वर्ष 35 / अंक - 38 / जाति जनगणना: महज जुबानी खानापूर्ति कब तक ?

जाति जनगणना: महज जुबानी खानापूर्ति कब तक ?

जाति जनगणना: महज जुबानी खानापूर्ति कब तक ?

-- अभय कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को ओबीसी कहने से कभी नहीं थकते. चुनावी रैलियों में अपनी ओबीसी ‘आइडेंटिटी’ को सामने रखकर पिछड़ों की सहानुभूति हासिल करने का कोई मौका वह हाथ से नहीं जाने देते. यह एक जमीनी सच्चाई है कि मोदी के चेहरे को आगे कर आरएसएस और भाजपा ओबीसी के एक बड़े तबके को अपने साथ लाने में कामयाब हुई हैं. उनकी यह रणनीति कांग्रेस की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति पर भारी पड़ी है.

हालांकि, मोदी सरकार के बड़े-बड़े पदों पर बैठे नौकरशाहों में बड़ी संख्या उच्च जातियों से आती है और उनकी मंत्रिपरिषद में भी ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात से कहीं अधिक है, फिर भी भाजपा सरकार लगातार यह कोशिश करती रही कि किसी न किसी तरह ओबीसी के मुद्दों पर महज जुबानी खानापूर्ति होती रहे. यही वजह है कि जब मोदी को यह एहसास हुआ कि जाति जनगणना की मांग को लेकर सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दल अपने आंदोलन के जरिए जनसमर्थन हासिल करने में कामयाब हो रहे हैं, तो उन्होंने जाति जनगणना कराने का वादा किया.

पिछले साल 30 अप्रैल को मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की समिति ने घोषणा की कि अगली जनगणना में जाति को शामिल किया जाएगा. इस अवसर पर न केवल मीडिया ने मोदी सरकार के इस फैसले की सराहना की, बल्कि यह भी कहा कि यह निर्णय वंचित वर्गों के कल्याण के प्रति भाजपा सरकार की प्रतिबद्धता का प्रमाण है.

गौरतलब है कि आजादी के बाद से कोई जाति-आधारित जनगणना नहीं हुई है. आजादी के बाद देश की सत्ता कांग्रेस के उन नेताओं के हाथों में आई, जो यह मानते थे कि जाति, धर्म और किसी भी तरह की सामाजिक पहचान पिछड़ेपन की निशानी है और जैसे-जैसे औद्योगीकरण होगा, लोग अपनी जाति और पुरानी सामाजिक पहचान को भूल जाएंगे. हालांकि, वे ऐसा इसलिए कह रहे थे ताकि उनसे यह सवाल न पूछा जाए कि कांग्रेस की नेतृत्व-व्यवस्था में ब्राह्मण इतने हावी क्यों हैं. विज्ञान, मेरिट और विकास के नाम पर सामाजिक न्याय के प्रश्नों को दबा दिया गया. उस दौर में पिछड़े समाज के नेताओं को पर्याप्त जगह नहीं दी गई, ताकि वे अपने समाज के सवालों को सत्ता और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला सकें.

सामाजिक न्याय से जुड़े अधिकांश सवालों को कांग्रेस के नेताओं और उनके द्वारा पोषित बुद्धिजीवियों ने जातिवाद, सांप्रदायिकता और अलगाववाद के नाम पर कलंकित करने की कोशिश की. विविधता का गुणगान तो खूब किया गया, लेकिन इस विविधता को मुख्यतः धार्मिक आधार पर समझा गया. जाति का सवाल भी विविधता के विमर्श से लगभग गायब रहा. थोड़ा-बहुत बदलाव हरित क्रांति के बाद आया. मंडल आयोग का गठन और विभिन्न राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का आना बहुजन राजनीति की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास थे.

हालांकि, कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने 2010 में संसद को आश्वासन दिया था कि कैबिनेट जाति-आधारित जनगणना कराने पर विचार करेगी. बाद में मंत्रियों का एक समूह गठित किया गया, जिसमें सभी राजनीतिक दलों ने जाति-आधारित जनगणना कराने का समर्थन किया. मगर उस दौर में बात आगे नहीं बढ़ पाई और आरोप-प्रत्यारोप के शोर में सब कुछ दबकर रह गया.

मोदी सरकार, जो कल तक जाति-आधारित जनगणना न कराने के लिए कांग्रेस की आलोचना कर रही थी और ओबीसी के बीच अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए जाति जनगणना कराने की बात कर रही थी, आज खुद अपने वादे से मुकर गई है. मोदी अपने वादे को पूरा करने में इसलिए नाकाम हुए हैं क्योंकि इस सवाल पर भाजपा के भीतर पिछड़ी और उच्च जातियों के दो गुटों के बीच भी खींचतान चल रही है. एक ओर, आरएसएस और भाजपा में उच्च जातियों और पूंजीपतियों के हितों के पैरोकार यह मानते हैं कि जाति-आधारित जनगणना एक नकारात्मक कदम है और इससे हिंदू समाज भीतर से कमजोर होगा. वहीं, दूसरी ओर, पिछड़ी जातियों से संबंधित भाजपा नेतृत्व जाति-आधारित जनगणना के पक्ष में है, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने खुलकर बोलने से डरता है. उसे अपने वर्ग और देश के हितों की चिंता से अधिक अपने निजी स्वार्थों की रक्षा की चिंता है.

एक ओर, भाजपा और आरएसएस का पारंपरिक नेतृत्व आक्रामक राष्ट्रवाद, ब्राह्मणवादी एजेंडे और हिंदू बनाम मुसलमान के पूर्वाग्रहों को बढ़ाकर राजनीति करने का पक्षधर है. उसकी दलील है कि धर्म की राजनीति को ही आगे बढ़ाकर संगठन (ब्राह्मणवाद) को मजबूत किया जा सकता है. वह इस बात का विरोधी नहीं है कि दलित और ओबीसी हिंदुत्व की राजनीति से जुड़ें, बल्कि उसकी पूरी कोशिश यह होती है कि भाजपा और आरएसएस में शामिल होकर बहुजन समाज के नेता हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाएं, न कि सामाजिक न्याय के सवालों का समर्थन करें. इसके सामने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का उदाहरण मौजूद है. उनका संबंध पिछड़ी जाति से था, लेकिन वे हिंदुत्व की राजनीति करते थे और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को मजबूत करने के लिए सब कुछ करने को तैयार थे. उनके ही शासनकाल में बाबरी मस्जिद को दिन के उजाले में तोड़ा गया, जिसका फायदा सामाजिक न्याय की राजनीति को नहीं, बल्कि ब्राह्मणवाद को मिला.

वहीं दूसरी ओर, भाजपा नेतृत्व का वह गुट, जो चुनावी समीकरणों के महत्व को समझता है, उसे लगता है कि जाति-आधारित जनगणना कराने से पार्टी को बहुत लाभ होगा. हालांकि, उसे मालूम है कि जब जाति से संबंधित सभी आंकड़ों पर से पर्दा उठेगा, तो यह बात दिन के उजाले की तरह साफ हो जाएगी कि आजादी के लगभग आठ दशक गुजारने के बाद भी दलित, आदिवासी और ओबीसी का एक बड़ा समूह भेदभाव और भयानक गरीबी का शिकार है.

इसलिए चुनावी समीकरणों को समझने वाला भाजपा नेतृत्व जाति-जनगणना के लिए कुछ करता हुआ तो दिखना चाहता है, मगर उसे इस बात का भी पूरा ध्यान है कि जो कुछ भी हो, उसमें ब्राह्मणवाद का वर्चस्व बना रहे. मोदी की ओर से जाति-जनगणना का वादा और फिर इस पूरे मामले को कमजोर करने की कोशिश को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है. हालांकि, जनगणना में लोगों को अपनी जाति बताने का विकल्प दिया गया है, मगर यह भी पूरी साजिश का हिस्सा है कि ओबीसी वर्ग के बारे में कोई महत्वपूर्ण तथ्य सामने न आ पाए.

जाति-आधारित जनगणना के मुद्दे को जिस तरह से कमजोर किया गया है, उससे यह साबित होता है कि मोदी चाहे खुद को कितना भी पिछड़ा कहें, भाजपा और आरएसएस अभी भी उच्च जातियों के गुटों के हाथों में हैं. मोदी सरकार द्वारा जाति जनगणना के अपने वादे से मुकर जाने के बाद विपक्ष ने उसे घेर लिया है और इस मुद्दे को इतना उछालना चाहता है कि भाजपा के भीतर की दरार और चौड़ी हो जाए. हालांकि, अब तक उसे सड़कों पर उतर जाना चाहिए था.

यहां यह भी याद रखना जरूरी है कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब भी उसने ओबीसी समुदाय के साथ न्याय नहीं किया. वोट लेने के समय उसने दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों को याद किया, मगर नेतृत्व देने में हमेशा ब्राह्मणों और दूसरी ऊंची जातियों को तरजीह दी. कांग्रेस के अंदर भी दक्षिणपंथी और लेफ्ट-सेक्युलर गुट हैं, मगर दोनों धड़ों में एक बात समान है कि उनकी लीडरशिप ब्राह्मणों और दूसरी ‘अपर कास्ट’ के हाथों में रही है, जो सामाजिक न्याय की राजनीति को बहुत पसंद नहीं करते.

यही वजह है कि राहुल गांधी जब भी सोशल जस्टिस की बात करते हैं और उन्हें थोड़ी-बहुत सहानुभूति मिलती है, तो जितनी तकलीफ आरएसएस और भाजपा को होती है, उससे कोई कम परेशानी कांग्रेस के ब्राह्मणवादी गुटों को नहीं होती. उन्हें लगता है कि राहुल कांग्रेस का ‘मंडलीकरण’ कर रहे हैं.

लोकतंत्र का सही अर्थ यही है कि नीतियां बनाने में देश का वंचित तबका बराबर का भागीदार बने. अगर ‘मेरिट’ ही सब कुछ है, तो फिर उन्हें आजादी की मांग का भी विरोध करना चाहिए था, क्योंकि अंग्रेज काबिलियत के मामले में भारतीयों से कुछ कम तो नहीं थे.

यही वजह है कि जब जाति-आधारित जनगणना के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, तो न सिर्फ भाजपा, बल्कि कांग्रेस के अंदर की भी ब्राह्मणवादी लाॅबी के कलेजे को ठंडक मिली है. हालांकि यहां कांग्रेस के ‘लिबरल’ और भाजपा के कट्टर ब्राह्मणवादी नेतृत्व को एक तराजू पर नहीं तौला जा रहा है. दोनों में कई मामलों में बहुत फर्क है, मगर जाति के सवाल पर यह फर्क बहुत हद तक मिट जाता है.

यही वजह है कि कांग्रेस कुछ नई राजनीति करने में नाकाम हो रही है. राहुल गांधी एक दिन सोशल जस्टिस की बात करते हैं और दूसरे दिन ब्राह्मणवादी कर्मकांड करते हुए दिखाई देते हैं. यह सब कुछ इस बात की ओर इशारा करता है कि कल भी और आज भी कांग्रेस के भीतर उच्च जातियों का प्रभाव मजबूत था और है.

हालांकि कांग्रेसी इस बात का श्रेय लेते हैं कि उनके दौर में उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण लागू हुआ. इस नीति के लिए कांग्रेस की प्रशंसा होनी चाहिए और इसका फल भी उसे 2009 के चुनाव में मिला. मगर बड़ी सच्चाई आज भी यही है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी को ओबीसी समुदाय के बारे में सिर्फ उतना ही करती है, जितना वोट पाने के लिए जरूरी है. दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी दिलचस्पी सत्ता परिवर्तन में है, सामाजिक परिवर्तन की नहीं है.

यह अच्छी बात है कि राहुल गांधी समय-समय पर सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाते हैं और इस बार भी जाति-आधारित जनगणना का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने मोदी को पत्र लिखकर इस बात पर आपत्ति जताई है कि जाति-आधारित जनगणना में जाति संबंधी आंकड़े ठीक से क्यों नहीं जुटाए जा रहे हैं और ‘ओबीसी काॅलम’ को क्यों शामिल नहीं किया गया है.

कांग्रेस का यह हस्तक्षेप सही है, लेकिन राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि सामाजिक न्याय की बात करने और उसे सैद्धांतिक रूप से गंभीरता से लेने में बहुत बड़ा अंतर होता है. अगर कांग्रेस वाकई सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे बुद्ध, कबीर, फुले, पेरियार और अंबेडकर के आदर्शों के प्रकाश में काम करना चाहिए.

भाजपा और संघ परिवार की हालत तो और भी बदतर है, क्योंकि इन संगठनों का जन्म सामाजिक न्याय के मुद्दों को दबाने और जमींदारों, पूंजीपतियों तथा समाज के प्रतिक्रियावादी तत्वों की सर्वाेच्चता को बनाए रखने के लिए हुआ था. जहां भाजपा चुनावी लाभ के लिए अपने रूढ़िवादी और ब्राह्मणवादी रुख से ऊपरी तौर पर समझौता करने को तैयार है, वहीं आरएसएस खुले तौर पर जाति-आधारित जनगणना का विरोध करता रहा है. इसके दो उदाहरण नीचे प्रस्तुत हैं.

आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के 2 अगस्त 2015 के अंक में ए. जयराम ने कहा कि जाति-जनगणना ‘विघटनकारी’ है. उन्होंने यह भी लिखा कि यह हिंदुओं के बीच विभाजन को बढ़ावा देगी. इसी दौरान ‘ऑर्गनाइजर’ के 13 अगस्त 2015 के एक अन्य अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें जाति-जनगणना की प्रक्रिया को ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘प्रजातंत्र’ के मूल्यों के विरुद्ध बताया गया हैः “भारत एक धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक देश है, जिसमें जाति और नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता. फिर, जाति के मुद्दे को क्यों उखाड़ा जा रहा है?”

अक्सर देखा गया है कि जब भी पिछड़े लोग अपनी सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का हवाला देते हुए सामाजिक न्याय के लिए राजनीतिक संघर्ष शुरू करते हैं, तो सामाजिक न्याय और आरक्षण के विरोधी धर्मनिरपेक्षता और योग्यता के नारे लगाने लगते हैं. हिंदू समुदाय के तथाकथित रक्षकों ने हमेशा पिछड़ों की दुर्दशा के प्रति उदासीनता दिखाई है, लेकिन जब भी पिछड़े लोग अपनी आवाज उठाते हैं और अपने हक की मांग करते हैं, तो अचानक हिंदुओं के विभाजन की चर्चा शुरू हो जाती है.

जाति-आधारित भेदभाव सदियों से भारतीय समाज में मौजूद है. इसलिए, जो कोई भी यह सोचता है कि जाति-जनगणना न कराने से जाति व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, वह वास्तव में सामाजिक न्याय का विरोध कर रहा है. जाति-आधारित जनगणना का वास्तविक उद्देश्य विश्वसनीय आंकड़े एकत्र करना है, ताकि सरकार कमजोर वर्गों के विकास के लिए प्रभावी नीतियां बना सके. 


19 September, 2026