(न्यूयाॅर्क में मोहन भागवत, अमेरिका में आरएसएस का नेटवर्क और उसके खिलाफ लामबंदी)
सलाम (साउथ एशियन लेफ्ट)
29 अगस्त को न्यूयाॅर्क शहर के ‘दुनिया के सबसे मशहूर सभा-स्थल’ यानी मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम हुआ. इसी मैडिसन स्क्वायर गार्डन में फरवरी 1939 में नाजी झंडों और स्वास्तिकों के साये में ‘जर्मन अमेरिकन बुंड’ की रैली भी हुई थी. इस बार, अमेरिका में बैठे भारतीय रईसों के पैसे के दम पर पांच हजार लोग हाॅल में जुटे, ताकि वे भागवत को ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (यूनिवर्सल वननेस) पर भाषण देते सुन सकें. इस जलसे को ‘अहेड’ (अमेरिकन हिंदूज फाॅर एंगेजमेंट एंड डायलाॅग) नाम के एक संगठन ने करवाया था, और इसके पीछे हिंदू मंदिरों और कम्युनिटी सेंटरों का एक तगड़ा नेटवर्क था, जिसने बसें भर-भरकर हजारों लोगों को वहां पहुंचाया. ढोल-नगाड़ों और नाच-गाने से शुरू हुआ यह तमाशा एक ‘सर्वधर्म’ बैठक तक पहुंचा, जहां भागवत को यहूदी रब्बियों और मुस्लिम इमामों के बीच बैठाया गया. फिर भागवत ने ‘विविधता में एकता’ पर चालीस मिनट का उपदेश दिया. इस तरह, बहुलतावाद का भव्य प्रदर्शन करते हुए आयोजित पूरा कार्यक्रम आरएसएस प्रमुख को केंद्र में रखकर संपन्न हुआ.
लेकिन सभागार के बाहर इस दिखावे की असलियत सामने आ गई. सलाम (साउथ एशियन लेफ्ट) और उसके सहयोगी संगठनों की पहल पर 250 से अधिक लोग मैडिसन स्क्वायर गार्डन के मुख्य दरवाजे पर विरोध प्रदर्शन के लिए जुटे. इस साझा प्रतिरोध में वामपंथी, दलित, मुस्लिम, सिख, जाति-विरोधी, प्रगतिशील हिंदू और फिलिस्तीन के साथ एकजुटता रखने वाले संगठन शामिल थे. उन्होंने इस आयोजन और इसके मुख्य वक्ता मोहन भागवत के खिलाफ आवाज उठाई. आरएसएस ने सभागार में भीड़ जुटाने के लिए बहुसांस्कृतिकता की भाषा का इस्तेमाल किया था. बाद में अमेरिका के कई धर्मगुरुओं ने कहा कि उन्हें भागवत के साथ मंच साझा करने के लिए गुमराह किया गया था. उनका कहना था कि अगर उन्हें आरएसएस की असलियत मालूम होती, तो वे इस कार्यक्रम में शामिल ही नहीं होते. प्रदर्शनकारियों ने हिंदुत्व की असलियत उजागर की. उन्होंने बताया कि हिंदुत्व एक ऐसी परियोजना है, जो लोगों के संसाधनों और अधिकारों पर कब्जा करने, दूसरों की जमीन और इलाकों पर अपना प्रभुत्व जमाने तथा जातिगत वर्चस्व कायम करने का काम करती है. यह शोषित लोगों के गुस्से को सत्ता और शोषण की असली ताकतों के खिलाफ जाने से रोकती है और उसे दूसरे उत्पीड़ित समुदायों के खिलाफ मोड़ देती है.
अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय सबसे अधिक कमाई करने वाले जातीय समुदायों में शामिल है. इस प्रवासी समुदाय के एक हिस्से ने उद्योग जगत और सामुदायिक जीवन में एक बेहद संगठित और संसाधन-संपन्न नेटवर्क खड़ा किया है, जिसका सीधा जुड़ाव आरएसएस से है.
अमेरिका, आरएसएस के वैश्विक संगठन ‘विश्व विभाग’ का आर्थिक और कूटनीतिक केंद्र है. आरएसएस खुद एक अपंजीकृत संगठन के रूप में काम करता है और उसके पास सदस्यों का कोई औपचारिक रजिस्टर नहीं है. इस व्यवस्था का फायदा उठाकर अमेरिका में उससे जुड़े कई संगठन, ट्रस्ट और सोसायटियां उसके काम को आगे बढ़ाते हैं. इन्हें करों से छूट हासिल है. इनके जरिए सदस्य भर्ती करने, चंदा जुटाने, राजनीतिक संरक्षण हासिल करने, लाॅबिंग करने और स्कूल के बाद बच्चों के लिए चलने वाले कार्यक्रमों तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन किया जाता है. यही गतिविधियां इस पूरे नेटवर्क को मजबूती देती हैं. इस नेटवर्क के केंद्र में ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ (एचएसएस) है. अमेरिका के 33 राज्यों में इसकी 267 शाखाएं चलती हैं. भारत के बाहर आरएसएस की कुल शाखाओं का यह लगभग छठा हिस्सा है. इसके साथ ही ‘विश्व हिंदू परिषद’ (विहिप) की अमेरिकी शाखा भी सक्रिय है, जिसे ‘अमेरिकन विहिप’ (वीएचपीए) के नाम से जाना जाता है.
ये लोग ‘एकल विद्यालय’ और ‘सेवा इंटरनेशनल’ जैसे मुखौटा संगठनों के सहारे काम करते हैं, जो ‘आदिवासी शिक्षा’ और ‘राहत कार्य’ के नाम पर संघ की तिजोरियों में पैसा भरते हैं. अमेरिका में काम करने वाले भारतीय इंजीनियरों, डाॅक्टरों और आईटी पेशेवरों की गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा इन्हीं रास्तों से होकर नफरत और सांप्रदायिक दंगों की बुनियाद तैयार करने में लगाया जाता है. एकल विद्यालय को भेजे जाने वाले पैसे से मध्य भारत में एक शिक्षक वाले स्कूल चलाए जाते हैं. इनका मकसद आदिवासी युवाओं को उनकी अपनी संस्कृति से दूर करके ब्राह्मणवादी हिंदू दायरे में लाना और उन्हें हिंदुत्व की विचारधारा के पैदल सिपाहियों के रूप में तैयार करना है. वहीं ‘सेवा इंटरनेशनल’ का पैसा बजरंग दल और वीएचपी के उस गिरोह तक पहुंचता है जो मुसलमानों और दलितों की माॅब लिंचिंग, गिरजाघरों को फूंकने और मेहनतकश बस्तियों पर बुलडोजर चलवाने के पीछे है. प्रवासी भारतीयों का पैसा इन स्वयंसेवकों की ताकत बढ़ाता है.
अमेरिका में संघी गिरोह साम्राज्यवादी सत्ता के केंद्र में अपनी ताकत बढ़ाने में लगा है. उसका नेटवर्क रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक, दोनों पार्टियों के चुनाव अभियानों को पैसा देता है. वह नगर निकायों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के अधिकारियों के बीच लाॅबिंग करता है और उदारवादी नागरिक संगठनों के साथ गठजोड़ बनाता है. ‘हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन’ (एचएएफ) ने अपने प्रभाव को बढ़ाने के पूरे अभियान के तहत वाॅशिंगटन डीसी में लाॅबिंग पर लाखों डाॅलर खर्च किए हैं. यह संगठन भाजपा के लिए कूटनीतिक ढाल का काम करता है. वहीं, काॅलेज परिसरों में सक्रिय ‘हिंदू युवा’ जैसे संगठन प्रवासी भारतीय अभिजात वर्ग की अगली पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं. इस नेटवर्क का संचालन सौमित्र गोखले जैसे पदाधिकारी करते हैं. एचएसएस की आधिकारिक फाइलिंग में सौमित्र गोखले को सालाना 36,000 डाॅलर कमाने वाले ‘योग प्रशिक्षक’ के रूप में दर्ज किया गया है. लेकिन वे वास्तव में आरएसएस के विदेश विभाग के वैश्विक संयोजक के तौर पर काम करते हैं. वे दुनिया भर की यात्रा करके संघ के सर्वाेच्च निकायों की बैठकें आयोजित करते हैं.
संघ परिवार के खिलाफ विरोध का भी एक लंबा इतिहास रहा है. यह उदारवादी संगठनों की पैरवी, शोध और राष्ट्रीय स्तर पर लाॅबिंग से लेकर मोहल्लों और शहरों में फासीवाद-विरोधी लामबंदी तक फैला हुआ है. न्यूयाॅर्क में भागवत की रैली के बाद उदारवादी गैर-सरकारी संगठनों ने 90 निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर उनसे आरएसएस से जुड़े संगठनों से मिलने वाले चंदे को ठुकराने की मांग की. संघ के विशाल नेटवर्क को उजागर करना जरूरी है और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच लाॅबिंग करना भी उपयोगी हो सकता है. लेकिन केवल इन तरीकों से काम नहीं चल सकता. हमारा सामना एक ऐसी विशाल ताकत से है, जिसके पास भारी संसाधन हैं, जो बेहद संगठित है और प्रवासी भारतीयों के सामाजिक जीवन में गहराई तक अपनी पैठ बना चुकी है. साथ ही, भारत की सरकार भी उसी के हाथों में है. इस ताकत को हराने के लिए उसके संस्थागत संरक्षण के ढांचे को तोड़ना और प्रवासी समुदाय के बीच काम की जगहों, सामुदायिक केंद्रों तथा रोजमर्रा के सामाजिक जीवन में संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है. मिसाल के तौर पर, इस साल ‘ड्रम बीट्स’ (DRUM Beats) से जुड़े दक्षिण एशियाई मेहनतकश साथियों ने न्यूयाॅर्क राज्य की असेंबली सदस्य जेनिफर राजकुमार को हराने में अहम भूमिका निभाई, क्योंकि उसे हिंदुत्ववादी ताकतों से चंदा और समर्थन मिल रहा था.
अमेरिकी समाज में भारतीय-अमेरिकियों की जिस ‘सफलता की कहानी’ का खूब गुणगान किया जाता है, उसकी बुनियाद प्रवासियों की मेहनत और संघर्ष से ज्यादा उस दौलत पर टिकी है, जो सदियों से ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा जमीन पर कब्जा जमाने, शिक्षा पर एकाधिकार कायम करने और उत्पीड़ित जातियों के श्रम की लूट से जमा की गई है. यही दौलत आगे चलकर वैश्विक टेक कंपनियों की पूंजी का हिस्सा बनी है. न्यू जर्सी के राॅबिन्सविल में बना बीएपीएस मंदिर परिसर इसका एक उदाहरण है. अमेरिका में इस मंदिर परिसर के खिलाफ दायर एक राष्ट्रीय मुकदमे से भारत से लाए गए हाशिये की जातियों के पत्थर तराशने वाले मजदूरों की बर्बर तस्करी का खुलासा हुआ. इन मजदूरों के पासपोर्ट छीन लिए गए, उन्हें पहरेदारों की निगरानी वाले परिसरों में बंद रखा गया और उनसे हफ्ते के सातों दिन, रोजाना बारह घंटे से अधिक काम कराया गया. इसके बदले उन्हें महज 1.20 डाॅलर प्रति घंटे की मजदूरी दी गई. इसी अमानवीय शोषण के जरिए भारत के बाहर आधुनिक हिंदू मंदिरों में सबसे बड़ा मंदिर बनाया गया.
यही राजनीति कानून और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम करती है. जब एचएएफ ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानूनी सुरक्षा देने वाले प्रावधानों को खत्म कराने की कोशिश की, तब उसने ‘हिंदूफोबिया’ की भाषा का इस्तेमाल किया. इनमें कैलिफोर्निया का एसबी 403 विधेयक और दूसरे राज्यों में ऐसे ही विधेयक शामिल थे. उसने स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से जाति का उल्लेख हटाने की भी मुहिम चलाई.
यह एक सोची-समझी चाल है, जिसका मकसद दबंग जातियों को कानून की पहुंच से बाहर रखना है, ताकि वे हाशिये की जातियों के श्रम का शोषण जारी रख सकें और सिलिकाॅन वैली में कार्यस्थलों पर जातिगत रंगभेद जैसी व्यवस्था कायम रख सकें.
मैडिसन स्क्वायर गार्डन के बाहर दक्षिण एशियाई संगठनों के साथ खड़े फिलिस्तीनी कार्यकर्ता महज एकजुटता का प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं कर रहे थे. वे एक ऐसे वास्तविक रिश्ते को उजागर कर रहे थे, जिसकी वैचारिक और भौतिक, दोनों बुनियादें हैं. हिंदुत्व और जायोनिज्म की वैचारिक जड़ें एक-दूसरे से जुड़ी हैं. शुरुआत में ये विचारधाराएं महज वैचारिक कल्पनाओं के रूप में उभरीं, लेकिन आगे चलकर इनके बीच ठोस गठजोड़ कायम हो गया.
भारत, इजराइल के हथियार उद्योग का सबसे बड़ा ग्राहक है. भारत और इजराइल की कंपनियां अब भारत की जमीन पर मिलकर हथियार बनाने का काम भी तेजी से कर रही हैं. शोधकर्ताओं ने दर्ज किया है कि भारतीय राज्य ने कश्मीर में इजराइल के कब्जे की व्यवस्था और उसके तौर-तरीकों का अध्ययन किया है और उन्हें अपनाया भी है. अमेरिका में हिंदुत्व समर्थक लाॅबी ने इजराइल समर्थक लाॅबी के तौर-तरीकों का अध्ययन करके और उसके साथ साझेदारी करके अपना संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया. 2002 में बने ‘यूएस-इंडिया पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी’ ने अमेरिकी इजराइल पब्लिक अफेयर्स कमेटी (एआईपीएसी) और अमेरिकन ज्यूइश कमेटी के संगठनात्मक माॅडल को सीधे अपनाया. 2015 में स्टीव बैनन को मानद सह-अध्यक्ष बनाकर गठित ‘रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन’ ने खुद को ‘बेहद सफल रिपब्लिकन ज्यूइश कोएलिशन की तर्ज पर बना संगठन’ बताया. इससे भी पहले, 1993 में एक भारतीय-अमेरिकी राजनीतिक संगठन ने वाॅशिंगटन डीसी में राजनीतिक गलियारों में अपनी राह बनाने के लिए एआईपीएसी के एक कार्यरत विधायी संपर्क अधिकारी की सेवाएं ली थीं.
प्रवासी समुदायों के बीच सक्रिय साम्राज्यवाद-विरोधी संगठन हिंदुत्व के खिलाफ संघर्ष को जायोनिज्म के खिलाफ चल रहे आंदोलनों से तेजी से जोड़ रहे हैं. सलाम के ‘टाटा बाय-बाय’ अभियान की शुरुआत अक्टूबर 2024 में न्यूयाॅर्क में हुई थी. बीस से अधिक संगठनों ने इस अभियान का समर्थन किया है. इसकी मांग है कि टाटा समूह को न्यूयाॅर्क सिटी मैराथन के प्रायोजक से हटाया जाए. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) इस मैराथन का मुख्य प्रायोजक है. इस अभियान का आरोप है कि टाटा समूह हथियारों के उत्पादन (टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स), बख्तरबंद वाहनों (जगुआर लैंड रोवर) और इजराइली सेना को आईटी तथा क्लाउड सेवाएं मुहैया कराने (टीसीएस) के जरिए इजराइल की युद्ध मशीन को ताकत दे रहा है. ऐसे अभियान इस बात पर जोर देते हैं कि फासीवाद का मुकाबला करने के लिए उसकी पूरी आपूर्ति श्रृंखला के खिलाफ संघर्ष संगठित करना होगा. इसमें उसे आर्थिक ताकत देने वाली पूंजी (टाटा), उसे टिकाए रखने वाला ‘सामाजिक सेवा’ का नेटवर्क (आरएसएस) और उसे बनाए रखने वाली भू-राजनीतिक ताकतें (भारत-इजराइल गठजोड़), तीनों को निशाना बनाना जरूरी है.
मोहन भागवत अमेरिका में आरएसएस का परिचय कराने न्यूयाॅर्क नहीं आए थे. वे उस जमीन का जायजा लेने और वहां अपनी पकड़ मजबूत करने आए थे, जिस पर संघ पहले ही अपना दावा कर चुका है. लेकिन मैडिसन स्क्वायर गार्डन के बाहर एक दूसरी तस्वीर भी सामने आई. वहां दक्षिण एशियाई प्रवासी समुदाय के मेहनतकश, साम्राज्यवाद-विरोधी और जाति-विरोधी लोग एकजुट होकर खड़े थे. वे अपने समुदाय को संघ के हवाले करने के लिए तैयार नहीं हैं. हमारा काम सिर्फ ‘सार्वभौमिक एकात्मता’ के मुखौटे को उतारना ही नहीं है, ताकि बुलडोजर से उजाड़े गए घरों, जातिगत हिंसा और छीनी गई जमीन की सच्चाई प्रवासी अभिजात वर्ग की खोखली बातों के नीचे दबकर न रह जाए. साम्राज्यवादी सत्ता के केंद्र में हमारा संघर्ष ठोस टकराव की राजनीति और मोहल्ले-दर-मोहल्ले, शहर-दर-शहर संगठन खड़ा करने की मांग भी करता है.