-- रंजन श्रीवास्तव
अक्सर मीडिया में हमें बताया जाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है. लेकिन जब आप अपने बटुए की ओर देखते हैं, तो कहानी कुछ और नजर आती है. हमारे बाजार सजे हुए हैं, लेकिन खरीदार गायब हैं. हमारी कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन युवाओं के पास नौकरियां नहीं हैं. जीडीपी के आंकड़े दिखाए जाते हैं, लेकिन लोगों के पास पैसा नहीं है. यह विरोधाभास केवल एक आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि एक ऐसे गहरे सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल की शुरुआत है, जिसे भारत ने पिछले 30 सालों में नहीं देखा. यह आलेख इसी परिस्थिति को समझने की एक कोशिश है.
बाजार से खरीदार गायब हैं
अर्थव्यवस्था को चलाने वाला सबसे बड़ा इंजन है आम आदमी की खरीदारी. जब हम साबुन, तेल, कपड़े या फ्रिज खरीदते हैं, तो कारखाने चलते हैं और नौकरियां पैदा होती हैं. लेकिन आज यह इंजन ठंडा पड़ता दिख रहा है.
आंकड़ों के अनुसार भारत की विकास दर उस रफ्तार पर नहीं लौट पाई है, जो कोरोना से पहले थी. निजी उपभोग, जो भारतीय जीडीपी का लगभग 57 प्रतिशत हिस्सा है, उसकी वृद्धि दर लगातार दबाव में है. ग्रामीण मजदूरी की वास्तविक वृद्धि कई राज्यों में शून्य के आसपास बनी हुई है. एफएमसीजी (तेजी से बिकनेवाले उपभेक्ता सामान) कंपनियों ने भी अपनी रिपोर्टों में ग्रामीण मांग की कमजोरी का उल्लेख किया है.
इसे समझने के लिए हम हाई फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स यानी रोजमर्रा के संकेतों को देखते हैं.
ट्रकों और भारी वाहनों की बिक्री में वृद्धि मात्र 1% है. अगर देश में व्यापार और सामान की आवाजाही बढ़ रही होती, तो नए ट्रकों की मांग बहुत ज्यादा होती. इसी तरह पेट्रोल और डीजल की खपत की रफ्तार भी सुस्त है. रेलवे की माल ढुलाई वृद्धि भी पहले की तुलना में धीमी हुई है, जो औद्योगिक गतिविधियों की कमजोरी की ओर संकेत करती है.
सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगों की असली कमाई नहीं बढ़ रही. अगर आपकी तनख्वाह 10% बढ़ी लेकिन महंगाई भी 10% बढ़ गई, तो असल में आपकी कमाई में वृद्धि शून्य रही. आज करोड़ों भारतीय इसी स्थिति में हैं. शहरी क्षेत्रों में खाद्य, किराया, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च आय की तुलना में कहीं तेजी से बढ़े हैं.
बाजार में सामान तो बहुत है, लेकिन लोगों की जेब खाली है. जब लोग खरीदारी नहीं करते, तो कंपनियां नए कारखाने नहीं लगातीं, और जब कारखाने नहीं लगते, तो नई नौकरियां पैदा नहीं होतीं. यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें हमारी अर्थव्यवस्था फंस गई है.
K आकार की तरक्की: एक देश, दो अलग दुनिया
वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था K आकार की तरक्की के दौर से गुजर रही है. इसका अर्थ यह है कि समाज का एक छोटा हिस्सा बहुत तेजी से अमीर हो रहा है, जबकि बड़ा हिस्सा अपनी आय और बचत खो रहा है. यह विभाजन अब इतना गहरा हो गया है कि यह दो अलग अलग भारत का निर्माण कर रहा है.
अमीर भारत की झलक हमें लग्जरी कार बाजार और प्रीमियम रियल एस्टेट में मिलती है. 3 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के घरों और लग्जरी गाड़ियों की बिक्री में 33.5% की भारी वृद्धि हुई है. मुंबई, गुरुग्राम और बेंगलुरु जैसे शहरों में अल्ट्रा लग्जरी प्राॅपर्टी की मांग रिकाॅर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है. शेयर बाजार रिकाॅर्ड ऊंचाई पर है और काॅर्पाेरेट जगत का मुनाफा लगातार बढ़ता जा रहा है. भारत में डाॅलर अरबपतियों की संख्या पिछले दशक में तेजी से बढ़ी है. इस विकास का सीधा लाभ समाज के शीर्ष 5% लोगों को मिल रहा है.
दूसरी तरफ बाकी भारत का हाल बहुत अलग है. इसका सबसे सटीक पैमाना दोपहिया वाहनों की बिक्री है. दोपहिया वाहन मध्यम और निम्न वर्ग की आकांक्षाओं का प्रतीक होते हैं. लेकिन इनकी बिक्री आज भी 2018 और 2019 के स्तर को नहीं छू पाई है. छोटी कारों की बिक्री में भी लगातार कमजोरी देखी जा रही है. इसका मतलब है कि आम आदमी के लिए आज एक मोटरसाइकिल खरीदना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है.
भारत के शीर्ष 10% लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का लगभग 70% हिस्सा केंद्रित होने का अनुमान है, जबकि नीचे के 50% लोगों की वास्तविक आय वृद्धि बेहद सीमित रही है.
यह ज्ञ आकार का विकास समाज में एक खतरनाक मनोवैज्ञानिक तनाव पैदा कर रहा है. जब आम आदमी देखता है कि एक तरफ बेहिसाब विलासिता है और दूसरी तरफ उसकी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो रही हैं, तो यह सापेक्षिक अभाव की भावना पैदा करता है, जो सामाजिक अस्थिरता की पहली सीढ़ी है.
मध्यम वर्ग का पतन: बचत का अंत और कर्ज का जाल
भारत का मध्यम वर्ग पारंपरिक रूप से अपनी बचत के लिए जाना जाता था. लेकिन आज यह ताकत खत्म हो रही है. ताजा आंकड़ों के अनुसार भारतीय परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत गिरकर जीडीपी के मात्रा 5.2% पर आ गई है. यह पिछले 50 वर्षों का सबसे निचला स्तर है.
घरेलू बचत दर जो कभी भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत मानी जाती थी, अब लगातार कमजोर हो रही है. कई परिवार अपनी बचत एफडी या पोस्ट ऑफिस में रखने के बजाय रोजमर्रा के खर्चों में इस्तेमाल कर रहे हैं.
आय स्थिर होने और खर्च बढ़ने के कारण मध्यम वर्ग अब अपनी जीवनशैली बनाए रखने के लिए कर्ज का सहारा ले रहा है. बिना गारंटी वाले कर्जों और क्रेडिट कार्ड खर्च में 25 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है. लोग रोजमर्रा की जरूरतों, बच्चों की फीस और मेडिकल बिलों के लिए कर्ज ले रहे हैं. आरबीआइ के आंकड़ों के अनुसार व्यक्तिगत ऋण भारतीय बैंकिंग प्रणाली के सबसे तेजी से बढ़ते हिस्सों में शामिल है.
मध्यम वर्ग अब उस नाजुक मोड़ पर खड़ा है जहां एक भी छोटा आर्थिक झटका उन्हें सीधे गरीबी रेखा के नीचे धकेल सकता है. जब समाज की रीढ़ माना जाने वाला मध्यम वर्ग खुद को असुरक्षित और गरीब होते देखता है, तो वह व्यवस्था के प्रति विद्रोही हो जाता है.
तकनीकी सुनामीः AI और नौकरियों का विनाश
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का उदय भारत के लिए एक ऐसी चुनौती बनकर उभरा है जिसके लिए हम तैयार नहीं हैं.
पिछली तकनीकी क्रांतियों ने शारीरिक श्रम की जगह ली थी, लेकिन AI अब बौद्धिक श्रम की जगह ले रहा है. भारत का मध्यम वर्ग मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र और विशेष रूप से AI उद्योग पर निर्भर है. AI और BPO सेक्टर भारत के करोड़ों शहरी परिवारों की आय का आधार रहे हैं. AI अब कोडिंग, बेसिक प्रोग्रामिंग, डेटा एनालिसिस और क्लर्क के काम इंसानों से कहीं तेजी और सस्ते में कर रहा है.
वैश्विक टेक कंपनियों ने पिछले दो वर्षों में लाखों कर्मचारियों की छंटनी की है. भारत में भी शुरूआती स्तर की भर्ती में तेज गिरावट देखी गई है. कई कंपनियां अब प्रफेशर्स की भर्ती कम कर रही हैं और AI आधारित ऑटोमेशन पर जोर दे रही हैं.
इसका परिणाम यह है कि आइटी क्षेत्र और अन्य सफेद काॅलर नौकरियों में नई भर्तियां लगभग थम गई हैं. 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर पहले से ही गंभीर है. शिक्षित बेरोजगारी ग्रामीण बेरोजगारी की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है. हर साल लाखों युवा डिग्रियां लेकर निकल रहे हैं, लेकिन बाजार में उनके कौशल की मांग घटती जा रही है.
AI केवल पुरानी नौकरियों को खत्म नहीं कर रहा, बल्कि नई नौकरियों के सृजन को भी रोक रहा है. यह स्थिति भविष्य में एक बड़े सामाजिक संकट का कारण बन सकती है.
काॅर्पाेरेट मुनाफा बनाम निवेश की कमी
भारतीय काॅर्पाेरेट जगत वर्तमान में एक बड़े विरोधाभास से गुजर रहा है. एक तरफ बड़ी कंपनियां रिकाॅर्ड मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे नए कारखाने लगाने से बच रही हैं.
मुनाफा मुख्य रूप से खर्चों में कटौती से आ रहा है, न कि ज्यादा बिक्री से. कंपनियां लागत कम कर रही हैं, जिसका अर्थ है कम लोगों को नौकरी देना या वेतन न बढ़ाना.
कई बड़ी कंपनियों के पास रिकाॅर्ड कैश रिजर्व मौजूद हैं, फिर भी निजी पूंजीगत व्यय अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ रहा. क्षमता उपयोग (capacity utilization) कई क्षेत्रों में अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है जहां कंपनियां बड़े निवेश का जोखिम लें.
जब बिक्री की वृद्धि दर सुस्त होती है, तो कंपनी मालिकों को भविष्य में लाभ की उम्मीद कम हो जाती है. इसलिए भारी नकदी होने के बावजूद वे नए निवेश नहीं कर रहे हैं.
बिना निजी निवेश के देश में अच्छी और स्थायी नौकरियां पैदा होना संभव नहीं है. यही वजह है कि मांग की कमी और रोजगार संकट एक दूसरे को लगातार बढ़ा रहे हैं.
चीनी विनिर्माण शक्ति और भारत की चुनौती
भारत का मेक इन इंडिया सपना चीन की विनिर्माण शक्ति के सामने कठिन चुनौती का सामना कर रहा है.
चीन आज वैश्विक विनिर्माण उत्पादन का लगभग 30% नियंत्रित करता है. इलेक्ट्राॅनिक्स, सोलर पैनल, स्टील, केमिकल्स और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में उसकी लागत भारत की तुलना में काफी कम है.
चीनी उत्पाद भारतीय उत्पादों की तुलना में 40 से 50% तक सस्ते हैं. चीन सरकारी सब्सिडी और बड़े पैमाने के उत्पादन के जरिए वैश्विक बाजारों पर कब्जा कर रहा है.
इसके विपरीत भारतीय सूक्ष्म लघु और मध्यम उद्योग ऊंची ब्याज दरों, बिजली की कमी और बुनियादी ढांचे की समस्याओं से जूझ रहे हैं. जब सस्ता चीनी माल भारतीय बाजार में भर जाता है, तो हमारे छोटे उद्योग बंद होने लगते हैं.
भारत में सबसे ज्यादा रोजगार छोटे उद्योगों से आता है. डैडम् सेक्टर भारत के कुल रोजगार का लगभग 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्रदान करता है. इसलिए डैडम् क्षेत्र का कमजोर होना सीधे बेरोजगारी को बढ़ाता है.
विदेशी निवेश का पलायन
2000 से 2010 का दशक में विदेशी निवेश भारत की विकास यात्रा का बड़ा इंजन था. लेकिन अब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. इसका मुख्य कारण है भारत की कमजोर होती मांग. जब निवेशकों को दिखता है कि मध्यम वर्ग कर्ज में डूबा है और उपभोग कमजोर है, तो उन्हें भविष्य में मुनाफे की संभावना कम नजर आती है.
इसके अलावा अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों के कारण वैश्विक पूंजी सुरक्षित बाजारों की ओर लौट रही है. इससे उभरते बाजारों पर दबाव बढ़ा है. विदेशी पूंजी का बाहर जाना भारतीय रुपये को कमजोर कर रहा है. इससे आयात महंगे हो जाते हैं और महंगाई बढ़ती है. कच्चे तेल और इलेक्ट्राॅनिक्स आयात पर भारत की निर्भरता इस समस्या को और बढ़ाती है.
भारी सरकारी कर्ज और शेयर बाजार का बुलबुला
भारत का सरकारी कर्ज लगातार बढ़ रहा है. सरकार बुनियादी ढांचे के लिए लगातार उधार ले रही है, लेकिन इस कर्ज का ब्याज चुकाने में ही बजट का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है.
केंद्र सरकार के कुल व्यय का बड़ा हिस्सा अब ब्याज भुगतान में चला जाता है. इससे स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं.
इसी समय शेयर बाजार में सट्टेबाजी का माहौल बना हुआ है. मध्यम वर्ग अपनी बची खुची पूंजी शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में लगा रहा है क्योंकि उसे लगता है कि पैसा केवल यहीं बनेगा. व्यवस्थित निवेश योजना (SIP) निवेश रिकाॅर्ड स्तर पर पहुंच चुका है और लाखों नए निवेशक शेयर बाजार में आए हैं. लेकिन अगर वैश्विक संकट या अमेरिकी मंदी आती है, तो भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ सकती है. यदि ऐसा हुआ, तो करोड़ों परिवारों की बचत खत्म हो सकती है.
सामाजिक और राजनीतिक ज्वालामुखी की ओर भारत
पूरा आर्थिक परिदृश्य इस निष्कर्ष की ओर संकेत करता है कि भारत एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के दौर में प्रवेश कर रहा है. जब समाज का शिक्षित मध्यम वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है, जब युवाओं को भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगता है, जब अमीरी और गरीबी के बीच का अंतर बहुत तेजी से बढ़ता है, तब समाज के भीतर गहरी बेचैनी पैदा होती है. इतिहास गवाह है कि आर्थिक हताशा जब एक सीमा पार कर जाती है, तो वह बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों का कारण बनती है. भारत आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है.