हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां अभाव और कमी को जान-बूझकर पैदा किया जाता है. इंसानी इतिहास में आज दुनिया पहले से कहीं ज्यादा दौलतमंद है, फिर भी दुनिया की लगभग दस प्रतिशत आबादी बेहद गरीबी और बदहाली में जीने को मजबूर है. लाखों लोग पेट भर खाना, ढंग का मकान और बुनियादी इलाज तक का खर्च नहीं उठा पाते, जबकि दूसरी तरफ एक बहुत छोटा-सा तबका बेहिसाब दौलत और ताकत समेटता जा रहा है. साथ ही, सूखे, भीषण जंगलों में आग, बाढ़ और लू की लहरें हमें बता रही हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था धरती की बर्दाश्त की हदों को पार कर रही है.
ये अलग-अलग संकट नहीं हैं. ये उस आर्थिक माॅडल की पैदावार के हैं जो अपनी मंजिल तक पहुंच चुका है. गरीबी और असमानता कोई हादसा या संयोग नहीं है, वे उन नीतिगत फैसलों का नतीजा हैं जिन्हें सरकारें जान-बूझकर लागू करती हैं. टैक्स व्यवस्था कैसी होगी, श्रम बाजार को कैसे नियंत्रित किया जाएगा, देखभाल और घरेलू काम को कितना महत्व दिया जाएगा, सार्वजनिक सेवाओं को किस तरह संगठित किया जाएगा, और आखिर किसकी जरूरतों और आवाजों को अहमियत दी जाएगी – इन सबका सीधा असर पड़ता है. सबसे अहम बात यह है कि अगर हुकूमतें गरीबी पैदा कर सकती हैं, तो उसे खत्म भी कर सकती हैं.
दशकों तक एक आसान-सा नुस्खा हमारे सामने रखा गया: अर्थव्यवस्था को बढ़ाते रहो, गरीबी अपने-आप कम होती जाएगी. कहा गया कि आर्थिक विकास का बढ़ता हुआ फायदा आखिरकार समाज के हर तबके तक पहुंचेगा. लेकिन यह वादा कभी पूरा नहीं हुआ. राष्ट्रीय आय बढ़ती रही, मगर मजदूरी ठहरी रही, रोजगार ज्यादा असुरक्षित होता गया और सार्वजनिक सेवाओं में लगातार कटौती हुई. ऊपर बैठे अमीरों की दौलत कई गुना बढ़ती गई, जबकि नीचे मेहनतकश परिवारों को भोजन के लिए राहत केन्द्रों और फूड बैंकों का सहारा लेना पड़ा. साफ है कि आर्थिक विकास और आम लोगों की खुशहाली का रिश्ता टूट चुका है.
इतना ही नहीं, यह माॅडल पर्यावरण के लिहाज से भी टिकाऊ नहीं है. हम ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं जो बढ़ते तापमान के कारण इंसानी जीवन के लिए नाकाबिल-ए-बर्दाश्त बनती जा रही है. बढ़ते कार्बन उत्सर्जन और जैव विविधता की तबाही ने उन प्राकृतिक परिस्थितियों को अस्थिर करना शुरू कर दिया है जिन पर इंसानी जीवन टिका हुआ है. दुनिया में अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन का लगभग 92 प्रतिशत हिस्सा विकसित और समृद्ध देशों से आता है. वहीं सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोग अकेले लगभग आधे वैश्विक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं. लेकिन इसका सबसे पहला और सबसे भारी असर गरीब लोगों पर पड़ता है, जिन्हें फसल बर्बादी, महंगाई और खाद्य संकट का सामना करना पड़ता है. एक सीमित ग्रह पर लगातार और अंतहीन विस्तार पर टिकी अर्थव्यवस्था सिर्फ अन्यायपूर्ण ही नहीं, बल्कि बेहद खतरनाक भी है.
बेशक, कम आय वाले कई देशों को आज भी सड़कें, अस्पताल, स्कूल, नवीकरणीय ऊर्जा और सम्मानजनक रोजगार पैदा करने के लिए आर्थिक विस्तार की आवश्यकता है. लेकिन जिस रास्ते को अब तक विकास का रास्ता बताया गया है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों की लूट, सस्ते और आज्ञाकारी श्रम का शोषण, निर्यात पर निर्भरता और बढ़ता कर्ज शामिल है, उसने असमानता बढ़ाई है और पर्यावरण को गम्भीर नुकसान पहुंचाया है. आज असली सवाल यह नहीं है कि विकास दर बढ़ेगी या नहीं; असली सवाल यह है कि हम किस तरह की अर्थव्यवस्था बना रहे हैं, वह किसकी सेवा कर रही है, और क्या वह धरती की सीमाओं के भीतर रहते हुए हर इंसान को सम्मानजनक जीवन की गारंटी देती है या नहीं.
इसी सोच के साथ हम सबने मिलकर ‘विकास से आगे बढ़कर गरीबी उन्मूलन का रोडमैप’ तैयार किया है और उसका समर्थन किया है. यह रोडमैप उन विकल्पों को सामने रखता है जो दशकों से नीति निर्माण पर हावी ‘विकास करो, टैक्स लगाओ और फिर कुछ हिस्सा बांट दो’ वाले सीमित नजरिए से आगे जाने का रास्ता दिखाते हैं. यह किसी मुट्टीभर विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया खाका नहीं है. बल्कि इसके ठीक उलट, पिछले अठारह महीनों में 400 से ज्यादा लोगों ने मिलकर इस पर काम किया. इनमें संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां, राष्ट्रीय सरकारें, विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ, नागरिक समाज संगठन, ट्रेड यूनियनें, सामाजिक और एकजुटता आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़े समूह तथा दुनिया के उत्तर और दक्षिण दोनों हिस्सों के जनआंदोलन शामिल थे. सबके सामने एक सीधा सवाल था: अगर जीडीपी वृद्धि को तरक्की की मुख्य शर्त न माना जाए, तो गरीबी और असमानता को कैसे खत्म किया जा सकता है? इस योजना पर अब तक 350 से अधिक लोगों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं. इनमें ज्यां द्रेज, पावलिना चेर्नेवा, टिम जैक्सन, भूमिका मुच्छाला, जूलिया स्टाइनबर्गर, नडोंगो सांबा सिला और टिमोथे पारिक जैसे जाने-माने अर्थशास्त्री और चिंतक शामिल हैं.
हम हर नीति के हर बिंदु पर एकमत नहीं हैं. लेकिन एक बात पर हमारी पूरी सहमति है: हमारी अर्थव्यवस्था को इस तरह नए सिरे से गढ़ा जाना चाहिए कि उसका मकसद किसी भी कीमत पर उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि धरती की प्राकृतिक सीमाओं के भीतर रहते हुए इंसानी अधिकारों और सामूहिक खुशहाली को सुनिश्चित करना हो. यहां मानवाधिकार कोई बाद में जोड़ी जाने वाली बात नहीं हैं; वे वही बुनियादी उसूल हैं जिनके आधार पर हम तरक्की को मापते हैं, प्राथमिकताएं तय करते हैं और अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाते हैं. सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक सेवाएं बेहद जरूरी हैं, लेकिन वे हमेशा ऐसी अर्थव्यवस्था की कमियों की भरपाई नहीं कर सकतीं जो अपने बनावट से ही कम मजदूरी, असुरक्षित रोजगार और महंगे आवास पैदा करती हो.
इसलिए जरूरत सिर्फ ऊपर-ऊपर राहत देने की नहीं, बल्कि खेल के नियम बदलने की है. इसका मतलब है, उदाहरण के लिए, सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार की गारंटी, गुजारा करने लायक वेतन और उचित मेहनताना, ट्रेड यूनियनें और कार्यस्थलों पर लोकतांत्रिक अधिकार. इसका मतलब है हर तरह के भेदभाव को चुनौती देना और उस देखभाल के काम को उचित महत्व देना, चाहे वह वेतन वाला हो या बिना वेतन का, जिसके सहारे पूरा समाज चलता है. इसका मतलब है बच्चों, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन पर सार्वभौमिक सार्वजनिक सेवाओं के जरिए बड़े पैमाने पर निवेश करना. इसका मतलब है रणनीतिक संसाधनों और परिसंपत्तियों पर सार्वजनिक नियंत्रण, निवेश को सामाजिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं की ओर मोड़ने के लिए ऋण व्यवस्था का लोकतांत्रिक संचालन, और सामाजिक व एकजुटता आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना.
इस नजरिया को अमल में लाने के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियमों को बदलना भी है. आज वैश्विक दक्षिण के देशों को गरीबी दूर करने के लिए पर्याप्त काम न करने पर आलोचना का सामना करना पड़ता है, जबकि दूसरी ओर वे एकतरफा प्रतिबंधों, अन्यायपूर्ण व्यापार समझौतों, असमान विनिमय और सदियों पुराने औपनिवेशिक लूट से पैदा हुए कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं. आज दुनिया में लगभग 3.4 अरब लोग ऐसे देशों में रहते हैं जहां सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा पर जितना खर्च करती हैं, उससे ज्यादा कर्ज का ब्याज और किस्तें चुकाने में खर्च करना पड़ता है. इसी दौरान वैश्विक सप्लाई चेन दक्षिण से उत्तर की ओर श्रम और संसाधनों के विशाल हस्तांतरण को संभव बनाती हैं. इसलिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता सिर्फ नैतिक अपील नहीं, बल्कि एक कानूनी और ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है. सच्चाई यह है कि आज के कई अमीर देशों ने अपनी दौलत वैश्विक दक्षिण को गरीब बनाकर खड़ी की है, और लूट तथा संसाधनों के दोहन का वही सिलसिला आज भी नए रूपों में जारी है. विकास-केंद्रित माॅडल से आगे बढ़कर एक न्यायपूर्ण बदलाव तभी संभव है जब उसमें कर्ज के मामले में न्याय, दक्षिण-दक्षिण सहयोग का विस्तार, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हर्जाने के तौर पर वित्तीय सहायता, और सबके लिए सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा की गारंटी शामिल हो. यह सब प्रभुत्व और नियंत्रण की राजनीति के बजाय समानता, आत्मनिर्णय और राष्ट्रीय संप्रभुता के उसूलों पर आधारित होना चाहिए, ताकि हर देश अपनी जनता की जरूरतों के मुताबिक अपना स्वतंत्र आर्थिक भविष्य तय कर सके.
उतना ही जरूरी यह है कि इस बदलाव को कौन शक्ल दे. अक्सर गरीबी से जूझ रहे लोगों के बारे में नीतियां उन्हीं की भागीदारी के बिना बनाई जाती हैं, और कई बार तो उनके खिलाफ भी. जब कल्याणकारी योजनाएं अविश्वास, दंड और अपमानजनक शर्तों पर आधारित होती हैं, तो वे गरीबी कम करने के बजाय लोगों को और कलंकित करती हैं तथा उन्हें अपने अधिकारों का दावा करने से भी रोकती हैं. गरीबी में जीवन गुजारने वाले लोग सबसे बेहतर जानते हैं कि व्यवहार में ये व्यवस्थाएं कहां और कैसे नाकाम होती हैं. इसलिए गरीबी उन्मूलन की नीतियों को तैयार करने, लागू करने और उनकी निगरानी करने में उनकी समझ और अनुभव को केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए – चाहे वह स्थानीय निकाय हों, संसदें हों या अंतरराष्ट्रीय मंच.
हम शून्य से शुरुआत नहीं कर रहे हैं. दुनिया भर में मूल निवासियों के संघर्ष, नारीवादी आंदोलनों, ट्रेड यूनियनों और जलवायु न्याय की मुहिमों ने सामूहिक देखभाल, सामुदायिक अधिकारों और जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों पर आधारित वैकल्पिक दुनियाएं बचा और बना रही हैं. कई देशों के नए गठबंधन वैश्विक आर्थिक शासन के नए नजरिया को आगे बढ़ा रहे हैं. विभिन्न सरकारें अधिकार-आधारित गरीबी उन्मूलन नीतियों, नागरिक सभाओं और सामुदायिक संपदा निर्माण जैसे प्रयोग कर रही हैं. संयुक्त राष्ट्र और उसके अनेक सहयोगी ‘जीडीपी से आगे’ जाकर प्रगति को मापने के नए पैमानों तथा असमानता पर एक अंतरराष्ट्रीय पैनल जैसी नई संस्थाओं की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं, ताकि इस बदलाव का खाका खींचा जा सके.
हमारा रोडमैप इन्हीं कोशिशों पर बना है, उन्हें जोड़ता है और आगे बढ़ाता है. हम इसे उन सभी लोगों के लिए एक साझा संदर्भ के रूप में पेश कर रहे हैं जो यह मानने से इनकार करते हैं कि गरीबी और पर्यावरणीय तबाही आर्थिक ‘सफलता’ की अनिवार्य कीमत हैं. सरकारों और बहुपक्षीय संस्थाओं के सामने आज साफ विकल्प मौजूद है: या तो वे उसी नाकाम पड़ चुके विकास-केंद्रित माॅडल पर अड़े रहें, या फिर उन आर्थिक नियमों को बदलने का संकल्प लें जो गरीबी पैदा करते हैं, ताकि गरीबी का सचमुच खत्मा किया जा सके.
गरीबी पैदा की जाती है. यही बुरी खबर है, और यही अच्छी खबर भी. जो चीज इंसानों द्वारा बनाई गई है, उसे बदला भी जा सकता है और उसकी जगह बेहतर व्यवस्था भी खड़ी की जा सकती है. हम ठोस विकल्प सामने रख रहे हैं, जिनके साथ विस्तृत नीतिगत खाके मौजूद हैं. इनमें सबूत, लागू करने के चरण और दुनिया भर के वास्तविक उदाहरण शामिल हैं. हम हर स्तर के राजनीतिक नेतृत्व से अपील करते हैं कि वे इन प्रस्तावों को अपनाएं, सबसे अधिक प्रभावित लोगों की आवाज सुनें, और आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन इस आधार पर करें कि वे गरीबी के खात्मे, असमानताओं में कमी और मानवाधिकारों की वास्तविक गारंटी में कितना योगदान देती हैं.
ओलिवियर डी शुटर – न्यू इकाॅनोमीज फाॅर एरेडिकेटिंग पोवर्टी के चेयर; जोसेफ स्टिग्लिट्ज – अर्थशास्त्र में नोबेल विजेता; जयती घोष – अर्थशास्त्र की प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स अमहस्र्ट; थाॅमस पिकेटी – प्रोफेसर, पैरिस स्कूल ऑफ इकाॅनोमिक्स; केट रावर्थ – अर्थशास्त्री, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का एनवायरनमेंटल चेंज इंस्टीट्यूट; जेसन हिकेल – राजनीतिक अर्थशास्त्री और प्रोफेसर, ऑटोनोमस यूनिवर्सिटी, बार्सिलोना
(साभार, द गार्जियन, 10 जून 2026, अनुवाद: मनमोहन)