नाकेबंदी और साम्राज्यवादी हमलों के इन बरसों ने बेशक वेनेजुएला को भौतिक तौर पर कमजोर किया है. लेकिन बोलिवारियन क्रांति ने समाज के भीतर ऐसी नई सामूहिक ताकत पैदा कर दी है जिसे आसानी से मिटाया नहीं जा सकता – एक संगठित जनता और ऐसे संस्थान, जो हर संकट का मुकाबला करने की क्षमता रखते हैं. अगर इस भूकंप ने देश की कमजोरियों को उजागर किया है, तो उसने यह भी दिखा दिया है कि उसकी असली ताकत कहां है – उसकी क्रांतिकारी जनता में, और उन गहरे सामाजिक व संस्थागत बदलावों में जिन्हें बोलिवारियन क्रांति ने जन्म दिया है.
क्रिस गिलबर्ट वेनेजुएला के बोलिवारियन विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर हैं. वे मंथली रिव्यू के कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं और कई किताबों व शोध-लेखों के लेखक भी हैं.
सीरा पास्कुअल मार्कीना प्लूरीवर्सिदाद पात्रिया ग्रांदे में जन-शिक्षिका हैं और इंटरनेशनल कम्यूनल डेमोक्रेसी नेटवर्क की सदस्य हैं.
स्रोत: Imperialism-Induced Fault Lines: The Venezuelan Earthquake, Chris Gilbert और Cira Pascual Marquina. Monthly Review, 29 जून 2026