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लाठियों के साये में शिक्षा का सवाल: छात्रों के मार्च पर पुलिसिया दमन

लाठियों के साये में शिक्षा का सवाल: छात्रों के मार्च पर पुलिसिया दमन

बिहार की राजधानी पटना ने 1 जुलाई को एक ऐसा मंजर देखा जिसने शिक्षा, लोकतंत्र और राज्य की भूमिका पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए. 7.5 CGPA की अनिवार्यता और नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के खिलाफ ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा), बिहार के नेतृत्व में गांधी मैदान से राजभवन तक एक छात्र मार्च निकाला गया. इस मार्च में पटना विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय व वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय सहित बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया.

छात्रों का कहना था कि 7.5 CGPA की अनिवार्यता उच्च शिक्षा को सीमित करने वाला एक ऐसा प्रावधान है जो विशेष रूप से वंचित, ग्रामीण और मेहनतकश तबकों के छात्रों को शोध और उच्च शिक्षा के अवसरों से बाहर धकेलता है. उनका विरोध केवल एक नियम तक सीमित नहीं था, बल्कि नई शिक्षा नीति के उस व्यापक ढांचे के खिलाफ भी था जिसे वे शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के बजाय उसके बाजारीकरण की दिशा में उठाया गया कदम मानते हैं.

मार्च का नेतृत्व आइसा बिहार के राज्य अध्यक्ष धनंजय, राज्य सचिव दीपांकर, राज्य उपाध्यक्ष मनीषा, राज्य सह सचिव अदिति, पटना विश्वविद्यालय इकाई की सचिव सबा आफरीन, अध्यक्ष नीतीश के साथ ही आशीष, दीपक, विवेक आनंद सुंदर, मोनू, दीपू, विकास तथा अन्य छात्र नेताओं ने किया.

राजभवन की ओर बढ़ रहे शांतिपूर्ण मार्च को पुलिस ने रास्ते में रोक दिया. प्रदर्शनकारियों के अनुसार, बिना किसी उकसावे के पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज किया. इस कार्रवाई में कई छात्र घायल हुए. आशीष के सिर और कान में गंभीर चोटें आईं, जबकि नीतीश के हाथ में गहरी चोट लगी. अनेक छात्रों ने आरोप लगाया कि उनके साथ मारपीट की गई, छात्राओं के साथ अभद्र व्यवहार (मैन हैंडलिंग) की गई और प्रदर्शनकारियों को घसीटते हुए पुलिस वाहनों में बैठाया गया.

लाठीचार्ज के बाद भी छात्र सड़क पर बैठकर शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध दर्ज कराते रहे. लेकिन पुलिस ने आंदोलन को समाप्त करने के लिए कई नेताओं और छात्रों को हिरासत में ले लिया. गांधी मैदान थाना द्वारा आइसा के राज्य अध्यक्ष धनंजय, राज्य सचिव दीपांकर, नीतीश, विवेक, विकास, दीपक और मोनू के अलावा आम छात्रों ऋृषु और अमर यादव को भी पुलिस ने हिरासत में रखा.

क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध का जवाब पुलिस बल और गिरफ्तारियों से दिया जाना चाहिए और शिक्षा के अधिकार और समान अवसर की मांग कर रहे छात्रों पर बल प्रयोग किया जाना चाहिए – इस घटना ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है. सम्राट चौधरी की भाजपा सरकार पुलिस दमन और हर तरह के जनवादी सुधारों को कुचलने का औजार बन चुकी है. सरकार संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है, जिससे लोकतांत्रिक असहमति के लिए उपलब्ध स्थान लगातार संकुचित हो रहा है.

आइसा ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए इसे छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज को दबाने का प्रयास बताया है और मांग की है कि हिरासत में लिए गए सभी छात्रों को बिना शर्त रिहा किया जाए, लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए, घायल छात्रों का समुचित उपचार सुनिश्चित हो तथा 7.5 CGPA की अनिवार्यता और नई शिक्षा नीति 2020 के छात्र-विरोधी प्रावधानों को वापस लिया जाए.

पटना की सड़कों घटित यह घटना उस संघर्ष का हिस्सा है जिसमें छात्र शिक्षा तक समान पहुंच, लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के भविष्य को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं. शिक्षा से जुड़े सवालों का जवाब क्या लोकतांत्रिक संवाद होगा या राज्य दमन. यही प्रश्न आज बिहार के छात्र आंदोलन के केंद्र में खड़ा है.

04 July, 2026