वर्ष 35 / अंक - 29 / लगता है, दौलत मर्दों के लिए है और काम औरतों के लिए

लगता है, दौलत मर्दों के लिए है और काम औरतों के लिए

लगता है, दौलत मर्दों के लिए है और काम औरतों के लिए

-- बीना अग्रवाल

[ दुनिया में दौलत की असमानता कम करनी है तो जितनी जरूरत घर की दौलत की असमानता पर काम करने की है, उतनी ही जरूरत है औरतों और मर्दों के बीच दौलत की असमानता पर काम करने की ]

वर्ल्ड इनइक्वैलिटी रिपोर्ट 2026 इसी जून में पेरिस स्कूल ऑफ इकोनाॅमिक्स के वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने छापी. यूएन की रिपोर्ट ‘काउंटिंग व्हाट काउंट्स’ इसी मई में आई. पहली रिपोर्ट सीधे असमानता की बात करती है, दूसरी थोड़ा-बहुत. दोनों में औरतों की असमानता पर भी कुछ ध्यान दिया गया है. पर कैसे? बस इस बात पर कि नौकरी-काम में औरतों की हालत मर्दों से खराब है. पर एक सवाल पूछना बनता है: और दौलत की असमानता का क्या? दोनों रिपोर्टों में औरतों और दौलत की बात कहीं नहीं है, जबकि वर्ल्ड इनइक्वैलिटी रिपोर्ट में घर की दौलत की असमानता पर कई अध्याय हैं, पर उनमें भी औरत-मर्द का कोई जिक्र नहीं. तो फिर इन रिपोर्टों का मतलब क्या निकलता है? कि दौलत सिर्फ मर्दों के लिए है और औरतें बस मजदूर हैं?

दशकों से महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर जो भारी-भरकम अकादमिक रिसर्च हुई है, वो ज्यादातर एक ही बात पर टिकी रही है: लेबर मार्केट में औरतों की हालत. अनगिनत रिपोर्टों, रिसर्च पेपर्स और नीतिगत दस्तावेजों में संपत्ति और जायदाद को लेकर लैंगिक असमानता को बार-बार नजरअंदाज किया गया है. महिलाओं की आर्थिक स्थिति आंकने का यह गलत नजरिया, जो सालों से चला आ रहा है, दुनिया के एक बड़े हिस्से में लैंगिक आर्थिक असमानता की असली जड़ को नीतियों की नजर से पूरी तरह गायब और उपेक्षित बना देता है. नारीवादी अर्थशास्त्रियों का काम भी इस पूर्वाग्रह से पूरी तरह अछूता नहीं है.

आर्थिक संपत्ति और जायदाद के मामले में लैंगिक असमानता को मापना आखिर इतना जरूरी क्यों है? सिर्फ इसलिए नहीं कि नापने के तरीके में बड़ी गड़बड़ी है, बल्कि इसलिए भी कि जायदाद का मालिकाना (क) औरतों और बच्चों की भलाई पर वो असर डालता है जो सिर्फ नौकरी करने से नहीं पड़ता; (ख) उत्पादन और आर्थिक तरक्की पर असर डालता है; और (ग) ज्यादातर अच्छी कमाई और अच्छे काम की जड़ में यही है. एक-एक करके देखते हैं.

पहली बात, पिछले तीस साल (1994-2024) का दुनिया भर का शोध – जिसकी शुरुआत मेरी अपनी 1994 की किताब ‘अ फील्ड ऑफ वन्स ओन’ से मानी जा सकती है, आज तक – बताता है कि ग्लोबल साउथ (गरीब और विकासशील देशों) में अगर मां के नाम जायदाद है, तो बच्चे के जिंदा रहने, सेहत और पढ़ाई की हालत, बाप के नाम जायदाद होने से कहीं बेहतर होती है. यहां बात सिर्फ अमीर-गरीब की नहीं, औरत-मर्द की भी है. अपनी जमीन-मकान होने से औरत के ऊपर घरेलू हिंसा का खतरा भी बहुत कम हो जाता है, और शादी टूटने पर गरीबी में गिरने का डर भी.

दूसरी बात, कई अध्ययन – जिनमें फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन के भी शामिल हैं – बताते हैं कि अगर औरतों के पास खेत जैसी उत्पादक जायदाद और उससे जुड़े साधन हों, तो खेती की पैदावार और देश की खेती-तरक्की दोनों बहुत बढ़ सकती हैं. तीसरी बात, खासकर ग्लोबल साउथ में, बहुत सारी औरतों के लिए ठीक-ठाक गुजारे के लिए उत्पादक जायदाद का मालिक होना जरूरी है, क्योंकि ज्यादातर औरतें असंगठित क्षेत्र में और खासकर खेती में काम करती हैं.

भारत की बात करें तो, पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे 2023-24 में दो बातें साफ दिखती हैं. एक, करीब 86 फीसदी काम करने वाली औरतें (गांव और शहर दोनों मिलाकर) और गांव की 91 फीसदी काम करने वाली औरतें असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं. इनमें से करीब 77 फीसदी खेती में लगी हैं. दूसरी बात, गांव की 73 फीसदी काम करने वाली औरतें ‘खुद का काम’ करती हैं – यानी ज्यादातर बिना तनख्वाह के पारिवारिक खेत या छोटे धंधे में काम, जिसमें सड़क पर सामान बेचना भी शामिल है. यानी गांव की काम करने वाली औरतों में से चौथाई से भी कम (और सारी काम करने वाली औरतों में एक तिहाई) को तनख्वाह वाला काम मिलता है (चाहे नियमित हो या ठेके पर). बाकी जो खुद का काम करती हैं, उनके लिए ठीक-ठाक कमाई के लिए जायदाद का मालिक होना बहुत जरूरी है – जैसे खेती के लिए जमीन, या सामान बेचने के लिए ठेला या दुकान वगैरह.

लेकिन अलग-अलग आंकड़े (एनएफएचएस, आईसीआरआईसैट, आईएचडीएस) लगातार दिखाते हैं कि गांव में जिन घरों के पास जमीन है, उनमें से सिर्फ 12-16 फीसदी घरों में जमीन औरतों के नाम है – जबकि असल में बहुत सी औरतें ही खेत संभालती हैं, क्योंकि ज्यादातर मर्द गैर-खेती काम के लिए बाहर चले जाते हैं. इन औरत किसानों के लिए, जमीन, खेती के औजार और बाकी जायदाद का मालिक होना उनके काम और कमाई के लिए बहुत जरूरी है. यही बात छोटे धंधों पर भी लागू होती है.

फिर भी, डब्ल्यूआईआर और यूएन दोनों रिपोर्टें औरतों की आर्थिक हालत नापने के लिए घंटे भर की औसत कमाई को मुख्य पैमाना मानती हैं, और उनकी जायदाद-दौलत की हालत को नजरअंदाज करती हैं – जिससे असल असमानता कहीं ज्यादा कम करके आंकी जाती है. साथ ही, औरतों के ‘बिना तनख्वाह’ वाले काम को सिर्फ घर के काम से जोड़कर, वो पारिवारिक खेत और धंधे में औरतों के बिना तनख्वाह वाले उत्पादक काम को गिनना ही भूल जाती हैं.

तीसरी बात, घंटे भर की कमाई में औरत-मर्द का अनुपात निकालकर असमानता नापना, दोनों रिपोर्टों का यह तरीका भी गलत है. ज्यादातर लोग ‘घंटे’ के हिसाब से नहीं कमाते. खासकर खुद का काम करने वालों की कमाई को ‘घंटे’ में बदलना आसान नहीं. किसान, दुकानदार या सब्जी बेचने वाले की घंटे भर की कमाई कैसे नापोगे, जो अपने काम के घंटे गिनते ही नहीं? कम से कम साल भर की कमाई का औरत-मर्द अनुपात तो लेना चाहिए.

चौथी बात, डब्ल्यूआईआर रिपोर्ट औरतों के मर्दों से कम नौकरी में होने की वजह सस्ती आया-देखभाल, आना-जाना, नौकरी की छुट्टी और नौकरी में भेदभाव को बताती है, पर फिर से जायदाद के मालिकाने को नजरअंदाज कर देती है. कम तनख्वाह का औरतों की दौलत जमा करने पर जो असर पड़ता है, उसका जिक्र बस सरसरी तौर पर है – जबकि पेरिस लैब खुद यह साबित कर चुकी है कि दौलत की असमानता की असली वजह विरासत है, कमाई नहीं.

एक बहाना अक्सर दिया जाता है कि दौलत में औरत-मर्द असमानता नापने के लिए आंकड़े ही नहीं हैं. पर यह बात पूरी सच नहीं. पहली बात, कुछ आंकड़े पहले से मौजूद हैं: जैसे, अमीर देशों में कई जगह पेंशन की दौलत का आंकड़ा औरत-मर्द के हिसाब से मिलता है, और सबसे अमीर 1 फीसदी लोगों में औरत-मर्द का हिसाब भी. गरीब देशों में, कितने-कितने देशों से जमीन के मालिकाने का आंकड़ा औरत-मर्द के हिसाब से मिलने लगा है (एफएओ और वर्ल्ड बैंक से). दूसरी बात, पेरिस का वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब खुद आंकड़े खोदकर निकालता है और कई सरकारों को दौलत के आंकड़े जुटाने-बांटने के लिए राजी भी कर चुका है. आंकड़े अधूरे होने पर भी कुछ अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है. और यह मान लेना भी जरूरी है कि सिर्फ नौकरी-धंधे का हिसाब देखने से आर्थिक असमानता की सतह भी मुश्किल से छूती है.

और हां, दुनिया में दौलत की असमानता कम करनी है तो जितनी जरूरत घर की दौलत की असमानता पर नीति बनाने की है, उतनी ही जरूरत औरत-मर्द की दौलत असमानता पर नीति बनाने की भी है. पर दोनों तरह की नीतियां एक जैसी नहीं हो सकतीं, क्योंकि पहली वाली नीति में घर के अंदर की असमानता से भी निपटना पड़ता है.

दौलत में औरत-मर्द के फर्क को नजरअंदाज करके सिर्फ औरतों के काम-धंधे पर ध्यान देने का मतलब यही निकलता है कि इन दोनों रिपोर्टों को लिखने वाले – जो सब तरक्कीपसंद सोच रखते हैं – इस बात से कोई दिक्कत नहीं रखते कि दुनिया में पूंजी सिर्फ मर्दों के हाथ रहे और औरतें बस अपनी मेहनत बेचती रहें. इक्कीसवीं सदी में यह हाल देखकर तो खुद मार्क्स को भी शर्म आ जाती.

https://indianexpress.com/article/opinion/columns/apparently-wealth-is-for-men-and-
work-is-for-women-10784409/ 13 July 2026

18 July, 2026