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मक्कारी से भरी बातें, आबादी पर निशाना : अपने ही नागरिकों को घुसपैठिया बताना

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नरेंद्र मोदी ने लगातार 12वीं बार भारत के प्रधानमंत्री के बतौर लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण दिया. इस लिहाज से अब वे इंदिरा गांधी से आगे निकल चुके हैं और सिर्फ जवाहरलाल नेहरू से पीछे हैं. भाषणों की लंबाई के मामले में तो वे पहले ही अपने सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों को पीछे छोड़ चुके थे, और इस बार उन्होंने 103 मिनट का भाषण देकर अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया. लेकिन हमें उनके इस साल के भाषण पर इन आँकड़ों से ज्यादा उन बातों पर ध्यान देना चाहिए जो उन्होंने कही और जो अनकही रह गईं. उनकी खामोशियां और उनके शब्द दोनों ही साफ संकेत देते हैं कि उनकी सरकार और अपनी सौवीं सालगिरह मना रही मातृ संस्था आरएसएस का फासीवादी एजेंडा आगे किस दिशा में बढ़ रहा है. मोदी ने तो आरएसएस का जिक्र करते हुए उसे “दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ” तक कह डाला! इस पर बाद में.

पहले उनकी खामोशियों पर नजर डालें. स्वतंत्रता दिवस का मतलब है भारत के आजादी आंदोलन को याद करना और उस आधुनिक भारत के सपने को दोहराना जिसने 19वीं-20वीं सदी में दुनिया के सबसे बड़े उपनिवेश रहे भारत को दशकों तक सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की ताकत दी. आज भले ही पुराने औपनिवेशिक शासक भारत को फिर से गुलाम बनाने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन अमेरिकी साम्राज्यवाद, खासकर ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद, भारत को एक नए प्रकार की गुलामी – आर्थिक और राजनीतिक निर्भरता – में जकड़ने की कोशिश कर रहा है. भारतीय निर्यातों पर भारी शुल्क लगाना, अमेरिका में बिना दस्तावेज वाले भारतीय नागरिकों को कैद करना, भारत की अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेश नीति की शर्तें तय करना – हर कदम पर ट्रंप प्रशासन भारत का अपमान कर रही है और एक संप्रभु गणराज्य के रूप में हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचा रही है. मगर ऐतिहासिक लालकिले से दिए अपने 12वें भाषण में मोदी भारत की राजनीतिक और आर्थिक संप्रभुता के लिए इस गंभीर साम्राज्यवादी खतरे पर पूरी तरह चुप रहे.

आज करोड़ों भारतीयों के लिए गुजर-बसर करना ही बहुत बड़ी चुनौती है. नवंबर 2016 की नोटबंदी की विनाशकारी मार के बाद से, जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था को झटके लगते गए, गायब होते रोजगार, घटती आमदनी और जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों ने देश के मेहनतकश करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छीन ली है और उनकी जिन्दगी और बदतर बना दी है. अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुके इस गहरे आर्थिक संकट की गंभीरता को स्वीकार करने के बजाय, मोदी ने यह हैरतअंगेज दावा किया कि उन्होंने 25 करोड़ भारतीयों को गरीबी से निकालकर ‘नए मध्यम वर्ग’ में पहुंचा दिया है!

या फिर शासन का सवाल लीजिए. मणिपुर महीनों से जल रहा है, लेकिन इस दौरान मोदी ने वहां जाना जरूरी नहीं समझा और स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में भी मणिपुर का जिक्र तक नहीं किया. जबकि पूरे देश में आदिवासी जंगलों और खनिज-समृद्ध इलाकों में क्रूर बेदखली और घरों के विध्वंस का सामना कर रहे हैं, उसी वक्त नरेंद्र मोदी में इतनी हिमाकत है कि वे छत्तीसगढ़ में चलाए जा रहे “ऑपरेशन कगार” – एक गैरकानूनी हत्या-अभियान – को बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि के रूप में पेश करते हैं, वो भी उनकी शहादत के 125वें साल में! भारत की आजादी की लड़ाई में आदिवासी विद्रोह का गौरवशाली इतिहास रहा है. उन्होंने न सिर्फ औपनिवेशिक गुलामी की बेड़ियां तोड़ीं बल्कि जमींदारी और साहूकारी की नींव तक हिला दी. और आज नरेंद्र मोदी इन्हीं आदिवासी जनता के महानायक, आजादी आंदोलन के अमर प्रतीक बिरसा मुंडा की याद को कलंकित करने पर तुले हैं – ऐसी ‘श्रद्धांजलि’ देकर, जो असल में भारत के आदिवासियों पर किए जा रहे सबसे रक्तरंजित, राज्य-प्रायोजित दमन और सफाये का प्रतीक है.

बिहार में मतदाता सूचियों का अचानक शुरू किया गया तथाकथित स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (विशेष गहन पुनरीक्षण) अब एक बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटने की मुहिम बन चुका है. 7 अगस्त को राहुल गांधी की प्रेस कान्फ्रेन्स, जिसमें बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र की सिर्फ एक विधानसभा सीट में ही एक लाख से ज्यादा फर्जी वोटर जोड़े जाने का खुलासा हुआ, के बाद से पूरे देश में “वोट चोरी” पर बहस छिड़ गई है. चुनाव आयोग चाहता है कि हम 65 लाख वोटरों के नाम काटे जाने को मतदाता सूची का शुद्धिकरण मान लें – जो दरअसल चुनावी भाषा में एक तरह का ‘जातीय सफाया’ ही नजर आता है. अब पूरी दुनिया देख रही है कि किस तरह जिन्दा लोगों को मृत घोषित किया जा रहा है और बिहार के वे बाशिंदे, जो रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं, उन्हें “बाहरी” बताकर बिहार की मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है. मगर नरेंद्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में, उम्मीद के मुताबिक, इन वोटरों को बड़े पैमाने पर बेदखल करने वाली कवायद यानी एसआइआर पर एक शब्द तक नहीं कहा.

लेकिन अपने 103 मिनट लंबे भाषण के आखिरी हिस्से में मोदी ने जो कहा, उसने एसआइआर और सरकार की दूसरी जुड़ी कार्रवाइयों के पीछे छुपी असली रणनीति साफ कर दी. मोदी ने ‘घुसपैठ’ को देश के सामने सबसे बड़ा खतरा बताकर इसे राष्ट्रीय सुरक्षा पर हमला और भारत की जनसंख्या संरचना बदलने की साजिश कहा. उनका पूरा भाषण घुसपैठियों का हौवा खड़ा कर नफरत और डर को हवा देने वाला जहरीला हमला था – जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया कि वे ‘हमारे नौजवानों की रोजी-रोटी छीन रहे हैं’, ‘हमारी बहनों-बेटियों को निशाना बना रहे हैं’, ‘भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर उनकी जमीनें हथिया रहे हैं’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर  खतरा पैदा कर रहे हैं’. आखिर में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘हाई-पावर्ड डेमोग्राफिक मिशन’ का ऐलान किया, जिसका मकसद इस कथित घुसपैठ संकट की जांच करना और भारत को ‘घुसपैठियों से मुक्त’ बनाने के उपाय सुझाना है.

यह भी असल में वही एजेंडा था जो भाजपा ने झारखंड विधानसभा चुनावों में अपने प्रचार अभियान का केंद्र बनाया था. बिहार में एसआइआर की कवायद को भी बांग्लादेश और म्यांमार से घुसपैठ का हौवा खड़ा कर जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है. असम में तो एनआरसी का पूरा एजेंडा ही दरअसल ‘जनसांख्यिकी बचाओ’ अभियान का हिस्सा है. यह अलग बात है कि भाजपा का ‘घुसपैठ-विरोधी’ हौवे का उन्माद झारखंड में बिल्कुल नहीं चला. बिहार में अब तक एक भी ‘विदेशी नागरिक’ नहीं मिला है, जबकि 65 लाख नाम तरह-तरह के बहानों से काट दिए गए हैं. और असम में छह साल और एनआरसी के दो दौर के बाद भी भाजपा सरकार को अब भी एक ‘सही एनआरसी’ की तलाश है.

हिंदुत्व का उन्माद भड़काते हुए मोदी ने उस संगठन को भी श्रेय दिया जिसने सौ साल पहले यह एजेंडा शुरू किया था और लगातार इसे आगे बढ़ा रहा है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. लेकिन हैरानी ये कि उन्होंने इसे दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ बता डाला! असल में उन्हें ये भी जोड़ना चाहिए था कि यह सबसे बड़ा नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सबसे रहस्यमयी एनजीओ है – जिसका न कभी कोई रजिस्ट्रेशन हुआ, न कभी कोई ऑडिट. या फिर वे इसे ऐसा ‘गैर-सरकारी संगठन’ भी कह सकते थे जो आज बिना डर के सीधे राज्य के साथ मिलकर काम कर रहा है. भाजपा के लिए आजादी का दिन अब मुख्य तौर पर विभाजन की याद ताजा करने और मुसलमानों को या तो ‘विभाजन का गुनहगार’ या आज के दौर में कभी ‘आतंकी’, कभी ‘घुसपैठिया’ ठहराने का मौका बन चुका है. हाल ही में पेट्रोलियम मंत्रालय के एक इश्तिहार में गांधी से ऊपर सावरकर की तस्वीर चिपका दी गई. एनसीईआरटी के प्रस्तावित खंड में विभाजन की जिम्मेदारी माउंटबैटन, मुस्लिम लीग और कांग्रेस पर डाल दी गई – इस सच्चाई को छुपाते हुए कि हिंदू राष्ट्र का विचार सबसे पहले सावरकर ने ही पेश किया था.

भारत की आजादी के 79वें साल में हमें हर हाल में उस फासीवादी खतरे के खिलाफ लड़ना होगा, जो इसके बुनियादी सिद्धांत, ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ को मिटाने पर तुला है. और जिस तथाकथित ‘हाई पावर्ड डेमोग्राफिक मिशन’ के जरिये हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोशिश हो रही है, उसे जनता की ताकत से, संविधान, लोकतंत्र और आजादी की हिफाजत करके शिकस्त देनी होगी.

23 August, 2025