नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने देश के 13 प्रतिशत आबादी वाले दलितों और वंचित समुदायों से नेपाल में उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के लिए राज्य की ओर से औपचारिक क्षमायाचना की है. उनके इस कदम की नेपाल के बाहर भी काफी तारीफ हो रही है. सरकार गठन के तीसरे दिन 28 मार्च 2026 को अपने शासन में सुधारों के लिए 100 सूत्रीय एजेंडे को बालेन्द्र सरकार की कैबिनेट ने मंजूरी दी थी. यह क्षमायाचना भी उसी 100 सूत्री एजेंडे का हिस्सा है. इस सूची को 29 मार्च, 2026 को सार्वजनिक किया गया. ‘परिणाम आधारित शासन’ के नाम से प्रचारित इस एजेंडे में ‘प्रशासनिक सुधार, भ्रष्टाचार नियंत्रण, डिजिटल सेवा वितरण, राजनीतिक हस्तक्षेप को हटाना, सेवाओं को सरल बनाना और जन शिकायतों का निवारण करना’ को प्राथमिकता देने की बात की गई है. एजेंडे के अधिकांश कार्यों को 15 से 100 दिनों के भीतर पूरा करने का वादा किया गया है. यह सुधार कार्यक्रम ‘डिजिटल नेपाल’, भ्रष्टाचार के प्रति ‘शून्य सहनशीलता’, राजनीति मुक्त प्रशासन और जन केंद्रित सेवाओं पर जोर देने की वकालत करता है.
भारत की तरह ही जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलितों के पांव धोने का नाटक करते हैं, तो दूसरी ओर पूरे देश में दलितों, आदिवासियों और गरीबों की झोपड़ियों, स्वरोजगार पर बुल्डोजर चलते हैं. ठीक उसी तरह नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भी दलितों से मांगे गए अपने माफीनामे के एक सप्ताह के अन्दर ही अतिक्रमण हटाने के नाम पर पूरे नेपाल में गरीबों की झोपड़ियों और सड़क किनारे व सरकारी भूमि से उनके रोजगार पर बुल्डोजर चलाना शुरू कर दिया है. कृषि व भूमि से अवैध कब्जे की समस्या का समाधान (1000 दिनों की विशेष योजना) तथा सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा इस एजेंडे का हिस्सा है, जो मोदी सरकार की तरह कारपोरेट के लिए भूमि बैंक तैयार करनी की योजना हो सकती है. इसके तहत बालेन्द्र सरकार का बुल्डोजर भारत नेपाल सीमा पर ‘नो मेंस लेंड’ क्षेत्र, पोखरा, फेवा झील, नारायण घाट, तोखा, जयनगर (मधुबनी), भीमनगर (सुपौल), इनरवा, बैतोंहा, हेटौडा आदि क्षेत्रों में दलितों, जनजातियों, और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की हजारों झोपड़ियों और रोजगार के ठीयों को ध्वस्त कर चुका है. अभी एक माह पूर्व ही सम्पन्न हुए नेपाल के चुनावों में बड़े बदलाव की उम्मीद लगाकर ‘बालेन-बालेन’ का नारा लगाने वाले नेपाल के दलित और गरीब अब खुद को ठगा महशूश करने लगे हैं.
हालांकि नेपाल के वर्तमान संविधान (2015 में लागू) में दलित और जनजाति (आदिवासी) दोनों समुदायों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं. ये प्रावधान मुख्य रूप से भाग 3 (मौलिक अधिकार और कर्तव्य) में शामिल हैं. इसके अतिरिक्त, समानता के अधिकार, सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और संवैधानिक आयोगों के माध्यम से भी विशेष प्रावधान किए गए हैं. ‘अनुच्छेद 40 : दलितों के अधिकार’ में दलितों के अधिकारों को उनके मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया गया है. जिसमें आनुपातिक समावेश के सिद्धांत के आधार पर सभी राज्य निकायों (संघीय, प्रांतीय, स्थानीय स्तर, लोक सेवा, सेना, पुलिस, आदि) में भाग लेने का दलितों का अधिकार, छात्रवृत्ति के साथ प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक निःशुल्क शिक्षा, तकनीकी और व्यावसायिक उच्च शिक्षा में उनके लिए विशेष प्रावधान, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए दलित समुदाय हेतु विशेष प्रावधान, उनके पारंपरिक ज्ञान, कौशल और प्रौद्योगिकी का संरक्षण और विकास. आधुनिक व्यवसायों में प्राथमिकता के साथ उन्हें कौशल और संसाधन उपलब्ध कराना शामिल है. अब देखना यह होगा कि बालेन्द्र सरकार संविधान संशोधन में दलितों-जनजातियों के लिए नया क्या करती है.
अपने 100 सूत्री एजेंडे में बालेन्द्र शाह सरकार ने सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और विश्वविद्यालयों से जुड़े लोगों के लिए राजनीतिक दलों की सदस्यता लेने पर प्रतिबंध लगाने की बात की है. विश्व विद्यालय परिसरों में राजनीतिक दलों से संबद्ध छात्रा संगठनों पर भी प्रतिबन्ध लगाकर छात्रों के वैचारिक राजनीतिक क्रियाकलापों को पूरी तरह नियंत्रित करने की घोषणा की गयी है. यही नहीं नेपाल के सभी सरकारी सार्वजनिक संस्थानों में राजनीतिक दलों से संबद्ध ट्रेड यूनियनों पर भी रोक लगा दी जाएगी. अनुत्पादक बोर्डों, समितियों और दोहरी अधिकार क्षेत्र वाली संस्थाओं को भंग करना या उनका पुनर्गठन कर उनके निजीकरण के दरवाजे खोले जा सकेंगे. इस तरह संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना से समाजवादी नेपाल की ओर संक्रमण का सपना देखने वाली नेपाल की प्रबुद्ध और मेहनतकश जनता के सामने जेनजी आन्दोलन एक प्रतिक्रांति की तरह प्रकट हो गया है. अब बालेन्द्र शाह सरकार ने राजशाही के दौर की तरह छात्रा और मजदूर संगठनों की राजनीतिक और आंदोलनात्मक गतिविधियों पर प्रतिबंध के साथ नेपाल में लोकतंत्र के लिए खुले दरवाजों को बंद करने की शुरुआत कर दी है.
छः दशक तक चले संघर्षों और भारी कुर्वानियों के बाद नेपाल ने संवैधानिक लोकतंत्र की ओर अपने कदम बढ़ाए थे. लेकिन संवैधानिक लोकतंत्र की राह पर चले मुश्किल से एक दशक ही बीता था, कि इस राह पर नेपाल को ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कम्युनिस्टों के व्यवहार ने नेपाल के लोगों को काफी निराश कर दिया. ऐसा नहीं है कि नेपाल के लोगों ने कम्युनिस्टों का साथ नहीं दिया. पिछले 20 वर्षों में कम्युनिस्टों को जनता ने हर चुनाव में बहुमत देकर या बहुमत के करीब पहुंचा कर नेपाल की तकदीर बदलने की उम्मीद बांधे रखी. पर सत्ता के लिए लगातार गठजोड़ बदलने वाली नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने पक्ष में खड़ी जनता को निराश ही किया. लगभग हर डेढ़ वर्ष के अंतराल में प्रधानमंत्री बदलने वाली नेपाल की राजनीति के कारण वहां नौकरशाही बेलगाम हो गयी और भ्रष्टाचार लोक जीवन का हिस्सा बन गया. नतीजे के तौर पर नेपाल की नई पीढ़ी के अन्दर एक स्थाई सरकार के निर्माण का सपना जोर मारने लगा. नई पीढ़ी के अन्दर पनप रहे इस भारी असंतोष को समय पर भांपने में कम्युनिस्ट पार्टियों की नाकामी ही नेपाल को आज संवैधानिक लोकतंत्र से एक प्रतिक्रियावादी शासन की ओर धकेलने का कारण बनी है.
‘कॉमन स्कूल सिस्टम’ अभी भी दूर
नेपाल की नई शिक्षा नीति में ‘समान शिक्षा’ और वहां ‘प्राइवेट स्कूलों की बंदी’ के बारे में भारत में आजकल खूब खबरें छप रही हैं. सोशल मीडिया पर लोग इसे नेपाल के कम्युनिस्टों और दुनिया के लिए एक सीख बताते हुए पूछ रहे हैं कि भारत और अन्य देश ऐसा साहस कब दिखाएंगे. परन्तु सच तो यह है कि ये खबरें पूरी तरह झूठी और भ्रामक हैं. नेपाल में न तो प्राइवेट स्कूलों को बंद करने का कोई आदेश हुआ है और न ही ‘समान शिक्षा’ के लिए कोई नई नीति घोषित हुई है. नेपाल की बालेन्द्र सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में जिन बदलावों की घोषणा की है, वे इस तरह हैं –
1. पांचवीं कक्षा तक कोई आतंरिक परीक्षा नहीं होगी ताकि बच्चों का तनाव कम हो सके.
2. स्कूलों और विश्वविद्यालयों में राजनीतिक पार्टियों से जुड़े छात्र संगठनों और छात्र संघ चुनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाएगा.
3. विदेशी नाम वाले प्राइवेट स्कूलों (जैसे ऑक्सफोर्ड, पेंटागन और सेंट जेवियर) को नेपाली नाम अपनाने का निर्देश दिया गया है.
4. कोचिंग सेंटर/ब्रिज कोर्स पर आंशिक प्रतिबंध लगाया है, विशेषकर एसईई के बाद वाले कोर्सों पर.
5. प्राइवेट स्कूलों को नए सत्र से नियम विरुद्ध ली गयी अवैध एडमिशन फीस वापस करने और नियमों का पालन करने की चेतावनी दी गई है.
यह नई सरकार द्वारा जारी 100 सूत्रीय एजेंडे में शिक्षा के संबंध में किये जाने वाले बदलावों में शामिल बिंदु हैं. इस तरह देखें तो नेपाल की बालेन्द्र शाह सरकार ने प्राइवेट स्कूल बंद करके एक ही तरह की शिक्षा व्यवस्था लाने का न कोई आदेश दिया है और न ही ऐसा कुछ उसके घोषित एजेंडे में है. नेपाल में प्राइवेट स्कूल अभी भी पहले की तरह चल रहे हैं और आगे भी चलते रहेंगे.