चुनाव आयोग और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेता अक्सर यह दलील देते सुनाई देते हैं कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ यानी एसआइआर कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह तो चुनावी प्रक्रिया का एक सामान्य और लगातार चलने वाला हिस्सा है. सुनने में यह बात बड़ी सीधी और सहज लग सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि अब पूरे देश में एसआइआर की जरूरत क्यों आ पड़ी और इसके जरिए असल में क्या किया जा रहा है?
जब किसी बात को सुबह-शाम बार-बार दोहराया जाता है, तो जनता का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे उसे सच मानने लगता है. मगर हकीकत यह है कि आजाद भारत की तारीख में पूरे देश के पैमाने पर ऐसा एसआइआर पहले कभी नहीं हुआ. यह पहली बार है जब पूरे देश को इस तरह की अचानक थोपी गई कवायद से गुजारा जा रहा है.
कुछ लोग 2002-2003 के दौर का हवाला देकर दावा करते हैं कि ऐसा पहले भी हुआ था. लेकिन इतिहास के पन्नों को साफ-साफ देखना जरूरी है. साल 2003 में जब जे. एम. लिंगदोह मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) थे, तब जो हुआ था वह केवल एक ‘गहन प्रकृति का विशेष पुनरीक्षण’ था. जनप्रतिनिधित्व कानून (रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट) की धारा 21 के तहत एसआइआर का कानूनी प्रावधान सिर्फ किसी एक चुनाव क्षेत्र या उसके किसी छोटे से हिस्से के लिए है, न कि पूरे हिंदुस्तान के लिए.
समूचे देश के लिए जो प्रक्रिया हर साल अपनाई जाती है, वह है एसएसआर यानी ‘विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण’ (स्पेशल समरी रिवीजन). यह प्रक्रिया सांस लेने की तरह इतनी सहज और लगातार चलती है कि आम लोगों को इसका अहसास तक नहीं होता. उसमें कुछ प्रशासनिक खामियां हो सकती हैं, लेकिन वह बिल्कुल अलग मसला है.
अगर चुनाव आयोग आज यह जतलाने की कोशिश करे कि एसआइआर तो हमेशा से होता आया है, तो यह सरासर गलतबयानी है. साल 2003 में कोई देशव्यापी एसआइआर नहीं हुआ था. आज जो करोड़ों लोग जिंदा हैं, वे 2003 में भी वोटर थे, लेकिन उनमें से किसी को भी याद नहीं पड़ता कि उस वक्त उन्हें अपनी वोट की पात्रता साबित करने के लिए कागजात का पुलिंदा बगल में दबाकर सरकारी बाबुओं या दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े हों. इसलिए आज जो कुछ हो रहा है, वह 2003 जैसा बिल्कुल नहीं है; ऐसा हमारे देश में पहले कभी नहीं देखा गया.
चुनाव आयोग और भाजपा के नेता अक्सर कहते रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगाई है. फिर भी, इसके तर्क पर सवाल उठाया जा सकता है. यह बहस से परे नहीं है. देश में न्यायपालिका, मीडिया, प्रशासन और राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली जगजाहिर है, हमें उसमें उतरने की जरूरत नहीं है. मगर सुप्रीम कोर्ट ने वह फैसला बहुत कमजोर बुनियाद पर लिया. वजह बिल्कुल साफ है – कानून की संबंधित धारा साफ तौर पर किसी एक इलाके या उसके हिस्से की बात करती है, पूरे देश की नहीं.
इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला खुलासा आरटीआई से हुआ. जब आरटीआई कार्यकर्ताओं ने एसआइआर कराने के फैसले से जुड़ी ‘फाइल नोटिंग्स’ मांगी, तो चुनाव आयोग में प्रधान सचिव के पद पर तैनात एक आईएएस अफसर ने बाकायदा लिखित में जवाब दिया कि आयोग के भीतर एसआइआर कराने को लेकर कोई औपचारिक फैसला ही नहीं हुआ था. यानी आयोग के पास इसका कोई दस्तावेज या फाइल नोटिंग तक मौजूद नहीं थी.
इस एसआइआर की शुरुआत सबसे पहले बिहार से की गई, जहां देखते ही देखते करीब 67 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए. गौर करने वाली बात यह भी है कि ये सारे आंकड़े अलग-अलग राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (सीईओ) की प्रेस रिलीज से जोड़े गए हैं, क्योंकि चुनाव आयोग खुद राष्ट्रीय स्तर पर राज्यवार कुल आंकड़े कभी जारी नहीं किया. बिहार एसआइआर के बाद जब आरटीआई के जरिए यह पूछा गया कि क्या इतनी बड़ी नीतिगत कवायद के बाद कोई औपचारिक समीक्षा की गई – जो कि किसी भी सरकारी नीति की गलतियों को पकड़ने और सुधारने का बुनियादी नियम होता है – तो आयोग का सीधा जवाब था कि कोई समीक्षा नहीं की गई.
जरा एक बुनियादी बात सोचिए: हमारे देश की आबादी बढ़ रही है या घट रही है? साफ है कि आबादी बढ़ रही है. और जब आबादी बढ़ेगी, तो वोटर लिस्ट में दर्ज नागरिकों का दायरा भी बढ़ना चाहिए. लेकिन इसके उलट, अब तक देश भर में लगभग 13.5 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से साफ कर दिए गए हैं. हम यह नहीं कहते कि मतदाता सूची में कोई फर्जी नाम, मृत व्यक्ति या कहीं और चले गए लोग नहीं होते. मगर 10 फीसदी गैर-हाजिर नामों को छांटने के बहाने 90 फीसदी जायज और असली वोटरों को लिस्ट से बाहर कर दिया गया है.
हमारा लोकतंत्र सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की बुनियाद पर खड़ा है. वोटर होने का आधार भाषा, जाति, लिंग, धर्म, टैक्स देना या संपत्ति नहीं है. एकमात्र शर्त है: उम्र 18 साल या उससे ज्यादा हो और दिमागी हालत ठीक हो. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) जैसे भरोसेमंद आंकड़ों से हर राज्य में 18 साल से ऊपर की आबादी का आंकड़ा साफ मिलता है. मान लीजिए किसी राज्य में 18 साल या उससे ऊपर के 100 वयस्क हैं. मतदाता सूची में कितने नाम होने चाहिए? आंकड़ों के फर्क से 99 या 101 समझ में आ सकते हैं, लेकिन 70 कोई स्वीकार नहीं कर सकता.
राज्यों के आंकड़े इस खेल की कलई पूरी तरह खोल देते हैं. बिहार में 18 साल से ज्यादा उम्र की कुल आबादी करीब 8.22 करोड़ है, लेकिन एसआइआर खत्म होने के बाद अंतिम वोटर लिस्ट सिमटकर 7.42 करोड़ रह गई. इसी तरह पश्चिम बंगाल में 93 लाख वोटर कम हो गए, तमिलनाडु में 97 लाख, गुजरात में 77 लाख, मध्य प्रदेश में 45 लाख, राजस्थान में 44 लाख और केरल में 24 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से गायब कर दिए गए.
अब सरकार के तर्कों को भी परख लेते हैं. पश्चिम बंगाल के मामले में यह दलील दी गई कि वहां बड़े पैमाने पर गैर-कानूनी घुसपैठ हुई है और पिछली राज्य सरकार ने राजनीतिक फायदे के लिए घुसपैठियों के वोट बनवा दिए थे, और अब मौजूदा राज्य सरकार वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने में सहयोग नहीं कर रही है. केंद्र का रुख यही रहा है कि ‘हम तो महज वोटर लिस्ट की सफाई कर रहे हैं, इसमें भला क्या बुराई है?’ लेकिन जरा ठहरकर इन दावों की हकीकत देखिए. पहली बात तो यह कि वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण चुनाव आयोग का काम है, राज्य सरकारों का नहीं. दूसरी बात, अगर गैर-भाजपा सरकारों पर असहयोग का इल्जाम है, तो फिर ‘डबल-इंजन’ वाले उत्तर प्रदेश का क्या? उत्तर प्रदेश में कितने वोट काटे गए? 2.89 करोड़ – करीब तीन करोड़ नाम हटा दिए गए. मीडिया ने इस पर लगभग खामोशी साधे रखी क्योंकि वहां फौरन कोई चुनाव नहीं था. क्या उत्तर प्रदेश की सरकार केंद्र या चुनाव आयोग के साथ तालमेल में नहीं थी? जाहिर है, असहयोग वाला यह बहाना पूरी तरह फिसड्डी साबित होता है.
दूसरी बात सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश की है, जिसे दरकिनार कर दिया गया. अदालत ने भले ही इस प्रक्रिया को मंजूरी दी हो, लेकिन उसने साफ शब्दों में यह व्यवस्था दी थी कि चुनाव आयोग को महज विदेशी होने के शक के आधार पर किसी का नाम काटने का कोई हक नहीं है. आयोग के अफसरों को ऐसे किसी भी संदिग्ध मामले को नागरिकता कानून, 1955 के तहत अधिकृत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना होगा. मई 2026 के आखिर में चुनाव आयोग के वकील ने अदालत में बाकायदा भरोसा दिलाया था कि यह काम एक महीने के भीतर पूरा कर लिया जाएगा. आज चार महीने बीत चुके हैं, मगर क्या चुनाव आयोग, गृह मंत्रालय या किसी भी सरकारी महकमे ने एसआइआर के दौरान पहचाने गए संदिग्ध गैर-नागरिकों की कोई सूची सार्वजनिक की है? एक भी मामला सामने नहीं रखा गया. फिर लाखों-करोड़ों विदेशी घुसपैठियों का वह सारा जहरीला नैरेटिव अचानक कहां गायब हो गया?
जमीनी हकीकत की तस्वीरें रोंगटे खड़े करने वाली हैं.
दिल्ली की चांदनी चौक विधानसभा के पोलिंग बूथ नंबर 333 पर कुल 99 वोटर दर्ज थे. एसआइआर की कैंची चली तो 98 नाम काट दिए गए और पूरी लिस्ट में महज 1 अकेला वोटर बचा रह गया. यही नहीं, दिल्ली के 24 विधानसभा क्षेत्रों में कुल दर्ज वोटरों की तादाद 2025 के विधानसभा चुनाव में पड़े असली वोटों से भी नीचे गिर गई.
हैदराबाद के मलकपेट हल्के में 2023 के चुनाव में कुल 1,32,246 वोट पड़े थे, जबकि एसआइआर में वहां 1,47,799 नाम काट दिए गए – यानी जितने वोट पड़े थे, उससे कहीं ज्यादा नाम लिस्ट से उड़ा दिए गए. याकूतपुरा में करीब 1,40,000 वोट पड़े थे, और वहां 1,54,000 से ज्यादा नाम काटे गए.
बिहार में चुनाव आयोग ने खुद माना कि 7.24 करोड़ पतों में से 1.42 करोड़ पते गलत पाए गए. छपरा के एक गांव में एक ही मकान नंबर पर देश भर के अलग-अलग राज्यों, जातियों और धर्मों के करीब 500 वोटर दर्ज दिखा दिए गए. जब पत्रकारों ने उस पते की पड़ताल की, तो जमीन पर वैसा कोई मकान ही मौजूद नहीं था.
और फिर, देश के भीतर रोजगार के लिए एक जगह से दूसरी जगह के प्रवास से कुल राष्ट्रीय वोटर लिस्ट में 13.5 करोड़ की कमी कैसे आ सकती है, जब तक कि कोई यह दावा न करने लगे कि 13.5 करोड़ हिंदुस्तानी देश छोड़कर ही चले गए हैं?
तो फिर असल सवाल यह है कि इस पूरी कवायद का असली मकसद क्या है? यह खेल महज किसी एक या दो चुनाव के तात्कालिक नफे-नुकसान का नहीं है. चुनावी जीत तो एक सिर्फ एक पहलू है, लेकिन यह साजिश हमारे जनतंत्र के बुनियादी ताने-बाने को बदल देने की है.
जब काटे गए नामों के पैटर्न को गौर से देखें, तो पता चलता है कि इसका सबसे बड़ा शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक (मुस्लिम और ईसाई), दलित, आदिवासी, जंगलों में रहने वाले लोग, असंगठित क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर और बेहद गरीब तबके बने हैं. ये वे लोग हैं जिनके पास न तो कागजात हैं और न ही अफसरशाही के दांव-पेचों की समझ. खोजी पत्रकारों की रिपोर्टें बताती है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले बीएलओ जैसे अफसरों को किनारे कर दिया गया और केंद्रीय डेटाबेस से सीधे नाम गायब किए गए.
असम को इस पूरी कवायद से बाहर रखा गया, और इसके पीछे की चालाकी समझना बेहद जरूरी है. असम में पहले ही एनआरसी हो चुका था, जिसमें 19 लाख से ज्यादा लोग बाहर हुए थे – जिनमें लगभग 12 लाख बंगाली हिंदू और करीब 7 लाख मुस्लिम थे. अगर असम में भी इस तरह का मशीनी और थोक एसआइआर लागू कर दिया जाता, तो मजबूरी में उन 12 लाख हिंदुओं के नाम भी वोटर लिस्ट से उड़ाने पड़ते. असम की मिसाल से विदेशी घुसपैठियों को छांटने का पूरा सरकारी तर्क ही भरभराकर गिर जाता है.
असल में यह साजिश भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के अलावा सामाजिक, क्षेत्रीय और आर्थिक आधार पर लोगों की बाकायदा प्रोफाइलिंग की है. इसके पीछे भारत को एक ऐसे सवर्ण हिंदू राष्ट्र में बदलने की विचारधारा है, जहां हाशिये के समुदाय और अल्पसंख्यक पूरे संवैधानिक अधिकारों के बिना दोयम दर्जे के बना दिए जाएं.
जरा उस 500 लोगों की बस्ती की हालत सोचिए, जहां किसी के पास वोट देने का हक ही न बचा हो. कोई भी नेता या अफसर उनके पीने के पानी, बिजली, नाली, सड़क या स्कूल के लिए एक कदम भी नहीं उठाएगा. वोट का हक छिनते ही इंसान इस जम्हूरियत में अपनी हैसियत खो बैठता है. अब तक 13.5 करोड़ लोगों की यह हैसियत छीनी जा चुकी है, और जब जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा और नगालैंड जैसे बचे हुए इलाकों में यह काम पूरा होगा, तो यह आंकड़ा बढ़कर 14 करोड़ तक पहुंच जाएगा.
इतिहास गवाह है कि यूरोप और दूसरी जगहों पर राष्ट्र-राज्य आबादी की शक्ल बदलने के लिए अक्सर शारीरिक हिंसा, जबरन बेदखली और जातीय सफाये का सहारा लेते थे. मगर 21वीं सदी के भारत में जो हो रहा है, वह एक निहायत खामोश और रक्तहीन तरीके से किया जा रहा राजनीतिक मताधिकार-हनन है. नागरिक को नहीं, नागरिकता को ही मिटा देना.
जब इस तरह चुन-चुनकर एक ‘क्युरेटेड’ यानी तराशी हुई वोटर लिस्ट तैयार हो जाएगी, तो हर राजनीतिक पार्टी को मजबूरी में सिर्फ बचे हुए वोटरों की ही चिंता करनी पड़ेगी.
इजराइल इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहां एक घोषित नस्ली-राष्ट्रवादी और रंगभेदी ढांचे के तहत सारी मुख्यधारा की पार्टियां सिर्फ प्रभावी बहुसंख्यक आबादी के हितों की ही बात करती हैं.
इस खतरे की गहराई को वक्त रहते समझना होगा. कई जनप्रतिनिधि अपने इलाके में वोट कटने की खबरों पर यह सोचकर बैठे हैं कि इससे उनके जीत के फासले पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. लेकिन वे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में हो रहे बुनियादी बदलाव को नहीं पहचान रहे.
इससे पहले कि छांटी गई यह वोटर लिस्ट एक कभी न बदलने वाली हकीकत बन जाए, भारतीय लोकतंत्र के समावेशी स्वरूप को बचाने के लिए हमारी आखिरी उम्मीद जनता की मुस्तैद पहरेदारी, पुरअमन लोकतांत्रिक लामबंदी और एक ऐसा साझा प्रतिरोध ही है जिसकी बुनियाद सक्रिय नागरिक असहमति में हो.
(एसआइआर पर सुजीत नायर के साथ परकला प्रभाकर की बातचीत पर आधारित)