-- मनमोहन
‘द वाॅयस ऑफ हिंद रजब’ फिल्म मुझे इंटरनेट के जरिए देखनी पड़ी, क्योंकि भारत सरकार ने इस पर पाबंदी लगा दी है. जो लोग पिछले ढाई साल से जारी गाजा जनसंहार को अपनी आंखों के सामने दिन-रात लाइव देख रहे हैं, जिन्होंने ईरान के मीनाब में बच्चियों के कत्लेआम को भी उन्हीं जनसंहारी दरिंदों के हाथों अंजाम होते देखा है, उनके लिए यह फिल्म देखना बेहद तकलीफदेह है. यह कुछ वैसा ही है जैसे जर्मन समाजवादी फिल्मकार ऑश्विट्ज पर उसी दौर में फिल्म बना रहे हों, जब वहां लाखों यहूदियों को गैस चैंबरों में अभी भी मारा जा रहा हो. ऑश्विट्ज के बाद दुनिया ने ‘नेवर अगेन’ कहा था, लेकिन विडंबना यह है कि वही ताकतें आज गजा में एक नए होलोकाॅस्ट को अंजाम दे रही हैं. जब जनसंहार जारी हो, तब फिल्म बनाना सिर्फ दस्तावेजीकरण भर नहीं रह जाता. अगर वह मानवता के खिलाफ इस अपराध को रोकने और उसके दोषियों की जवाबदेही तय करने की आवाज न बन सके, तो यह खतरा बना रहता है कि वह इंसानी त्रासदी को एक ‘तमाशे’ में बदल दे.
हिंद रजब, जिसे 29 जनवरी 2024 को 355 गोलियों से छलनी कर दिया गया था, अपनी आवाज हमेशा के लिए खामोश होने से पहले ‘फिलिस्तीन रेड क्रिसेंट सोसाइटी’ के साथ साढ़े तीन घंटे से ज्यादा समय तक फोन पर बनी रही. वह काॅल इसलिए खत्म नहीं हुई कि कोई मदद पहुंच गई थी, बल्कि इसलिए खत्म हुई क्योंकि इजरायली सैनिकों ने उस आवाज का ही बेरहमी से अंत कर दिया. हिंद के आखिरी शब्द उन वाॅलंटियर्स ने रिकाॅर्ड किए थे, जिनसे उसने और उसकी चचेरी बहन ने मदद की गुहार लगाई थी. वे दोनों एक कार में फंसी थीं और चारों तरफ इजरायली टैंकों का घेरा था. गाजा शहर में जारी इजरायली जनसंहार से बचकर निकलने की कोशिश में हिंद अपने परिवार के छह सदस्यों के साथ मार दी गई. इजरायली सेना ने उन दो पैरामेडिक्स की भी हत्या कर दी जो हिंद को बचाने पहुंचे थे. यह कोई अकेली घटना नहीं थी. जनसंहार के पहले तीन महीनों में ही इजरायल ने 113 से ज्यादा एम्बुलेंस तबाह कर दीं – यह चिकित्सा सेवाओं को निशाना बनाकर उन्हें खत्म करने की एक सुनियोजित मुहिम का हिस्सा है, ताकि गाजा को एक ऐसी जगह में तब्दील कर दिया जाए जो इंसानों के रहने के काबिल ही न रहे.
जो बच्चे मासूमियत, उम्मीद और इंसानी जिंदगी के सबसे अनमोल हिस्सों की निशानी होते हैं, वे अक्सर हमदर्दी जगाने, अपराधबोध पैदा करने और हमारी सुन्न पड़ती संवेदनाओं को झकझोरने का सबसे आसान और असरदार जरिया बन जाते हैं. लेकिन कहानियों का मकसद महज भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करना नहीं, बल्कि उससे कहीं आगे जाना होना चाहिए.
कौथर बेन हनिया की ‘द वाॅयस ऑफ हिंद रजब’ किसी इंसान को ‘यादगार’ में बदल देने की चाहत में एक बड़ा खतरा भी मोल लेती है, क्योंकि यह प्रक्रिया अक्सर उस इंसान की असलियत को ही निगल जाती है. फिल्म में हिंद एक जीती-जागती बच्ची के बजाय महज एक प्रतीक बनकर रह जाती है. फिल्म उस जरूरी और कठिन चुनौती से लगभग बच निकलती है जहां हिंद की जिंदगी, उसके डर और उसकी वास्तविक मौजूदगी को गहराई से महसूस कराया जाना था.
पूरी फिल्म में हिंद की असली रिकाॅर्ड की गई आवाज का इस्तेमाल तो हुआ है, लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा उस रेस्क्यू सेंटर के भीतर सिमटा रहता है जहां कर्मचारी उसकी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. नतीजा यह होता है कि हिंद की घबराहट और उसकी आखिरी पुकारों की जगह बार-बार तेज सांसें, चीखती प्रतिक्रियाएं और बेचैन संवाद ले लेते हैं. चमकते स्क्रीन माॅनिटर, साफ-सुथरे फर्श, कांच के दरवाजे और करीने से इस्त्री किए कपड़े मिलकर एक ऐसा सजा-संवरा सिनेमाई मंच तैयार करते हैं, जो बाहर जारी वास्तविक हिंसा की भयावहता को महसूस कराने के बजाय उसे एक नियंत्रित तमाशे में बदल देता है.
पूरी फिल्म देखते हुए मेरे भीतर बस एक ही सवाल लगातार गूंजता रहा कि हम आखिर किस दौर में जी रहे हैं? मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि हिंद की याद जिंदा रहे. उन 22,000 से ज्यादा बच्चों की याद में जिनकी आवाज को इजरायल ने हमेशा के लिए दफन कर दिया, जबकि दुनिया इस जनसंहार का लाइव टेलीकास्ट देख रही है.
हिंद की त्रासदी जितनी भयावह है, उसमें एक कड़वी विडंबना भी छिपी है कि वह इस मायने में ‘खुशकिस्मत’ रही कि उसकी मौत पूरी तरह खामोशी में नहीं हुई. उसकी आवाज ने अंधेरे को चीरते हुए दुनिया को, चाहे कुछ लम्हों के लिए ही सही, इजरायल द्वारा किए जा रहे इन युद्ध अपराधों का मुकम्मल तौर पर सामना करने को मजबूर कर दिया. लेकिन सबसे गहरी त्रासदी सिर्फ हिंद की कहानी में नहीं है, बल्कि उन अनगिनत लोगों की कहानियों में है जो अलग-अलग तरीकों से मारे गए और गाजा में जारी इस जनसंहार में आज भी मारे जा रहे हैं. वे बिना किसी आवाज, बिना किसी तस्वीर और बिना किसी गवाह के कत्ल किए जा रहे हैं. उनकी मौतें इस भयावह त्रासदी के मलबे में कहीं दफन होकर रह गईं, जहां फिलिस्तीनियों के पास न तो उन्हें दर्ज करने का मौका है, न उन पर बात करने का और न ही उन्हें सम्मान के साथ दफनाने का हक.
हिंद की कहानी को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक फिल्मी पर्दे के जरिए पहुंचाने को ‘जागरूकता फैलाने’ के एक बड़े पल के तौर पर सराहा जा रहा है. लेकिन सवाल यह है कि अब, इस मोड़ पर, आखिर किस बात की जागरूकता फैलाना बाकी रह गया है? द लांसेट में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक गाजा में 1,82,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें 22,000 से अधिक बच्चे शामिल हैं. 17,000 से ज्यादा घायल बच्चे ऐसे हैं जिनके परिवार में अब कोई नहीं बचा. दुनिया ने उनके लिए एक नया क्रूर शब्द गढ़ दिया है – WCNSF, यानी घायल बच्चा जिसका कोई परिवार जिंदा नहीं बचा. हर वह इंसान जो मीडिया, राजनीति या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़ा है, अच्छी तरह जानता है कि गाजा में क्या हो रहा है. फिलिस्तीनियों की बेबसी कोई छिपी हुई चीज नहीं है. इसे हर रोज रीयल-टाइम में पूरी दुनिया के सामने प्रसारित किया जा रहा है – बमबारी से ढहे घरों के मलबे से, अस्पतालों के खंडहरों से और विस्थापित परिवारों के टेंटों से. हर कोई जानता है, और फिर भी कुछ नहीं बदलता.
यही वजह है कि ‘द वाॅयस ऑफ हिंद रजब’ कई बार एकजुटता के सच्चे इजहार से ज्यादा एक खोखली औपचारिकता और पूंजीवादी मुनाफे के साधन जैसी महसूस होती है. ‘जागरूकता फैलाने’ के नाम पर जनसंहार को एक तमाशे और भावनात्मक उपभोग में बदल देने का खतरा मौजूद है. हिंद की कहानी कोई दूर का इतिहास नहीं है. यह बीते दौर की ऐसी त्रासदी नहीं जिसे सिनेमाई रूप देकर दर्शकों को ‘शिक्षित’ किया जाए. यह आज की कहानी है, इसी पल की हकीकत है. हिंद जैसे बच्चे आज भी शहीद किए जा रहे हैं और उसके जैसे न जाने कितने परिवारों का नामो-निशान मिटाया जा रहा है. लाखों लोग अब भी भूख से तड़प रहे हैं क्योंकि गाजा में इजरायल द्वारा जान-बूझकर पैदा किया गया अकाल और नाकेबंदी जारी है, जहां भोजन व दवाइयों को सुनियोजित तरीके से रोका जा रहा है.
ऐसे में इस गहरी पीड़ा को एक फिल्मी जलसे की नुमाइश में बदल देना, जहां दर्शक तालियां बजाएं, भावुक हों और फिर अपनी सामान्य जिंदगी में लौट जाएं, वाकई घिनौना लगता है. पश्चिमी पाखंड का यह ढर्रा नया नहीं है. रवांडा के जनसंहार के दौरान जब हर रोज हजारों लाशें गिर रही थीं, तब पश्चिमी ताकतें और संयुक्त राष्ट्र तमाशबीन बने रहे. अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास दखल देने के तमाम साधन मौजूद थे, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह नदारद थी. बाद में जब खून सूख गया, तो उन्हीं ताकतों ने जिन्होंने उस वक्त आंखें फेर ली थीं, अचानक रवांडा में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. उन्होंने किताबें लिखीं, फिल्में बनाईं, रिसर्च किए, और उस त्रासदी को दुनिया के बाजार में बेचने लायक सामग्री में बदल दिया. जनसंहार उनके लिए अकादमिक अध्ययन, सांस्कृतिक रसूख और अपनी ‘नैतिकता-प्रदर्शित करने का माध्यम बन गया. जो नदारद था, वह थी जवाबदेही – और उस वक्त की वह ठोस कार्रवाई जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत तब थी जब कत्लेआम जारी था.
यह फिल्म भी उसी खोखली औपचारिकता को दोहराने का जोखिम पैदा करती है. सिनेमाई दीर्घाओं में देर तक गूंजती तालियों ने किसी भी मायने में फिलिस्तीनियों की मदद नहीं की. न इससे नाकेबंदी टूटी, न भूखे बच्चों को खाना मिला और न ही बमों की बारिश रुकी. हां, इसने वेनिस समेत कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में खूब वाहवाही बटोरी और वैश्विक फिल्म बाजार में मुनाफा भी कमाया. हाॅलीवुड स्टार ब्रैड पिट की प्रोडक्शन कंपनी ‘प्लान बी’, जिसने इस फिल्म को फाइनेंस किया है, उसमें बहुलांश हिस्सेदारी ‘मीडियावान’ की है. मीडियावान एक अरबों डाॅलर की फ्रांसीसी निजी इक्विटी कंपनी है जिसके तार जायोनी पूंजी और शेयरधारकों से जुड़े बताए जाते हैं.
दूसरे शब्दों में, इस फिल्म से पैदा होने वाला मुनाफा आखिरकार उन्हीं पूंजीवादी नेटवर्कों की जेब में जाएगा जो इजरायल के जारी अपराधों को राजनीतिक, आर्थिक या वैचारिक सहारा देते हैं. यह एकजुटता नहीं है बल्कि जनसंहार को कला-सौंदर्य और नैतिक संवेदनशीलता के आवरण में लपेटकर पेश की गई एक रस्म-अदायगी है. इस लिहाज से यह प्रतिरोध कम और एक आत्ममुग्ध उपभोक्तावादी संस्कृति का विस्तार ज्यादा लगती है. यह हाॅलीवुड के दिग्गजों और उनके दर्शकों को खुद को जागरूक और संवेदनशील महसूस करने का अवसर देती है, जबकि जमीन पर असल त्रासदी बिना रुके और भी विकराल होती जा रही है. हिंद रजब की कहानी से निचोड़ी गई यही पूंजी अंततः उन ढांचों को और मजबूत करेगी जिनके रिश्ते जनसंहारी इसराइल के रंगभेदी शासन को खाद-पानी देने वाले नेटवर्कों से जुड़े हैं. यह एकजुटता नहीं बल्कि अपराध में मिलीभगत है. यह एक ऐसी औपचारिकता है जो जुल्म को खूबसूरत संवेदनशीलता की परतों में ढककर उसे और सहूलियत देती है.
वेनिस में गूँजती वे तालियां हिंद रजब के लिए नहीं थीं. वे उन लोगों के सुकून के लिए थीं जो उसकी कहानी को दो घंटे के एक सजे-संवरे सिनेमाई पैकेज की तरह इस्तेमाल कर सकते थे. वे उस भ्रम के लिए थीं कि देखना, रो लेना और तालियां बजा देना ही कुछ कर गुजरने के बराबर है. यह बिना किसी जोखिम या अंजाम के परवाह करने का एक सुविधाजनक प्रदर्शन था. लेकिन फिलिस्तीनियों को जमीर की ऐसी खोखली तसल्ली की जरूरत नहीं है. उन्हें वातानुकूलित थिएटरों में बजती तालियों की जरूरत नहीं है जबकि वे खुद टेंटों में भूखे सोने पर मजबूर हैं. उन्हें ऐसे सिनेमाई तमाशों की जरूरत नहीं है जो उनकी मौत को एक नुमाइश में बदल दें लेकिन उनकी जिंदगी में कोई वास्तविक बदलाव न ला सकें. उन्हें जरूरत है जमीनी एकजुटता की – जिसमें खाना, दवाइयां, राहत, आर्थिक बहिष्कार, पाबंदियां, राजनीतिक दबाव और ऐसी अंतरराष्ट्रीय इच्छाशक्ति शामिल हो जो सिर्फ उनके दुख को स्वीकार न करे बल्कि इस जनसंहार को रोकने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप भी करे.
कला की भूमिका हमेशा दोहरी रही है. वह सच को उजागर कर सकती है, सत्ता को चुनौती दे सकती है और लोगों को कार्रवाई के लिए प्रेरित कर सकती है. लेकिन वही कला ध्यान भटकाने, त्रासदी का सौदा करने और गुस्से को निष्क्रिय करने का औजार भी बन सकती है. हिंद रजब की फिल्म के मामले में तराजू का पलड़ा दुर्भाग्य से दूसरी तरफ ज्यादा झुका दिखाई देता है. इसका मतलब यह नहीं कि फिलिस्तीनियों की कहानियां नहीं बताई जानी चाहिए. वे बिल्कुल बताई जानी चाहिए, लेकिन वे कहानियां खुद फिलिस्तीनियों की आवाज में और उनके प्रतिरोध और आजादी की लड़ाई के पक्ष में कही जानी चाहिए. ये उन पश्चिमी प्रोडक्शन कंपनियों के जरिए नहीं आनी चाहिए जिनके जायोनी शेयरधारक मातम को भी मुनाफे में बदल देते हैं. ये कहानियां फिल्म फेस्टिवलों की बेरूह तालियों के लिए नहीं बल्कि आजादी की तड़प, तात्कालिकता और इंसाफ की पुकार के साथ कही जानी चाहिए.
विडंबना यह भी है कि भारत में इस फिल्म पर मोदी सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध खुद अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला है, जिसकी गारंटी भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 देता है. भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड का यह तर्क कि इस फिल्म को प्रमाण-पत्र देने से भारत-इजरायल संबंधों में दरार आ सकती है, संवैधानिक और लोकतांत्रिक दोनों ही पैमानों पर बेमानी है. अगर विदेशी संबंधों की चिंता ही सेंसरशिप का आधार होती, तो ‘120 बहादुर’ या ‘द बंगाल फाइल्स’ जैसी फिल्मों पर भी सवाल उठते, जिनसे पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ने की आशंका कहीं ज्यादा है. साफ है कि फासीवादी मोदी सरकार भारत में फिलिस्तीनी जनता के प्रति बढ़ती जनएकजुटता को कुचलने और गाजा जनसंहार में अपनी संलिप्तता छुपाने की कोशिश कर रही है – इसीलिए फिलिस्तीन के समर्थन में उठने वाली आवाजों और सांस्कृतिक गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से रोका और दबाया जा रहा है. पिछले साल केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में ‘वन्स अपाॅन अ टाइम इन गाजा’ और ‘ऑल दैट्स लेफ्ट ऑफ यू’ जैसी फिलिस्तीनी फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई. इस साल की शुरुआत में केरल के अंतरराष्ट्रीय थिएटर फेस्टिवल में ‘द लास्ट प्ले इन गाजा’ पेश करने आ रहे एक इजरायल फिलिस्तीन-समर्थक थिएटर ग्रुप के सदस्यों को वीजा देने से इनकार कर दिया गया. दिल्ली में ‘फ्री फिलिस्तीन’ स्टिकर लगाने के आरोप में दो ब्रिटिश पर्यटकों को ‘भारत छोड़ो’ नोटिस थमा दिया गया. पूरे देश में फिलिस्तीन के समर्थन में बोलने वालों को दमन, धमकियों, सेंसरशिप और रोजगार छिन जाने तक का सामना करना पड़ रहा है.
एक तरफ फासीवादी भाजपा सरकार और सेंसर बोर्ड हकीकत को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, दूसरी तरफ नफरत और युद्धोन्माद फैलाने वाले प्रोपेगेंडा को खुली छूट दी जा रही है. यह कदम आम जनता के लिए नहीं, बल्कि सत्ता और जायोनी-साम्राज्यवादी गठबंधन को बचाने की कोशिश है. ऐसे समय में हमारी जिम्मेदारी सिर्फ सच बोलने की नहीं, बल्कि फिलिस्तीनी जनता के साथ और भी मजबूती से खड़े होने, इस दमनकारी गठजोड़ का विरोध करने और इंसाफ की आवाज और भी बुलंद करते रहने की है.