कल पीरपैंती की हमारी यात्रा ने हमें यह साफ दिखा दिया है कि प्रस्तावित अडानी पावर प्लांट की कीमत पीरपैंती के प्रभावित लोगों और इलाके के लिए कितनी भारी है.
यह जमीन बिहार सरकार ने लगभग दस साल पहले जबरन ले ली थी, स्थानीय लोगों के विरोध को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए. यह हैरान करने वाला है कि सरकार ने लोगों के प्लांट के वैकल्पिक स्थल के प्रस्ताव पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिससे कोई विस्थापन नहीं होता और बहुत कम तबाही होती. पटना हाई कोर्ट ने भी लोगों की रिट याचिका यह कहकर खारिज कर दी कि “अधिग्रहण के लिए स्थल राज्य तय करता है और प्रभावित लोग वैकल्पिक स्थल चुनने के लिए सरकार को बाध्य नहीं कर सकते.” यह फैसला 10 अक्तूबर 2017 को आया, जबकि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून ने जमीन खोने वालों की सहमति को जरूरी ठहराया था.
जमीन खोने वालों को दिया गया मुआवजा न केवल बिल्कुल अपर्याप्त है, बल्कि एक जैसी जमीन होने के बावजूद अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग दरों का मुआवजा मिला है. यह इलाका आम और दूसरे पेड़ों से भरा हुआ है और नुकसान और मुआवजे की गणना करते समय इन पेड़ों के मूल्य को शामिल नहीं किया गया है. 2013 का कानून रोजी-रोटी खोने वालों को भी मुआवजा देता है और यह भी कहता है कि अगर अधिग्रहण के बाद पांच साल तक जमीन बेकार पड़ी रहे तो उसे मालिकों को वापस करना होगा. पीरपैंती में इन दोनों बातों की साफ उल्लंघन हुआ है.
अधिग्रहण के समय, इस स्थल पर एनटीपीसी का पावर प्लांट बनाने का इरादा था. इन सभी सालों तक बेकार पड़े रहने के बाद, अब इस जमीन – कुल 1,050 एकड़ जमीन, लगभग अस्सी घरों और लाखों आम, लीची और दूसरे पेड़ों समेत – को अडानी समूह को 33 साल के लिए सालाना सिर्फ 1 रुपये की मामूली लीज रकम पर दे दी गई.
मोदी सरकार और गोदी मीडिया के लिए “अडानी” नाम विकास की सबसे पक्की गारंटी की तरह पेश किया जाता है. लेकिन पीरपैंती के लोग गोड्डा में अडानी पावर प्लांट या फिर बगल के कहलगांव ब्लॉक में एनटीपीसी पावर प्लांट के अनुभव से अच्छी तरह वाकिफ हैं. इन दोनों प्लांटों में स्थानीय लोगों के रोजगार के बहुत कम सबूत हैं. बड़े पैमाने पर कृषि भूमि और संबंधित आजीविका के नुकसान, पानी की खपत और लोगों के विस्थापन के अलावा, कहलगांव और गोड्डा में सबसे आम शिकायत भयंकर प्रदूषण और उससे होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की है.
पीरपैंती के लोग, जो जबरन और धोखाधड़ी से हुई जमीन छीनने की कार्रवाई के बाद से ही उचित मुआवजे और पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनकी आवाज दबाने के लिए प्रशासन और भाजपा अब धमकी-धौंस पर उतर आए हैं – बेदखली नोटिस भेजे जा रहे हैं, पंचायत प्रतिनिधियों और आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं को जेल में डाला जा रहा है. अडानी को दिया जा रहा यह तोहफा सिर्फ पावर प्लांट तक सीमित नहीं है. यहां कोयला ब्लॉक देने और गोड्डा से पीरपैंती तक रेलवे लाइन बिछाने की भी तैयारी है, ताकि झारखंड-बिहार के इस संसाधन-संपन्न इलाके पर अडानी की पूरी पकड़ जम सके. लेकिन पीरपैंती के लोग न्याय की लड़ाई जारी रखने के लिए डटे हुए हैं और इस संघर्ष में सीपीआई(एमएल), सीपीआई(एम), सीपीआई और आरजेडी के स्थानीय संगठन सब एकजुट हैं.
पीरपैंती जाते वक्त हम रानी दियारा के विस्थापित लोगों से भी मिले. 2016 में गंगा कटाव में उनके गांव बह गए थे. कहलगांव ब्लॉक के किसनदासपुर पंचायत और पीरपैंती ब्लॉक के रानी दियारा पंचायत के ये सभी विस्थापित लोग तब से छोड़ी हुई रेलवे लाइनों पर झोपड़ियों में बिना किसी नागरिक सुविधाओं के जीवन बसर कर रहे हैं. इनमें से कई तो मौजूदा वोटर लिस्ट संशोधन में मतदाता सूची से भी बाहर कर दिए गए हैं और अब नाम वापस जुड़वाने के लिए लड़ रहे हैं.
2016 में भागलपुर के रानी दियारा से लेकर 2025 में भोजपुर के जवइनिया तक, गंगा कटाव के शिकार इन परित्यक्त परिवारों की हालत वही है – न कोई पुनर्वास और न सरकार की चिंता. नदी कटाव और जमीन अधिग्रहण के पीड़ितों की समस्या भी एक ही है – विस्थापन और प्रशासन की बेरुहघी. और आगे का रास्ता भी एक ही है – एकजुट होकर उचित पुनर्वास और जवाबदेह शासन की लड़ाई लड़ना.