नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर युवा महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा उन्हें और उनकी मां को अपशब्द कहने के मामले में चेतावनी दी. इसके बाद भारत की मुखर जेन-जी महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन और ऑफलाइन धमकियों और गालियों की बाढ़ आ गई. फिर नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने भाषण में ‘दिमागी नक्सलियों’ की तुरंत पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान किया. इसका नतीजा यह हुआ कि भारत के स्कूलों की जांच और ऑडिट करने की कोशिश कर रहे कार्यकर्ताओं पर शारीरिक हमले हुए और कोलकाता की मशहूर यादवपुर यूनिवर्सिटी में आधी रात को ‘तांडव’ हुआ – संघ से जुड़े उपद्रवियों की भीड़ ने वहां हिंसक हमला किया जिसकी अगुवाई प्रत्यक्षतः यादवपुर से नवनिर्वाचित भाजपा विधायक कर रहे थे. साफ है कि मोदी के इशारे सिर्फ खोखली बातें नहीं हैं, बल्कि उनके समर्थकों के लिए ‘कार्रवाई’ के आदेश होते हैं. ऐसा लगता है कि मोदी सरकार पहले से कहीं अधिक जोर-जबर्दस्ती और हिंसा का इस्तेमाल करके अपनी ढीली पड़ती पकड़ को मजबूत करने पर आमादा है, लेकिन जंतर-मंतर का सबसे बड़ा संदेश युवा भारत का यह ऐलान है कि वह अब डर से आजाद है.
यादवपुर यूनिवर्सिटी में आधी रात को हुआ संघी हमला हमें 2019-20 के दौर में दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) पर हुए हमलों की याद दिलाता है. भाजपा अभी तक यादवपुर यूनिवर्सिटी समुदाय – शिक्षक, छात्र या कर्मचारी – के बीच वैसी पैठ नहीं बना पाई है जैसी उसने जेएनयू में बनाई थी, इसलिए यह हमला मुख्यतः बाहर से ही आयोजित किया गया था. लेकिन पुलिस द्वारा हमलावरों को खुली छूट देने और स्थानीय भाजपा विधायक के नेतृत्व में होने के कारण हमलावर भीड़ के घातक इरादों और ताकत को लेकर कोई शक नहीं रह गया था. सिर्फ एक फोल्डिंग गेट था जिसने छात्रों को उन हमलावरों से बचाया, जो मुख्य गेट को पहले ही तोड़ चुके थे. कुछ दिन पहले ऐसी ही एक भीड़ मुख्य गेट के बाहर लेनिन की मूर्ति तोड़ने के मकसद से जमा हुई थी; वे भारत के बंटवारे के लिए लेनिन को जिम्मेदार ठहरा रहे थे जबकि यह बंटवारा लेनिन की मौत के तेईस साल बाद हुआ था.
संघी गुंडों ने यादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रतीक चिह्न (एमब्लेम) को तोड़ा और उसे पैरों तले रौंदा. इस प्रतीक चिह्न को महान कलाकार नंदलाल बोस ने डिजाइन किया था, जिन्होंने संविधान सभा द्वारा अपनाए गए भारत के संविधान की प्रति को भी चित्रित किया था. हालांकि पश्चिम बंगाल की जनता ने यादवपुर यूनिवर्सिटी पर हुए संघी हमले की तुरंत और साफ तौर पर निंदा की है. यह यूनिवर्सिटी आजादी की लड़ाई के समय से ही अपनी शानदार ऐतिहासिक विरासत और शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है. जनता के इस विरोध के कारण भाजपा को फिलहाल पीछे हटना पड़ा है. पार्टी के राज्य अध्यक्ष ने एबीवीपी की कोई भी जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया और उसे एक अलग संगठन बताया. वहीं, जिस भाजपा विधायक ने रात भर तबाही मचाने (उन्होंने ‘तांडव’ शब्द का इस्तेमाल किया था) की धमकी दी थी, उन्होंने अगले दिन हुई हिंसा के लिए भाजपा के झंडे का इस्तेमाल करने वाले टीएमसी के उपद्रवियों को जिम्मेदार ठहराया! हालांकि, शुभेंदु अधिकारी यादवपुर यूनिवर्सिटी को राष्ट्र-विरोधी विचारों और ताकतों का गढ़ बताकर बदनाम करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने छह महीने के भीतर कैंपस में ‘राष्ट्रवाद’ का वर्चस्व स्थापित करने का संकल्प लिया है!
भाजपा किसी विश्वविद्यालय की राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्धता को कैसे परखती है? मोदी सरकार ने देशभक्ति की नई कसौटी के तौर पर ‘वंदे मातरम’ के अत्यल्प चर्चित लंबे संस्करण का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. टैगोर ने ही उपन्यासकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की मूल कविता ‘वंदे मातरम’ को संगीतबद्ध किया था और कांग्रेस के अधिवेशन में इसे गाया था. साथ ही, टैगोर ने ही यह सुझाव दिया था कि कविता के केवल शुरूआती दो पद ही राष्ट्रगीत के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के लिए उपयुक्त हैं. असल में, कविता के मूल संस्करण में केवल ये दो ही पद थे; कविता का लंबा संस्करण ‘आनंद मठ’ उपन्यास की जरूरतों के हिसाब से उसमें बदलाव करने के कारण बना था. अब मोदी सरकार ‘वंदे मातरम’ के लंबे संस्करण को भारत के राष्ट्रगीत के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है और पूरे देश को देशभक्ति की इस नई कसौटी पर परखना चाहती है. राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति में महिलाओं के प्रति घोर नफरत पर खुलेआम सवाल उठाए जाने के बाद, हो सकता है कि भाजपा अब मनुस्मृति को ‘सभ्यता की कसौटी’ के तौर पर इस्तेमाल करे, जबकि भारत इस गुलामी के प्रतीक को बाबासाहब अंबेडकर द्वारा सार्वजनिक रूप से जलाए जाने की घटना की 100वीं बरसी मनाने से बस एक साल दूर है.
एक तरफ जहां संघ ब्रिगेड ने शिक्षा, शैक्षिक स्वतंत्रता और कैंपस में लोकतंत्र के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है, वहीं दूसरी तरफ संस्थागत उदासीनता और अन्याय के खिलाफ छात्रों के प्रतिवाद भी तेज होते जा रहे हैं. ‘स्कूल ठीक करो’ का नारा अब शिक्षा में जरूरी सुधारों के लिए देशव्यापी अभियान का रूप ले रहा है. दिल्ली आइआइटी में दूसरे साल के छात्र हृषिकेश कुमार की रहस्यमयी मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रतिवाद शुरू हो गए हैं. हाल के वर्षों में आइआइटी, आइआइएम और दूसरे बड़े संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है. पिछले दो दशकों में विभिन्न आइआइटी में छात्रों की आत्महत्या के 160 से ज्यादा मामले सामने आए हैं, जिनमें से 70 से ज्यादा मामले तो सिर्फ पिछले पांच सालों में हुए हैं. और भारत के कैंपस से बाहर 8.7 करोड़ युवा भारतीय हैं, जिन्हें सरकार के ही ‘नीति’ आयोग ने नीट (एनईईटी) का नाम दिया है – यहां एनईईटी का मतलब है 15-29 साल की उम्र के वे युवा भारतीय जो किसी भी तरह की शिक्षा, रोजगार या ट्रेनिंग में शामिल नहीं हैं. 37 करोड़ युवाओं की आबादी में से 8.7 करोड़ का मतलब है हर चार में से एक युवा भारतीय. सरकार भले ही वंदे मातरम और मनुस्मृति का इस्तेमाल हथियार के तौर पर करे, लेकिन भारत के लोग तब तक लड़ते रहेंगे जब तक जेन-अल्फा के लिए गुणवत्तापूर्ण सार्विक शिक्षा और जेन-जी के लिए सुरक्षित व सम्मानजनक रोजगार सुनिश्चित नहीं हो जाता.