वर्ष 34 / अंक-25 / वोटर अधिकार यात्रा और चुनावी धांधली तथा मताधिकार ह...

वोटर अधिकार यात्रा और चुनावी धांधली तथा मताधिकार हरण के खिलाफ बढ़ती लड़ाई

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25 जून को मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण के अचानक लागू होने के बाद से ही बिहार के लोग हाशिये पर खड़े समुदायों और प्रवासी मजदूरों के व्यापक मताधिकारहरण के खतरे के खिलाफ लड़ रहे हैं. बिहार की जनता ने इस खतरे को जल्द ही भांप लिया और 9 जुलाई आते-आते दसियों हजार लोग वोटबंदी के विरोध में सड़कों पर उतर पड़े. घमंडी चुनाव आयोग ने गणना प्रपत्र के साथ दस्तावेज जमा करने की अंतिम तारीख 25 जुलाई निर्धारित कर दी थी, किंतु उसे उसे बाध्य होकर अपनी गति धीमी करनी पड़ी और उसने अगस्त के अंत तक यह समय-सीमा बढ़ा दी. साक्ष्य दस्तावेजों की अनिवार्य सुपुर्दगी की शर्त हटाने के बावजूद खबरों के मुताबिक 65 लाख लोग प्रपत्र नहीं जमा कर पाए हैं, और इसीलिए उनके नाम मसौदा सूची से काट दिए गए हैं. अगर चुनाव आयोग एसआइआर की मूल समय-सीमा पर अड़ा रहता तो और कितने दसियों लाख लोग इस सूची से बाहर हो जाते, यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है.

स्वतंत्र मीडिया के साथ-साथ प्रिंट मीडिया के हिस्सों ने भी बिहार में मताधिकारहरण के खिलाफ लड़ाई को समर्थन देना शुरू कर दिया है. और बंगलोर सेंट्रल क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा खंड में मतदाता सूची में बड़े पैमाने की अनियमितता का भंडाफोड़ करने वाले राहुल गांधी के प्रेस कंफ्रेंस के बाद मताधिकारहरण के खिलाफ बिहार की यह लड़ाई वोटचोरी के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मुहिम में विकसित हो गई है. इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय में एसआइआर के विरुद्ध मुकदमे की सुनवाई भी चल रही है. एसआइआर की असंवैधानिक प्रकृति और इसके हास्यास्पद क्रियान्वयन के दौरान की जा रही भारी त्रुटियों के बारे में दिये जा रहे तर्कों ने मिलकर एसआइआर प्रक्रिया में निहित मताधिकारहरण की मंशा को लोगों की नजरों के सामने ला दिया है. और क्योंकि चुनाव अयोग को स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची में से कोई भी दस्तावेज गरीबों और हाशिये पर खड़े लोगों के पास उपलब्ध रहीं हैए सर्वोच्च न्यायालय को यह मानना पड़ा कि आधार कार्ड वैध दस्तावेज है. इससे एसआइआर की मताधिकारहरण की मंशा बिल्कुल बेनकाब हो गई है.

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अभी तक खुद को सिर्फ एसआइआर के व्यावहारिक पहलुओं तक ही सीमित रखा है, कोर्ट द्वारा की जा रही जांच-पड़ताल और तर्क के बुनियादी सिद्धांतों व पारदर्शिता को स्वीकार करने में चुनाव आयोग के हठीले टाल-मटोल और यहां तक कि उसके इन्कार से लोगों को मताधिकारहरण के वास्तविक खतरे के प्रति सजग होने में मदद ही मिली है, और अगर इसके साथ ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा शुरू की गई वोट अधिकार यात्रा को मिल रहे व्यापक जन-समर्थन, विदेशी घुसपैठियों का हौआ खड़ा कर एसआइआर को उचित ठहराने के भाजपा खेमे के हताशोन्मत्त प्रयासों और चुनावी धोखाधड़ी के लगातार बढ़ते साक्ष्यों का जवाब देने से चुनाव आयोग के इन्कार तथा नियमों में बदलाव लाकर तमाम जांच-पड़ताल से बच निकलने अथवा उसे दबा देने की उसकी कोशिशों को जोड़ दिया जाए तो हम देख सकते हैं कि इन सबके परिणामस्वरूप मोदी सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत के खिलाफ बिहार में कैसा शक्तिशाली जन-जागरण पैदा हुआ है.

एसआइआर कवायद से यह बेनकाब हो गया है कि वोटरों पर अपनी प्रमाणिकता साबित करने की जिम्मेदारी डाल कर चुनाव आयोग किस तरह सटीक व समावेशी मतदाता सूची सुनिश्चित करने के अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व से कतरा रहा है. और अबए जबकि विसंगतियां व त्रुटियां एकदम साफ.साफ सामने आ रही हैं, तो चुनाव आयोग इन्हें छोटी-मोटी त्रुटियां बताने तथा शुद्धिकरण की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों और उनके बूथ लेवल एजेंटों (बीएलए) पर डाल देने की कोशिश कर रहा है. मसौदा सूची बनने के बाद मतदाताओं के द्वारा दावे व शिकायतें दायर कराने (1 अगस्त से लेकर 31 अगस्त तक) से संबंधित चुनाव आयोग के रोजाना प्रसारणों में यह ‘तथ्य’ प्रमुखता से सामने लाया जा रहा है कि बिहार में मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों के बीएलओ कोई शिकायत नहीं दर्ज करा रहे हैं. लेकिन चुनाव आयोग यह नहीं बोल रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद ही अंततः उसने 18 अगस्त को हटाए गए वोटरों के नाम प्रकाशित किए हैं. चुनाव आयोग ने एसआइआर लागू करने व बड़े पैमाने पर नाम हटाने के पहले राजनीतिक दलों से कोई मशविरा नहीं किया, लेकिन वही चुनाव आयोग अब राजनीतिक दलों व उनके बीएलओ पर उदासीनता और निष्क्रियता का आरोप मढ़ रहा है!

बूथ लेवल एजेंटों को राजनीतिक दलों का एकमात्र प्रतिनिधि मानकर और शिकायत दर्ज कराने की पूरी प्रक्रिया को अत्यंत जटिल व कठिन बनाकर चुनाव आयोग मताधिकारहरण के खिलाफ लड़ाई को किसी वास्तविक साक्ष्य से रहित खोखली राजनीतिक बयानबाजी के बतौर बदनाम करने का प्रयास कर रहा है.  लेकिन भाकपा(माले) कैडरों की समर्पित व संकल्पित टीमों और नागरिक समाज कार्यकर्ताओं ने इस नौकरशाही व्यवधानों के सामने हार नहीं मानी.

बिहार के तमाम मान्यताप्राप्त राजनीतिक दलों में केवल भाकपा(माले) के बीएलओ टीम को ही विपरीत परिस्थितियों में भी कुछ शिकायतें दर्ज कराने में कामयाबी मिली है, जबकि भाकपा(माले) द्वारा नियुक्त सैकड़ों बीएलओ को चुनाव आयोग की आधिकारिक ‘स्वीकृति’ और ‘मान्यता’ मिलना बाकी है. नागरिक समाज कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियनों और स्थानीय स्तर पर सक्रिय अन्य अनेक नागरिक समूहों की मदद से हम बिहार में और अन्यत्र भी लगभग 5 लाख नाम काटे गए वोटरों और प्रवासी मजदूरों से मिल सके, तथा प्रपत्र भरवाने व साक्ष्य दस्तावेज जमा करने में हमने उनकी मदद की. बूथ लेवल एजेंटों की सबसे विशल वाहिनी (60,000) का दावा करने वाली भाजपा ने एजेंटों के इस ढांचे के मार्फत एक भी शिकायत दर्ज नहीं कराया है. क्या हम यह मान लें कि एसआइआर के जरिये वोटरों के इस बड़े पैमाने के निष्कासन में भाजपा ने अपना एक भी वोटर नहीं खोया है?

दस्तावेज जमा करने और दावे.शिकायतें दर्ज कराने की अवधि खत्म होने में अब एक सप्ताह से भी कम समय बचा है. चुनाव आयोग ने बताया है कि 99 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने दस्तावेज जमा करा दिए हैं. जहां यह आंकड़ा हैरतअंगेज ढंग से काफी ज्यादा लग रहा है, वहीं हमें यह भी याद रखना होगा कि इन दस्तावेजों का सत्यापन अभी बाकी है. और अभी तक जिन 1 प्रतिशत मतदाताओं ने दस्तावेज जमा नहीं किए हैं, उनकी संख्या भी लगभग 8 लाख हो जाएगी. हम नहीं जानते कि पहले दौर में जिन 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं – अधिकांशतः अनुचित रूप से, खासकर उन्हें ‘स्थायी रूप से बाहर चले गए’ बताकर – उनमें से कितने लोगों को अंतिम सूची में पुनः शामिल किया जाएगा. जिन मतदाताओं ने अपने दस्तावेज जमा कराए हैं, उनमें से अनेक लोगों को दस्तावेजों के ‘सत्यापन’ के दौरान अनुचित निष्कासन झेलना पड़ सकता है. और फिर, ‘नए वोटरों’ के नाम जोड़ने का मसला तो है ही – बिहार में भी महादेवपुरा पैटर्न दुहराए जाने के संकेत पहले ही मिल चुके हैं.

इसीलिए मताधिकार हरण और चुनावी धांधली का खतरा बना हुआ है, और अगले कुछ सप्ताह में चुनाव की हर प्रक्रिया पर पैनी नजर रखकर ही बिहार इस खतरे पर काबू पा सकता है. वोटर अधिकार यात्रा ने पूरे बिहार में और इसके बाहर भी चुनावी धोखाधड़ी के खिलाफ स्पष्ट संदेश दिया है, और अब इस लड़ाई को बिल्कुल बदनाम हो चुकी मोदी-नीतीश की ‘डबल इंजन’ सरकार को गद्दी से उतार फेंकने की तरफ ले जाना होगा.


30 August, 2025