– मनमोहन
( इलाहाबाद हाईकोर्ट का 2 सितंबर का फैसला: नागरिक आजादी के दमन पर सरकार को कड़ा संदेश )
इलाहाबाद हाई कोर्ट का 2 सितंबर का फैसला सत्ता के उस ‘ऑरवेलियन’ दमन पर सीधा तमाचा है, जो नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाने वाले आम लोगों पर आए दिन आजमाया जाता है. ‘आकृति चौधरी (नजरबंद) बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में अदालत ने साफ कर दिया कि सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल जनता के मौलिक अधिकारों और नागरिक आजादी को छीनने के लिए नहीं किया जा सकता. मौजूदा दौर में जब मेहनतकशों और इंसाफपसंद लोगों के अधिकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं, तब अदालत का यह दखल बेहद जरूरी और राहत देने वाला है.
यह सारा मामला नोएडा के कारखानों में काम करने वाले ठेका और औद्योगिक मजदूरों के अधिकारों से जुड़ा है. कमरतोड़ महंगाई में अपनी मामूली दिहाड़ी और पगार बढ़ाने की मांग को लेकर जब मजदूर सड़कों पर उतरे, तो 24 साल की छात्रा कार्यकर्ता आकृति चौधरी को आंदोलन बड़ा होने से पहले ही अप्रैल 2026 में उठा लिया गया. उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की तमाम संगीन धाराएं थोपकर जेल भेज दिया गया. मजदूरों के आंदोलन के और भड़क जाने के डर से झुकते हुए यूपी की योगी सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का एलान तो किया, लेकिन इसके तुरंत बाद शुरू हुआ पुलिस का वहशी दमन. इसका सीधा मकसद उन गरीब मजदूरों के दिल में खौफ बैठाना था, जिनके पास न तो वकीलों की भारी-भरकम फीस भरने के पैसे हैं और न ही कोई रसूख.
गैर-यूनियन मजदूरों के इस जायज आंदोलन को कुचलने के लिए यूपी सरकार ने 200 से ज्यादा लोगों को जेल में ठूंस दिया. हुकूमत ने साफ संदेश दिया कि बोलने, जुटने और संगठन बनाने का अधिकार सबके लिए नहीं है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच बताती है कि सात मुख्य मुकदमों में सौ से ज्यादा लोगों को पकड़ा गया, लेकिन पांच में से चार मामलों में अदालतों ने जमानत दे दी और कुल 222 जमानत आदेश जारी हुए. अदालतों ने बार-बार फटकार लगाई कि पुलिस भीड़ में मौजूद किसी भी इंसान को मुल्जिम बना रही है और पूरी भीड़ को एक ही तराजू में तौल रही है. सुप्रीम कोर्ट दशकों से स्पष्टता के साथ कहता रहा है कि किसी प्रदर्शन में महज मौजूद होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन कानून की रखवाली की कसम खाने वाली यूपी पुलिस ने इन नियमों को ताक पर रखकर उन लोगों पर भी मुकदमे लाद दिए जो प्रदर्शन का हिस्सा तक नहीं थे.
पुलिस का सबसे ज्यादा गुस्सा उन आठ लोगों पर निकला, जिन्हें उसने आंदोलन की अगुआई करने वाला बता दिया. इनमें छात्रा आकृति चौधरी और 65 साल के बुजुर्ग पत्रकार सत्यम वर्मा शामिल थे, जो पिछले 12 सालों से नोएडा गए तक नहीं थे. इन दोनों पर काला कानून रासुका मढ़ दिया गया. गिरफ्तार साथियों और उनके परिवारों ने पुलिस की बर्बरता का कच्चा-चिट्टा खोला – किस तरह गुंडों की तरह आधी रात को उठाना, पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा महिलाओं के साथ बदसलूकी और गिरफ्तारी, थाने में बेरहम टाॅर्चर और फर्जी सबूत प्लांट करने जैसी करतूतें की गईं. चार्जशीट देखकर साफ समझ आता है कि यह महज बदले की नीयत से की गई कार्रवाई थी. दंगा भड़काने, जानलेवा हमले और साजिश के ‘सबूत’ के तौर पर पुलिस ने क्या पेश किया? कार्ल मार्क्स के विचार, क्रांतिकारी साहित्य, शहीद-ए-आजम भगत सिंह पर लिखी किताबें और फिलस्तीन के हक में चले अभियानों का समर्थन. हुकूमत का पैगाम साफ था कि अगर आप गरीबों के हक में सोचेंगे या भगत सिंह को पढ़ेंगे, तो आपको देश का दुश्मन करार दे दिया जाएगा.
2 सितंबर को अदालत ने आकृति चौधरी पर से रासुका रद्द करते हुए पुलिस और अफसरशाही के गठजोड़ को जमकर लताड़ा. कोर्ट ने साफ पकड़ा कि गिरफ्तारी को सही ठहराने के लिए सरकारी कागजों में साफ-साफ हेरफेर और जालसाजी की गई थी, जबकि हिंसा भड़काने का कोई सबूत सरकार के पास नहीं था. अदालत ने जिलाधिकारी की भूमिका पर गहरी चोट करते हुए कहा कि उनके दिए गए आधार सिर्फ खोखले कयास और निजी राय थे. यह सब सिर्फ इसलिए किया गया ताकि आकृति को सजा देकर बाकी समाज में खौफ पैदा किया जाए और कोई भी मजदूरों के अधिकारों को लेकर बोलने की हिम्मत न जुटा सके. अदालत ने इस साजिश को सजा देते हुए अवैध कैद के लिए हर्जाना तय किया और आदेश दिया कि यह रकम जिलाधिकारी से लेकर शुरुआत में झूठी रिपोर्ट बनाने वाले थानेदार तक की तनख्वाह से काटी जाए, साथ ही उनकी सर्विस बुक में कोर्ट की कड़ी फटकार दर्ज की जाए. अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही अफसरशाही की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए यह फैसला एक मिसाल है.
हाई कोर्ट ने बिल्कुल सही रेखांकित किया कि अफसरशाही की वफादारी किसी राजनीतिक दल या नेता के बजाय देश के संविधान के प्रति होनी चाहिए. लेकिन इस फैसले में एक अहम कड़ी छूट गई – वह है राजनीतिक सत्ता की जवाबदेही. अप्रैल में मजदूरी की नई दरों को मंजूरी देने से चंद रोज पहले खुद यूपी के मुख्यमंत्री ने आदेश दिए थे कि ‘औद्योगिक शांति’ बिगाड़ने और माहौल खराब करने वालों की पहचान कर उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए. जाहिर है कि आंदोलनकारियों के इस सुनियोजित शिकार के असली गुनहगार सिर्फ पुलिस-प्रशासन नहीं, बल्कि उनके वे राजनीतिक आका हैं जिनके इशारे पर यह पूरी साजिश रची गई. आकृति चौधरी के इस फैसले से दो बातें साफ हैं: पहली यह कि अदालतों को सरकार के तानाशाही रवैये के खिलाफ आगे आकर लोगों के मौलिक अधिकारों की हिफाजत करनी होगी, और दूसरी यह कि समाज के सबसे कमजोर और मेहनतकश तबके के अधिकारों की रक्षा करना हर राजनीतिक वर्ग और तरक्कीपसंद लोगों का साझा फर्ज होना चाहिए.