वर्ष 34 / अंक-26 / महिलाओं के खिलाफ हिंसक घटनाओं की बाढ़ के साथ-साथ बे...

महिलाओं के खिलाफ हिंसक घटनाओं की बाढ़ के साथ-साथ बेइंतहा दरिंदगी

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-- कुमदिनी पति

ग्रेटर नोएडा में निक्की दहेज हत्या मामला देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. उत्पीड़िता पर हो रही वहशियाना हिंसा का एक वीडियो सामने आया. महिला को बाल पकड़कर खींचा गया, उस पर ज्वलनशील तेल डाला गया और उसके 6 वर्षीय बेटे के सामने उसे जिंदा जला दिया गया. वह अर्ध्जली अवस्था में सीढ़ी से उतरते समय ढेर हो गयी. अस्पताल में वह मृत घोषित की जाती है. पर लोगों के दिमाग में कई सवाल हैं.

7 साल बाद भी दहेज की मांग क्यों? निक्की के ब्यूटी पार्लर को बंद कराया गया और दोबारा खोलने के प्रस्ताव पर कहर क्यों बरपा, जबकि उसका पति घर पर निठल्ला बैठा था? पार्लर से पैसे ही आते जो वह अक्सर चुराता भी था. निक्की के पिता यह जानते हुए कि बेटी हिंसा की शिकार है, उसे बार-बार उसी घर में क्यों धकेल देते थे, और ससुराल के दहेज की मांग को क्यों पूरा करते रहे?

राजस्थान के जोधपुर जिले का मामला और भी वीभत्स है; यहां एक मां संजू अपनी 3-वर्षीय बेटी को गोदी में लेकर खुद को पेट्रोल डालकर आग लगा लेती है, जबकि वह एक स्कूल की अध्यापिका थी और पूरी तरह स्वावलम्बी थी. वह दहेज के लिये प्रताड़ना सहन नहीं कर सकी. पर क्या वह स्कूल से सीधे मायके नहीं जा सकती थी? निक्की और संजू विश्नोई दोनों ने कभी पुलिस में शिकायत नहीं दर्ज की. आखिर क्यों? दोनों को क्या अपनी काबिलियत और कानून पर जरा भी भरोसा नहीं था? या वे लोकलाज के चलते सब झेलती रहीं? अब अमरोहा की गुल्फिजा को दहेज के लिये तेजाब पिलाकर मार डाला गया. वह अस्पताल में 17 दिन जीवन के लिये संघर्ष कर दम तोड़ दी. फिर एक टेकी ने फांसी लगा ली दहेज प्रताड़ना के चलते. क्या आर्थिक स्वावलम्बन कोई मायने नहीं रखता.

इससे पहले राधिका यादव नाम की एक टेनिस खिलाड़ी की उसके पिता द्वारा घर में ही गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. वह एक एकेडमी चलाती थी, खेल को अपना कैरियर बनाना चाहती थी; शायद संगीत में रुचि होने के कारण रील बनाकर इन्स्टाग्राम पर पोस्ट करती थी और अपने तरीके से अपना जीवन जीना चाहती थी. पर 21वीं सदी में भी उसके पिता को उसका स्वतंत्र होकर जीना अच्छा न लगा. उनका कहना था कि पड़ोसी उनका मजाक बनाते हैं कि वह अपनी बेटी के पैसों पर जी रहे थे. राधिका का इंस्टा अकाउंट बंद कर दिया गया था. आखिर लाखों खर्च करके बेटी को खिलाड़ी बनाने का सपना देख रहा पिता क्यों बेटी का हत्यारा बन गया?  क्या वह उसकी हुनर का मालिक बना रहना चाहता था?

तीन मामलों में एक बात समान है, महिला अपने दम पर कुछ करना चाहती थी; वह आर्थिक रूप से स्वावलम्बी थी. वह अपने जीवन के फैसले खुद लेना चाहती थी. पर परिवार वालों को यह मंजूर नहीं था. वे इनको सोने के अंडे देने वाली मुर्गी के रूप में रखना तो चाहते थे, पर पिंजड़े में कैद!

एक साफ्टवेयर इंजीनियर, सोनम कहती हैं, “लड़कियां बहुत आगे बढ़ गयी हैं; वे सब कुछ कर रही हैं – ऐसे काम भी, जो मर्दों के माने जाते थे –और वे अव्वल आ रही हैं. पर लड़के अपनी पुरानी सोच को बदल नहीं पा रहे. अब बेटी या पत्नी बराबरी, आजादी और इज्जत चाहती है; वह किसी की पैर की जूती बनकर नहीं रह सकती, तो उस पर काबू करने के लिये हिंसा का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह परिपाटी युगों से चली आ रही है. बस रूप और क्रूरता बढ़ गयी है, क्योंकि औरतें डर नहीं रहीं”.

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गुजरात में वनासकांठा की एक 18-वर्षीय नीट क्वालिफाइड लड़की को उसके पिता और चाचा गला घोंटकर मार डालते हैं – इस डर से कि मेडिकल कॉलेज में पढ़ने के बाद वह अपनी मर्जी से अपने प्रेमी से शादी कर लेगी, क्योंकि वह उसके साथ लिव-इन संबंध बना चुकी थी. पुलिस के अनुसार पिता और चाचा ने झूठी शान के लिये लड़की की हत्या की थी. इन सभी मामलों में देखा गया कि हत्यारों को अपने किये पर जरा भी पछतावा नहीं था. बल्कि वे अपने किये को सही ठहराने के लिये तर्क गढ़ रहे थे.

यह इसलिये भी संभव हो पाता है कि पितृसत्तात्मक समाज का एक बड़ा हिस्सा इन तर्कों को जायज समझता है, उनसे सहमत होता है! हमारी जाति-व्यवस्था में लड़की-लड़का बालिग भी हो जाएं, उन्हें अपने पसंद से शादी करने नहीं दिया जाता. परिवार और समुदाय की नाक का सवाल बन जाता है. और, यह हम 21वीं सदी में बात कर रहे हैं – कहीं जबरदस्ती विवाह है तो कहीं ऑनर किलिंग. तो अब छिट-पुट घटनाओं में औरत को पति की हत्या करने के अलावा कोई चारा ही नहीं समझ आता, भले ही वह गलत हो.

दूसरी ओर हमारा ऐसे मामलों से साबका पड़ता है, जहां महिला के अधिक उम्र की होने के बावजूद, कम उम्र के युवक पितृसत्ता के दम्भ में उनसे बदला लेते हैं. उनका तरीका क्रूर है, और वे अपने किये पर गर्व महसूस करते हैं. ये घटनाएं पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को भी धता बताती हैं – समाज के एक विकृत विकास की ओर इशारा करती हैं. मसलन, मध्य प्रदेश के भोपाल से एक ऐसी घटना सामने आती है, जहां एक छात्र अपनी पूर्व शिक्षिका को, जो उम्र में उससे 8 साल बड़ी थी, पेट्रोल डालकर जलाने का प्रयास करता है. बताया जाता है कि उसे टीचर से एकतरफा लगाव (obsession) हो गया था, और उसने एक बार उन पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसके चलते उन्होंने छात्रा को स्कूल से निकलवा दिया. उसने बदले में उसने यह कार्यवाही की.

दूसरी ओर दिल्ली के हौज काजी इलाके में एक 39 वर्षीय युवक अपनी 65 वर्षीय मां को तथाकथित “पुराने समय के विवाहेतर सम्बंध” की सजा के रूप में दो बार बलात्कार का शिकार बनाता है. फिर फोकस हैदराबाद के उस पति पर शिफ्ट होता है, जिसने प्रेम विवाह के बावजूद अपनी 5 माह की गर्भवती पत्नी का गला घोंटकर उसकी हत्या की, फिर हेक्सा ब्लेड से बोटी-बोटी काटकर कुछ अंगों को नदी में डाल दिया. महिला एक काल सेंटर में काम करती थी और पति को उस पर शक था, इसलिये जब उसने मायके जाने की बात कही, पति ने बवाल खड़ा कर दिया और उसकी हत्या कर दी.

आखिर पुरुष इतने असुरक्षाबोध से ग्रस्त क्यों हैं? इस खबर के बाद नजर मैसुरु की एक और दर्दनाक घटना पर जा टिकती है – एक प्रेमी अपनी पहले से विवाहित प्रेमिका से एक लॉज में झगड़ा करता है; वह उसके 80,000 रुपये लौटाने में आना-कानी करता है, जिस पर महिला आपत्ति जताती है. वह उसके मुंह में विस्फोटक ठूंसकर ट्रिगर दबाकर उसके चेहरे को क्षत-विक्षत कर देता है. महिला की तत्काल मौत हो जाती है. आखिर छोटी सी बात पर इतनी क्रूरता क्यों?  इतनी घृणा कहां से आती है? यह पितृसत्तात्मक सोच की चरम अवस्था है – मिसोजिनी – औरत जात से घृणा. पुराने समय में औरतों को कुलटा या डायन कहकर जब जलाया जाता था, समाज का एक हिस्सा सहमति जताता और जश्न मनाता था. आज भी एक हिस्सा औरत पर दमन देखकर खुश है – “अच्छा हुआ, बहुत उड़ रही थी!”

इलाहाबाद के महिला अध्ययन केंद्र की पूर्व निर्देशक प्रो. सुमिता परमार कहती हैं कि ऐसी क्रूर व हिंसक कार्यवाही के लिये बहुत से कारण हैं – सबसे बड़ा तो यह कि महिलायें स्वावलम्बी हो गयी हैं और उनको दबाना आसान नहीं है. पर पुरुष पितृसात्मक सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं. दूसरी बात यह कि उपभोक्तावाद (consumerism) बहुत बढ़ा है, सो दहेज की मांग भी बढ़ी है. सोशल मीडिया ने भी बहुत सारी समस्याएं पैदा कर दी हैं – खासकर ऐसे एक देश में जो विकास के मामले में संक्रमण (transition) के दौर से गुजर रहा है. मसलन लड़कियों और लड़कों को डेटिंग ऐप और चैट रूम मिल गये हैं, पर हमारे देश में लड़कियां इनके संभावित दुरुपयोग से अधिक परिचित नहीं हैं. वीडियो लड़कियों को ब्लैकमेल करने के लिये बनाए जा रहे हैं. फिर, जाति-संप्रदाय के आधार पर ब्याह और दहेज की परम्परा आज भी जारी है. पूरी व्यवस्था पितृसत्तात्मक सोच पर चल रही है. तो ऐसे समाज में महिलाओं को बराबरी और इज्जत कैसे मिले?”

सुमिता जी की बात सही लगती है – साइबर स्टॉकिंग से लेकर एआई से महिलाओं की अश्लील तस्वीर बनाने तक. कितना पतन हो रहा है आज के युवकों का. ऐसी घटनाएं सिलसिलेवार हो रहीं. थमने का नाम नहीं ले रही हैं, और हर घटना पहली से ज्यादा वीभत्स व रोंगटे खड़ा कर देने वाली होती है. अगर आप बलात्कार की घटनाओं को देखेंगे, तो पश्चिम बंगाल के बाद ओडिशा सुर्खियों में है. क्या यह सब अकस्मात ही हो रहा है? या कि इसके पीछे कोई ऐसी सच्चाई है, जिसे हम समझ नहीं रहे.

कोलकाता के आरजी कार अस्पताल में क्रूर बलात्कार व हत्या का मामला आज भी न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है. कार्यस्थल पर यौन हिंसा निरोधक कानून बनने पर भी क्या एक अस्पताल में तक सुरक्षा की न्यूनतम व्यवस्था नहीं हो सकती? शायद सबसे सशक्त व लम्बे आंदोलन के बाद भी सर्वाच्च न्यायालय में सरकार ने जो कुछ माना था – कार्यस्थल पर शिकायत समितियों का निर्माण होगा, महिला शौचालय और रेस्टरूम बनेंगे, सीसीटीवी कैमरे लगेंगे, सुरक्षाकर्मियों की नियुक्ति होगी, अस्पतालों और कार्यस्थलों की नियमित चेकिंग होगी – उसका 10% तक लागू नहीं हुआ है!

(अगले अंक में जारी)


06 September, 2025