दिल्ली दंगों की साजिश में फंसाए गए कार्यकर्ताओं को ज़मानत के अधिकार से वंचित करना न्यायिक प्रक्रिया का मखौल है

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दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा नौ कार्यकर्ताओं की जमानत याचिकाओं को खारिज करने के निर्णय ने न्याय और न्यायिक प्रक्रिया का मखौल बना दिया है। झूठे मुकदमों में फंसाए गए दिल्ली दंगों के इन आरोपियों में शरजील इमाम (2044 days), खालिद सैफी (2015 days), मीरान हैदर (1980 days), गुल्फ़िशाँ फातिमा (1972 days), शिफा उर रहमान (1955 days), उमर खालिद (1815 days), अतहर खान, मो. सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। इन नौजवान कार्यकर्ताओं को मनगढ़ंत आरोपों में फंसा कर दिल्ली पुलिस ने करीब पांच सालों से जेलों में डाल रखा है।

इन पर "गहरी साजिश" रचने का आरोप लगाया गया है, वास्तव में यह पुलिस और दक्षिणपंथी हिंदुत्व गिरोहों के बीच की गहरी साजिश का नतीजा है। भाजपा के कपिल मिश्रा जैसे नेताओं द्वारा सांप्रदायिक उन्माद भड़का कर समाज में ध्रुवीकरण की साजिश और इस पर दिल्ली पुलिस की चुप्पी एवं मिलीभगत साफ बता रहे हैं कि दिल्ली में 2020 दंगों के पीछे कौन था। असली अपराधियों को पकड़ने की जगह राज्य सांप्रदायिक हिंसा का विरोध करने वालों को प्रताड़ित कर रहा है, क्योंकि वे असंवैधानिक सी ए ए - एन आर सी का शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहे थे। 

इन कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न लोकतांत्रिक विरोध की आवाज़ों को तथा सांप्रदायिकता और तानाशाही के खिलाफ चल रहे आंदोलनों को दबाने की एक गहरी साजिश है। नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करने में विफल न्यायपालिका का यह फैसला स्पष्ट रूप में बता रहा है कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण कितना गंभीर रूप ले चुका है। 

आशा करनी चाहिए कि देश का सर्वोच्च न्यायालय इस न्यायिक प्रहसन का संज्ञान लेगा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगा।

--  केंद्रीय कमेटी, भाकपा (माले) लिबरेशन

03 September, 2025