यह 26 जनवरी 2026 का दिन था. पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, देश के लोकतंत्र बनने का दिवस. लेकिन उत्तराखंड के पौड़ी जिले के कोटद्वार शहर में आजादी और लोकतंत्र के संग्राम की विरासत का माखौल उड़ाते हुए, कुछ लोग, एक बुजुर्ग दुकानदार को उनके धर्म के आधार पर निशाना बनाने के लिए उतरे. जिन्होंने कोटद्वार में बुजुर्ग को निशाना बनाने के लिए 26 जनवरी के दिन का चुनाव किया, उन्होंने अपने संगठन का नाम बजरंग दल बताया.जाहिर सी बात है कि न आजादी के आंदोलन की विरासत से उनका कोई सरोकार है और ना ही लोकतांत्रिक मूल्यों में उनका विश्वास! इसलिए देश के गणतंत्र बनने के दिवस का उपयोग भी उन्होंने सांप्रदायिक जहर के प्रसार के दिन के रूप में किया. किसी गैर मुद्दे को कैसे सांप्रदायिक नफरत के औजार के तौर पर उपयोग किया जा सकता है, यह कोटद्वार के उक्त प्रकरण में दिखाई दिया.
उस दिन ‘बाबा कलेक्शन’ के नाम से कोटद्वार में कपड़े और स्कूल ड्रेस की दुकान चलाने वाले वकील अहमद की दुकान पर खुद को बजरंग दल का बताने वाले कुछ लोग आये और उनसे दुकान का नाम बदलने को कहने लगे.
देश और उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनने के बाद, हिंदू धर्म के कुछ स्वयंभू ठेकेदार पैदा हो गए हैं, जो हर घड़ी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के तौर-तरीके ढूंढते रहते हैं. इसलिए वकील अहमद की दुकान को निशाना बनाने के लिए उन्होंने तर्क या कुतर्क गढ़ा कि उनकी दुकान का नाम ‘बाबा’ है और ‘बाबा’ हिंदू शब्द है. कोटद्वार में बाबा सिद्धबली का मंदिर है. इसलिए वकील अहमद को अपनी दुकान का नाम बदल देना चाहिए. 70 वर्षीय वकील अहमद बीते 30 सालों से कोटद्वार में इसी नाम से दुकान चलाते रहे हैं और किसी को ना तो उनकी दुकान के नाम से कोई परेशानी हुई और ना ही उनके धर्म से! लेकिन धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों का तर्क से क्या वास्ता. उन्हें तो अपना नफरती एजेंडा आगे बढ़ाना है. मनुष्यता, तर्क और बुद्ध से उनका वास्ता होता तो वे जानते कि जिस बाबा शब्द को वो विवाद और उन्माद के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं, वो बाबा शब्द किसी एक भाषा या धर्म की मिलकियत नहीं है. वो तुर्की, फारसी, स्लाविक (रूसी, पोलिश, चेक आदि) से लेकर जापानी तक विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग होने वाला शब्द है.
बहरहाल, जब एक 70 वर्षीय बुजुर्ग को धमकाए जाने के स्वर बगल की दुकान में बैठे जिम ट्रेनर दीपक कुमार और उनके दोस्त विजय रावत तक पहुंचे तो वे मौके पर आये. दीपक और विजय ने बुजुर्ग को दुकान के नाम पर परेशान किये जाने का विरोध किया. इस पर बजरंग दल के लोगों ने दीपक से उनका नाम पूछा तो उन्होंने बुजुर्ग के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए नाम बताया – मोहम्मद दीपक!
दीपक और विजय के प्रतिरोध के चलते बजरंग दल वालों को दुकान से जाना पड़ा. लेकिन दीपक को निशाना बनाने के लिए उन्होंने ही वीडियो का वह अंश वायरल किया, जिसमें वो अपना नाम – मोहम्मद दीपक – बता रहे हैं. धर्मांधता के मारे बजरंगियों को लगा कि इससे वे समाज में दीपक के प्रति नफरत का भाव पैदा करने में कामयाब हो जायेंगे. लेकिन हुआ इसका उलट. वीडियो वायरल होने के साथ ही लोगों ने सांप्रदायिक घृणा और उन्माद के इस दौर में एक मुस्लिम बुजुर्ग के पक्ष में मजबूती से खड़े होकर अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताने वाले दीपक कुमार को सौहार्द और प्रेम की नयी मिसाल के तौर पर देखा.
बजरंग दल वालों के उत्पात का सिलसिला यहां रुका नहीं. 31 जनवरी को वे देहरादून, हरिद्वार से इकठ्ठा हो कर फिर कोटद्वार पहुंचे. उन्होंने उस दिन जम कर बवाल किया, दीपक कुमार के जिम के सामने सड़क जाम की, गाली-गलौज की और सांप्रदायिक नारे उछाले. ऐसा उत्पात वो उस दिन कर रहे थे, जबकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी कोटद्वार में मौजूद थे. पुलिस का तर्क था कि बजरंग दल वाले बवाल इसलिए कर पाए क्यूंकि मुख्यमंत्री उस दिन कोटद्वार में थे और सारी पुलिस फोर्स मुख्यमंत्री की सुरक्षा में लगी हुई थी. होना तो इसके उलट चाहिए था. मुख्यमंत्री के शहर में मौजूद रहने के समय तो हर तरह के उत्पात को रोकने का मुकम्मल इंतजाम होना चाहिए था. इससे ज्यादा कानून-व्यवस्था के फेल होने का उदाहरण और क्या हो सकता है कि शहर के एक हिस्से में मुख्यमंत्री मौजूद हों और शहर के दूसरे हिस्से में उन्मादी सड़क जाम करके गाली-गलौज और सांप्रदायिक जहर उलीच रहे हों!
किसी अन्य मुख्यमंत्री के राज में ऐसा हुआ होता तो ऐसी गंभीर लापरवाही के लिए पुलिस के अफसरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होती. लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तो खुद ही आए दिन सांप्रदायिक नफरत की भाषा बोलते रहते हैं. रोज नए प्रकार के जेहादों का जिक्र करके वे अल्पसंख्यकों के प्रति अपने द्वेष को प्रकट करते रहते हैं. हाल ही में वाशिंगटन स्थित अमेरिकी थिंक टैंक – सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट – द्वारा जारी रिपोर्ट – हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया-रिपोर्ट 2025 – में पुष्कर सिंह धामी, 2025 में सबसे ज्यादा नफरत भरे भाषण देने वाले व्यक्ति बताए गए हैं. रिपोर्ट बताती है कि नफरत भरे भाषणों वाले आयोजनों के मामले में उत्तराखंड चौथे स्थान पर रहा. नफरत भरे भाषण वाले आयोजनों के मामले में राज्य तो चौथे स्थान पर रहा, लेकिन मुख्यमंत्री नफरत भरे भाषण देने में पहले नंबर पर रहे यानि वे बिल्कुल आगे बढ़ कर इस नफरती अभियान की अगुवाई कर रहे हैं.
यह भी एक कारण है कि राज्य की पुलिस सांप्रदायिक तत्वों के प्रति मुलायम रुख रखती है और वे रोज राज्य के विभिन्न हिस्सों में उत्पात मचाते रहते हैं.
दीपक कुमार के मुस्लिम बुजुर्ग के पक्ष में खड़े होने से सिर्फ उन्मादी सांप्रदायिक तत्वों को ही परेशानी नहीं हुई बल्कि ऐसा लगता है कि उत्तराखंड सरकार और उसकी पुलिस को भी इससे भारी दिक्कत महसूस हुई है. इसीलिए पुलिस ने दीपक की शिकायत पर बजरंग दल के लोगों के खिलाफ तो एफआईआर नहीं की, लेकिन बजरंग दल वालों के द्वारा दी गयी मनगढ़न्त शिकायत पर दीपक कुमार और विजय रावत के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली. बजरंग दल वालों दी गयी शिकायत कितनी झूठी है, उसे इस बात से समझ सकते हैं कि शिकायतकर्ता ने लिखा है कि वे अपने साथियों के साथ विश्व हिंदू परिषद् की धर्म रक्षा निधि के निमित्त जनसंपर्क के लिए गए थे! जबकि सबने देखा कि वे तो दुकान का नाम बदलने के लिए एक अल्पसंख्यक बुजुर्ग को धमकाने के लिए गए थे!
उत्तराखंड सरकार और पुलिस के लंपट सांप्रदायिक तत्वों के प्रति उदार रवैये का ही नतीजा था कि सांप्रदायिक तत्वों ने पिछले एक महीने में मसूरी में 100 साल पुरानी सूफी संत और कवि बाबा बुल्ले शाह की मजार तोड़ी, देहरादून के विकासनगर में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं के साथ बर्बर मारपीट की और फिर कोटद्वार में बवाल का एक सिलसिला चालू कर दिया. 12 फरवरी को भी सांप्रदायिक तर्त्वों के एक और समूह ने कोटद्वार जा कर दीपक कुमार के जिम पर हमला बोलने का ऐलान किया. वामपंथी पार्टियों तथा नागरिक संगठनों द्वारा इसके खिलाफ राज्य के पुलिस मुख्यालय पर दबाव बनाए जाने के बाद पुलिस ने इन सांप्रदायिक तत्वों को कोटद्वार जाने से रोका. लेकिन इनमें से लंपट तत्वों में से एक ने दीपक कुमार का सिर काट कर लाने वाले को 55 लाख रुपये देने का ऐलान ठीक ऋषिकेश पुलिस स्टेशन के बाहर ही कर दिया. सीधे हत्या के लिए उकसाने जैसी इतनी गंभीर घटना के बाद भी पुलिस ने गिरफ्तार करने के बजाय एफआईआर दर्ज करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली.
भाजपा की कोशिश है कि उत्तराखंड को अपने सांप्रदायिक नफरत की प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया जाए. लेकिन समाज में बेइंतहा सांप्रदायिक जहर घोलने के बावजूद दीपक कुमार जैसे युवाओं का सांप्रदायिक तत्वों के सामने तन कर खड़ा होना दर्शाता है कि समाज में मनुष्यता के तंतु अभी भी जिंदा हैं. पिछले वर्ष अप्रैल के महीने में नैनीताल में एक बच्ची के दुष्कर्म की घटना में ठेकेदार उस्मान खान का नाम आने के बाद अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाए जाने के खिलाफ एक युवा महिला शैला नेगी सांप्रदायिक तत्वों के सामने खुल कर खड़ी हो गयी. इस तरह देखें कि सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ अकेले होने के बावजूद युवा, ऐसे तत्वों के खिलाफ मजबूती से खड़े होते रहे हैं.
बजरंगियों के लिए मोहम्मद दीपक नाम अनोखा हो सकता है क्यूंकि उनकी वैचारिक धारा का इस देश की आजादी की लड़ाई से कोई संबंध नहीं रहा है. लेकिन इस देश की आजादी की लड़ाई की विरासत के साथ जुड़ाव रखने वाले जानते हैं कि 1940 में लंदन में माइकल ओ डायर की हत्या करने के बाद ऊधम सिंह, ब्रिटिश पुलिस द्वारा जब गिरफ्तार किये गए तो उन्होंने अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद बताया था!
कोटद्वार, उन कॉमरेड चन्द्र सिंह गढ़वाली की भी कर्मस्थली रही है, जिन्होंने गढ़वाली सिपाहियों के साथ मिलकर 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में निहत्थे पठान स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ गोली चलाने से इंकार कर दिया था.
जब सत्ता के शीर्ष पर सांप्रदायिक घृणा फैलाने वाले काबिज हैं, ऐसे समय में देश की इस गंगा-जमुनी तहजीब और साझी शहादत-शहादत विरासत को बुलंद करने की पुरजोर जरूरत है. ऐसे हर प्रयास के साथ मजबूती के साथ खड़े होने की जरूरत है.