जेल की सलाखों के पीछे हुदा जरीवाला
मस्जिद ध्वस्तीकरण पर योगी सरकार से सोशल मीडिया के माध्यम से सवाल करने वाली पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता हुदा जरीवाला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है. इसके अलावा और भी कई लोगों को इस प्रकरण में हिरासत में लिया गया है. उल्लेखनीय है कि जरीवाला बीबीसी लन्दन की एंकर रह चुकी हैं तथा अरब में पत्रकारिता कर चुकी हैं. उन्होंने जामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की है.
उनकी यह गिरफ्तारी प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है. भाकपा(माले) की राज्य इकाई ने उनकी अविलंब बिना शर्त रिहाई की मांग की है. भाकपा(माले) ने कहा है कि हुक्मरानों से सवाल पूछने का अधिकार देश का संविधान देता है. सवाल पूछने पर शांति भंग जैसे आरोप लगाना और गिरफ्तार कर जेल भेजने जैसी कार्रवाई एक लोकतांत्रिक राज्य में नहीं, अपितु तानाशाही और फासिस्ट राज्य में ही संभव है. योगी सरकार में गैर संवैधानिक पुलिस-बुलडोजर राज चल रहा है, इसीलिए सवाल पूछने वालों को चुप कराने की कोशिश हो रही है. यह अस्वीकार्य है.
भाकपा(माले) ने कहा कि प्रशासन और यूपी पुलिस ने दिल्ली विवि की छात्रा आकृति चौधरी पर नोएडा मजदूर आंदोलन के सिलसिले में रासुका लगाने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया फैसले से सबक नहीं लिया. कोर्ट ने कहा कि रासुका लगाने के लिए न तो संबंधित डीएम, न ही पुलिस ने ‘दिमाग का इस्तेमाल’ किया. यही हाल जरीवाला की गिरफ्तारी मामले में भी है. सवाल पूछने व प्रशासन की किसी कार्रवाई से असहमति व्यक्त करने पर भला शांति भंग का सवाल कहां से पैदा होता है, जिसके आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया है?
पार्टी ने कहा कि सरकार से जनता के पक्ष में खड़े होकर सवाल पूछना एक पत्रकार का कर्तव्य व पेशा है. लेकिन उन्हें ऐसा न करने देने और उनका दमन करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. हाल ही में 4 पीएम न्यूज चैनल की दो पत्रकारों – शाहीन खान और नफीसा खान – को भाजपा शासित दिल्ली की मुख्यमंत्री से सवाल करने पर दिल्ली पुलिस ने थाने लाकर उनकी पिटाई कर दी और उनकी एफआईआर भी नहीं दर्ज की. पत्रकार जरीवाला ने उक्त दो महिला पत्रकारों की पिटाई मामले में भी दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया था और एफआईआर दर्ज करवाने के लिए दिल्ली के साकेत थाने भी गईं थीं. इसकी खुन्नस जरीवाला को यूपी में गिरफ्तार कर निकाली गई है. भाजपा सरकार ने जरीवाला को उनकी न्यायप्रियता का ‘दंड’ दिया है.
भाकपा(माले) ने कहा कि इस तरह की ‘ज्यादतियां’ प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पिछले स्वतंत्रता दिवस पर ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के प्रयोग के बाद बढ़ गई हैं. शायद सहारनपुर मस्जिद पर बुलडोजर चलाने से असहमत जरीवाला भी भाजपा सरकार के ‘दिमागी नक्सल’ की श्रेणी में आती हैं, तभी उनके खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की गई है. मौजूदा सत्ता का मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति जो नफरती दृष्टिकोण है, वह भी उनके खिलाफ कार्रवाई का एक कारण प्रतीत होता है.
गौरतलब है कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में 70 साल पुरानी मस्जिद को नगर मजिस्ट्रेट के आदेश का हवाला देकर प्रशासन ने आनन-फानन में गत पांच सितंबर को तड़के बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया. इस पर जरीवाला ने असहमति जताते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से सहारनपुर के जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री योगी से सवाल पूछे और टिप्पणी की. इस पर एक स्थानीय वकील की शिकायत पर सदर बाजार थाने की पुलिस ने कार्रवाई करते हुए जरीवाला को शांतिभंग के आरोप में जेल भेज दिया.
दिव्या श्रीवास्तव: ट्रोल व धमकी से पलायन
इसी तर्ज पर पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव को मुख्यमंत्री योगी से सवाल पूछने पर भाजपाई समर्थकों द्वारा डराने, धमकाने व ट्रोल का सामना करना पड़ा.
दिव्या को अपनी सुरक्षा पर खतरा महसूस होने के कारण लखनऊ छोड़कर दिल्ली जाना पड़ा. खबर यह भी है कि जिस न्यूज चैनल में वे काम करती थीं, उसमें नौकरी से उन्हें निकाल दिया गया है. सिर्फ सवाल पूछने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. उनकी सुरक्षा को अभी भी खतरा है. क्या योगी सरकार प्रदेश को ‘ऑरवेलियन डिसटोपिया’ बनाना चाहती है, जहां सवाल पूछने की आजादी न हो और नागरिकों के लिए तानाशाही व दमनकारी व्यवस्था हो. ‘ऑरवेलियन डिसटोपिया’ शब्द का इस्तेमाल हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छात्रा आकृति चौधरी मामले में किया था.
भाकपा(माले) ने कहा कि लोकतंत्र का यह तकाजा है कि मुख्यमंत्री योगी दिव्या श्रीवास्तव से खेद व्यक्त करें, उन्हें ट्रोल करने की कार्रवाई पर रोक लगाएं, उनकी सुरक्षा व्यवस्था करें और उन्हें ससम्मान नौकरी पर बहाल कराएं.
विनोद सहनी: सामंती दबंगों के शिकार हुए
9 सितंबर 2026 को गोंडा के परसपुर में विनोद सहनी की सामंती गुंडों ने बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी. विनोद सहनी की परसपुर में छोटी सी दुकान थी. वे रात में दूकान बंद कर घर जा रहे थे कि छिपकर घात लगाकर बैठे अपराधियों ने धारदार हथियार से हमला कर और गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन उनकी मौत हो गई. विपक्ष के तमाम दल – सपा, कांग्रेस, भाकपा(माले) व वीआईपी इसके खिलाफ सड़क पर उतर पड़े हैं.
दरअसल, चुनाव नजदीक होने के कारण यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है. पूर्वांचल की लगभग 100 सीटों पर निषाद वोट प्रभावी है. इसलिए सभी दल मैदान में कूद पड़े हैं. बहरहाल इस घटना ने योगी सरकार के कानून व्यवस्था की पोल खोल दी है. सरकार के राज में दबंग सामंती तत्वों का मनोबल इस कदर बढ़ा हुआ है कि हत्या जैसे जघन्य अपराध में भी उन्हें कोई डर भय नहीं है. विनोद सहनी के हत्यारे मुख्यमंत्री के सजातीय बताए जा रहे हैं.
बताया जा रहा है कि विनोद साहनी सोशल मीडिया पर निषाद समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार पोस्ट करते थे. हमले से कुछ घंटे पहले भी उन्होंने सोशल मीडिया पर एक रील पोस्ट की थी, जिसमें साध्वी निरंजन ज्योति और राजू दास की तस्वीरें थीं. पोस्ट में एक गाना लगाया गया था और निषाद समाज से जुड़े लोगों से वीडियो शेयर करने की अपील की गई थी.
बताया जा रहा है कि विनोद की सोशल मीडिया गतिविधियों और पोस्ट को लेकर समाज के दबंग तत्वों में नाराजगी थी. वह फेसबुक पर कैबिनेट मंत्री डाॅ. संजय निषाद और उनके बेटे श्रवण निषाद को लेकर भी आलोचनात्मक राजनीतिक टिप्पणियां करते थे. इसे लेकर पहले भी कुछ लोगों से उनकी बहस होने की बात सामने आई.
विनोद सहनी अतीत में सपा, आजाद समाज पार्टी और निषाद पार्टी से भी जुड़े थे. बताया जा रहा है कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी थी. वे विधान सभा चुनाव लड़ने का भी मन बनाए हुए थे. उनकी राजनीति में आने और चुनाव लड़ने की महत्वाकांक्षा सामंती तत्वों को बर्दाश्त नहीं थी. इसलिए उन्हें रास्ते से हटा देने का फैसला लिया गया.
विनोद सहनी के परिजन और आक्रोशित निषाद समुदाय मुख्यमंत्री योगी से आरोपियों के खिलाफ उसी तरह बुलडोजर न्याय की मांग कर रहे हैं जैसी अन्य समुदायों के सदस्यों के खिलाफ करने के लिए वे जाने जाते हैं. बताया जा रहा है कि हत्यारे विनोद सहनी की सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर गुस्से में थे जहां वे अपने समुदाय के खिलाफ होने वाले अत्याचार को लेकर प्रतिरोध का स्वर बुलंद करते थे. बस यही बात सामंती दिमाग के अपराधियों को नागवार गुजरती थी. इन्होंने फूलन देवी के घर जाकर वहां उनकी मूर्ति भी लगवाई थी. इस तरह अपने समुदाय से संबंधित सवालों पर उनकी सक्रियता और सामंती दबदबे के खिलाफ आवाज उठाना ही अंततः उनकी मौत का कारण बनी. अभी हाल ही में अयोध्या में मछली भोज के सवाल पर उनके हस्तक्षेप ने ऐसा लगता है कि आग में घी डालने का काम किया. बहरहाल दबाव में आई सरकार ने 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले की जांच शुरू कर दी है.
प्रदेश में योगी सरकार के सहयोगी दल निषाद पार्टी के मुखिया और योगी सरकार में मंत्री संजय निषाद भी अपनी ही सरकार के खिलाफ दो-दो जगह धरने पर बैठने को मजबूर हो गए – पहले लखनऊ में केजीएमयू अस्पताल में और फिर कलक्ट्रेट में. मंत्री संजय निषाद से योगी का 36 का आंकड़ा है. निषाद दिल्ली दरबार के अमित शाह के खेमे के माने जाते हैं. उधर अमित शाह और योगी के बीच मोदी का उत्तराधिकारी बनने की प्रतिद्वंद्विता अब किसी से छिपी हुई नहीं है. जैसे जैसे 2029 नजदीक आता जा रहा है, लड़ाई और तेज होती जा रही है और इसमें अब से चंद महीनों बाद 2027 का उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव महत्वपूर्ण पड़ाव होगा. संजय निषाद के कदम को इससे जोड़ कर देखा जा रहा है.
भाकपा(माले) की टीम मृतक के घर पहुंची
शुक्रवार (11 सितंबर) को भाकपा(माले) की टीम मृतक विनोद कुमार साहनी के गांव (गोंडा के रेक्सड़िया-मल्लाहनपुरवा, परसपुर थाना क्षेत्र) पहुंची और हत्याकांड से जुड़े तथ्यों की जानकारी हासिल की. इसके पूर्व, टीम ने परसपुर में साहनी के शव के साथ शाहपुर चौराहे को जाम कर न्याय की मांग कर रहे जनसमूह के साथ भागीदारी कर एकजुटता व्यक्त की.
टीम का नेतृत्व भाकपा(माले) की राज्य स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमेटी) के सदस्य राजेश साहनी (गोरखपुर) ने किया. टीम में पार्टी की राज्य समिति सदस्य राम लौट, गोरखपुर जिला कमेटी के सदस्य बजरंग लाल निषाद, शिव भोले निषाद, बस्ती से रमेश चंद्र निषाद, निर्मल सहित अन्य व्यक्ति शामिल थे.
आश्वासन की उम्मीद में घंटों बैठे रहे लोग
11 सितंबर को पोस्टमार्टम के बाद गांव में आने पर शाहपुर चौराहे पर हजारों महिला-पुरुष विनोद साहनी का शव लेकर घंटों बैठे रहे. परिजनों की स्पष्ट मांग थी कि जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक मौके पर आकर उनकी मांगों पर लिखित आश्वासन दें.
डीएम और एसपी के मौके पर पहुंचने के बावजूद प्रशासन की ओर से न तो तत्काल आर्थिक सहायता और न ही परिवार की सुरक्षा का ठोस आश्वासन दिया गया. जिलाधिकारी का रवैया भीड़ की पीड़ा और आक्रोश को समझने के बजाय टालमटोल और असंवेदनशीलता वाला था. परिणामस्वरूप आक्रोशित लोग शव लेकर गांव लौटे और अंतिम संस्कार किया.
पार्टी की रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया है कि योगी सरकार के मंत्री (संजय निषाद) यदि वास्तव में पीड़ित परिवार के साथ खड़े थे, तो उन्हें केजीएमयू में धरने तक सीमित रहने के बजाय शाहपुर चौराहे पर शव के साथ बैठे परिजनों और हजारों ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उनकी मांगों को प्रशासन से मनवाने के लिए दबाव बनाना चाहिए था.
भाकपा(माले) की टीम ने जुटाई जानकारी
भाकपा(माले) की टीम 11 सितंबर को शाहपुर चौराहे पहुंची और शव के साथ मौजूद परिजनों तथा ग्रामीणों से बातचीत कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली, बाद में विनोद साहनी के घर भी गई और दाह संस्कार के बाद वापस लौटी. अगले दिन लखनऊ में जांच रिपोर्ट जारी की गई.
भाकपा(माले) टीम की प्रमुख मांगें
भाकपा(माले) टीम ने योगी सरकार से मांग की है कि विनोद साहनी के परिवार को तत्काल दो करोड़ रुपये मुआवजा और दो एकड़ जमीन दी जाए. परिवार के एक सदस्य को स्थायी सरकारी नौकरी तथा पूरे परिवार को तत्काल सुरक्षा दी जाए. पीड़ित परिवार को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए और हत्या में शामिल सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाए. हत्याकांड के राजनीतिक एवं अन्य संरक्षकों की भूमिका की जांच कर उनके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज किया जाए और कानूनी कार्रवाई की जाए. मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए गोंडा के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को तत्काल हटाया जाए.
( प्रस्तुति: लाल बहादुर सिंह )