भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: मोदी सरकार ने ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के मंसूबों के सामने देश के हित गिरवी रख दिए — भाकपा (माले)

भारतीय किसानों, मेहनतकश जनता और देश की संप्रभुता से किसी भी तरह का समझौता करने की कोशिश का डटकर मुकाबला किया जाएगा.

अब बुनियादी सवाल यह है कि मोदी सरकार ने भारत के राष्ट्रीय हितों, खासकर किसानों के हितों को दांव पर लगाकर ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ मंसूबों के सामने देश को गिरवी क्यों रखा?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच जिस "ट्रेड डील" का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उसकी पहली जानकारी खुद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दी. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ‘X’ पर चुनिंदा और अधूरी बातें रखीं. इतने अहम राष्ट्रीय मसले पर, जिसके दूरगामी और खतरनाक नतीजे होंगे, यह देश की जनता के साथ कपट भरी धोखाधड़ी है.

ट्रंप-मोदी समझौते की असली शर्तें क्या हैं? प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ 18% टैरिफ की गोल-मोल बात कर रहे हैं, जबकि ट्रंप ने इस सौदे की असली और कड़वी सच्चाई स्पष्ट कर दी है. ट्रंप के मुताबिक, भारत रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद करेगा और उसकी जगह अमेरिका व वेनेज़ुएला से तेल आयात बढ़ाएगा— वेनेज़ुएला, जिसके तेल संसाधनों पर अमेरिका साम्राज्यवादी दखल के ज़रिये कब्ज़ा जमाने की कोशिश कर रहा है.

ट्रंप का यह भी कहना है कि भारत ने अमेरिकी सामानों—जिनमें कृषि उत्पाद शामिल हैं—के लिए अपने बाजार ‘जीरो टैरिफ’ पर खोलने पर सहमति दे दी है. अमेरिका की कृषि सचिव ब्रुक रोलिन्स ने सार्वजनिक तौर पर ट्रंप को अमेरिकी किसानों के लिए बड़ी जीत दिलाने के लिए धन्यवाद दिया है. इससे साफ है कि इस समझौते से फायदा किसे होने वाला है.  अब बुनियादी सवाल यह है कि मोदी सरकार ने भारत के राष्ट्रीय हितों, खासकर किसानों के हितों को दांव पर लगाकर ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ मंसूबों के सामने देश को गिरवी क्यों रखा?

अगर अमेरिका की भारी सब्सिडी से लैस मक्का, इथेनॉल, सोयाबीन, डेयरी, मीट और प्रोसेस्ड फूड (डिब्बाबंद खाना) को बिना किसी रोक-टोक भारत में आने दिया गया, तो यह भारतीय खेती को तबाह कर  देगा. हमारे करोड़ों छोटे और सीमांत किसान, जो पहले से ही खेती की बढ़ती लागत और सरकार की बेरुखी की दोहरी मार झेल रहे हैं, और गहरे संकट में धकेल दिए जाएंगे.

खास बात यह है कि स्टील और एल्युमिनियम जैसे उत्पाद तथाकथित पारस्परिक टैरिफ के दायरे से बाहर रखे गए हैं. यानी इन अहम क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों को पहले की तरह भारी टैरिफ का सामना करना पड़ेगा. ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति से पहले अमेरिका में औसत टैरिफ करीब 2.5% था, जो बाद में बढ़कर 50% तक पहुंच गया. इस लिहाज से 18% टैरिफ वाला यह “डील” भारत के लिए  बुरा और घाटे का सौदा है, जिसमें उसे मिला कम और गंवाया कहीं ज्यादा है.

गैर-टैरिफ बाधाओं को शून्य करने की जो खबरें आ रही हैं, उसके नतीजे और भी गंभीर होंगे. अगर यह लागू हुआ, तो इसका मतलब भारत के छोटे उत्पादकों, एमएसएमई और लाखों नौकरियों के हितों को दाव पर लगाना होगा. इससे भारतीय बाजार में अमेरिकी कृषि व छोटे उद्योग के उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी. हमारे घरेलू उत्पादकों को अमेरिका के भारी सब्सिडी वाले डेयरी, अनाज, मांस और प्रोसेस्ड फूड सेक्टर से ऐसी असमान और बर्बर प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा, जिसमें उनका टिक पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा.

मोदी सरकार इस समझौते को बड़ी उपलब्धि बता पेश कर रही है, जबकि यह ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देगा, जिससे देश की आधी से ज्यादा आबादी की आजीविका चलती है. हमारे छोटे और मध्यम उद्योगों को बड़ी अमेरिकी कॉर्पोरेट कंपनियों से मुकाबला करने के लिए मजबूर किया जाएगा, जिससे “मेक इन इंडिया” और “मेड इन इंडिया” को गहरा ढांचागत झटका लगेगा.

यह समझौता अमेरिका के भू-राजनीतिक हितों के सामने भारत के घुटने टेकने और बढ़ती अधीनता को उजागर करता है. पिछले एक साल में भारत के तेल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग दोगुनी हो चुकी है. ऐसे में यह बेहद चिंताजनक है कि भारत सरकार अमेरिका के इशारे पर वेनेज़ुएला से तेल खरीदने या रूस और ईरान से तेल न खरीदने का फैसला ले रही है. वेनेज़ुएला से तेल खरीदना — या किसी अन्य देश से न खरीदना — दो संप्रभु देशों के बीच का द्विपक्षीय मामला है. ऐसा फैसला लेने का हक डोनाल्ड ट्रंप या अमेरिकी सरकार को कतई नहीं है.

सरकार को तुरंत इस समझौते और प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते का पूरा विवरण जनता के सामने रखना चाहिए, ताकि उस पर लोकतांत्रिक चर्चा और जांच हो सके. भारतीय किसानों, मेहनतकश जनता और देश की संप्रभुता से किसी भी तरह का समझौता करने की कोशिश का डटकर मुकाबला किया जाएगा.

-  केंद्रीय कमेटी, भाकपा(माले) लिबरेशन (04 फरवरी 2026)

06 February, 2026