वर्ष 35 / अंक - 35 / का. आरएन सिंह: चलो कामरेड, ये दुनिया हमारी है

का. आरएन सिंह: चलो कामरेड, ये दुनिया हमारी है

का. आरएन सिंह: चलो कामरेड, ये दुनिया हमारी है

-- दिव्या भगत

उस दिन बहुत सारे लोग सोनारई नदी के किनारे का. आरएन सिंह को नम आंखों के साथ विदा देने के लिए खड़े थे. मेरे बगल में खड़ी कामरेड सुशीला फफक-फफक कर रोते हुए कह रही थीं – ‘मैं पहली बार श्मशान घाट पर आई हूं. मुझे जब सर में गोली लगी थी, तो वे हाथों से मुझे बच्चे की तरह खाना खिलाया करते थे ... करीब एक महीने खिलाया होगा मुझे.’ वह बमुश्किल इतना ही बोल पाईं, और फिर से रोने लगीं.

पलामू प्रमंडल से बाहर के अधिकांश साथी उनको इस वजह से भी जानते हैं कि उन्होंने अपनी युवावस्था में ही का. डाॅ. महेश्वर के लिए ‘किडनी दान’ की थी. किन्तु उनकी असली पहचान जनता के संघर्षों के प्रति उनके उस नजरिए और आंदोलन की उस समझदारी से बनती है जिसे उन्होंने जमीन से जुड़कर हासिल किया था. कोई किताब पढ़कर नहीं बल्कि यहां के सामंती समाज द्वारा शोषण के प्रत्यक्ष अनुभव जनित ज्ञान के जरिए वे आंदोलन से जुड़े.

मेरी पहली मुलाकात उनसे तब हुई जब मेरी बहन और मां को झूठे केस में फंसा कर जेल भेजा जा रहा था. बरसों बाद उन्होंने मुझे उस पहली मुलाकात की याद दिलाते हुए बताया था कि वे मुझसे बात करने में इस वजह से संकोच करते थे कि मैं जेएनयू से पढ़कर आई थी और उन्हें इस बात का डर लगता था कि उनके मुंह से कोई ऐसी बात न निकल पड़े जो सैद्धांतिक रूप से गलत हो. उनकी यह बात सुनकर मुझे बहुत हंसी आई. बहुत बाद में मेरी समझ में आया कि महिलाओं, शोषितों और दबे-कुचले वर्ग से आने वाले लोगों के लिए वे इतने प्रिय क्यों थे क्योंकि वे ‘क्रांति’ को न केवल समझते थे, बल्कि वे उसको जीते भी थे.

पलामू के हमारे एक साथी ने, जो पहले दिल्ली में रहते थे और पार्टी में नए-नए आए थे, एक बार आरएन सिंह से पूछा – ‘शोषित या दलित वर्ग का एक आदमी अगर एक उच्च वर्ग के किसी व्यक्ति (सामंत) को अकारण थप्पड़ मार दे या उसकी संपत्ति चोरी कर ले तो क्या तब भी वह सही है? का. आरएन सिंह ने उनको बताया कि यह भी एक किस्म का विद्रोह है, यह भी एक तरह की सामाजिक गतिशीलता है. हमें इसकी निंदा करने के बजाय उसे सही दिशा देने का प्रयास करना चाहिए.

जटिल व मुश्किल परिस्थितियों में भी एक सच्चे नेता की तरह अडिग होकर फैसला लेने के बहुत सारे किस्से हैं लेकिन एक घटना जो मेरे सामने ही घटित हुई, उसका जिक्र में जरूर करना चाहूंगी.

2019 के मई का महीना था – कोरोना काल. पलामू जिले के पाटन प्रखंड के मेराल गांव में एक आदिवासी नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसकी हत्या कर दी गई थी, बलात्कारी उसी गांव रसूख वाले लोग थे. बंगाल के डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) उन लोगों के रिश्तेदार थे, सो उन्हें सजा का कोई डर तो था ही नहीं. वे खुलेआम घूम रहे थे, लड़की के घर वालों पर केस वापस लेने का दवाब भी डाल रहे थे. पुलिस भी उनकी हर तरह से मदद कर रही थी – पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ हेर-फेर, लड़की के भाइयों और रिश्तेदारों को थाने में रख कर पीटना, सरकारी नौकरी का लालच देकर अपनी ही बहन के साथ बलातकार करने के जुर्म को कबूल कर लेने का दबाव डालना. पीड़िता के परिजनों व ग्रामीणों ने हमारे संगठन के क्षेत्रीय साथियों से मदद की गुहार लगाई तो भाकपा(माले) और अन्य सामाजिक संगठनों ने इस मामले में हस्तक्षेप किया. कोरोना काल के अपने ही नियम थे जैसे कि थाने और सरकारी दफ्तरों में प्रवेश निषेध, पोस्ट के द्वारा आवेदन देना, शिकायत करने के लिए थाने न आना. पुलिस वालों का मनमानापन बढ़ गया था, जनता की कोई सुनवाई ही नहीं हो रही थी. पीड़िता के परिजनों समेत पूरा गांव आंदोलन छेड़े के लिए आतुर था लेकिन न तो थाने का घेराव हो सकता था और न ही जिला समाहरणालय का.

संगठन ने तय किया कि इस अन्याय और जुल्म के खिलाफ गांव में आंदोलनात्मक कार्यक्रम किया जाये. पहले मशाल जुलूस निकाला जाये और उसके अगले दिन गांव के पंचायत कार्यालय में एक सभा की जाये. तय कार्यक्रम के अनुसार मशाल जुलूस निकला. उसके अगले दिन बड़ी सभा हुई जिसमें ग्राम के हजारों लोगों ने शिरकत की. सभा के बाद हमारी पार्टी के नेता-कार्यकर्ता अपने-अपने गांव चले गए. मैं भी एक साथी को लेकर उस गांव से बाहर निकल चुकी थी और बगल के गांव में जा रही थी. तभी हमने अपने पीछे फायरिंग की आवाज सुनी. हमारे फोन बंद थे. आगे जाकर एक जगह हमने फोन चार्ज किया और पार्टी के साथियों एवं ग्रामीणों से संपर्क स्थापित किया. यह पता चला कि हमारे वहां से जाने के बाद एक ग्रामीण पर गोली चलाई गई और महिलाओं और बच्चों के साथ मारपीट भी की गई. उस गांव से हमारे निकलते ही थाना प्रभारी औरं सर्किल ऑफिसर 30-40 पुलिस वालों के साथ गांव में घुसे और उन्होंने भीड़ पर ही गोली चलवा दी.

यह घटना बहुत बड़ी थी अतः इस पर तुरत एक्शन लेना भी जरूरी था. ग्रामीणों में असंतोष था और उन्होंने थाना प्रभारी को बंधक बना लिया था. वहां थी सिर्फ मैं और मेरे एक साथी. तुरंत कोई बैठक भी नहीं बुलायी जा सकती थी, और यूं ही बिना सोचे-समझे जाया भी नहीं जा सकता था. हमने जिले के कई वरिष्ठ साथियों को फोन किया लेकिन हमें सही दिशा मिली का. आरएन सिंह से बात करने के बाद. उन्होंने पहले तो माहौल को समझने का प्रयास किया और फिर बड़े साफ तरीके से कहा कि अगर गांव के लोगों ने थाना प्रभारी को बंधक बना लिया है और बातचीत करने कोई बड़े अधिकारी गांव में आ रहे हैं तेा हमारा वहां रहना बहुत जरूरी है. कोई पार्टी प्रतिनिधि न हो तो वे लोगों के ऊपर कहर की तरह टूट पड़ेंगे. इसमें बहुत सारी जानें भी जा सकती हैं, गिरफ्तारियां तो होंगी ही. गांव में वापस लौटना तो मैं भी चाह रही थी लेकिन उनके पास इसके स्पष्ट कारण थे. राजनीतिक समझ और जनहित के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता ही थी कि उन्हें फैसला लेने में कोई वक्त नहीं लगा. यह गहरी समझ ही एक सच्चे नेता की असली निशानी है.

एक और बात है जिसके बारे में मुझसे बेहतर कोई नहीं महसूस कर सकता. वह है पलामू जैसे भयावह सामंती, पितृसत्तात्मक व जातिवादी जगह में भी एक नारीवादी इंसान की तरह सोचना. और न केवल सोचना बल्कि उसको अपने जीवन में उतारना भी. तब मुझे उस बात की याद आती है जो उन्होंने पहली बार मुझे देखकर कहा था. किसी युवती का सम्मान ‘पिता’ बनकर नहीं, बल्कि ‘सच्चा साथी’ बनकर ही हासिल किया जा सकता है – यह बात उनके दिल के तहों में गहरी छुपी रहती थी. पलामू में संघर्ष करते हुए मैंने स्कूटी की बहुत सवारी की. बहुत कम ही पुरुष साथी स्कूटी पर मेरे पीछे बैठे हैं, शायद किसी महिला के पीछे बैठना कमतर माना जाता हो. लेकिन जिस सहजता से उन्होंने कई महिला साथियों को अपनी बाइक पर पीछे बैठाया होगा, उससे कई गुना ज्यादा गर्व के साथ वे मेरी स्कूटी पर पीछे बैठे होंगे. हम दोनों ने न जाने कितने जंगली, पहाड़ी व मैदानी रास्ते साथ में तय किए होंगे. इससे पहले मेरे पिता ने ही मुझमें ऐसा विश्वास दिखाया था जो देर रात भी स्कूटी पर सवार होकर कहते थे ‘चलो बेटा, कुछ नहीं होता, ये शहर हमारा है’. का. आरएन सिंह भी मानो उसी तरह हमेशा कहते हों – ‘चलो कामरेड, ये दुनिया हमारी है.’

मेरे पार्टी में आने से पहले सन 2000 के आसपास ऐसे ही एक घटता हुई थी. एक लड़की के साथ बलात्कार के हुआ था. सामन्तों का दबदबा ऐसा था कि उसके मां-बाप को ही थाने में बंद कर धमकाया जा रहा था. का. आरएन सिंह, कविता सिंह (महिला नेत्री, जो तब बहुत सक्रिय थीं)  और दो-तीन अन्य साथी रात में ही थाने पहुंच गए थे. वहां से हटाने के लिए पहले तो उन्हें डराया-धमकाया गया और फिर भी नहीं माने तो थाने में ही उल्टा लटका बर्बरतापूर्ण पिटाई की गई.  लेकिन वे जाने को तैयार नहीं हुए. थक-हारकर पुलिस को सुबह तक सबको छोड़ना पड़ा.

जीवन में मैंने केवल एक बार उनको परेशान देखा, तब जब उनके बेटे का देहांत हुआ था. वे उसका अंतिम संस्कार कर लौटे थे, अपने आंगन में बैठे थे जहां गांव के लोग और रिश्तेदार भी मौजूद थे. लेकिन तब भी उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज का पालन करते हुए दशकर्म करने से मना कर दिया. इसका बहुत विरोध हुआ – कभी सनातन धर्म का वास्ता, तो कभी सामाजिक बहिष्कार की धमकी. किन्तु का. आरएन सिंह उस हाल में भी अडिग रहे और उन्होंने एक श्रद्धांजलि सभा के लिए दिन तय किया. वह दिन अभी भी मेरी आंखों के सामने आ जाता है.

सबसे अंत में बात पार्टी में उनके शुरुआती दिनों की जब वे बिल्कुल नौजवान ही थे. एक पत्रिका में मनातू के आदमखोर मउआर (Maneater of Palamu) के सामंती अत्याचार की कहानी छपी थी. इस कहानी को पढ़कर का. लालचंद साहू ने पलामू आने और यहां पार्टी का निर्माण करने का फैसला लिया. लेकिन बहुत दिनों तक प्रयास करने के बाद भी ऐसा नहीं हो सका. का. लालचंद साहू को जब लगने लगा था कि पलामू में क्रांतिकारी कार्य के किए कोई युवक तैयार ही नहीं है, तब वे यहां से जाने की तैयारी करने लगे थे. तभी का. आरएन सिंह ने उस इलाके में सामंतो के अत्याचार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया – कुछ सामंतों के घरों पर बम फेंक दिए. इस धामाके की गूंज दूर-दूर तक फैली और उसी के असर से वहां पार्टी की नींव भी पड़ गई.

जीवन के अंतिम समयों में भी वे छात्रों के आंदोलन के बीच थे. तीन दिन के अंतराल पर डायलिसिस कराते हुए भी हमेशा जोश और प्रेरणा से भरे – अथक साहस, चट्टान सी अडिगता और अथाह प्रेम से भरे-पूरे हुए.



29 August, 2026