-- उज्ज्वल कुमार दत्ता
आज काॅमरेड ए. के. राय का अभी 91वां जन्मदिन होता. मजदूर आंदोलन को आदिवासी जनता के संघर्षों के साथ जोड़ने का उनका रास्ता दो बड़ी ऐतिहासिक जीतों तक पहुंचा – कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण और झारखंड राज्य का गठन. फासीवाद के खिलाफ आज की लड़ाइयों में उनकी विरासत हमें और ताकत, हौसला और दिशा देती रहे.
@Dipankar_cpiml
झारखंड की धरती – जिसे कभी सिर्फ खनिजों के भंडार के रूप में देखा गया – दरअसल वह एक जीवित सभ्यता है. यह जंगलों की हरियाली, नदियों की लय, पहाड़ों की स्थिरता और आदिवासी जीवन की सामूहिक चेतना से निर्मित एक ऐसी दुनिया है, जिसे बाहरी नजरें अक्सर ‘पिछड़ा’ कहकर खारिज करती रही हैं. लेकिन इसी दुनिया के भीतर एक ऐसा दर्शन भी है, जो मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन का पाठ पढ़ाता है – एक ऐसा दर्शन, जिसे न तो पूंजीवाद समझ पाया और न ही तथाकथित ‘विकास’ की अंधी दौड़. इसी धरती पर एक व्यक्ति उभरा – सादगी में असाधारण, विचार में अडिग, और संघर्ष में अजेय – ए के राॅय. वह सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि एक विचार थे; एक ऐसा विचार जो झारखंड की आत्मा को समझता था, और उसे उसी के स्वभाव में विकसित होते देखना चाहता था. काॅमरेड राय की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने आदिवासी समाज को ‘विकास का विषय’ नहीं, बल्कि ‘विकास का स्वामी’ माना. वे बार-बार कहते थे – “आदिवासी थोपा गया विकास नहीं चाहते.” यह वाक्य केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि एक गहरे दार्शनिक बोध का परिणाम था.
विकास का प्रश्न: किसके लिए, किसके द्वारा?
जब देश में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना को ‘प्रगति’ का प्रतीक माना जा रहा था – सिंदरी का उर्वरक कारखाना, बोकारो का स्टील प्लांट, धनबाद की कोयला खदानें – तब काॅमरेड राय इस चमक के पीछे छिपे अंधकार को देख रहे थे. उन्होंने देखा कि यह विकास स्थानीय आदिवासियों के लिए नहीं, बल्कि बाहरी पूंजी और सत्ता के लिए हो रहा है. जिन जमीनों पर पीढ़ियों से आदिवासी रहते आए थे, वे अचानक ‘राष्ट्रीय संपत्ति’ घोषित कर दी गईं. जिन जंगलों को वे अपनी मां मानते थे, वे ‘रिजर्व फाॅरेस्ट’ बन गए. यह वही दौर था जब बिरसा मुंडा की विरासत को फिर से याद करने की जरूरत थी – वह विरासत जो ‘उलगुलान’ के रूप में जंगल-जमीन की रक्षा के लिए खड़ी हुई थी. काॅमरेड राय ने इसी विरासत को ‘लाल झंडे’ से जोड़ा. उन्होंने कहा कि आदिवासी संघर्ष केवल सांस्कृतिक या क्षेत्रीय नहीं है – यह एक वर्गीय संघर्ष भी है. यह उस सर्वहारा का संघर्ष है, जिसे इतिहास ने हमेशा हाशिए पर रखा.
लाल और हरे झंडे की मैत्री
झारखंड आंदोलन की एक अनूठी विशेषता थी – यह केवल आदिवासियों का आंदोलन नहीं था. इसमें बाहरी मजदूरों, गैर-आदिवासियों और विभिन्न भाषाई समूहों की भी भागीदारी थी. काॅमरेड राय ने इस एकता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने ‘लाल झंडे’ (मजदूर आंदोलन) और ‘हरे झंडे’ (झारखंडी पहचान) के बीच एक सेतु बनाया. 1970 के दशक में यह मैत्री इतनी मजबूत थी कि झारखंड आंदोलन को एक नई दिशा मिली. यह एक ऐसा उदाहरण था, जहां वर्ग संघर्ष और क्षेत्रीय पहचान एक-दूसरे के पूरक बन गए थे, न कि विरोधी.
आदिवासी: सबसे बड़ा सर्वहारा
मार्क्सवाद के पारंपरिक सिद्धांतों में सर्वहारा को औद्योगिक मजदूरों के रूप में परिभाषित किया गया था. लेकिन काॅमरेड राय ने इस अवधारणा को झारखंड की जमीन पर नए सिरे से परिभाषित किया. वे पूछते थे – ‘आदिवासी से अधिक सर्वहारा आज की तारीख में है कौन?’ यह प्रश्न केवल एक वैचारिक चुनौती नहीं था, बल्कि एक वास्तविकता की ओर इशारा था. आदिवासी समाज के पास उत्पादन के साधन – जमीन, जंगल, पानी – तो थे, लेकिन उन पर उनका अधिकार नहीं था. वे अपने ही संसाधनों से बेदखल किए जा रहे थे. इस तरह वे न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी शोषण का शिकार थे.
थोपा गया विकास: एक सांस्कृतिक हमला
काॅमरेड राय के अनुसार, ‘थोपा गया विकास’ केवल आर्थिक शोषण नहीं है – यह एक सांस्कृतिक हमला भी है. जब आदिवासियों को उनकी जमीन से हटाकर शहरों की झुग्गियों में बसाया जाता है, तो केवल उनका घर नहीं छिनता – उनकी भाषा, संस्कृति, परंपरा और पहचान भी टूट जाती है. यह वही प्रक्रिया है, जिसे आज ‘उपभोक्तावाद’ और ‘बाजारवाद’ के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है. काॅमरेड राय इसे एक साजिश मानते थे – एक ऐसी साजिश, जिसके तहत समाजवादी और वामपंथी विचारधारा को पीछे धकेलकर संप्रदायवाद, जातिवाद और उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया जा रहा है.
विकास का सच: आंकड़ों के पीछे छिपी पीड़ा
आज जब हम विकास की बात करते हैं, तो हमारे सामने आंकड़े रखे जाते हैं – जीडीपी, उत्पादन, निवेश. लेकिन इन आंकड़ों के पीछे जो कहानियां छिपी होती हैं, वे अक्सर अनसुनी रह जाती हैं. वह है एक उजड़े हुए गांव की कहानी, एक बिखरे हुए परिवार की कहानी, एक खोती हुई संस्कृति की कहानी.
काॅमरेड राय इन कहानियों को सुनते थे, समझते थे, और उन्हें अपनी आवाज बनाते थे. वे कहते थे – “विकास का मतलब यह नहीं कि कुछ लोग बहुत आगे बढ़ जाएं, बल्कि यह है कि कोई पीछे न छूटे.”
आदिवासी दर्शन: प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व
झारखंड का आदिवासी समाज प्रकृति को केवल संसाधन नहीं मानता – वह उसे एक जीवित सत्ता के रूप में देखता है. सरना धर्म, करम और सरहुल जैसे त्योहार इस बात का प्रमाण हैं कि उनका जीवन प्रकृति के साथ गहरे जुड़ा हुआ है. यह दर्शन आधुनिक ‘विकास माॅडल’ से बिल्कुल अलग है, जहां प्रकृति को केवल दोहन की वस्तु माना जाता है.
काॅमरेड राय इस अंतर को गहराई से समझते थे. इसलिए वे कहते थे कि झारखंड का विकास उसी के अपने सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे के अनुसार होना चाहिए. झारखंड की मिट्टी में इतिहास केवल किताबों में नहीं मिलता – वह पेड़ों की छाल में, पहाड़ों की चुप्पी में और आदिवासी स्मृतियों की मौखिक परंपराओं में जीवित रहता है. लेकिन विडंबना यह है कि जिस इतिहास ने इस भूमि को आकार दिया, वही इतिहास तथाकथित ‘मुख्यधारा’ की किताबों में लगभग अनुपस्थित है. काॅमरेड ए के राॅय इस विसंगति को गहराई से समझते थे. उनके लिए आदिवासी संघर्ष केवल वर्तमान का प्रश्न नहीं था – वह एक ऐतिहासिक निरंतरता का हिस्सा था, जिसे जानबूझकर भुला दिया गया.
भूली हुई विद्रोह-गाथाएं और इतिहास का मौन
जब हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तो कुछ निश्चित नाम बार-बार सामने आते हैं. लेकिन क्या हम उतनी ही सहजता से नाम लेते हैं? झारखंड के प्रमुख आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी, उनमें बिरसा मुंडा, सिद्धू और कान्हू मुर्मू, तिलका मांझी, वीर बुधु भगत, नीलांबर और पीतांबर, पोटो हो, भागीरथ मांझी, रानी सर्वेश्वरी, रघुनाथ महतो, पांडेय गणपत राय और अन्य अल्पज्ञात सेनानियों – गया मुंडा, हाड़ी मुंडा, होपन मांझी, बैरू मांझी, अर्जुन मांझी, रूपु मांझी, और चम्पाइ मांझी आदि प्रमुख हैं.
ये वे नाम हैं, जिन्होंने न केवल अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी, बल्कि “स्वशासन” की अवधारणा को भी जिया. 1832 का कोल विद्रोह, 1855 का संथाल हूल, 1910 का भूमकाल – ये केवल घटनाएं नहीं थीं, बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन के प्रतीक थे. यह दर्शन कहता था कि शासन का अधिकार उन्हीं के पास होना चाहिए, जो उस भूमि के मूल निवासी हैं. काॅमरेड राय इस इतिहास को ‘आदिवासी गणतंत्र’ की प्रारंभिक अभिव्यक्ति मानते थे.
स्वशासन बनाम राज्यसत्ता
आदिवासी समाज में ‘राज्य’ की अवधारणा आधुनिक राष्ट्र-राज्य से बिल्कुल भिन्न रही है. वहां सत्ता का केंद्रीकरण नहीं, बल्कि विकेंद्रीकरण ही जीवन का आधार है. गांव केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवित लोकतांत्रिक संस्था है, जहां ग्रामसभा ही सर्वाेच्च होती है – निर्णय वही लेती है और वही सामाजिक न्याय का अंतिम मंच भी होती है.
इसी परंपरा और संवैधानिक भावना को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 1996 में पेसा एक्ट लागू किया. यह कानून वस्तुतः भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले आदिवासी क्षेत्रों में स्वशासन की ऐतिहासिक परंपरा को संवैधानिक मान्यता देने का प्रयास था. पेसा का मूल उद्देश्य यह था कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास का माॅडल ‘ऊपर से थोपा हुआ’ न होकर ‘नीचे से उत्पन्न’ हो – अर्थात ग्रामसभा की सहमति और भागीदारी के बिना कोई भी निर्णय न लिया जाए. इस अधिनियम के अनुसार ग्रामसभा को कई महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए – जैसे कि स्थानीय संसाधनों (जल, जंगल, जमीन) पर नियंत्रण, लघु वनोपज का स्वामित्व, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के मामलों में अनिवार्य परामर्श, ग्राम स्तरीय योजनाओं की स्वीकृति और परंपरागत सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं की रक्षा.
सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो पेसा एक्ट भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में एक क्रांतिकारी कदम था. यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं था, बल्कि यह आदिवासी समाज के उस स्वशासन के अधिकार की स्वीकृति थी, जिसे उन्होंने सदियों से अपने जीवन में जिया था. लेकिन यहीं पर वह विडंबना शुरू होती है, जिसकी ओर काॅमरेड राॅय बार-बार संकेत करते थे. वास्तविकता यह है कि पेसा का क्रियान्वयन अधिकांश राज्यों में अधूरा और कमजोर रहा है. कानून की किताबों में ग्रामसभा को सर्वाेच्च बताया गया, लेकिन व्यवहार में उसकी भूमिका अक्सर औपचारिकता तक सीमित रह गई. खनन परियोजनाएं, बड़े उद्योग, बांध और अन्य ‘विकास योजनाएं’ आज भी कई बार ग्रामसभा की वास्तविक सहमति के बिना लागू कर दी जाती हैं. कई मामलों में ग्रामसभा की बैठकों को केवल कागजी प्रक्रिया बना दिया जाता है – जहां न तो सही जानकारी दी जाती है, न ही स्वतंत्र निर्णय का अवसर. इस तरह पेसा एक्ट, जो स्वशासन का प्रतीक होना चाहिए था, कई जगहों पर ‘प्रशासनिक औपचारिकता’ बनकर रह गया है. यही वह बिंदु है, जहां ‘थोपा गया विकास’ फिर से सामने आता है – एक ऐसा विकास, जिसमें आदिवासी केवल दर्शक बनकर रह जाते हैं, जबकि उनके जीवन, उनकी जमीन और उनकी संस्कृति पर फैसले कहीं और लिए जाते हैं. काॅमरेड राय का मानना था कि यदि पेसा एक्ट को उसकी वास्तविक भावना के साथ लागू किया जाए, तो यह झारखंड जैसे राज्यों में विकास की दिशा को पूरी तरह बदल सकता है. यह केवल एक कानून नहीं है – यह एक वैकल्पिक लोकतांत्रिक दर्शन है, जहां सत्ता का केंद्र दिल्ली या रांची नहीं, बल्कि गांव का वह चबूतरा है, जहां लोग मिलकर अपने भविष्य का निर्णय लेते हैं.
इसलिए सवाल केवल पेसा के अस्तित्व का नहीं है, बल्कि उसके वास्तविक क्रियान्वयन का है. जब तक ग्रामसभा को वास्तविक शक्ति नहीं मिलेगी, तब तक स्वशासन केवल एक विचार बना रहेगा – और राज्यसत्ता, अपने पुराने केंद्रीकृत स्वरूप में, आदिवासी जीवन पर हावी होती रहेगी. और शायद यही वह संघर्ष है, जो आज भी जारी है – स्वशासन और राज्यसत्ता के बीच, अधिकार और नियंत्रण के बीच. और सबसे बढ़कर – मनुष्य की गरिमा और ‘थोपे गये विकास’ के बीच.
विकास का उपनिवेशी माॅडल
काॅमरेड राय बार-बार यह कहते थे कि झारखंड में जो विकास हो रहा है, वह दरअसल एक ‘आंतरिक उपनिवेशवाद’ का उदाहरण है. पहले अंग्रेज बाहर से आए और संसाधनों का दोहन किया. आज वही काम देश के भीतर की शक्तियां कर रही हैं. कोयला, लोहा, बाॅक्साइट – ये सब झारखंड की धरती से निकलते हैं, लेकिन इनसे होने वाला लाभ झारखंड के लोगों तक नहीं पहुंचता. इसके विपरीत, उन्हें मिलता है – विस्थापन, बेरोजगारी और सांस्कृतिक विघटन. यह वही स्थिति है, जिसे कार्ल मार्क्स ने ‘विमुखता’ (एलियनेशन) कहा था – जब मनुष्य अपने ही श्रम और संसाधनों से अलग हो जाता है.
थोपा गया विकास बनाम सहभागिता का विकास
काॅमरेड राय का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने ‘विकास’ के प्रश्न को नए सिरे से परिभाषित किया. उन्होंने कहा कि विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं है – यह सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक संरक्षण और राजनीतिक सहभागिता का समन्वय है. यदि किसी परियोजना में स्थानीय लोगों की भागीदारी नहीं है, उनसे पूछा नहीं जाता, उनकी सहमति नहीं ली जाती – तो वह विकास नहीं, बल्कि थोपा गया परिवर्तन है. आज जब हम “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” और “इन्क्लूसिव ग्रोथ” की बात करते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि काॅमरेड राय इन अवधारणाओं को बहुत पहले ही व्यवहार में ला चुके थे.
संस्कृति का संघर्ष: सरना बनाम बाजार
झारखंड का आदिवासी समाज केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी संघर्ष कर रहा है. सरना धर्म, जो प्रकृति पूजा पर आधारित है – आज एक अदृश्य दबाव में है. बाजारवाद और उपभोक्तावाद धीरे-धीरे उस सामूहिक जीवन शैली को तोड़ रहे हैं, जहां ‘मैं’ से अधिक ‘हम’ का महत्व था. काॅमरेड राय इसे एक खतरनाक बदलाव मानते थे. उनका मानना था कि जब कोई समाज अपनी संस्कृति खो देता है, तो वह केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से भी दरिद्र हो जाता है.
ग्रामसभा: लोकतंत्र की असली जड़
काॅमरेड राय के विचारों में ‘ग्रामसभा’ केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं थी – वह लोकतंत्र की आत्मा थी. झारखंड के आदिवासी समाज में ग्रामसभा का निर्णय अंतिम माना जाता है. यह वही व्यवस्था है, जहां हर व्यक्ति की आवाज का महत्व है, जहां निर्णय सामूहिक होते हैं, और जहां सत्ता का केंद्रीकरण नहीं होता. आज जब लोकतंत्र अक्सर चुनावों तक सीमित हो गया है, तब यह आदिवासी माॅडल हमें एक वैकल्पिक दृष्टि देता है. काॅमरेड राय का मानना था कि यदि झारखंड को सही दिशा में आगे बढ़ना है, तो उसे ग्रामसभा की इस शक्ति को वास्तविक रूप में लागू करना होगा.
झारखंड आंदोलन: सामाजिक से राजनीतिक तक
काॅमरेड राय के अनुसार, झारखंड आंदोलन मूलतः एक सामाजिक आंदोलन था. यह आदिवासियों और स्थानीय लोगों की पहचान, अधिकार और सम्मान की लड़ाई थी. लेकिन समय के साथ यह एक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया – अलग राज्य की मांग के रूप में. यहां यह उल्लेखनीय है कि उस समय अधिकांश वाम दल इस मांग के विरोध में थे. लेकिन काॅमरेड राय ने इस मांग का समर्थन किया, क्योंकि वे समझते थे कि बिना राजनीतिक स्वायत्तता के सामाजिक न्याय संभव नहीं है. उन्होंने झारखंड को ‘समाजवादी आंदोलन की उर्वर भूमि’ कहा.
नेतृत्व का संकट और विचारधारा का क्षरण
आज जब हम झारखंड की राजनीति को देखते हैं, तो काॅमरेड राय की चिंताएं सच होती नजर आती हैं. समाजवादी और वामपंथी विचारधारा, जो कभी इस आंदोलन की आत्मा थी, अब हाशिए पर है. उसकी जगह संप्रदायवाद, जातिवाद और उपभोक्तावाद ने ले ली है. यह वही ‘साजिश’ है, जिसके बारे में काॅमरेड राय बार-बार चेतावनी देते थे. वे कहते थे कि यदि झारखंड को सच में ‘अपने राज्य’ में बदलना है, तो उसे फिर से अपने सामाजिक आंदोलन की जड़ों की ओर लौटना होगा.
स्मृति बनाम विस्मृति
इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं होता – वह वर्तमान की दिशा और भविष्य की संभावना भी तय करता है. जब किसी समाज को उसके इतिहास से काट दिया जाता है, तो वह अपनी पहचान खो देता है.
काॅमरेड राय इसीलिए आदिवासी इतिहास को जीवित रखने पर जोर देते थे. वे चाहते थे कि नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के संघर्ष को जाने, समझे और उससे प्रेरणा ले. झारखंड की राजनीतिक और सामाजिक यात्रा को यदि किसी एक जीवन में समेटकर देखा जाए, तो वह जीवन काॅमरेड एके राय का है. उनके भीतर एक साथ कई धाराएं बहती थीं – मार्क्सवादी विचारधारा की तीक्ष्णता, आदिवासी समाज के प्रति आत्मीयता और एक ऐसे मनुष्य की सहज विनम्रता, जो शिखर पर पहुंचकर भी जमीन से जुड़ा रहा. लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण यह नहीं था कि वे तीन बार सांसद और तीन बार विधायक रहे – बल्कि यह था कि उन्होंने सत्ता को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया.
एक नेता, जो “नेता” नहीं बना
धनबाद की गलियों में यदि कोई व्यक्ति सादे कुर्ता-पायजामा में, हाथ में एक पुरानी डायरी दबाए चलता हुआ दिखाई देता था, तो लोग सहज ही कह उठते – “राय दा जा रहे हैं.” उनके व्यक्तित्व में कोई आडंबर नहीं था. न गाड़ियों का काफिला, न सुरक्षा का घेरा, न भाषणों की कृत्रिमता.
यह सादगी केवल व्यक्तिगत चुनाव नहीं थी – यह एक वैचारिक प्रतिबद्धता थी. काॅमरेड राय मानते थे कि यदि कोई नेता जनता के जीवन को समझना चाहता है, तो उसे उसी जीवन को जीना होगा. शायद यही कारण था कि आदिवासी समाज और मजदूर वर्ग उन्हें अपना ‘मसीहा’ नहीं, बल्कि ‘अपना आदमी’ मानता था.
कोयलांचल की कालिख और एक बेदाग चेहरा
धनबाद – कोयले की कालिख से भरा एक शहर. यहां की खदानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन हमेशा जोखिम और असुरक्षा से भरा रहा है. इसी क्षेत्र में माफिया, ठेकेदारी और राजनीतिक गठजोड़ की एक जटिल संरचना भी विकसित हुई. लेकिन इस अंधकार के बीच काॅमरेड राय एक ऐसी रोशनी थे, जो खुद को कभी धूमिल नहीं होने देती थी.
उन्होंने कोयला माफिया के खिलाफ आवाज उठाई, मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की रक्षा को अपना जीवन समर्पित कर दिया. उनका यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं था – यह नैतिक संघर्ष भी था.
आज का झारखंड: एक अधूरा सपना
आज जब हम झारखंड को देखते हैं, तो यह सवाल उठता है – क्या वह झारखंड, जिसकी कल्पना काॅमरेड राय ने की थी, वास्तव में साकार हुआ है? राज्य तो बन गया, लेकिन क्या वह ‘अपना राज्य’ बन पाया? खनन और उद्योग का विस्तार आज भी जारी है. विस्थापन की समस्या अभी भी उतनी ही गंभीर है. ग्रामसभा की शक्ति कागजों तक सीमित है और आदिवासी समाज अपनी पहचान और अधिकारों के लिए अब भी संघर्ष कर रहा है. यह वही स्थिति है, जिसके बारे में काॅमरेड राय ने चेतावनी दी थी.
आदिवासी चेतना: भविष्य का मार्ग
झारखंड का आदिवासी समाज केवल अतीत की विरासत नहीं है – वह भविष्य की संभावना भी है. प्रकृति के साथ संतुलन, सामूहिक जीवन और संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग – ये सभी ऐसे मूल्य हैं, जो आज के संकटग्रस्त विश्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. काॅमरेड राय ने इन्हीं मूल्यों को समझा और उन्हें एक वैचारिक रूप दिया. उन्होंने दिखाया कि आदिवासी समाज केवल “विकास का लाभार्थी” नहीं है – वह एक वैकल्पिक विकास माॅडल का वाहक है.
एकता: संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत
काॅमरेड राय का एक और महत्वपूर्ण योगदान था – विभिन्न वर्गों और समुदायों के बीच एकता स्थापित करना. उन्होंने आदिवासी और गैर-आदिवासी, स्थानीय और बाहरी, मजदूर और किसान – इन सभी के बीच एक सेतु का काम किया. आज जब समाज विभाजन की राजनीति से जूझ रहा है, तब यह एकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. काॅमरेड राय हमें यह सिखाते हैं कि संघर्ष केवल तभी सफल हो सकता है, जब वह सामूहिक हो.
काॅमरेड एके राय का जीवन केवल बड़े मंचों और भाषणों तक सीमित नहीं था. वह ऐसे ही छोटे-छोटे गांवों में, साधारण लोगों के बीच, उनकी भाषा में, उनके दर्द को समझते हुए जिया गया एक जीवन था. मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की तरह – जहां नायक कोई असाधारण व्यक्ति नहीं होता, बल्कि आम आदमी ही अपने संघर्ष से असाधारण बन जाता है.
और शायद यही काॅमरेड राय की सबसे बड़ी विरासत है – उन्होंने लोगों को यह सिखाया कि वे अपने जीवन के नायक खुद बन सकते हैं. झारखंड की धरती पर जब संध्या उतरती है, तो वह केवल दिन का अंत नहीं होता – वह एक गहरी, चिंतनशील चुप्पी लेकर आती है. साल के पेड़ों के बीच से गुजरती हवा, दूर कहीं बजता मांदर और धुएं की हल्की-सी गंधङ्ख इन सबके बीच जैसे समय ठहर जाता है. ऐसी ही एक संध्या में, जब आकाश पर लालिमा धीरे-धीरे धुंधली हो रही थी, तब यह एहसास और भी गहरा हो उठता है कि कुछ लोग कभी पूरी तरह जाते नहीं – वे स्मृति बनकर, विचार बनकर, और सबसे बढ़कर एक नैतिक साहस बनकर हमारे भीतर जीवित रहते हैं. काॅमरेड ए के राय भी ऐसे ही एक नाम हैं जो अब इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि झारखंड के जनजीवन की धड़कनों में बसते हैं.
एक जीवन, जो कहानी बन गया
उनका जीवन किसी बड़े महल में नहीं बीता, न ही किसी राजसी वैभव में. वह जीवन बीता – कोयले की कालिख में, मजदूरों के पसीने में, आदिवासी गांवों की धूल भरी पगडंडियों पर. लेकिन यही साधारणता उन्हें असाधारण बनाती है. आज जब हम उनके जीवन को याद करते हैं, तो वह किसी राजनेता की जीवनी नहीं लगती – वह एक कहानी लगती है.
सादगी: विचार की सबसे बड़ी ताकत
काॅमरेड राय की सबसे बड़ी ताकत उनका जीवन था. तीन बार सांसद और तीन बार विधायक रहने के बावजूद उन्होंने न तो कोई संपत्ति बनाई, न ही सत्ता का कोई विशेष लाभ उठाया. धनबाद की गलियों में एक साधारण कुर्ता-पायजामा पहने, डायरी दबाए चलते हुए वे किसी आम कार्यकर्ता की तरह दिखते थे. लेकिन उनके भीतर एक पूरा आंदोलन धड़कता था. उनकी सादगी केवल व्यक्तिगत गुण नहीं थी – वह एक राजनीतिक वक्तव्य था. वह यह बताती थी कि संघर्ष केवल भाषणों से नहीं, बल्कि जीवन से भी लड़ा जाता है.
मनुष्य होने की सबसे बड़ी कसौटी
काॅमरेड राय की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी मनुष्य को ‘संख्या’ या ‘वोट’ के रूप में नहीं देखा. उनके लिए हर आदमी एक कहानी था – उसकी अपनी पीड़ा, अपना संघर्ष, सपना सब कुछ अलग.
वे कहते थे, “राजनीति का उद्देश्य सत्ता नहीं, समाज होना चाहिए.”
आज के समय में, जब राजनीति अक्सर सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती है, यह विचार और भी प्रासंगिक हो उठता है.
एक विरासत, जो जिम्मेदारी भी है
काॅमरेड एके राय की विरासत केवल गर्व करने की चीज नहीं है – वह एक जिम्मेदारी भी है. यह जिम्मेदारी है – उनके अधूरे सपनों को पूरा करने की, उनके दिखाए रास्ते पर चलने की और सबसे बढ़कर, अन्याय के खिलाफ खड़े होने की. आज की पीढ़ी के सामने कई चुनौतियां हैं – बेरोजगारी, पर्यावरण संकट, सांस्कृतिक विघटन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि. लेकिन इन सबके बीच एक उम्मीद भी है – वह उम्मीद, जो काॅमरेड राय जैसे लोगों ने हमें दी है.
एक छोटी-सी रोशनी
कहा जाता है कि अंधेरे को कोसने से बेहतर है, एक छोटा-सा दीपक जलाना. काॅमरेड राय ने अपने जीवन से यही किया – उन्होंने अंधेरे के खिलाफ एक छोटी-सी रोशनी जलाई. वह रोशनी आज भी जल रही है – हर उस व्यक्ति के भीतर, जो सच के साथ खड़ा होता है.
एक पुकार, जो गूंजती रहेगी
जब हम इस पूरे सफर को देखते हैं – संघर्ष, सादगी, विचार और प्रतिबद्धता – तो यह स्पष्ट हो जाता है कि काॅमरेड राय केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक युग थे. और हर युग की तरह, उनका भी एक संदेश है – “अपने हक के लिए खड़े हो जाओ, अपने अस्तित्व को पहचानो और किसी भी कीमत पर अपनी आत्मा को मत खोओ.”
रात अब गहराने लगी है. आकाश में तारे एक-एक कर उभर रहे हैं. और कहीं दूर, किसी गांव में, कोई बुजुर्ग अपने पोते को कहानी सुना रहा है – एक ऐसे आदमी की कहानी, जो बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन बहुत सच्चा था. जिसने सिखाया – “विकास वह नहीं, जो हमें तोड़ दे, विकास वह है, जो हमें जोड़ दे.”
(समाप्त, लेकिन अंत नहीं, एक नई शुरुआत)