भारत में फासीवाद के खतरनाक उभार पर चर्चा करते समय हम अक्सर हिटलर के नाजी जर्मनी से इसकी तुलना करने लगते हैं. बेशक, कई चौंकाने वाली समानताएं हैं, लेकिन एक मौलिक अंतर भी है जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते और न ही करना चाहिए. जर्मनी के विपरीत, भारत एक पूर्व-उपनिवेश था, और आज के भारतीय फासीवादी, जिनके पूर्वजों ने औपनिवेशिक काल के दौरान ब्रिटिश शासकों के साथ सहयोग किया था, अपनी शक्ति को अधिनाकवाद और लोगों के प्रति तिरस्कार से मजबूत करते हैं जो कि एक औपनिवेशिक विरासत है; जबकि वे साथ ही अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उपनिवेशवाद-विरोधी भाषा का इस्तेमाल करने की भी कोशिश करते हैं. असल में, आज ट्रंप के तहत अमेरिका ही हिटलर के तहत जर्मनी के सबसे करीब है, जो हमें साम्राज्यवाद और फासीवाद के मेल का एक और क्लासिक उदाहरण देता है, जो नाजी जर्मनी की पहचान थी. ट्रंप प्रशासन से जुड़े कई हालिया घटनाक्रम इसे काफी स्पष्टता से दिखाते करते हैं.
टैरिफ और व्यापार को हमले के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने और गाजा में नरसंहार अभियान और ईरान पर हमले में इजराइल का समर्थन करने के बाद, 2026 की शुरूआत से ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी साम्राज्य की घटती शक्ति को मजबूत करने के लिए खुले तौर पर सैन्य धमकियों और कदमों का एक सिलसिला शुरू कर दिया है. वेनेजुएला में हमने एक नए तरह का सीआइए ऑपरेशन देखा. दो दशक पहले ह्यूगो शावेज को हटाने के लिए असफल तख्तापलट प्रयास के बाद, इस बार सीआइए ने राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस का अपहरण कर लिया, जबकि ट्रंप खुले तौर पर ‘वेनेजुएला चलाने’ और वेनेजुएला के विशाल तेल संसाधनों को नियंत्रित करने के बारे में बात कर रहे थे. वेनेजुएला की रक्षा में क्यूबा के बत्तीस सैनिकों ने शहादत दी और ट्रंप प्रशासन इस बात को छिपाता नहीं है कि समाजवादी क्यूबा में सत्ता परिवर्तन लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र में उसका अंतिम लक्ष्य बना हुआ है.
लगभग उसी समय ट्रंप ने ग्रीनलैंड को हथियाने की अमेरिकी योजना के बारे में अपनी आक्रामक बयानबाजी भी तेज कर दी, जो डेनमार्क साम्राज्य के तहत एक स्वायत्त क्षेत्र रहा है. इससे पहले उन्होंने कनाडा को संयुक्त राज्य अमेरिका का 51वां राज्य बनाने के बारे में भी भड़काऊ टिप्पणियां की थीं. सबसे ज्यादा भयानक बात यह है कि ट्रंप ने ‘विश्व आर्थिक मंच’ में तथाकथित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के गठन की घोषणा कर दी, जिसमें ट्रंप प्रशासन द्वारा आमंत्रित साठ में से बीस देशों का सहयोग और भागीदारी थी. इसका मकसद न सिर्फ गाजा पर अमेरिका-इजराइल का स्थायी नियंत्रण सुनिश्चित करना था, बल्कि असल में संयुक्त राष्ट्र के पूरे ढांचे को ही बदल डालना था. जहां ट्रंप ने अपनी आजीवन अध्यक्षता में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन किया, वहीं उनके दामाद जेरेड कुशनर ने फिलिस्तीनी आबादी और संस्कृति को नष्ट करके गाजा को ‘विकसित करने’ के लिए 30 अरब डॉलर का एक मास्टरप्लान का ऐलान किया जिसके जरिये गाजा को पर्यटन और मनोरंजन के एक कृत्रिम रूप से निर्मित कॉर्पोरेट केंद्र में बदल दिया जाएगा. इसी बीच, अमेरिका ने ईरान में हस्तक्षेप करने की अपनी तत्परता का भी संकेत दिया है, और इसके लिए उस देश में आजीविका और लोकतंत्र के मुद्दों पर बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को बहाना बनाया गया है.
विडंबना यह है कि पश्चिमी दुनिया, जो वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिकी हमले और राष्ट्रपति मादुरो के अपहरण पर चुप रही और गाजा में अमेरिका के समर्थन से इजराइल द्वारा फिलिस्तीनियों के नरसंहार और फिलिस्तीनी क्षेत्र पर कब्जे को लेकर भी काफी हद तक खामोश रही या सक्रिय रूप से मिलीभगत की, उसने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर काफी कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है. कनाडा के राष्ट्रपति मार्क कार्नी ने यूरोप और उससे बाहर की ‘मध्य शक्तियों’ से अपील करने में पहल की कि वे ‘सुरक्षा खरीदने’ के भ्रम में अमेरिका की बात न मानें, बल्कि अन्य विकल्पों की तलाश करें और रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर दें. कमोबेश पूरे यूरोपीय संघ और ‘नाटो’ के भारी बहुमत ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के पक्ष में गोलबंद होकर अमेरिका द्वारा किसी भी तरह से ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश का विरोध किया. बोर्ड ऑफ पीस प्रोजेक्ट और गाजा मास्टरप्लान को भी अमेरिका के कुछ चुनिंदा छोटे सहयोगियों के समूह से परे कोई खास समर्थन नहीं मिला है.
अमेरिका के वित्तीय और सैन्य प्रभुत्व को मजबूत करने के इस साम्राज्यवादी मुहिम के साथ-साथ, ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका के भीतर ट्रंप के आप्रवासी-विरोधी फासीवादी और नस्लवादी एजेंडे के खिलाफ तमाम असंतोष को कुचलने के लिए क्रूर राज्य आतंक का अभियान भी शुरू किया है. मिनियापोलिस, वह शहर जो एक अफ्रीकी अमेरिकी नागरिक जार्ज फ्लायड की क्रूर हत्या के बाद शक्तिशाली ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ नामक विरोध-प्रदर्शनों का केंद्र था, अब आइसीई (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) एजेंटों और होमलैंड सिक्योरिटी के बॉर्डर पेट्रोल विंग द्वारा राज्य आतंक झेल रहा है, जिसमें दो अमेरिकी नागरिकों रेनी गुड और एलेक्स प्रेटी की हत्या भी शामिल है, जो आइसीई से अपने पड़ोसियों की शांतिपूर्ण रक्षा कर रहे थे. दो लगातार मामलों में बिना किसी सुनवाई के उन्हें मार दिया गया. अमेरिका के बाहर वित्तीय और सैन्य आक्रामकता की अमेरिकी साम्राज्यवादी विदेश नीति के घरेलू फासीवादी अनुपूरक के बतौर अब उस देश को दुष्ट पुलिस राज्य में बदल दिया जा रहा है. हिटलर की हार के आठ दशक बाद अमेरिका पर अब साम्राज्यवाद और फासीवाद के शास्त्रीय नाजी मिश्रण का हौआ मंडरा रहा है – बेशक यह अमेरिका के अपने श्वेत वर्चस्व और वैश्विक साम्राज्य के अनोखे इतिहास से प्रभावित है.
कई मायनों में, भारत में संघ-भाजपा की फासीवादी परियोजना ट्रंप के तहत अमेरिका में साम्राज्यवाद और फासीवाद के इस मेल से जुड़ती है. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति, जो लंबे समय से पाकिस्तान के साथ स्थायी युद्धोन्माद की स्थिति भड़काये जाने पर आधारित रही थी, अब बंगलादेश से कथित घुसपैठ से होने वाले जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) खतरे के इर्द-गिर्द घूम रही है. विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी सरकार अमेरिका-इजराइल धुरी के प्रति पूर्ण मौन सहमति जताती है, जबकि भारतीय सामानों और सेवाओं पर अमेरिका दंडात्मक टैरिफ लगा रहा है और भारतीय नागरिकों को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़कर भारत वापस भेज रहा है. राज्य आतंक और उत्पीड़न को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द भी अजीब तरह से मिलते-जुलते हैं – मोदी सरकार असहमति की आवाजों को दबाने के लिए ‘अर्बन नक्सल’, राष्ट्रद्रोही और आंदोलनजीवी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है, जबकि ट्रंप प्रशासन अमेरिकी राज्य आतंक के पीड़ितों को ‘पेशेवर आंदोलनकारी’, ‘घरेलू आतंकवादी’ और ‘वामपंथी विद्रोही’ बताता है. अमेरिका और दुनिया के अन्य हिस्सों में साम्राज्यवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी और नस्लवाद विरोधी संघर्षों को पूरा समर्थन देते हुए, हमें भारत के अंदर फासीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ अपने संघर्षों को और तेज करने की जरूरत है.