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यूपीआइ टैक्स: मोदी के जन्मदिन पर भारतीय जनता को झटका

यूपीआइ टैक्स: मोदी के जन्मदिन पर भारतीय जनता को झटका

भारत के सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधान मंत्री के बतौर नरेंद्र मोदी के ‘रिकाॅर्ड’ का जश्न मनाने के बमुश्किल तीन महीने बाद ही मोदी सरकार, भाजपा के नेतृत्व वाली कई राज्य सरकारों और पूरे संघ-भाजपा तंत्र ने मोदी के 76वें जन्मदिन को एक भव्य राष्ट्रीय तमाशे में बदल दिया. भारत ने पहले कभी भी अहंकार और व्यक्ति-पूजा के ऐसे भद्दे और जबरन थोपे गए सरकारी जश्न को नहीं देखा था. जन्मदिन के सम्मान में लोगों को दीये जलाने के लिए खुल्लमखुल्ला मजबूर करने में जनता के पैसे की न जाने कितनी भारी-भरकम रकम खर्च की गई और हर संभव तरीके से संस्थागत नियमों का दुरुपयोग किया गया. आइआइएम जम्मू में जो छात्र कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए, उन पर जुर्माना लगाया गया.

इतनी जोर-जबरदस्ती के बावजूद यह ‘तमाशा’ बुरी तरह फ्लाॅप साबित हुआ. अपनी पूरी विफलता, अक्षमता और उदासीनता के कारण हर मोर्चे पर जनता के विरोध का सामना कर रही सरकार को ऐसे जबरन थोपे गए जश्न के लिए कोई स्वतःस्फूर्त समर्थन नहीं मिल सकता था. असल में, सरकार का यह जश्न मनाने का तरीका भारत की मौजूदा हकीकत का मजाक उड़ाता हुआ लग रहा था, जब एक तरफ देश के बड़े हिस्से बाढ़ से जूझ रहे थे, और कुछ ही दिन पहले दक्षिण दिल्ली में असुरक्षित पेइंग गेस्ट के दड़बानुमा घर में रह रहे छात्र वह इमारत गिरने से कुचलकर मर गए थे – एक ऐसी घटना जिसे असल में म्युनिसिपल प्रशासन की पूरी तरह विफलता के तौर पर देखा जाना चाहिए.

प्रधान मंत्री के जन्मदिन-जश्न से पहले, दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) का 18वां शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ. पिछले कुछ वर्षों में ‘ब्रिक्स’ में भारत की भूमिका काफी गौण हो गई है, क्योंकि मोदी युग की विदेश नीति ने भारत को लगभग अमेरिका-इजरायल धुरी का रणनीतिक सहयोगी बना दिया है. अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हवाई हमले में निशाना बनाकर ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद भारत ने बहुत देर से और बहुत ही दबी-छुपी संवेदना व्यक्त की और ईरान के खिलाफ युद्ध तथा गाजा में फिलिस्तीनियों के लगातार हो रहे नरसंहार पर भी वह बेशर्मी से चुप रहा. इसी वजह से नई दिल्ली में हुए ‘ब्रिक्स’ शिखर सम्मेलन में कुछ खास नहीं हुआ, सिवाय इसके कि नरेंद्र मोदी को वैश्विक नेताओं के साथ अपने बहुप्रचारित ‘व्यक्तिगत संबंधों’ के ‘दिखावे’ का एक और मौका मिला और काफी संभलकर तैयार किया गया ‘आम सहमति’ वाला घोषणापत्र जारी हुआ. इस घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की बात तो की गई, लेकिन अमेरिका-इजराइल युद्ध गठबंधन की कोई स्पष्ट निंदा नहीं की गई जो इस समय विश्व शांति और मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है.

इस बीच, जब मोदी के जन्मदिन का जश्न चल रहा था, अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत को फिर से धमकी दी; इस बार 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई. यह धमकी अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा, अमेरिकी संसद का निचला सदन) द्वारा पारित एक बिल के रूप में आई, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस पर प्रतिबंध लगाने और रूस से तेल व गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के व्यापक अधिकार दिए गए. टैरिफ की धमकी के जवाब में मोदी सरकार ने औपचारिक रूप से भारत की ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का हवाला दिया है, लेकिन हमेशा शब्दों से ज्यादा काम मायने रखता है. और इस मामले में सरकार एक बार फिर अमेरिकी दबाव के आगे झुक गई है.

यह हकीकत मोदी सरकार के हालिया जबरन वसूली वाले टैक्स आदेश से सर्वाधिक स्पष्ट तौर पर दिख जाती है. नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ शिखर सम्मेलन खत्म होने के ठीक बाद और मोदी के जन्मदिन पर दीप-प्रज्वलन समारोह से पहले सरकार ने भारत के सबसे लोकप्रिय डिजिटल पेमेंट प्लेटफाॅर्म यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के जरिए 2,000 रुपये से ज्यादा के हर कमर्शियल पेमेंट (खरीद-बिक्री वाले भुगतान) पर 0.4% टैक्स लगाने की घोषणा की. बेशक, इस टैक्स को ‘डिस्काउंट रेट’ का नाम दिया गया है और वह भी ‘मर्चेंट्स’ (व्यापारियों) के लिए. हालांकि ‘डिस्काउंट’ का संबंध 2,000 रुपये से कम की भुगतान सीमा से है, जिस पर कोई फीस नहीं लगेगी. और ‘व्यापारी’ असल में उपभोक्ताओं के लिए एक कोडवर्ड है, क्योंकि कोई भी व्यापारी खरीदार पर टैक्स का बोझ डाले बिना उसे खुद नहीं उठाएगा.

यह बात जगजाहिर है कि अमेरिका की क्रेडिट कार्ड दिग्गज कंपनियां मास्टरकार्ड और वीजा लंबे समय से भारत के मुफ्त यूपीआई पेमेंट प्रणाली के बारे में शिकायत कर रही थीं. मोदी सरकार ने अप्रैल 2016 में यूपीआई प्रणाली की शुरूआत की थी जो नोटबंदी के विनाशकारी कदम से छह महीने पहले की बात है. धीरे-धीरे यह भारत में सीधे नगदी लेन-देन का सबसे बड़ा विकल्प बन गया. जहां आम लोगों और एमएसएमई (छोटे व मंझोले उद्यम) सेक्टर को नोटबंदी से हुई भारी उथल-पुथल का खामियाजा भुगतना पड़ा, वहीं बड़े नोटों को हटाने से जिस काले धन पर रोक लगाने का दावा किया गया था, उस पर कोई खास असर नहीं पड़ा. असल में, नोटबंदी का एकमात्र ठोस और दीर्घकालिक असर यह हुआ कि नगदी के इस्तेमाल के विकल्प के तौर पर यूपीआई भारत में सबसे आम तरीका बन गया. मोदी सरकार के लिए यूपीआई डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी ‘आत्मनिर्भर’ सफलता की कहानी थी. अब यूपीआई टैक्स लागू होने के बाद, जिसे अमेरिका के साथ भारत की चल रही व्यापार समझौता वार्ता के लिए एक जरूरी शर्त माना जा रहा है, सरकार खुद यूपीआई के इस्तेमाल को हतोत्साहित करेगी और फिर से नगदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देगी.

नोटबंदी मोदी सरकार द्वारा ‘शाॅक थेरेपी’ का पहला इस्तेमाल था. 2017 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों से ठीक पहले लागू की गई नोटबंदी ने राज्य में पंद्रह साल के अंतराल के बाद भाजपा की सत्ता में वापसी में अहम भूमिका निभाई थी. नोटबंदी, जीएसटी और लाॅकडाउन से लेकर एसआइआर और अब यूपीआई टैक्स तक, मोदी युग भारतीय लोगों को लगातार झटके पर झटका दे रहा है. लेकिन मोदी का शासन काल भारत के कुछ सबसे यादगार और शक्तिशाली प्रतिवाद आंदोलनों का गवाह भी रहा है – जैसे कि, विभाजनकारी तथा भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शाहीन बाग का धरना, भारतीय कृषि पर काॅरपोरेट कब्जे के तीन काले कानूनों के खिलाफ किसानों का ऐतिहासिक प्रतिरोध और हाल ही में जंतर-मंतर पर ‘जेन जी’ का अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन, जिसने मोदी सरकार को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने पर मजबूर कर दिया. क्या भारत उसी एकता और संकल्प के साथ फिर से उठकर एसआइआर के हमले को रोक नहीं सकता और यूपीआई टैक्स को वापस नहीं करवा सकता है ?

26 September, 2026