वर्ष 35 / अंक - 19 / नौवापुरवा पढ़ेगा कैसे और नौवापुरवा आगे बढ़ेगा कैसे?

नौवापुरवा पढ़ेगा कैसे और नौवापुरवा आगे बढ़ेगा कैसे?

नौवापुरवा पढ़ेगा कैसे और नौवापुरवा आगे बढ़ेगा कैसे?

-- शांतम निधि

नौवापुरवा, लखनऊ शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर, इटौंजा थाना क्षेत्र और बख्शी का तालाब तहसील में स्थित एक छोटा सा गांव है. यहां के अधिकांश लोग दलित समुदाय से आते हैं, जिनके पास एक बीघा से भी कम जमीन है या वे खेत मजदूर के रूप में काम करते हैं. गांव में न कोई प्राथमिक विद्यालय है, न इंटर काॅलेज, न अस्पताल, न पक्की नालियां, न स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था और न ही शौचालयों की पर्याप्त सुविधा. बच्चों को पढ़ने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, जो अधिकतर के लिए संभव नहीं होता. यही कारण है कि नौवापुरवा के इतिहास में आज तक एक भी बच्चा ग्रेजुएशन तक नहीं पहुंच पाया है. यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था की निर्मम सच्चाई है.

यह वही जमीन है जहां से हमें लखनऊ विश्वविद्यालय में 40% से 200% तक की फीस वृद्धि को समझना चाहिए. जब एक गांव में प्राथमिक शिक्षा तक की पहुंच नहीं है, तो उच्च शिक्षा तक पहुंचने का रास्ता पहले ही टूटा हुआ है. ऐसे में जब विश्वविद्यालय की फीस अचानक कई गुना बढ़ा दी जाती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं रहता, बल्कि यह तय करता है कि शिक्षा किसकी होगी और किससे छीन ली जाएगी. नौवापुरवा का बच्चा विश्वविद्यालय तक पहुंचने से पहले ही बाहर कर दिया जाता है. फीस वृद्धि उस दरवाजे पर ताला है, जिसके अंदर वह कभी पहुंच ही नहीं पाया.

इसी संदर्भ में बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में छात्रा अनामिका सिंह की मौत को समझना होगा. यह एक ‘दुर्घटना’ नहीं थी, बल्कि एक संस्थागत हत्या थी, जो खराब मेस भोजन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक लापरवाही के कारण हुई. जब विश्वविद्यालय अपने ही छात्रों को सुरक्षित भोजन और इलाज नहीं दे सकता, तो यह साफ हो जाता है कि शिक्षा संस्थान अब देखभाल और विकास के स्थान नहीं, बल्कि उपेक्षा और जोखिम के केंद्र बनते जा रहे हैं. जो छात्रा किसी तरह इन संस्थानों तक पहुंच भी जाते हैं, उनके लिए भी जीवन की कोई गारंटी नहीं है.

नौवापुरवा के बच्चे क्यों नहीं पढ़ पाते? इसका जवाब सिर्फ शिक्षा व्यवस्था में नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक अर्थव्यवस्था में छिपा है. मनरेगा, जो ग्रामीण गरीबों के लिए न्यूनतम रोजगार की गारंटी था, उसे लगातार कमजोर किया जा रहा है. काम के दिन घटाए जा रहे हैं, भुगतान में देरी हो रही है, और बजट में कटौती की जा रही है. जब परिवार के पास स्थिर आय नहीं होगी, तो सबसे पहले बच्चों की पढ़ाई ही छूटती है. शिक्षा उनके लिए अधिकार नहीं, बल्कि एक असंभव खर्च बन जाती है.

इसी के साथ चार श्रम संहिताएं मजदूरों की सुरक्षा और अधिकारों को कम करती हैं, जिससे असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की स्थिति और अस्थिर हो जाती है. नौवापुरवा का मजदूर जब असुरक्षित और अनिश्चित श्रम बाजार में धकेला जाता है, तो उसका पूरा परिवार असुरक्षा में जीता है. ऐसी स्थिति में शिक्षा कोई प्राथमिकता नहीं रह जाती, बल्कि जीवित रहने की लड़ाई ही सबसे बड़ा प्रश्न बन जाती है.

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते जैसे कदम इस संकट को और गहरा करते हैं. ये समझौते बड़े काॅर्पाेरेट हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे छोटे और सीमांत किसान बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते. उनकी आय घटती है, कर्ज बढ़ता है, और अंततः उन्हें अपनी जमीन और श्रम सस्ते में बेचने पर मजबूर होना पड़ता है. इसका सीधा असर उनके बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है, जो स्कूल छोड़कर मजदूरी करने लगते हैं. इस तरह शिक्षा से बहिष्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता रहता है.

इस पूरी प्रक्रिया को अगर एक साथ देखेें, तो यह साफ हो जाता है कि यह केवल कुछ नीतियों की विफलता नहीं है, बल्कि एक संगठित प्रक्रिया है जिसमें गरीब, दलित, किसान और मजदूर समुदायों को शिक्षा से बाहर रखा जा रहा है. शिक्षा को धीरे-धीरे एक बाजार में बदला जा रहा है, जहां वही पढ़ सकता है जिसके पास पैसा है. बाकी लोगों के लिए शिक्षा हासिल करना एक सपना बनकर रह जाता है.

इसलिए नौवापुरवा का सवाल सिर्फ एक गांव का सवाल नहीं है. यह उस पूरे समाज का सवाल है, जहां यह तय किया जा रहा है कि कौन पढ़ेगा और कौन नहीं. जब शिक्षा को अधिकार के बजाय वस्तु बना दिया जाता है, तो नौवापुरवा जैसे गांवों के बच्चों के लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं.

नौवापुरवा के आगे बढ़ने का मतलब केवल वहां एक स्कूल या अस्पताल बनाना नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को बदलना है जो उसे पीछे धकेलती है. इसका मतलब है शिक्षा को एक सार्वभौमिक अधिकार के रूप में स्थापित करना, फीस वृद्धि जैसी नीतियों का विरोध करना, ग्रामीण रोजगार और किसान आय को मजबूत करना, और उन सभी नीतियों के खिलाफ खड़ा होना जो समाज के बड़े हिस्से को हाशिए पर धकेलती हैं.

नौवापुरवा तभी पढ़ेगा और आगे बढ़ेगा, जब शिक्षा, श्रम और कृषि को बाजार के नहीं, बल्कि समाज के अधिकार के रूप में देखा जाएगा. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक नौवापुरवा केवल एक गांव नहीं रहेगा, बल्कि उस भारत का प्रतीक बना रहेगा जिसे जानबूझकर पीछे रखा गया है.

09 May, 2026